न्यूयार्क में मस्जिद
मुद्दा
न्यूयार्क में मस्जिद
राम पुनियानी
9/11 के आतंकी हमले को अमरीका ही नहीं, पूरा विश्व आज तक भुला नहीं सका है. इस
हमले ने वैश्विक राजनीति की दिशा बदल दी. इससे आमजनों के इस्लाम व मुसलमानों के
प्रति दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन आया. अमरीकी समाज में इन दिनों ग्राऊंड जीरो,
वह स्थल जहां डब्लूटीसी टॉवर हुआ करते थे-से थोड़ी दूरी पर “इस्लामिक सांस्कृतिक
केन्द्र“ के निर्माण के प्रस्ताव को लेकर जमकर विवाद हो रहा है. ऐसा लग रहा है मानो
ग्राऊंड जीरो पर कोई मस्जिद बनाई जा रही हो, जिससे अमरीका के घाव हरे होंगे, जिससे
जिहाद की जीत होगी और जो इस्लामिक विस्तारवाद को प्रतिबिंबित करेगा.
उपराष्ट्रपति पद की रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवार साराह पालिन इसका विरोध कर रही
हैं, जबकि राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा का कहना है कि अमरीका में मुसलमानों को अपने
धर्म का पालन करने का बराबरी का अधिकार है.
पहली बात तो यह है कि प्रस्तावित इमारत मस्जिद नहीं है. वह सांस्कृतिक केन्द्र है
जिसमें प्रार्थना करने के लिए कमरे भी होंगे. दूसरा, इसका निर्माण ग्राऊंड जीरो पर
नहीं बल्कि उससे दो ब्लाक दूर प्रस्तावित है. इस परियोजना का मुख्य प्रायोजक
कोरडोवा इनिसियेटिव है, जिसका नाम दसवीं सदी के स्पेन के एक शहर के नाम पर रखा गया
है, जहां ईसाई, मुसलमान और यहूदी मिलजुलकर रहते थे.
इस केन्द्र के निर्माण के लिए सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूर्ण की जा चुकी हैं. इस
परियोजना का उद्धेश्य, अतिवादी विचारधाराओं को हतोत्साहित करना और बहुसंस्कृतिवाद व
शांति के अमरीकी मूल्यों को प्रोत्साहित करना है. इस संस्था के सदस्य मध्यमार्गी
इस्लाम में विश्वास रखते हैं और उन तत्वों के कड़े आलोचक हैं जो इस्लाम के नाम पर
हिंसा करते हैं.
प्रस्तावित इमारत से कुछ ही दूर पहले से ही एक मस्जिद है. न्यूयार्क में पांच लाख
मुसलमान रहते हैं और वहां कई मस्जिदें हैं. फिर, प्रस्तावित सांस्कृतिक
केन्द्र-मस्जिद का इतना विरोध क्यों?
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 9/11 का हमला, जिसके पीछे ओसामा बिन लादेन व उसके
अनुयायियों का हाथ बताया जाता है, इस्लाम का प्रतिनिधित्व नहीं करता. इस हमले में
कई मुसलमान भी मारे गए थे. ओसामा, दुनिया के 135 करोड़ मुसलमानों का प्रतिनिधि नहीं
है. वह तो अल् कायदा का प्रतिनिधि है, जिसे अमरीका ने अफगानिस्तान पर रूसी कब्जे को
समाप्त करने के लिए खड़ा किया था. अल् कायदा के लड़ाकों को प्रशिक्षित करने के लिए
अमरीका ने इस्लाम के सबसे दकियानूसी और कट्टरपंथी स्वरूप-सऊदी अरब में प्रचलित
वहाबी इस्लाम को चुना था.
सऊदी अरब के शासक, अमरीका के पुराने दोस्त हैं और उनसे अमरीका ने वहां के कुओं से
कच्चा तेल निकालने का लंबी अवधि का अनुबंध किया हुआ है. इस्लाम का वहाबी स्वरूप,
इस्लाम की मूल भावना के विपरीत है और काफिर और जिहाद जैसी अवधारणाओं को तोड़-मरोड़कर
प्रस्तुत का यह स्वरूप निर्दोषों की जान लेने को प्रोत्साहित करता है जबकि कुरान के
अनुसार एक निर्दोष व्यक्ति को मारना, पूरी मानवता को मारने के बराबर है.
दुर्भाग्यवश, अमरीका ने तेल-उत्पादक क्षेत्र में अपने हितों की रक्षा के लिए इस्लाम
के सबसे कट्टरपंथी स्वरूप का इस्तेमाल, अपने द्वारा स्थापित मदरसों में किया. अब,
इन मदरसों से प्रशिक्षित होकर निकले भस्मासुर इस क्षेत्र में मुसीबतों का पहाड़ खड़ा
कर रहे हैं. 9/11 के आतंकी हमले के बाद, अमरीकी मीडिया ने इस्लामिक आतंकवाद शब्द
गढ़ा और नतीजतन, आतंकवाद को सामूहिक सोच में इस्लाम और मुसलमानों से जोड़ दिया गया.
अब समय आ गया है कि हम इस प्रक्रिया को पलटें और सभी धर्मों के उदारवादी और
मध्यमार्गी चेहरे को दुनिया के सामने रखें. हमें विभिन्न धर्मों की दकियानूसी
परंपराओं और अतिवाद से बचकर चलना होगा. जो लोग धर्म का इस्तेमाल अपने राजनैतिक
हितों की पूर्ति के लिए करना चाहते हैं, वे हर धर्म के अतिवादी स्वरूप का इस्तेमाल
करते हैं. इसके विपरीत, सभी धर्मों के संतों ने संबंधित धर्मों के मध्यमार्गी,
उदारवादी स्वरूप पर जोर दिया है और उनके द्वारा स्थापित नैतिक मूल्यों को महत्व
दिया है.
पिछले एक दशक में अमरीका में मुसलमानों का दानवीकरण हुआ है. मध्यपूर्व और दक्षिण
एशिया से आए मुसलमान इस प्रक्रिया के मुख्य शिकार बने हैं. “सभ्यताओं के बीच टकराव“
के सिद्धांत का इस्तेमाल धर्मों के बीच बैरभाव बढ़ाने के लिए किया गया है. सच तो यह
है कि नैतिकता के मामले में विभिन्न धर्मों की समानताओं और संस्कृति व भौतिक विकास
के मामले में विभिन्न सभ्यताओं के बीच मेलजोल को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया.
इसका नतीजा यह हुआ है कि आमजनों के एक तबके के दिलो-दिमाग में मुसलमानों की
नकारात्मक छवि अंकित हो गई है.
प्रस्तावित सांस्कृतिक केन्द्र के जरिए, वैश्विक इस्लामिक ताकतें अमरीका पर कब्जा
कर लेंगी, यह आशंका बेबुनियाद है. इस केन्द्र की स्थापना का उद्धेश्य,
अंतरर्धार्मिक रिश्तों की बेहतरी व इस्लाम के मध्यमार्गी स्वरूप को प्रोत्साहित
करना है. ओसामा बिन लादेन के इस्लाम से इस केन्द्र का कोई लेना-देना नहीं है.
अमरीका में भी अधिकांश उदारवादी मुसलमानों और मुस्लिम संगठनों ने किसी भी बहाने या
किसी भी नाम पर आतंकवाद का समर्थन नहीं किया है..
अमरीका के राज्यतंत्र ने इस्लाम और मुसलमानों के दानवीकरण का इस्तेमाल, मध्यपूर्व
के तेल संसाधनों पर कब्जा करने की अपनी लिप्सा को पूरा करने के लिए किया. अमरीका की
इन्हीं नीतियों के कारण मुसलमानों के बारे में आम आदमी के दिमाग में एक विशिष्ट
धारणा बन गई है. विश्व पर अपनी प्रभुता स्थापित करने के प्रयास में अमरीका, विशिष्ट
समुदायों का दानवीकरण करता रहा है. जैसा कि नोएम चॉमस्की ने कहा है, अमरीका अपने
साम्राज्यवादी लक्ष्यों की पूर्ति के लिए “सहमति का उत्पादन“ करता आया है. शीत
युद्ध के युग में उसने कम्यूनिस्टों का दानवीकरण किया, जिसके चलते मेकार्थी ने 1950
के दशक में अपना कम्यूनिस्ट-विरोधी आंदोलन चलाया.
नफरत फैलाने के इसी अभियान का नतीजा है कि ग्राऊंड जीरो के नजदीक मस्जिद के निर्माण
का जबरदस्त विरोध हो रहा है. इस मामले में आशा की एकमात्र किरण ओबामा का दृष्टिकोण
है. हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि शांति की विजय होगी और घृणा व संकीर्णता की
ताकतें धूल चाटेंगी.
21.08.2010,
15.12 (GMT+05:30) पर प्रकाशित