पत्थरबाजी में कुछ टूट गया है
बात निकलेगी तो
पत्थरबाजी में कुछ टूट गया है
शैलेन्द्र चौहान की दो कवितायें
अठारह सौ सत्तावन
एक
कौन हैं ये विद्वतजन
वर्तमान में
गिरहकट या लुटेरे
इन्हें क्या काम तुमसे ?
तुम्हारी जेब में मुद्राएँ तो हैं नहीं
क्या ?
अर्जुन के तीर परबिंधी हैं मुद्राएँ
इसलिए
खोद रहे
गड़े मुर्दे
मंगल पांडे, लक्ष्मी, तात्या, अजीमुल्लाह, पांडे !
वह अदना सिपाही
रानी ! विधवा स्त्री
तात्या ! दास पुत्र
और म्लेच्छ अजीमुल्लाह
इतने भर से नहीं चैन
इतिहास के वे कुपात्र अस्पृश्य, शूद्र
मातादीन भंगी,
महावीरी, पूरन कोरी,
झलकारी बाई
कौन थे ये सब ?
इतिहास को कर गड्ड-मड्ड
विलुप्त हो गये
अठारह सौ सत्तावन के भूत
किसको याद अब
कौन झांकता अतीत में
नहीं यह
गीता, कुरान या बाइबल का उपदेश
झुनझुना बर्गर, पीज़ा, सिज़लर
मनोरंजन भी नहीं वह
भूमंडलीकृत तिजारत, बाजार, सूचनातंत्र,
सनसनीखेज समाचार
कुछ भी तो नहीं
नई पीढी और आज के जनमानस से
क्या साम्य
अठारह सौ सत्तावन का ?
एक शगूफा नहीं
तो और क्या !
अवसरवाद, आयोजन धर्मिता
और कमाई का स्रोत नहीं
अठारह सौ सत्तावन
दो
बस करो
बस भी करो
कुछ मुद्राओं और
थोड़ी सी प्रसिद्धि के लिए
उपहास न करो
उस महान भावना का
जो मुक्ति की चाह में
स्वत:स्फूर्त थी जन्मी
देखो आज जो सूर्य, पश्चिम से उगा है
कहाँ दर्ज है उस पर, अठारह सौ सत्तावन
जैसे कि चाँद में
दिखती एक
सूत कातती वृद्धा
सदियों से
24.08.2010, 16.23 (GMT+05:30) पर प्रकाशित