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इस अंक में

 

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

चुनावी मसाले की सोंधी महक

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
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पत्थरबाजी में कुछ टूट गया है

बात निकलेगी तो

पत्थरबाजी में कुछ टूट गया है

शैलेन्द्र चौहान की दो कवितायें

अठारह सौ सत्तावन

एक
कौन हैं ये विद्वतजन
वर्तमान में

गिरहकट या लुटेरे
इन्हें क्या काम तुमसे ?

तुम्हारी जेब में मुद्राएँ तो हैं नहीं
क्या ?
अर्जुन के तीर परबिंधी हैं मुद्राएँ

इसलिए
खोद रहे
गड़े मुर्दे
मंगल पांडे, लक्ष्मी, तात्या, अजीमुल्लाह, पांडे !
वह अदना सिपाही
रानी ! विधवा स्त्री
तात्या ! दास पुत्र
और म्लेच्छ अजीमुल्लाह

इतने भर से नहीं चैन
इतिहास के वे कुपात्र अस्पृश्य, शूद्र
मातादीन भंगी,
महावीरी, पूरन कोरी,
झलकारी बाई
कौन थे ये सब ?

इतिहास को कर गड्ड-मड्ड
विलुप्त हो गये
अठारह सौ सत्तावन के भूत
किसको याद अब
कौन झांकता अतीत में

नहीं यह
गीता, कुरान या बाइबल का उपदेश
झुनझुना बर्गर, पीज़ा, सिज़लर

मनोरंजन भी नहीं वह
भूमंडलीकृत तिजारत, बाजार, सूचनातंत्र,
सनसनीखेज समाचार
कुछ भी तो नहीं

नई पीढी और आज के जनमानस से
क्या साम्य
अठारह सौ सत्तावन का ?

एक शगूफा नहीं
तो और क्या !
अवसरवाद, आयोजन धर्मिता
और कमाई का स्रोत नहीं
अठारह सौ सत्तावन

दो
बस करो
बस भी करो
कुछ मुद्राओं और
थोड़ी सी प्रसिद्धि के लिए
उपहास न करो
उस महान भावना का
जो मुक्ति की चाह में
स्वत:स्फूर्त थी जन्मी

देखो आज जो सूर्य, पश्चिम से उगा है
कहाँ दर्ज है उस पर, अठारह सौ सत्तावन

जैसे कि चाँद में
दिखती एक
सूत कातती वृद्धा
सदियों से

24.08.2010, 16.23 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

रवि प्रताप शाही (rpshahi@gmail.com) रांची

 
 बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति..लेकिन अन्याय के विरुद्ध लड़ने में अहिंसक रास्ते में कठिनाईयां अधिक हैं, इसीलिए आज के नौजवान माओ या अलगाववादियों के साथ बन्दूक उठा लेते हैं... आज एक मेहनतकश हिंदुस्तानी, माओवादियों या कश्मीरी भटके हुए नौजवानों से अधिक अत्याचार सहते हुए भी आगे एक बदलाव की उम्मीद में कोशिश कर के जी रहा है. गंभीर समस्या तो यह है कि बन्दूक उठाने के लिए तो ओसामा और माओ जैसे लोग के कट्टर समर्थक मिल जाते हैं, पर अहिंसा के पाठ पर चलाने के लिए गाँधी या विनोबा के सच्चे समर्थक नहीं मिल रहे हैं. आखिर नौजवान पीढ़ी किसको आदर्श बनाये. पूंजीवाद के इस दौर में मानवता भूलती जा रही है और हिंसावाद को बढ़ावा मिलता जा रहा है. 
   
 

मनोज शर्मा (smjmanoj.sharma) जम्मू

 
 1857 के बहाने से शैलेंद्र जी ने मर्म कुरेदा है, अरसा पहले "उदभावना" में प्रकाशित असद ज़ैदी की कविता और "नया ज्ञानोदय" में छपी प्रिंयवद की कहानी भी बरबस याद हो आयी. बधाई. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 पहाड़ी लोग अक्सर भोले-भाले बताये जाते हैं. काफी आगे की एक हद तक जाकर उनके भोलेपन को हर चतुर-चालाक आदमी अपने फायदे में इस्तेमाल करता आया है. यही सब आदिवासियों के साथ होता है. लेकिन एक जगह ऐसी आ जाती है, जहां वह साफ़ देख लेता है कि सियासत, मजहब और दौलत वाले उस से अब उसकी ज़िन्दगी ही छीन लेने पर आमादा हैं.

जूता फेंकना हो या पत्थर फेंकना, इसके लिए काफी दुस्साहस चाहिए. नक्सलवादी हों या माओवादी, उन्हें जान की बाज़ी लगाने जितनी हिम्मत होती ही है. वे बिस्तरों में पसर कर टीवी से अपना मनोरंजन नहीं करते. कितनी शर्मनाक बात है कि अब भी हम अपने ही मुल्क के बच्चों के साथ बैठ कर उनसे उनके दिल की बात न पूछ कर बन्दूक का ही इस्तेमाल किये जा रहे हैं और उन लड़कों को भी मरवा रहे हैं, जो अपनी रोज़ी-रोटी के लिए फ़ौज और पुलिस में हैं.

जो बच्चे कल को वास्तविक आतंक से लड़ सकते हैं, उन्हें हम अपने ही देश का दुश्मन बनाए जाते है. होना तो यह चाहिए कि जिन हिन्दू परिवारों को आतंकवाद के दिनों में कश्मीर छोड़ना पड़ा, हम उन परिवारों के मुखिया लोगों और उनके जवान हो रहे बच्चों से भी राय लें कि कैसे दोनों तरफ के लोगों को साथ बैठा कर यह मसला सुलझाया जा सकता है? अगर आप सियासत को सबसे ऊपर रखेंगे तो जाहिर है, कश्मीर के अलगाववादी नेता युवाओं को भड़काने में कामयाब रहेंगे, भले ही उस से नस्ल बर्बाद होती हो.
हिन्दू या मुसलमान होने से पहले हम इंसान हैं, यह नई नस्ल को कौन बतायेगा?

मैं एक पहाड़ी आदमी हूँ और अक्सर कश्मीर आता जाता हूँ.

मैं जनसत्ता और समयांतर जैसी पत्रिकाओं के लिए श्रीनगर सहित पूरे कश्मीर में नौजवानों से मिला हूँ. वे आज तक यही बताते आये हैं कि उनका सबसे बड़ा रोज़गार दुनिया भर से आने वाले सैलानियों से चलता है और वे कभी नहीं चाहते कि वह रोज़गार ठप्प हो.

पकिस्तान के मौजूदा हालात देख कर कश्मीर के वे युवा भी वहाँ हाथ मिलाने के इच्छुक नहीं जो पहले वहाँ से मिलने वाली शाह पर हरकत में आते थे. मैंने मुंबई और कश्मीर में रह कर देखा है कि भारत के प्रति जितना अलगाव ठाकरे परिवार जैसी अजीब सियासतों से पैदा होता है, उतना कश्मीर के लोगों से नहीं. अब इसका क्या किया जाए कि कश्मीर सरहद का इलाका है और वहाँ मुसलामानों की ज्यादा तादाद है? कश्मीर के मुसलमान ही क्यों, भारत के मुसलामानों को भी तो बराबर अपने देशप्रेम का सबूत पेश करना पड़ता है.

आज दुनिया के जो हालात हैं, उन में युवाओं के अपने नए खयालात हैं और नए सपने हैं. उन्हें पास बैठ कर समझना ही होगा.

उसके बाद भी अगर लगता है कि भारत के आदिवासी या सरहद से सटे लोग देश को नुकसान पंहुचा रहे हैं तो सारा देश एक होकर उन्हें मज़ा चखायेगा. लाल कृष्ण अडवाणी और नरेन्द्र मोदी के साथ भारत के लोगों ने वही किया जो किसी अलगाववादी मुसलमान सियासतदान के साथ करते हैं. देश में हर कहीं भ्रष्ट लोग देशद्रोह कर रहे हैं. उनके काटने के लिए हर प्रदेश के नौजवान को तैयार किया जाना चाहिए.

जिस देश में कई मुसलमान राष्ट्रपति के ओहदे पर रह चुके, जहां एक स्त्री विदेश से आकर सबसे बड़ी पार्टी की अध्यक्ष है, जहां का प्रधानमन्त्री एक सिख है, उस देश को पत्थरबाज़ लड़कों को गले से लगाने का हुनर आना ही चाहिए, वरना जब वे माओवादियों की तरह बन्दूक उठा लेंगे, तब आप बहुत मुश्किल में पड़ जायेंगे. ऐसा आप पहले देख भी चुके हैं. मेरी बात एक लेख जितनी हो गई. माफ़ी चाहता हूँ.
 
   
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