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मुस्लिम पर्सनल लॉ के संहिताबद्ध होने से डर कैसा

मुद्दा

मुस्लिम पर्सनल लॉ के संहिताबद्ध होने से डर कैसा

डॉ. असगर अली इंजीनियर

समान नागरिक संहिता, भारतीय राजनीति में लंबे समय से एक ज्वलंत व विवादास्पद मुद्दा रहा है. 1980 के दशक के मध्य में, भाजपा ने इसे अपने हिन्दुत्ववादी एजेंडे में शामिल कर उसका इस्तेमाल हिन्दू मध्यम वर्ग के वोट कबाड़ने के लिए किया. कुछ समय तक तो भाजपा को इससे लाभ हुआ परंतु जल्दी ही हिन्दू भी यह समझ गए कि अगर समान नागरिक संहिता सचमुच लागू हो गई तो अपनी महिलाओं पर उनके कई विशेषाधिकार भी समाप्त हो जायेंगे.

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मुसलमानों के लिए यह एक बहुत नाजुक मसला था. यह न केवल उनकी पहचान से जुड़ा हुआ था वरन् उनकी दृष्टि में, उनके सदियों पुराने शरीयत कानून से छेड़छाड़ करने वाला प्रस्ताव भी था. मुस्लिम नेतृत्व ने मुसलमानों को यह विश्वास दिला दिया कि “दैवीय कानूनों“ में कोई परिवर्तन संभव नहीं है और वे अपनी इस मान्यता को शाहबानो मामले पर भी लागू करने लगे. नतीजतन, सरकार को शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पलटना पड़ा और इसने देश में सांप्रदायिकता को जबरदस्त बढ़ावा दिया.

पूरी इस्लामिक दुनिया में मुस्लिम महिलाएं विभिन्न समस्याओं का सामना कर रही हैं. भारत में उलेमा की जिद के चलते, मुस्लिम महिलाएं वे अधिकार भी नहीं पा सकी हैं, जो कुरान उन्हें देती है. उलेमा मानते हैं कि महिलाएं, दिमागी तौर पर कमजोर और अस्थिर मानसिकता की होती हैं और इसलिए उन्हें पुरूषों के नियंत्रण से मुक्त नहीं किया जाना चाहिए.

जाहिर है, इस मान्यता में कोई दम नहीं है. परंतु उलेमा की सोच का लब्बो-लुआब यही है कि महिलाएं इस काबिल नहीं हैं कि उन्हें स्वतंत्रता दी जाये. अपनी इस मध्यकालीन सोच को उलेमा ने “दैवीय“ दर्जा दे दिया है. जिन कानूनों को उलेमा “दैवीय“ बताते हैं, वे उस समय बने थे जब महिलाएं न तो शिक्षित थीं और न ही सार्वजनिक जीवन में उनकी कोई हिस्सेदारी थी. ये सैकड़ों साल पहले के जीवन को प्रतिबिंबित करने वाले कानून हैं जब महिलाओं का जीवन केवल घरेलू कामकाज के इर्द-गिर्द घूमता था. आज, जबकि महिलाएं शिक्षित हैं और सार्वजनिक जीवन में हिस्सा ले रहीं हैं तब परिवर्तन की आवश्यकता को नजरअंदाज करना अनुचित होगा.

भारत की मुस्लिम महिलाएं, गरीबी व अशिक्षा जैसी समस्याओं से जूझते हुए भी, सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हो रही हैं. मुस्लिम मध्यमवर्ग-जो सन् 1980 के दशक से उभरना शुरु हुआ-और निम्न वर्ग की महिलाओं में उच्च शिक्षा पाने की जबरदस्त ललक है. समाज के बढ़ते सांप्रदायिकीकरण, सांप्रदायिक दंगों की संख्या व गंभीरता में इजाफे और बाबरी मस्जिद को ढ़हाए जाने जैसी घटनाओं ने मुस्लिम महिलाओं के आधुनिक शिक्षा पाने और भारत में मुसलमानों की स्थिति बेहतर बनाने के इरादे को और मजबूती दी है. कई मुस्लिम महिलाएं आज तकनीकी संस्थानों में काम कर रही हैं. कुछ साल पहले तक, यह अकल्पनीय था. इन परिवर्तनों के चलते, मुस्लिम महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागृत हुई हैं और वे महसूस करतीं हैं कि भारत में प्रचलित मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव की दरकार है.

विवाह का पंजीकरण होना चाहिए और काज़ी को विवाह-संबंधी रिकार्ड रखना चाहिए. संबंधित काज़ी, विवाह का पंजीकरण करवाने के लिए वर से कुछ शुल्क भी ले सकता है.


बाबरी कांड के बाद आदर्श निकाहनामा तैयार करने की कई कोशिशों हुई थीं और कुछ मुस्लिम जोड़े, इन निकाहनामों पर दस्तखत कर वैवाहिक बंधन में बंधे भी. परंतु आज आवश्यकता इस बात की है कि इस्लाम द्वारा तय की गई हदों के भीतर रहते हुए, मुस्लिम पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध किया जाये, जैसा कि कई मुस्लिम देशों में दशकों पहले किया जा चुका है.

भारत, दुनिया का एकमात्र देश है जहाँ उलेमा, पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध किए जाने तक का विरोध कर रहे हैं. संहिताबद्ध होने से कानूनों में कोई परिवर्तन नहीं होगा बल्कि उन्हें ठीक ढंग से, पूरे देश में एकसमान प्रावधानों के साथ लागू किया जा सकेगा. हमारे सेन्टर ने मुस्लिम समाज के विभिन्न वर्गों-उलेमा, बुद्धिजीवियों, वकीलों व महिला अधिकार कार्यकर्ताओं के साथ व्यापक विचार-विमर्श कर, मुस्लिम पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध करने की पहल की. इस काम के लिए मैदानी सर्वेक्षण भी किए गए. कई शहरों में उलेमा से बातचीत की गई. साथ ही, उन महिलाओं के विचार भी जाने गए जो पारंपरिक प्रावधानों के चलते, दुःखों व परेशानियों के दौर से गुजरी थीं.

इसके बाद हमने दो विमर्श आयोजित किए. एक दिल्ली में, जिसमें उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों से आए उलेमा, वकीलों व अन्यों ने भाग लिया व दूसरा मुंबई में, जिसमें स्थानीय उलेमा ने हिस्सा लिया. विमर्श में प्रतिभागियों को एक प्रश्नावली भी दी गई व उनके उत्तरों का विश्लेषण किया गया. इस पूरी प्रक्रिया ने हमें मोटे तौर पर एक निश्चित मत तक पहुँचने में मदद की. हमारे अंतिम निष्कर्षो को हम जल्दी ही सार्वजनिक करेंगे परंतु उसके पहले, मैं उन विषयों पर संक्षिप्त रूप से प्रकाश डालना चाहूंगा, जिनसे संबंधित कानूनों को हमने संहिताबद्ध करने का प्रयास किया है.

पहला ऐसा विषय है विवाह.
चूंकि इस्लाम में विवाह एक अनुबंध है इसलिए उसमें वधु की स्वीकृति आवश्यक है. यह स्वीकृति दो गवाहों के सामने ली जानी चाहिए और उसके बाद इससे काजी को अवगत कराया जाना चाहिए. मेहर की रकम निर्धारित करने का अधिकार वधु को होगा. यह रकम, वर की एक साल की आय से कम नहीं होना चाहिए और सोना, चाँदी या बैंक में जमा रकम के रूप में होनी चाहिए ताकि मुद्रास्फीति का असर उस पर न पड़े.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sunil kumar bansingh (sunilbansingh@yahoo.com) ghatsila

 
 मुस्लिम समुदाय में या अन्य किसी समुदाय में बहु-विवाह रोकने का एक ही उपाय है, पत्नी सेक्स से इनकार कर दे और अगर पति रेप करने की कोशिश करे तो थाने में FIR करे. पति के होश ठिकाने आ जायेंगे. 
   
 

bhagat singh raipur c.g.

 
 डॉक्टर साहब के आर्टिकल हमलोग पढ़ते और उनकी क्लास भी अटेंड की हैं,उनसे हमेशा सहमत रहते रहे हैं,लेकिन पूरे सम्मान और आदर के साथ मेरी कुछ आशंकाए हैं-
1.आपने दिल्ली और मुंबई में दो चर्चायें आयोजित की, जिसमे उलेमा और वकील आमंत्रित थे.लेकिन इनमे महिला संघटन या कुछ अन्य महिलाये भी थी क्या? शायद नहीं.
2. विवाह समिति को आपने निर्णायक या सबसे महत्वपूर्ण बनाया हैं लेकिन इसमें शहर के जानेमाने मुसलमानो को इस समिति में शामिल किया गया हैं. यहाँ भी मुस्लिम महिलाओ को छोड़ दिया गया हैं,आखिर क्यों?
3.बहुपत्नी विवाह पर आम सहमति यह बनी कि इस प्रथा को न तो पूरी तरह ख़तम किया जाये और न इतना आसन बनाया जाये कि पुरुष अपनी मर्जी से दूसरा या तीसरा विवाह कर सके. क्या इस आम सहमति में महिलायें भी शामिल हैं,बिलकुल नहीं, क्योंकि वे तो वहां थी ही नहीं.
4.यदि वह दूसरी पत्नी लाना चाहता हैं तो पहले यह कि क्या उसके पास दोनों पत्नियों को पालने के लिए पर्याप्त आर्थिक साधन हैं ,आर्थिक साधन होने से वो दूसरी तीसरी या जितनी चाहे पत्नी ला सकता हैं.वो दोनो के साथ कुरान की रोशनी में न्याय कर सकेगा ,इसका तो कोई मापदंड तय नहीं किये जा सकते.यदि यहां भी महिलाओ से सलाह ली जाती तो वे इसको खारिज कर देती.
5.पहली पत्नी की संतान देने में अक्षम होने और शारीरिक जरूरते पूरी करने में असमर्थ होने पर वो दूसरी या जितनी भी चाहे पत्नी ला सकता हैं.क्या पति की असमर्थता होने पर पत्नी को भी अपने सुख जे लिए पति लाने का जिक्र किया गया हैं.
6.विवाह समिति को जब तक कानूनी अधिकार नहीं मिलेंगे तब तक वो शहर के मुल्लानुमा मुसलमानों की जमात होगी वो भी वही कारनामें करेगी ,जिसके कारण आप यह सब तैआरी कर रहे हैं.
7. तलाक में पत्नी की मंजूरी को कानूनी बनाना चाहिए जैसा कि अभी विवाह अधिनियम में हैं, तब ही महिलाओ के साथ कुछ नया बनता दीखता हैं. यह बहुत अच्छा प्रयास हैं कि देश में एक सा मुसलमानो के लिये अपने कॉमन सिविल कोड हो,जिससे कुरान की अलग अलग व्याख्या न हो सके.
8. एक विवाह कुरान की रौशनी में बिलकुल सही और जायज हैं क्योंकि दूसरी शादी में दोनों के साथ न्याय करना संभव ही नहीं हैं,फिर वहुविवाह की बात ही क्यों ?
9. देश के बाहर ही क्यों, हमारे ही देश में मुस्लिम महिलाओ की तंजीमे एक विवाह के लिए आन्दोलन चला रही हैं.यह कुरान के खिलाफ भी नहीं हैं.
 
   
 

shahroz delhi

 
 कौन होगा जो इंजिनियर साहब से असहमत हों!! लेकिन इस लेख में पहली बार अपूर्णता नज़र आ रही है. तलाक़ की शर्तें और पुनर्विवाह की शर्तों को और विस्तार से स्पष्ट करना था. मुसलमानों को अपने सारे स्कूल्स की प्रचलित मान्यताओं के मुताबिक नए सिरे से शरियत लिखने की ज़रुरत है! वरना वह खुद भी परेशान रहेंगे और नाहक संघ के निशाने पर रहेंगे स्प अलग! संघ चाहता है कि सामान्य संहिता में हिन्दुओं को भी दो या तीन विवाह करने की अनुमति हों. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 समाज के हित में यह असगर साहब का एक और बेहतरीन मजमून है. 
   
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