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जातीय पंचायत की बली

जातीय पंचायत की बलि

 

प्रशांत दुबे

भोपाल से

 

अब उनके फैसले को चुनौती देने वाला कोई नहीं है.

भोपाल के बंजारा समुदाय ने जब अपने समाज की संगीता ऊर्फ विजया और उसके परिवार वालों का हुक्का पानी बंद कर दिया तो आठवीं पास संगीता बंजारा पंचायत के इस फैसले के खिलाफ उठ खड़ी हुईं. उन्होंने बंजारा पंचायत के फैसले को चुनौती दी.

पंचायत ने फैसला सुनाया था कि अगर उन्हें बंजारा समुदाय में वापसी चाहिए तो पूरे समुदाय को मांस और शराब की दावत के साथ-साथ 5100 रुपए का जुर्माना भी चुकाना होगा. संगीता ने इससे इंकार कर दिया.

सामाजिक प्रताड़ना से तंग आकर संगीता ने अंततः आत्महत्या कर ली.

 

लेकिन समाज की प्रताड़ना बढ़ी तो वह टूट गई. बंजारा पंचायत के फैसले को चुनौती देने वाली संगीता ने मंगलवार को आत्महत्या कर ली. जिस मुंहबोले भाई के कारण उन्होंने आत्महत्या की, वह भी बहन की मौत का सदमा सह नहीं सका और उसने भी जान दे दी.


अंतरजातीय विवाह के कारण आत्महत्या का यह मामला उस प्रदेश की राजधानी में हुआ, जहां गणतंत्र दिवस के दिन अंतरजातीय विवाह करने वालों को पुरस्कृत करने की परंपरा रही है.

गुनाह
भोपाल के चांदबड़ इलाके में रहने वाली बंजारा समुदाय की संगीता को उसकी मां की मौत के बाद पड़ोस के ब्राह्मण परिवार ने बेटी की तरह पाला था.

बाद में उसकी संगीता की शादी अपने ही समुदाय के परसराम सिंह से हुई.

बंजारा समुदाय से विवाद की शुरुवात तब हुई जब संगीता ने ब्राह्मण परिवार के अपने मुंहबोले भाई
रंजन पांडे की शादी एक बांजारा लड़की रुचि से करायी. रंजन और रुचि दोनों ही विकलांग थे और दोनों को लगा कि उनका जीवन एक-दूसरे के साथ खुशी-खुशी कट जाएगा.

 

लेकिन बंजारा समाज के लोग इस अंतरजातीय विवाह से बेहद खफा थे. समाज के लोगों ने संगीता और ऑटो चला कर गुजारा करने वाले उसके पति परसराम सिंह को चेतावनी दी कि वे रंजन पांडे और रुचि को आश्रय देना बंद करें. पेशे से कंप्यूटर ऑपरेटर रंजन को जान से मारने की धमकी भी दी गई.

बंजारा समाज की लड़की को अपनी बहु बनाने वाली रंजन की मां कहती हैं-“ संगीता और मेरी बहु रुचि पर बंजारा समाज का बहुत दबाव था.मेरे बेटे रंजन को भी बंजारा समाज के लोग गालियां बका करते थे.बंजारा समाज के लोग इस विवाह के लिए संगीता को जिम्मेवार मानते थे.”

सामाजिक बहिष्कार
1 जून को बंजारा समाज ने अपनी पंचायत बुलाई और परसराम सिंह और संगीता के परिवार को समाज से बेदखल करने का फैसला सुना दिया.

बंजारा समाज ने शर्त रखी कि अगर परसराम सिंह का परिवार पूरे समाज को मांस और शराब की दावत दे और हरजाना के रुप में 5100 रुपए की रकम दे तो यह फैसला वापस लिया जा सकता है.

संगीता इसके लिए तैयार नहीं हुईं. फिर समाज का दबाव बढ़ता चला गया.

संगीता ने इस फैसले के खिलाफ जगह-जगह गुहार लगाई. विमुक्त घुमक्कड़ एवं अर्ध घुमक्कड़ जाति विकास अभिकरण के प्रदेशाध्यक्ष नारायण सिंह बंजारा ने संगीता को आश्वस्त किया कि यह समाज का आंतरिक मामला है और इसे समाज में ही निपटा लिया जाएगा. इसके लिए उन्होंने 12 जून तक की तारीख भी मुकर्रर की लेकिन नारायण सिंह ने इस मामले में खामोशी की चादर ओढ़ ली.

बंजारा समाज का दबाव जब ज्यादा तेज़ हुआ तो संगीता और उसके मुंहबोले भाई रंजन ने हार मान ली. उन्होंने भोपाल के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को पत्र लिख कर स्पष्ट कर दिया कि अगर उनकी रक्षा नहीं की जाएगी तो वे आत्महत्या कर लेंगे.

आत्महत्या की चेतावनी

आम आदमी के सरोकारों को हाशिये पर रखने वाले अफसरों के लिए यह एक आम पत्र भर था और उसका हश्र भी वही हुआ.

कहीं से कोई सहायता नहीं मिलने पर समाज की प्रताड़ना से तंग आ चुकी संगीता ने 24 जून को आत्महत्या कर ली. संगीता की आत्महत्या ने सबको हिला कर रख दिया. अपने मृत्यु पूर्व पत्र में संगीता ने अपनी मौत के लिए बंजारा समाज के लोगों को जिम्मेवार ठहराया था.

संगीता की मौत का जिस पर सबसे अधिक असर पड़ा वो था उसका मुंहबोला भाई रंजन. उसी शाम रंजन ने भी आत्महत्या कर ली.

महिला अधिकार मंच की सुश्री प्रार्थना मिश्र कहती हैं-“ यह कोई पहला मामला नहीं है, जब प्रशासन ने आम आदमी के गुहार की अनदेखी की. सागर के पीटीए अध्यक्ष शिवकुमार और बैतुल की पंच सुश्री उर्मिला बाई ने भी न्याय नहीं मिलने पर आत्महत्या कर लेने की इत्तला प्रशासन को पहले ही दी थी लेकिन प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया. अंततः इन लोगों ने भी आत्महत्या कर अपनी जान गंवा दी. राज्य में इस तरह के अधिकांश मामले दलितों से जुड़े हुए हैं. ”

संगीता की आत्महत्या के मामले में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए स्थानीय जन संगठनों ने अपनी कमर कसी है. संगीता के पति परशराम भी कहते हैं-“ हम बंजारा समाज के इस अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे.”

लेकिन जिस सरकारी तंत्र को कार्रवाई करनी है, उसकी सफाई है कि इस मामले का उन्हें पता ही नहीं चला.

जिले के कलेक्टर का कहना है कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है और प्रताड़ना से संबंधित मामले पुलिस अधीक्षक के पास भेज दिए जाते हैं. वहीं पुलिस अधीक्षक आत्महत्या से पूर्व किसी तरह की जानकारी मिलने से अपने को अनजान बता रहे हैं.

जाहिर है, अंतरजातीय विवाह के कारण जातीय पंचायत की बलि चढ़ गए संगीता और रंजन अपने पीछे कई सवाल छोड़ गए हैं. लेकिन इन सवालों में किसी की भी दिलचस्पी नहीं है.

पुलिस की डायरी में मामला दर्ज हो गया है. अब सालों-साल अदालत में मुकदमा चलता रहेगा और फिर कमज़ोर स्मृतियों वाला समाज सब कुछ भूल जाएगा.

27.06.2008, 22.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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