बेरहम, बेपरवाह सरकारें
मुद्दा
बेरहम, बेपरवाह सरकारें
देविंदर शर्मा
केन्द्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री शरद पवार ने सर्वोच्च
न्यायालय के इस सुझाव को अव्यावहारिक मानते हुए तदनुरूप कदम उठाने से इनकार कर दिया
है कि खाद्यान्नों को एफसीआई के गोदामों में सड़ा कर बर्बाद होने देने से बेहतर है
कि सरकार उन्हें गरीबों में मुफ्त बांट दे. सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति
दलवीर भण्डारी और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की दो सदस्यीय खण्डपीठ ने सार्वजनिक वितरण
प्रणाली में खुलेआम घष्टाचार के खिलाफ याचिकाओं को सूचीबद्ध करते निर्देश दिया था-“
गोदामों में सड़ाने के बजाय खाद्यान्नों को गरीब-गुरबा में बांट दीजिए.”
न्यायालय का यह सुझाव लगभग 10 वर्ष बाद आया जब भुखमरी के मारे प्रदेशों-उड़ीसा,
छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और हिमाचल प्रदेश को अपने यहां बन्द पड़ी सार्वजनिक
वितरण प्रणाली को एक हफ्ते के भीतर फिर से शुरू करने का निर्देश दिया था ताकि भूख
की गंभीर होती समस्या का हल निकाला जा सके. यह मामला अगस्त 2001 का है.
इसके 7 साल बाद सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को दूसरा निर्देश जारी किया- ” एक ऐसी
प्रणाली विकसित की जाये जिससे कि देश का कोई भी व्यक्ति भूखा न रहे जबकि भण्डार भरे
हों और गोदामों में जगह की कमी से बाहर पड़े खाद्यान्न बरबाद हो रहे हों.”
अदालत के इस निर्देश का सरकार के ऊपर कोई बहुत असर नहीं पड़ा. हम सब यह जानते हैं
कि सिवा आंकड़ेबाजी के सरकार ने भुखमरी दूर करने की अपनी भूमिका के प्रति लापरवाह
ही रही हैं. न केवल सर्वोच्च न्यायालय, यहां तक कि सत्ता में आए प्रधानमंत्रियों ने
भी समय-समय पर गरीबों और भूखों के प्रति केवल वाचिक सहानुभूति दिखायी है.
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नयी दिल्ली में अप्रैल 2001 में
’टूवार्डस ए हंगर फ्री इण्डिया‘ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन भाषण
में कहा था, “ लोकतंत्र और भुखमरी दोनों साथ-साथ नहीं चल सकती. भूखे पेट में सवाल
घुमड़ते रहते है जो व्यवस्था को विफल करते है. अन्न प्रत्येक मनुष्य की बुनियादी
जैविक जरूरत है. विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास से प्रचुर और विकास की समान
स्थितियों वाले आधुनिक विश्व में भूख और गरीबी के लिए कोई जगह नहीं हो सकती.”
वाजपेयी ने कहा था कि भारत ’उपनिषद‘ के निर्देशक सिद्धान्तों से परिचालित होता है,
जिसमें कहा गया है-’अन्नम् बहु कुर्वित‘, अर्थात् बहुविधि से बहु गुणा अन्न उपजाओ.
कितना पवित्र विचार है. तिस पर भी वाजपेयी सरकार ने दोबारा नामकरण तथा सार्वजनिक
वितरण प्रणाली को ’मजबूत‘ किया ताकि खाद्यान्न का भण्डारण कल्पनाशीलता और
उद्देश्यपूर्ण तरीके से किया जाए, जिससे कि बाजार में दामों का सन्तुलन बना रहे और
निर्यात को बढ़ावा मिल सके.
स्तब्धकारी विरोधाभास यह है कि भण्डार तो खाद्यान्नों से ठसाठस भरे हैं, जगह के
अभाव में बाहर सड़ भी रहे हैं लेकिन भूखों की तादाद कई गुनी बढ़ती जा रही है, यह
हमारे देश के लिए शर्म की बात है. वैश्विक भूखे देशों की सूची में भारत कुल 88 वें
में से 66 वें नम्बर पर है. सरकार किसी भी तरह भूख और गरीबी मिटाने की शपथ खा ले,
तथ्य है कि इस लक्ष्य को पाना उसकी प्राथमिकता ही नहीं है.
राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम बनाने की चर्चा के दौरान सभी राजनीतिक दलों के
नेता बिना किसी अपवाद के विनिवेश और भूमि अधिग्रहण की बातों में मशगूल हैं. देश के
विकास की नीतियां बनाने वाले अपना ज्यादातर समय उद्योगपतियों और व्यवसायियों से
गुफ्तगू में बिताते हैं और इससे बचे समय का सदुपयोग वे कॉकटेल पार्टियों में दुनिया
के राजनयिकों से मेलजोल बढ़ाने में करते हैं. मीडिया भी अधिकतर पेज-थ्री लायक खबरों
में अपने को मशगूल रखता है, उन्हें अथक लिखता जाता है और खूबसूरती से तराशी गयी
मॉडलों की लम्बी टांगों की तस्वीरें छापता रहता है.
अगर आप कृषि वैज्ञानिकों के बारे में जानने को उत्सुक हों तो यह मत भूलें कि उनके
पास भी लघु और सीमान्त किसानों के समुदाय की भलाई के लिए अवकाश नहीं है. वे
बहुराष्ट्रीय और जैव प्रौद्योगिकी कम्पनियों के व्यावसायिक हित में बीजों को उन्नत
व प्रसंस्कृत करने में व्यस्त रहते हैं. वे देश के पहले जीन प्रसंस्कृत-परिवर्धित
बी टी बैगन की खेती पर रोक लगने से काफी क्षुब्ध हैं. राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा
अधिनियम के तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को माहवारी कितना अनाज दिया
जाये, अभी इसी पर चर्चा हो रही है.
खाद्यान्न और कृषि मंत्रालय ने हालांकि गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों को खाद्यान्न की
खरीद पर सब्सिडी देने से इनकार कर दिया है लेकिन सोनिया गांधी की अगुवाई वाली
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को भी भूख से निबटने का कोई कारगर उपाय नहीं सूझ रहा है.
इस मामले में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण इस तथ्य को न समझा जाना है कि भूख और खाद्यान्न
सुरक्षा परस्पर जुड़ी हुई हैं और ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
वास्तव में खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम गरीबों को सस्ती दरों पर राशन का माहवारी
कोटे के अधिकार से आगे नहीं देखता. वहीं दूसरी ओर, खाद्य सुरक्षा लगातार पैदावार
बढ़ाये बिना संभव नहीं है. राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम दोनों में तालमेल
बिठाने में दयनीय रूप से विफल है. दरअसल, मैं खाद्यान्न सुरक्षा मामले में सरकार को
भयानक रूप से दुविधाग्रस्त पाता हूं.
एक तरफ तो सरकार अपने पड़ोसी देशों म्यांमार व लैटिन अमेरिकी देशों की तर्ज पर
तेलहन-दलहनों की पैदावार बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्रों को प्रोत्साहित करने पर
विचार कर रही हैं, दूसरी तरफ उसने राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा अभियान के तहत 4,883
करोड़ से गेहूं, चावल, तेलहन और दलहनों का उत्पादन का बढ़ावा देना तय किया है.
अचम्भित करने वाली बात यह है कि राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा अभियान को प्रस्तावित
राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम से कोई लेना-देना नहीं है.
मेरा मानना है कि इसमें नीतियों के स्तर पर कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. सरकार
अपने घरेलू उपभोक्ताओं की आपूर्ति के लिए तिलहनों पर आयात शुल्क में लगातार कटौती
करती जा रही है, जिससे देश में तेलहन की पैदावार क्षमता में गिरावट आएगी. इसी तरह,
वह तेलहन का उत्पादन बढ़ाने के लिए संसाधन झोंकने की मंशा रखती है ताकि आने वाले
वर्षों में तेलहन के आयात पर कम से कम निर्भर रहा जा सके.
सवाल है कि ये दोनों कैसे संभव है? इसका मतलब यह तो नहीं कि सरकार के कार्यक्रम
वास्तव में गलतफहमी के शिकार हैं? सस्ती दरों पर तेलहनों के आयात ने इस मामले में
देश की आत्मनिर्भरता ही नहीं छीन ली, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका को छिन्न-भिन्न
कर दिया. प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम को जब तक व्यवसाय और कृषि
नीति से संबद्ध नहीं किया जाता, सभी को भोजन सुनिश्चित नहीं किया जा सकता.
29.08.2010, 02.49
(GMT+05:30) पर प्रकाशित