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छत्तीसगढ़, जीडीपी और कुल्हाड़ीघाट
मुद्दा
छत्तीसगढ़, जीडीपी और कुल्हाड़ीघाट
दिवाकर मुक्तिबोध
रायपुर से
छत्तीसगढ़ सरकार इस बात से प्रसन्न हो सकती है कि सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के
आंकड़ों में उसने बाजी मारी है. 11.49 प्रतिशत की उसकी विकास दर देश में सर्वोच्च
है. इस मामले में उसने विकसित गुजरात को भी पीछे छोड़ दिया है. यही नहीं प्रति
व्यक्ति औसत आय दस वर्षों में तिगुनी हो गयी है. वर्ष 2000-2001 में औसत आय 10 हजार
रुपए थी, जो 2009-10 में बढ़कर 34 हजार 483 रुपए हो गयी.
निश्चय ही ये आंकड़े सरकार को सुकून देने वाले हैं. लेकिन खुशी के इन लम्हों के बीच
उसे विश्व बैंक की उस रिपोर्ट का भी अध्ययन कर लेना चाहिए जिसमें दुनिया के देशों
में गरीबी का मूल्यांकन किया गया है. इस रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ को सबसे गरीब राज्य
बताया गया है, जहां 45 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करते हैं. राज्य की
यह है असलियत.
दरअसल जीडीपी में छलांग लगाने का अर्थ है अमीरों का और अमीर होना, पूंजी का
केन्द्रीयकरण तथा उसका कुछ ही लोगों की तिजोरी में बंद होना. यदि सरकार इसे ही
उपलब्धि मानती है तो ठीक है लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि राज्य के आर्थिक
संसाधनों का यदि कोई वर्ग बेतहाशा दोहन कर रहा हैं तो वह अभिजात्य वर्ग ही है. इस
वर्ग में वे नौकरशाह और राजनेता भी शामिल हैं, जो राज्य के विकास के लिए राजकोष से
निकलने वाले धन में बटमारी करते हैं. राज्य के इन दस वर्षों में भ्रष्टाचार के
ऐसे-ऐसे उदाहरण सामने आए हैं कि आंखें फट जाएं. ये वो घटनाएं हैं, जो पकड़ में आई
हैं. जिनका पर्दाफाश नहीं हुआ, उस बारे में अनुमान लगाया जा सकता है.
बहरहाल तमाम कमियों, अभावों को छोड़ दें तो जीडीपी दर में वृद्धि उत्साहवर्द्धक तो
है ही. लेकिन कुछ क्षेत्रों, खासकर औद्योगिक क्षेत्रों के विकास से काम नहीं चलेगा.
सरकार को सबसे पहले गरीबों पर ध्यान देना चाहिए. इस बारे में दावे बड़े-बड़े किए जाते
हैं किंतु सच्चाई ठीक विपरीत है. केन्द्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं के बावजूद
गरीबी दूर होना तो दूर गरीब और गरीब होते जा रहे हैं. यह चिंता का विषय है. इससे
साफ जाहिर है, सरकार ठीक से काम नहीं कर रही है जबकि योजना आयोग राज्य सरकार को धन
देने में कमी नहीं करता. अभी हाल में उसने 13 हजार 230 करोड़ रुपए स्वीकृत किए हैं.
यकीनन यह राशि कम नहीं होती.
बीते दस वर्षों में राज्य में धन का अथाह प्रवाह हुआ है. कहां गया यह पैसा? इतने
पैसों में तो राज्य के 19 हजार 720 गांवों में से कुछ हजार की शक्ल तो बदल ही जानी
चाहिए थी? लेकिन कितनों की बदली? राज्य के मुखिया हर साल गर्मी में हफ्ते-दस दिन के
ग्राम सम्पर्क अभियान पर निकलते हैं. भरी दोपहरी में गांवों का दौरा करते हैं.
ग्रामीणों से बातचीत करते हैं. उनकी समस्याओं को देखने-समझने की कोशिश करते हैं.
उनके दौरों के बाद सरकारी दफ्तरों में शिकायतों एवं आवेदनों का अंबार लग जाता है.
सरकारी तौर पर ऐलान होता है कि समस्यायें निपटायी जा रही हैं, विकास कार्य शुरू हो
गए हैं. तस्वीर बदल जाएगी. लेकिन हकीकत यह है कि तस्वीरें जस की तस हैं. उन पर धुंध
छायी हुई है. फलत: किसी गांव की शक्ल उजली नहीं दिखती.
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अगर बैठकों एवं सम्पर्क अभियानों से ही
कष्ट दूर होता तो छत्तीसगढ़ के सभी गांवों में बहार आ जाती. वे पंजाब को
मात देते, हरियाणा से आगे निकल जाते. |
जरा गौर करें गांव की मोटी-मोटी आवश्यकताएं क्या हैं? कृषि के लिए पानी, बिजली,
निस्तारी के लिए तालाब, स्वास्थ्य के लिए अस्पताल, पढ़ाई के लिए स्कूल, पीने के पानी
के लिए सामान्य बंदोबस्त अर्थात नलकूप अथवा कुएं तथा गांवों का एक-दूसरे से सड़क
सम्पर्क तथा इन सबका स्थायी बंदोबस्त. यानी गांव की मूलभूत आवश्यकताएं यदि पूर्ण
हैं तो अभावग्रस्तता कायम नहीं रहनी चाहिए.
अभी दिक्कत यह है कि कुछ सौ गांवों में स्कूल भवन हैं तो शिक्षक नहीं, प्राथमिक
स्वास्थ्य केन्द्र हैं तो दवाइयां और डॉक्टर नहीं. नलकूप हैं तो पानी नहीं, पेयजल
की व्यवस्था है तो पानी शुद्ध नहीं, राशन दुकान है तो राशन नहीं या वे समय पर खुलती
नहीं. यानी व्यवस्थाएं हैं पर व्यवस्थित संचालन नहीं. इन दस वर्षों में इसमें कोई
सुधार हुआ हो, ऐसा नहीं लगता.
मुख्यमंत्री ग्राम सम्पर्क अभियान के बावजूद उन
प्रवासी गांवों की भी स्थिति कोई खास नहीं बदली. अब तो ग्रामसभाओं की भी शुरूआत हो
चुकी है. यानी प्रत्येक छोटे-बड़े गांव में ग्रामीणों की बैठक. बैठकों का वार्षिक
कैलेंडर बन गया है. ग्रामीण बताएंगे अपना कष्ट तथा बैठक में उपस्थित सरकारी अधिकारी
उन्हें दूर करेंगे. किंतु अगर बैठकों एवं सम्पर्क अभियानों से ही कष्ट दूर होता तो
छत्तीसगढ़ के सभी गांवों में बहार आ जाती. वे पंजाब को मात देते, हरियाणा से आगे
निकल जाते. फिर छत्तीसगढ़ पिछड़ा नहीं कहलाता. पर ऐसा नहीं है. व्यवस्थागत दोषों एवं
भ्रष्टाचार की वजह से मंजिल अभी कोसों दूर दिख रही है.
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अब कुल्हाड़ीघाट को ही लें. रायपुर जिले के मैनपुर विकासखंड का गांव. यहां कमार
आदिवासी बसते हैं. समूचा छत्तीसगढ़ जानता है कि 25 बरस पूर्व 17 जुलाई 1985 को
तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ इस गांव का
दौरा किया था. ग्रामीणों से रूबरू हुए थे. उनकी बातें सुनी थी, हालातों का जायजा
लिया था. उनकी वजह से कुल्हाड़ीघाट रातों रात प्राथमिकता की सूची में आ गया. किंतु
क्या हुआ? कमार अभी भी उसी अवस्था में जी रहे हैं. इस छोटे से आदिवासी गांव में
विकास की कोई किरण नहीं पहुंची. खबरों के मुताबिक वहां अभी भी आदिवासियों के घासफूस
के ही मकान हैं, सरकारी कार्यालय खुले भी तो कर्मचारियों के अभाव में उसमें ताले
जड़े हुए हैं. अस्पताल भवन अधूरा पड़ा है. नालों पर बनी पुलिया टूटी हुई है. बरसात के
दिनों में गांव का टापू बनना तय है. कुल मिलाकर गांव अभी भी अभावग्रस्त हैं, जबकि
आदिवासियों का विकास राज्य सरकार का संकल्प है.
राजीव गांधी प्रवास के इन ढाई दशकों में इस गांव ने कई सरकारें देखीं, कांग्रेस की
भी और भाजपा की भी. राज्य के बस्तर एवं सरगुजा के आदिवासी गांवों के विकास के नाम
पर बड़ी-बड़ी घोषणाएं हुईं, करोड़ों-अरबों खर्च हो गए लेकिन अन्य गांवों के साथ-साथ
कुल्हाड़ीघाट में भी जिंदगी ठहरी हुई है. उसमें कोई गतिशीलता नहीं. गांव का प्राय:
हर बाशिंदा भूखा, नंगा और प्यासा है. इसी तरह बिलासपुर जिले के गांव रंजना एवं
धमतरी जिले के गांव दुगली की भी यही स्थिति है. ये गांव राजीव गांधी के सपनों के
गांव थे पर जब प्रदेश कांग्रेस के किसी भी नेता को उनके सपनों की परवाह नहीं है तो
सत्तारूढ़ भाजपा को क्या पड़ी है कि वह इन गांवों में झांककर देखें. जाहिर है, विकास
के सवाल पर राजनीति के शिकार ऐसे गांवों की संख्या भी राज्य में कम नहीं है.
दरअसल ग्रामीण विकास के मामले में सरकार हमेशा कटघरे में रही है. छत्तीसगढ़ ने मप्र
में रहते कम से कम 9 पंचवर्षीय योजना देखीं. दस साल से तो वह स्वतंत्र है. यानी
विकास के लिए केन्द्र से मिल रही राशि में किसी और की हिस्सेदारी नहीं. इन दस
वर्षों में यदि गांवों के विकास की एकीकृत योजनाएं ढंग से लागू की जातीं, वे
भ्रष्टाचार से मुक्त होतीं, इनके क्रियान्वयन पर कड़ी निगरानी रखी जाती तो आज
छत्तीसगढ़ के गांव भूखे-प्यासे नहीं रहते, सैंकड़ों औद्योगिकीकरण की बलि नहीं चढ़ते,
नक्सलवाद को पनपने के लिए जगह नहीं मिलती तथा ग्रामीणों एवं आदिवासियों का सही
मायनों में उत्थान होता. यानी हर गांव में आबादी के हिसाब से नलकूप, कुएं, तालाब,
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्रायमरी से लेकर माध्यमिक या उच्चतर माध्यमिक स्कूल,
सस्ते अनाज की दुकानें, कुटीर उद्योग, गांवों में ही रोजगार के अवसर तथा सड़कें
न्यूनतम जरूरतों को पूरा कर देती. किंतु ऐसा नहीं हो पाया है इसीलिए मुख्यमंत्री के
ग्राम सम्पर्क अभियान में सर्वाधिक शिकायतें इन मामूली आवश्यकताओं से संबंधित रहती
हैं.
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गांवों का चेहरा वही पुराना है जिस पर पड़ी सलवटें ग्रामीणों के दु:ख
एवं विवशता को बयां करती हैं. जीडीपी की लंबी छलांग उनके अभावों को दूर
नहीं कर रही है.
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गांवों के विकास के संबंध में राजनीतिक चेतना एवं जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही की
बात करें तो स्थिति बिलकुल स्पष्ट है. गांवों में राजनीतिक जागरूकता पर संशय नहीं
लेकिन जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति निश्चय ही गंभीर नहीं हैं. यदि गंभीर
रहते तो गांवों का नक्शा कुछ बेहतर रहता. राजीव गांधी के गांव कुल्हाड़ीघाट, दुगली
या रंजना को ही लें या उन गांवों की बात करें, जहां मुख्यमंत्री रमन सिंह बीते 7
वर्षों में हो आए हैं, क्या वहां आदर्श स्थितियां बन पायी हैं?
राज्य बनने के बाद
अजीत जोगी तीन वर्षों तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. क्या उनके कार्यकाल में राजीव
गांधी के प्रवासी गांवों की दशा, जिसमें बस्तर के भी गांव शामिल हैं, बदल नहीं सकती
थी? प्रदेश के कांग्रेसी जनप्रतिनिधि, सांसदों एवं विधायकों का दायित्व केवल राजीव
गांधी की जयंती अथवा पुण्यतिथि मनाने तक सीमित है? जब वे राजीव गांधी को
श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, तब उन्हें राजीव गांधी के छत्तीसगढ़ दौरे एवं उनके
सपने याद नहीं आते? यह शर्मनाक है.
दरअसल समूचा विपक्ष सत्ता के सुर के साथ सुर मिला रहा है. जब विपक्ष निर्बल हो तो
विकास के लिए दबाव की उम्मीद कैसे की जा सकती है? छत्तीसगढ़ में विकास के नाम पर आ
रहे पैसे का बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार के गटर में जा रहा है. इसीलिए चाहे कुल्हाड़ीघाट
हो या दुगली, गांवों का चेहरा वही पुराना है जिस पर पड़ी सलवटें ग्रामीणों के दु:ख
एवं विवशता को बयां करती हैं. जीडीपी की लंबी छलांग उनके अभावों को दूर नहीं कर रही
है.
यह तो गनीमत है कि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण सरल, सौम्य एवं धैर्यवान हैं. रोटी के लिए
संघर्ष से न तो थकते हैं न ही निराश होते हैं. इसलिए तमाम तरह के अभाव एवं
ऋणग्रस्तता के बावजूद कभी यह सुनने नहीं मिलता कि किसी किसान ने फसल चौपट होने पर
आत्महत्या की हो. लेकिन उनके धैर्य एवं साहस का यह मतलब नहीं है कि उन्हें अभावों
में ही जीने दिया जाए. राज्य सरकार ग्रामीण विकास के मॉडल पर भले ही अपनी पीठ
थपथपाती रहे किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि गांवों में असंतोष के जो छोटे-बड़े
ज्वालामुखी तैयार हो रहे हैं, वे कभी भी फट सकते हैं.
31.08.2010,
01.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | sushil (sushilpathak88) bilaspur | | | | दिवाकर जी की बेबाक राय बरसो बाद पढने को मिली. gdp के मायाजाल के पीछे छिपी राज्य की हकीकत का जिस तरीके से बयां किया है वो सराहनीय है. | | | | | |
| | sanjeev pandey () bilaspur | | | | दिवाकर जी का लिखा लंबे दिनों बाद उस समय पढ़ने को मिला है, जब प्रदेश भ्रष्टाचार और सीएम मैडम राज से कुपोषित हो चुका है. कृपया आगे भी लिखते रहें. आपको और रविवार को बधाई. | | | | | |
| | prakash chandra jha (prapoorna2006@gmail.com) new delhi | | | | Spot on himanshu ji regarding your intervention regarding bihar GDP growth story. The mainstream media has supressed the news of GDP of this year. The media were making nitish hero last time but did not mention anything this time. Actually nitish is very good media manager. Absence of alternative other than castist laloo make choice difficult for the peole of bihar. | | | | | |
| | रुद्र अवस्थी (rudraawasthi@yahoo.co.in) बिलासपुर | | | | छत्तीसगढ़ में रहने वाले लोगों की माली हालत को लेकर आंकड़ों की बाजीगरी के जरिए श्रेय लेने की जो होड़ लगी हुई है,उसकी हकीकत को सामने लाने वाला सराहनीय लेख है। विचारणीय पक्ष यह भी है कि जब छत्तीसगढ़ के लोगों की माली हालत बेहतर हो गई है तो फिर गरीबी रेखा के नीचे बसर करने वाले लोगों की इतनी बड़ी संख्या क्यों है, जो एक- दो रुपए किलो में चाँवल खरीदकर अपना पेट भरते हैं। एक तरफ हम सस्ता अनाज मुहैया कराने के नाम पर वाहवाही लूट रहे हैं और दूसरी तरफ तरक्की की पायदान पर आगे बढ़ने के मामले में भी अपने को अव्वल बताने के लिए आंकड़ों का सहारा ले रहे हैं। दोनों में से सच क्या है यह भी जनता को बताना चाहिए। | | | | | |
| | Vikash Singh (for_vikash@yahoo.co.in) , Siligudi | | | | अच्छा आलेख लिखा है आपने. बिहार के बाद अब छत्तीसगढ़ में जीडीपी का हौव्वा खड़ा किया गया. पूछने का मन करता है कि अब बिहार की हालत क्या है ? क्या बिहार को भी देश का सबसे तेज गति से विकास करने वाला राज्य मानने के लिये रमन सिंह तैयार हैं ? | | | | | |
| | कमलजीत सिंह सरदाना , नई दिल्ली | | | | बीबीसी में आज ही एख खबर लगी है. जीडीपी के नाम पर देश में जो घोटाला चल रहा है, उसे इस खबर से समझा जा सकता है-
वित्त वर्ष 2010-11 की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर की गणना को लेकर पैदा हुए विवाद को समाप्त करने के लिए सरकार ने क़दम उठाया है. बुधवार की देर शाम सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर के बाज़ार कीमत वाले आंकड़े को दुरुस्त करते हुए इसे 10 फ़ीसदी कर दिया है. मंगलवार को जारी आंकड़ों में बाजार मूल्य पर जीडीपी वृद्धि दर को 3.65 फ़ीसदी बताया था जबकि स्थिर मूल्यों पर इस दर को 8.8 फ़ीसदी बताया था. अर्थशास्त्रियों ने दोनों आंकड़ों में भारी अंतर को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था.वैसे सुधार के बावजूद सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 8.8 फ़ीसदी की विकास दर के आंकड़े पर कोई असर नहीं पड़ेगा. दरअसल आर्थिक विकास को नापने के दो अलग-अलग तरीके हैं. एक तरीका बाज़ार में कीमतों का आधार बनाता है. दूसरा तरीका सरकार और निजी क्षेत्र के खर्चे को आधार बनाता है. सरकार और निजी क्षेत्र की खर्च की गई रकम हमेशा बाज़ार की कीमत से कम होती है.दोनों तरीकों में फ़र्क आने से अर्थशास्त्रियों में हड़कंप मचा हुआ था.
अर्थशास्त्री कहते हैं कि कृषि और उद्योग जैसे सेक्टरों में बढ़ोत्तरी से अर्थव्यवस्था में तो तेज़ी आई, लेकिन सवाल ये कि क्या देश में खपत की क्या स्थिति है.बैंक ऑफ़ बड़ौदा की प्रमुख अर्थशास्त्री रूपा रेगे कहती हैं कि सरकारी आंकड़े ऊपर नीचे होते रहते हैं लेकिन इतना ज़्यादा फ़र्क पहली बार सामने आया. एक उद्योग संगठन के अर्थशास्त्री ने सरकारी आंकड़ों की गुणवत्ता पर चिंता व्यक्त की थी. | | | | | |
| | ajay sahani , New Delhi | | | | Muktibodh ji, thanks for such a nice article. Himanshu@, You have written a good letter. You have also seen an article by Udit Misra who belongs to Forbes India.In feb, 2010 he wrote an article that Reserve Bank of India cranked up the economic growth forecast for the current financial year from 6 percent to 7.5 percent.
The Prime Minister, a distinguished economist himself, has pegged it at 7 percent and his Finance Minister estimates it at 7.75 percent.
It’s a mystery how, presumably, the same set of data would allow for such variety for forecasts. Some of the more frequently distributed forecasts of economic growth in India seem to follow the trend more than predict it.
Take the GDP forecasts by the Centre for Monitoring Indian Economy (CMIE). After the collapse of Lehman Brothers in September 2008, every successive month brought bad news for the world economy. The CMIE forecasts reflected that: GDP growth rate got revised from 9.4 percent in September 2008 to 8.2 percent in November and 6.5 percent in April 2009. | | | | | |
| | कृष्ण कुमार , नई दिल्ली | | | | राजनीति के लिहाज से यह बहुत अफसोसजनक बात है कि जो मुद्दा दो कौड़ी का है, उसे राजनीति अपनी उपलब्धि बता कर जनता को मूर्ख बनाने का काम कर रही है. जीडीपी का ग्रोथ जनता की माली हालत का ग्रोथ नहीं है, यह बात बहुत साफ समझने की जरुरत है. लेकिन हमारे धूर्त नेता इसे इस तरह बताते हैं, जैसे अब राज्य में पैसे की सालों साल जरुरत नहीं पड़ेगी और आम जनता पांचसितारा जीवन जीएगी. | | | | | |
| | Ajay Kumar tiwari , Dehradun | | | | दिवाकर जी, आपने बहुत गंभीर मुद्दा उठाया है. आखिर जब जीडीपी इतना बढ़ गया है तो रायपुर में और छत्तीसगढ़ में गरीबों की संख्या क्यों बढ़ती चली जा रही है ? ये इसलिये, क्योंकि ये जीडीपी कुछ लोगों के बढ़ने का द्योतक है. आम आदमी की हालत तो और पतली होती चली जा रही है. | | | | | |
| | Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) , Noida | | | | Congrats Diwakar ji. I was just thinking a news of January 2010. at that time among the 18 states and Union Territories of which data were available, Bihar recorded the highest State Gross Domestic Product (SGDP) in a year when the global financial meltdown pulled down country's economic growth rate to 6.7 per cent from 9 per cent.
Last year a report compiled by the Central Statistical Organisation (CSO), which has data on 18 out of 32 states and Union Territories, Bihar recorded the highest growth of 11.44 per cent in the last fiscal. But what happened in the latest data ? Bihar gone on 8th or 9th rank. | | | | | |
| | Manoj kumar singh , Agra. UP | | | | Very informative article. Muktibodh ji, we know that India's per capita income is not calculated with the help of purchasing power parity (PPP) which effectively regulates conversion rates for purchasing power of currencies. In fact per capita GDP of India is calculated by the Atlas technique and by allotting official exchange rates for translation.
Significant importance has been given by the analysts to the performance of different Indian states in comparison with each other in context of per capita income. A calculated study has revealed that the states which were better equipped and open to economic liberalization have shown a steady growth rate. | | | | | |
| | kewal krishna (kewalraipur@gmail.com) raipur | | | | बेहतरीन विश्लेषण. दिवाकर जी और रविवार को बधाई. | | | | | |
| | bhagat singh raipur c.g. | | | | जब सारे अख़बार और सरकार प्रगति का गुब्बारा फुला रही हों, ऐसे में यथार्थ मूल्यांकन बहुत सही समय पर किया है. 35 लाख परिवार बीपीएल में हों और आदिवासी अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट में हो तब जीडीपी और मानव सूचनांक के अंतर को भी सीखना चाहिये, चिदंबरम और मनमोहन सिंह जी भी ऐसी ही बात करते रहे हैं क्योंकि दोनों का सम्बन्ध जनता से नहीं अर्थशास्त्र या कारपोरेट से है. कम से कम रमन सिंह तो जनता की नब्ज पहचानने का दावा करने लगे हैं. ये बिलकुल सही है कि जीडीपी के बढ़ने का कोई सम्बन्ध गरीबो से नहीं होता. लेख के लिए मुक्तिबोध जी को बधाई. | | | | | |
| | amit kalra , इंदौर | | | | असल में जीडीपी एक फरेब के सिवा कुछ नहीं है. दिवाकर जी ने बहुत सहजता से अपनी बात कह दी है. | | | | | |
| | Surendra Kumar Bagh (surendra_2000@yahoo.co.in) , Delhi | | | | मेरे प्रिय कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के पुत्र और वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध का यह लेख अपनी पिता की परंपरा में ही है. दिवाकर जी ने बहुत गहराई से गरीबों का दर्द उकेरा है और स्पष्ट कर दिया है कि पार्टनर, ये मेरी पालिटिक्स है. | | | | | |
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