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भगवा, हरा और काला आतंकवाद

मुद्दा

भगवा, हरा और काला आतंकवाद

राम पुनियानी

क्या आतंकवाद पर कोई लेबिल चस्पा किया जा सकता है? क्या आतंकवाद को किसी रंग से जोड़ा जा सकता है, विशेषकर किसी ऐसे रंग से, जो समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ हो?

भगवा आतंकवाद


इस बहस की शुरुआत हुई केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम के एक वक्तव्य से. शीर्ष पुलिस अफसरों को संबोधित करते हुए मंत्रीजी ने कहा- “हाल में भगवा आतंकवाद का पर्दाफाश हुआ है और इसे पूर्व में हुए कई बम धमाकों के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है. मेरी आपको सलाह है कि हम सतत सतर्क रहें और आतंकवाद से लड़ने की अपनी क्षमता को-राज्य व केन्द्र दोनों स्तरों पर-बेहतर बनाते रहें.”

गृह मंत्री के इस वक्तव्य पर हिंदुत्व समर्थक पार्टियों-विशेषकर हिंदू राष्ट्र की पैरोकार भाजपा व शिवसेना ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की.

कांग्रेस भी इस मुद्दे पर दुविधा में नजर आई. पार्टी के एक प्रवक्ता ने गृह मंत्री के वक्तव्य का समर्थन किया तो दूसरे ने उससे पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हुए कहा कि आतंकवाद का केवल एक ही रंग होता है और वह है काला. भाजपा प्रवक्ता ने चिदंबरम से माफी माँगने को कहा और शिवसेना के उद्धव ठाकरे ने गृह मंत्री के इस्तीफे की माँग कर डाली.

शिवसेना के बूढ़े शेर बाला साहेब ठाकरे ने जानना चाहा कि कश्मीर में व सिक्ख-विरोधी दंगों में दिल्ली में जो खून बहा, उसका रंग क्या था.

चिदंबरम के वक्तव्य की पृष्ठभूमि में हैं मालेगाँव बम धमाके में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, स्वामी दयानंद पांडे व अन्य हिंदुत्व कार्यकर्ताओं की संलिप्तता उजागर होने के बाद हुए कई रहस्योद्घाटन, जिनसे यह साफ हो गया कि विभिन्न हिंदुत्व संगठन कई सालों से देश के अलग-अलग हिस्सों में आतंकी हमले करते आ रहे हैं.

महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद-निरोधक दस्ते के प्रमुख स्वर्गीय हेमंत करकरे ने सबसे पहले इन भगवा वस्त्रधारियों के काले कारनामों का पर्दाफाश किया. साध्वी प्रज्ञा, स्वामी दयानंद, स्वामी असीमानंद आदि के साथ ले. कर्नल श्रीकांत पुरोहित, पूर्व मेजर उपाध्याय व कई अन्य लोगों पर आरोप है कि ये हिंदू राष्ट्र की स्थापना के अपने लक्ष्य को पाने के लिए, बम बनाते व निदोर्षों का खून बहाते रहे हैं. आरोप हैं कि अभिनव भारत, सनातन संस्था व बजरंग दल उन संगठनों में शामिल हैं, जिन्होंने देश में कई स्थानों पर बम विस्फोट किए.

‘हिंदू राष्ट्र’ के झंडाबरदारों की बमों में दिलचस्पी जब पहली बार उजागर हुई थी तब भाजपा-शिवसेना शिविर में हड़कंप मच गया था. शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ ने लिखा था, “हम इस मामले की जाँच कर रहे हेमंत करकरे के मुँह पर थूकते हैं.” भाजपा के एक प्रमुख नेता ने करकरे को ‘देशद्रोही’ बताया था.

मुंबई पर 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमले के दौरान करकरे को मौत के घाट उतार दिया गया. उनकी हत्या रहस्यमय परिस्थितियों में हुई. यहां तक कि अल्पसंख्यक मामलों के तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री ए.आर. अंतुले तक ने कहा कि आतंकवाद के अलावा “कुछ और भी” करकरे की मौत के लिए जिम्मेदार हो सकता है.

मालेगाँव रहस्योद्घाटन व करकरे की रहस्यपूर्ण मौत के बाद ही भगवा/हिंदू आतंकवाद शब्द प्रचलन में आए. इस आतंकवाद को हिंदू धर्म व पवित्र भगवा रंग से जोड़ने के पीछे एक कारण यह भी था कि इस्लामिक आतंकवाद शब्द का लंबे समय से प्रयोग होता आ रहा था. इस शब्द को अमरीकी मीडिया ने गढ़ा था और धीरे-धीरे इसका व्यापक प्रयोग होने लगा.

इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘हिंदू आतंकवाद’ और ‘इस्लामिक आतंकवाद’ जैसे शब्दों का प्रयोग अनुचित है. जहाँ तक ‘जिहादी आतंकवाद’ शब्द का संबंध है, वह इसलिए ठीक नहीं है क्योंकि ‘जिहाद’ का मरने-मारने या खून-खराबे से कोई लेना-देना नहीं है. ‘जिहाद’ तो स्वयं को बेहतर मनुष्य बनाने के आंतरिक संघर्ष का नाम है.

यह निहायत अफसोस की बात है कि त्याग का प्रतीक यह पवित्र रंग एक राजनैतिक विचारधारा की पहचान बन गया.


जहाँ तक ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का सवाल है-जिसका इस्तेमाल चिदंबरम के अलावा कई सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार व लेखक कर रहे हैं- हमें इसकी पृष्ठभूमि को समझना होगा. ‘भगवा’ शब्द पर हिंदू राष्ट्र के पैराकार अपना कापीराईट समझते हैं. ऐसा लगता है मानों हिंदुत्ववादियों ने ‘भगवा’ को पेटेंट करवा लिया हो.

‘हिंदुत्व’ शब्द के जनक सावरकर थे. उनके अनुसार, हिंदुत्व में हिंदू धर्म, आर्य नस्ल, वैदिक संस्कृति व सिंधु नदी से लेकर समुद्र तक का भूभाग-इन सभी का समावेश है. हिंदुत्व की तुलना उस राजनैतिक इस्लाम से की जा सकती है, जो मुस्लिम लीग का वैचारिक आधार था. मुस्लिम लीग का झंडा हरे रंग का था जबकि हिंदू महासभा ने अपने लिए भगवा झंडा चुना था. आरएसएस ने सन् 1925 में अपनी स्थापना के साथ ही, हिंदुत्व को, हिंदू राष्ट्र के अपने लक्ष्य को पाने का हथियार बना लिया था.

भारतीय तिरंगे की जगह आरएसएस ने भी भगवा झंडे को अपनाया. हिंदू परंपरा में भगवा रंग त्याग, बलिदान व समर्पण का प्रतीक माना जाता है. संघ ने इस रंग पर अपना अधिकार घोषित कर दिया. भगवा रंग का इस्तेमाल उसने अपने उन राजनैतिक लक्ष्यों को पाने के लिए किया, जो राष्ट्रीय आंदोलन के लक्ष्यों से न सिर्फ अलग थे वरन् उनके विरोधी भी थे.

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन बहुवादी, धर्मनिरेपक्ष, प्रजातांत्रिक भारत के निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध था. अपना हरा झंडा फहराते हुए मुस्लिम लीग, इस्लामिक राष्ट्र माँग रही थी जबकि भगवा झंडे के तले इकट्ठा संघी, हिंदू राष्ट्र का नारा बुलंद कर रहे थे.

सन् 1980 के दशक में संघ परिवार ने राम मंदिर आंदोलन शुरू किया. इस आंदोलन में धार्मिक शब्दावली व धार्मिक प्रतीकों का राजनैतिक हितसाधन के लिए खुलकर इस्तेमाल किया गया. संघ परिवार यह मानता है कि प्राचीन भारत की सामाजिक व्यवस्था सर्वश्रेष्ठ थी.

संघ और उसके साथियों ने सन् 1980 व 1990 के दशकों में भगवा झंडे का भरपूर इस्तेमाल किया. राम मंदिर और हिंदू राष्ट्र के समर्थन में देश भर में लगाए गए स्टिकरों की पृष्ठभूमि में भगवा रंग था. संघ के पास भगवा वस्त्रधारी साधू-साध्वियों की छोटी-मोटी सेना है, जिसे वह जरूरत पड़ने पर तैनात करता रहता है. ये साधू सेना खुलकर कहती रही है कि हिंदू धर्म ग्रंथ, संविधान के ऊपर हैं व अदालती फैसलों से आस्था से जुड़े मुद्दे तय नहीं हो सकते.

कुल मिलाकर, धार्मिक भावनाओं से जुडे़ भगवा रंग का संघ परिवार ने अपनी राजनीति में इतना अधिक उपयोग किया कि भगवा रंग, एक प्रकार से, संघ की रीति-नीतियों का प्रतीक बन गया. एनडीए शासनकाल में, स्कूली पाठ्यपुस्तकों और शिक्षा पद्धति में हिंदुत्व के एजेंडे को डालने के मुरली मनोहर जोशी के अभियान को “शिक्षा के भगवाकरण” की संज्ञा दी गई थी. यह निहायत अफसोस की बात है कि त्याग का प्रतीक यह पवित्र रंग एक राजनैतिक विचारधारा की पहचान बन गया. चिदंबरम के हालिया बयान को, भगवा रंग और संघ परिवार की राजनीति के आपसी जुड़ाव की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए.

हमारी आज की दुनिया में केवल एक महाशक्ति है और इस महाशक्ति ने तेल व दुनिया के अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा जमाने के अपने कुटिल अभियान को धर्म का जामा पहना दिया है. इसी उद्देश्य से ‘सभ्यताओं के टकराव’ की बात कही जा रही है और इसी उद्देश्य से इस्लाम व मुसलमानों का दानवीकरण किया जा रहा है. भारत में भी इस्लाम को हौव्वा बना दिया गया है. अब समय आ गया है कि हम धर्मों की पवित्रता की रक्षा करें और धार्मिक प्रतीकों, रंगों व शब्दावली के राजनीति में इस्तेमाल का विरोध करें.

02.08.2010, 00.02 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad/Jaunpur

 
 सदियों तलक रहा है यह देश गुलाम ? आखिर क्यों जब इसकी अस्मिता लोगों को गिरवीं हो जाती है तो गुलामी की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, क्या रंगों पर कब्ज़ा उस प्रक्रिया का अंग तो नहीं बनने जा रहा है ? यथा- भगवा-नीला-काला-हरा-सफ़ेद-गुलाबी-पीला |
जबकि इन रंगों के अपने मायने हुआ करते हैं, हम कहीं न कहीं इनके मूल्यों को समाप्त तो नहीं करते जा रहे हैं इन पर कब्ज़ा कर-कर के. आम जीवन इन रंगों के साथ अपने जीवन में उत्सवी आनंद व मंगल की कामना करता रहा है. पर आज इन्हीं रंगों पर राजनितिक दलों ने, धार्मिक मठों ने आधिपत्य जमा रखा है. ऐसे में हमारे सांस्कृतिक विरासत पर आधिपत्य का मामला काफी भयावह है. यदि यही हालात रहे तो हमारे रंग भी गुलाम हो जायेंगे. अब सवाल यह बनता है कि ये राजनितिक और धर्माधिकारी क्या करें. कहाँ से ले प्रतीक अपने-अपने अभियानों के लिए या रंग पर आमजन के रंगों की कीमत वसूलने का हक़ यानी कब्ज़ा ना करें तो ही ठीक रहेगा. परन्तु आज हमारे बीच इन रंगों की अनदेखी ही नहीं, उनके मायने भी बदल रहे है. बगैर दलों के नाम लिए यहाँ यह कहा जा सकता है कि यह हाल करीब-करीब सभी दलों की है, जहाँ इन रंगों का सम्मान होने के बजाय ज्यादा अपमान ही किया जा रहा है. यहाँ तक कि राष्ट्रध्वज भी इससे बच नहीं पा रहा है.
 
   
 

sunil kumar bansingh (sunilbansingh@yahoo.com) ghatsila

 
 मैं यह मानता हूँ कि होम मिनिस्टर जैसे पावरफुल रोल प्ले करने वाले पी.चिदंबरम को बयानबाज़ी के बजाय हर उस संगठन के विरुद्ध कारवाही करना चाहिए जो कट्टरवादी मानसिकता से प्रेरित हो. मेरी नज़र में वेलेंटाइन डे पर उत्पात मचने वाले आरएसएस, बजरंग दल, शिव सेना भी आतंकवादी संगठन है क्योंकि एक दिन के लिए ही सही यह लोग पूरे देश में अराजकता और आतंक मचा देते हैं. 
   
 

amita neerav indore

 
 पुनियानी जी, जब आतंक का रंग लाल हो सकता है, तो भगवा क्यों नहीं? क्या महज इसलिए कि इससे हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है या हमारे धार्मिक इतिहास में इसे त्याग, बलिदान औऱ शौर्य का रंग माना गया है? गलत तो हर हाल में गलत ही होगा ना...! अब इस रंग की गरिमा को बनाए रखने की जिम्मेदारी समाज को उठानी होगी। मूल मुद्दा निर्दोषों की मौतों का है, राजनीति यदि इसे रंगों में न बाँटे तो सही तो यही है कि आतंकवाद का रंग काला है, जो कि कोई रंग ही नहीं है, लेकिन क्या राजनीति समाज को इतना समझने की मोहलत देगी? यदि ये इतनी चिंता की बात है तो इस्लामिक आतंकवाद और लाल आतंक पर भी चिंता होनी चाहिए। 
   
 

Sainny Ashesh Western Himalayas

 
 Puniyani ji,
Aapki baat ek nek insaan ke dil ki baat hai.
Mai jin ilaakon me rahta hoon, wahaan ke log jaante hain ki apne ghar-baar aur wahaan ke maahaul me mai Bhagwa wastron me dikhaayi deta hoon.
mere bhagwa vastron se yahaan kisi ko koi aitraaz ya dikkat nahin hai. Yah bhagwa vastra sirf bhaarat me nahin, samooche vishwa me sammanit hai aur 'Hinduttwa' ke daawedaaron ko chhod kar har kahin insaaniyat ke vikaas ka prateek hai. Gautam Buddh se lekar Osho tak yah rang aantrik kranti ka prateek hai. Kahin halka laal, kahin gahra laal, magar Soorya ki aag aur viksit jeewan ka parichaayak. Himalay me to har kahin bhagwa vastradhaari dikhaayi dete hain. Ye log Hindu ya Musalmaan nahin hain, isliye Bhagwa yahaan Buddh ki shanti aur "Appo Deep Bhav:" sandesh ka prateek hai.
Mai Bauddh nahin hoon. Hindu, Musalmaan ya eesaai hone ka to sawaal hi nahin. Mere lekhan par aksar mukadme chale hain aur we sab mukadme jaahir hai Hinduttwa ke thekedaaron ne hi chalaaye.
Main aur aap udaarta ke sath sabse yah appel to kar sakte hai ki we dhaarmik prateekon ko aatank se na joden, magar aap aur mai kya nahin jaante ki jab tak ek aadmi apni taraf kee bheed ke "Dharm" ya "Majhab" ko baaki se behtar bataayega, tab tak wah aadmi ek aatank me hissedaar ho jaayega.
Main ya mere jaise duniya bhar ke log Bhagwa pahante hain, lekin kya yah sach nahin hai ki is rang par adhikaansht: bheed ka hi kabza hai?
Achhe se achhe prateek-vastra aur uske rang ko girohbaaz gadhe ya range siyaar kab nhain apnaate?
Log aapki baat kabhi nahin maanenge. Ap ya mai bhi apni baat kahne se baaz nahin aayege. Magar adhikaash log abhi isi laayak nahin hain ki sachche hone ke liye apni bheed ka munh na taaken. Unhe marna aur maarna hi hai. Jo is paap me shaamil nahi hona chaahte, we aaraam se apni ek sahi zindagi jee sakte hain. Prakriti aaj bhi aise jeewan ki sahyogi hone ko taiyyar hai. Sadgi aur sachchaai ki sachchi zindagi!

Sach yahi hai ki samajhdaari ki baat maan lene par bhi adhikaansh log moorkh bane rahne me faayada dekh rahe hain.
Unhen apne nark bhugatne hi hain.

Jai Raam ji ki.
 
   
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