किसानों के अंत की शुरुआत
मुद्दा
किसानों के अंत की शुरुआत
देविंदर शर्मा
आजकल दावे किए जा रहे हैं कि रिटेल चेन कृषि क्षेत्र का कायाकल्प कर देगा. जबकि
वास्तव में, यह किसानों के लिए मौत का जाल है. यह भारतीय किसानों के अंत की शुरुआत
साबित होगी. ऐसा अमरीका में हो चुका है. जैसे ही बाजार में बड़े रिटेलरों जैसे
वालमार्ट, टेस्को और केरफॉर ने प्रवेश किया, किसान गायब हो गए और गरीबी बढ़ गई.
आज अमरीका में मात्र सात लाख किसान ही बचे हैं. वहां किसानों की संख्या इतनी कम हो
गई है कि सन 2000 के बाद की जनगणना में उनकी अलग से गिनती करनी बंद कर दी गई है.
यूरोप में, बड़े रिटेलरों के बाजार में छाने के कारण हर मिनट एक किसान खेती को त्याग
रहा है.
एक रिपोर्ट के अनुसार फ्रांस में 2009 में किसानों की आमदनी 39 फीसदी घट गई है.
इससे पहले 2008 में इसमें 20 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी थी. स्कॉटलैंड में डेयरी
किसानों के धंधा छोड़ने की वजह सुपरमार्केट की कम कीमतों को बताया जा रहा है. इसलिए
यह अपेक्षा करना व्यर्थ है कि भारत में किसानों को सुपरमार्केट बचा लेंगे.
सुपरमार्केट के कारण वैश्विक स्तर पर कृषि के विनाश के बावजूद उद्योग एवं वाणिज्य
मंत्री रिटेल क्षेत्र में खुले हाथों से निवेश को बढ़ावा दे रहे हैं. इसका मतलब है
कि वालमार्ट और टेस्को जैसे बड़े खिलाड़ी भारतीय बाजार को निगल जाएंगे. औद्योगिक नीति
और प्रोत्साहन विभाग के एक दस्तावेज के अनुसार, 'ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक विकास,
संपन्नता और रोजगार के अवसर सृजित करने के लिए कृषि क्षेत्र में बेहतर कार्यशील
बाजार की आवश्यकता है.'
अनेक अर्थशास्त्री और शोधकर्ता सुपरमार्केटों की एक सुर में प्रशंसा कर रहे हैं.
किंतु क्या वास्तव में सुपरमार्केट फायदेमंद हैं? 2006 से भारत ने रिटेल क्षेत्र के
लिए अर्थव्यवस्था के कपाट खोलने शुरू कर दिए थे. क्या इन रिटेल इकाइयों ने किसानों
और उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचाया है? इसका जवाब है-नहीं. दलील दी जाती है कि
सुपरमार्केट बिचौलियों को बाहर करके किसानों को उपज का अधिक दाम देने के साथ-साथ
कृषि उत्पाद के प्रसंस्करण और कोल्ड श्रृंखला ढांचे के विकास में भारी-भरकम रकम
निवेश करेंगे.
ये दावे बेबुनियाद हैं. बिग रिटेल ने विश्व में कहीं भी किसानों का भला नहीं किया
है. ब्राजील, उरुग्वे, अर्जेटीना और कोलंबिया जैसे लातिन अमेरिकी देशों में भी,
बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा चलाए जा रहे सुपरमार्केटों ने किसानों को खेती छोड़ने
पर मजबूर कर दिया है.
अगर सुपरमार्केट बेहतर हैं तो मैं जानना चाहूंगा कि अमरीका अपने किसानों को भारी
अनुदान क्यों दे रहा है? आखिरकार, विश्व का सबसे बड़ा सुपरस्टोर वालमार्ट अमेरिकी ही
है और इसे अब तक किसानों के लिए खेती को फायदे का सौदा बना देना चाहिए था. किंतु
ऐसा नहीं हुआ. इसके बजाय किसानों को बचाने के लिए अमेरिकी सरकार 1995 से 2009 के
बीच 12.5 लाख करोड़ रुपये का अनुदान दे चुकी है, इसमें प्रत्यक्ष आय सहयोग भी शामिल
है. 1950 तक अमरीका में भोजन पर खर्च की गई कुल राशि का करीब 70 फीसदी हिस्सा किसान
को मिल जाता था. आज यह राशि तीन से चार प्रतिशत के बीच सिमट गई है. इसीलिए अमेरिकी
किसानों को सरकार की तरफ से प्रत्यक्ष सहायता राशि मिल रही है.
तीस सबसे धनी देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकॉनोमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट की
हालिया रिपोर्ट के अनुसार, '2009 में कृषि अनुदान 22 प्रतिशत हो गया है, जबकि 2008
में यह 21 प्रतिशत था.' केवल 2009 में ही औद्योगिक राष्ट्रों ने 1260 अरब डालर का
कृषि अनुदान दिया. और इसका मुख्य कारण यह है कि कृषि लाभकारी नहीं रह गई है.
नीदरलैंड में कृषक परिवार की औसत आय आम परिवारों से 275 प्रतिशत अधिक है और इसका
कारण सुपरमार्केट नहीं, कृषि अनुदान है. इस तरह हम अमरीका से विफल मॉडल का आयात कर
रहे हैं.
बड़े रिटेलर बिचौलियों को हटाते नहीं हैं. बिचौलिये से मतलब है कि उत्पादक और
उपभोक्ता के बीच की कड़ी. सुपरमार्केट का दावा है कि उनके यहां बिचौलिये नहीं हैं
जिस कारण किसानों को उपज का अधिक दाम मिलता है. वास्तव में, इसका उलटा ही होता है.
सुपरमार्केट खुद ही बड़े बिचौलिया हैं. वे इस धंधे की छोटी मछलियों को निगल जाते
हैं. वे धोती-कुरते वाले परंपरागत आढ़ती के स्थान पर टाई वाले बिचौलियों को ले आए
हैं. सुपरमार्केट सुनियोजित तरीके से यह भ्रम फैला रहे हैं कि वे बिचौलियों को हटा
देते हैं. किंतु वस्तुस्थिति यह है कि अब कुछ बड़े बिचौलिये उनसे कमीशन लेते हैं.
रिटेलरों के बिचौलियों के समूह में गुणवत्ता नियंत्रक, सर्टिफिकेशन एजेंसियां,
पैकेजिंग उद्योग, प्रसंस्करण उद्योग और थोक विक्रेता शामिल हैं.
इन नए किस्म के बिचौलियों के कारण कृषि आय में गिरावट होती है. इस तरह किसान की
आमदनी घटती चली जाती है और सुपरमार्केट का मुनाफा बढ़ता जाता है. भारत में आने के
पीछे भी सुपरमार्केटों की यही मंशा है. हमें इस संबंध में भुलावे में नहीं रहना
चाहिए कि भारत में आकर सुपरमार्केट गरीब किसानों के साथ दयाभाव या सहानुभूति का
इजहार करेंगे.
क्या सुपरमार्केट गरीबी उन्मूलन में सहायक हैं? कुछ सलाहकार फर्र्मो और संस्थानों
के पक्षपातपूर्ण अध्ययनों के आधार पर भारत सरकार को भरोसा है कि सुपरमार्केट रोजगार
के अवसर बढ़ाएंगे और इस प्रकार गरीबी उन्मूलन में सहयोग देंगे. यह भी गलत आकलन है.
अमरीका की पेनसिलवेनिया यूनिवर्सिटी के कृषि अर्थशास्त्र एवं ग्रामीण समाजशास्त्र
विभाग के स्टीफन जे गोएत्ज और हेमा स्वामीनाथन के 2004 के अध्ययन से सबक सीखने की
आवश्यकता है. इन्होंने विभिन्न अमेरिकी राज्यों में वालमार्ट के फैलाव के गरीबी पर
पड़ने वाले प्रभाव के संबंध में शोध किया है. आंखें खोल देने वाले इस अध्ययन का
शीर्षक है 'वालमार्ट और गरीबी'. इसमें साफ तौर पर बताया गया है कि 1987 में जिन
अमेरिकी राज्यों में वालमार्ट के अधिक स्टोर थे, उनमें उन राज्यों की तुलना में
1999 में गरीबी की दर अधिक थी, जिनमें वालमार्ट के स्टोरों की संख्या कम थी.
रिपोर्ट का निष्कर्ष है, 'इतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि जिन जिलों में 1987 से
1998 के बीच वालमार्ट के स्टोर खुले हैं, उनमें भी गरीबी की दर अधिक है.'
दिलचस्प यह है कि वालमार्ट के कारण इन क्षेत्रों में उस वक्त गरीबी बढ़ी है, जब
अमरीका के अन्य भागों में गरीबी की दर में कमी आ रही थी.
सुपरमार्केट के आने से भारत में 1.2 करोड़ छोटे दुकानदारों, चार करोड़ हाकरों और कम
से कम 20 करोड़ छोटे किसानों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी. आवश्यकता यह है कि देश
भर में मंडियों की स्थापना पर अधिक सरकारी धन खर्च किया जाए, खास तौर पर उत्तर
प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश में. सरकारी खरीद के माध्यम से किसानों
को सुनिश्चित दाम अदा किए जाएं जो भारतीय किसानों की जरूरत है. पंचायत स्तर पर
खाद्यान्न बैंकों की स्थापना से फसल के भंडारण और वितरण का तंत्र खड़ा किया जा सकता
है.
02.09.2010,
01.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित