पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

चुनावी मसाले की सोंधी महक

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
Photobucket
 पहला पन्ना > बात निकलेगी तो... > समाजPrint | Send to Friend | Share This 

एक पुरस्कार और सौ इफ्तिखार

बात निकलेगी तो

एक पुरस्कार और सौ इफ्तिखार

अभिषेक श्रीवास्तव

एनडीटीवी की नीता शर्मा को साल के सर्वश्रेष्ठ रिपोर्टर का पुरस्कार मिलने की खबर बुधवार को आई, तो सबसे पहले इफ्तिखार गिलानी का चेहरा आंखों में घूम गया. अभी पिछले 25 को ही तो कांस्टिट्यूशन क्लब के बाहर यूआईडी वाली मीटिंग में वह दिखे थे. वैसा ही निर्दोष चेहरा, हमेशा की तरह विनम्र चाल और कंधे पर झोला... शायद. खबर आते ही एक एक वरिष्ठ सहकर्मी उछले थे, ''गजब की रिपोर्टर है भाई... उसकी दिल्ली पुलिस में अच्छी पैठ है.'' जब मैंने इफ्तिखार का जिक्र किया, तो उन्होंने अजीब-सा मुंह बना लिया.

ndtv


एक रिपोर्टर की ''दिल्ली पुलिस में अच्छी पैठ'' का होना क्या किसी दूसरे रिपोर्टर के लिए जेल का सबब बन सकता है? टीवी देखने वाले नीता शर्मा को जानते हैं तो प्रेस क्लब और आईएनएस पर भटकने वाले गिलानी को. लेकिन टीवी और अखबारों के न्यूजरूम में कैद लोग शायद यह नहीं जानते कि अगर हिंदुस्तान टाइम्स में रहते हुए नीता शर्मा ने गलत रिपोर्टिंग नहीं की होती, तो शायद गिलानी को तिहाड़ में उस हद तक प्रताड़ना नहीं झेलनी पड़ती जिसके लिए 'अमानवीय' की संज्ञा भी छोटी पड़ जाती है.

गिलानी की लिखी पुस्तक 'जेल में कटे वे दिन' पढ़ जाएं, तो जानेंगे कि इसी दिल्ली में कैसे एक पत्रकार खुद अपनी ही बिरादरी का शिकार बनता है. गिलानी की कहानी में खलनायक नीता शर्मा उतनी नहीं, जितने वे पत्रकार हैं जिन्होंने उन्हें पुरस्कांर दिया है, जिन्होंने खबरें लाने को पुलिस का भोंपू बनने का पर्याय समझ लिया है, जिन पत्रकारों ने कभी जाना ही नहीं कि आखिर आईएनएस-प्रेस क्लब और पुलिस हेडक्वार्टर के बीच की कड़ी उन्हीं के बीच जगमगाते कुछ चेहरे हैं.

हिंदू के पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने नीता शर्मा के बारे में जो लिखा है, उसे जरा देखें: ''जहां तक उस क्राइम रिपोर्टर का सवाल है जिसने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा फीड की गई स्टोरी को छापा, उसने कभी कोई माफी नहीं मांगी. एक सहकर्मी की शादी में इस रिपोर्टर से मेरा परिचय 2004 में हुआ. मैंने जब उससे कहा कि इफ्तिखार गिलानी के मामले में उसने जो हिट काम किया है, उसे लेकर मेरी कुछ आपत्तियां हैं, तो उसने कहा, 'मैं किसी इफ्तिखार गिलानी को नहीं जानती.' मैं नाराज तो जरूर हुआ, लेकिन सोचा कि उसे एक सलाह दे ही डालूं, 'जिन पुलिस अधिकारियों ने उस स्टोरी को प्लांट करने में तुम्हारा इस्तेमाल किया, वे तो अपनी प्रतिष्ठा बचा कर निकल लिए, लेकिन जो तुमने किया, वह हमेशा एक पत्रकार के रूप में तुम्हारी प्रतिष्ठा पर दाग की तरह बना रहेगा, जब तक कि तुम इफ्तिखार से माफी नहीं मांग लेती.'

सिद्धार्थ आगे लिखते हैं: ''नीता शर्मा की स्टो्री पुलिस के लिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह ठीक ऐसे समय में आई, जब अनुहिता मजूमदार और इफ्तिखार के अन्य मित्रों द्वारा तैयार एक याचिका खबरों में थी. 10 जून को इस बारे में एक छोटी-सी खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में आई थी और पुलिस व आईबी को तुरंत अहसास हो गया कि किसी भी किस्म की पत्रकारीय एकजुटता को सिर उठाते ही कुचल देना उनके लिए जरूरी है. संपादकों पर दबाव बनाया जा सकता था (और वे झुके हुए ही थे) लेकिन इफ्तिखार के पक्ष में किए जा रहे प्रचार अभियान के खिलाफ इससे बेहतर क्या हो सकता था कि उसी के द्वारा फर्जी स्वीकारोक्ति करवाई जाए कि वह आईएसआई का एजेंट रहा है. तुरंत ऐसी खबरों की बाढ़ आ गई और अधिकांश भारतीय मीडिया में कलंकित करने वाली रिपोर्टें आने लगीं जिसमें इफ्तिखार पर एक षडयंत्रकारी और आतंकवादी, तस्कर और जिहादी, यौन दुष्कर्मी और भारतीय जनता पार्टी के सांसद व कभी खुद पत्रकार रहे बलबीर पुंज के शब्दों में 'पत्रकार होने का लाभ ले रहे एक जासूस' होने के आरोप लगाए जाने लगे.''

ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत सात महीने जेल में रहे कश्मीर टाइम्स के तत्कालीन ब्यूरो प्रमुख इफ्तिखार गिलानी के मामले में रिपोर्टिंग के स्तर पर न सिर्फ नीता शर्मा ने, बल्कि आज तक के दीपक चौरसिया और दैनिक जागरण आदि अखबारों ने भी गड़बड़ भूमिका अदा की.

मन्निका चोपड़ा ने गिलानी से एक इंटरव्यू लिया था (जो अब भी सैवंती नैनन की वेबसाइट 'द हूट' पर मौजूद है) जिसमें गिलानी ने बताया था कि दीपक चौरसिया ने उनके घर से लाइव रिपोर्ट किया कि गिलानी फरार हो गए हैं, जबकि वह घर में ही थे. दीपक चौरसिया ने 'सनसनीखेज खबर' दी कि पुलिस ने गिलानी के पास से एक लैपटॉप बरामद किया, जिसमें अकाट्य सबूत हैं. गिलानी ने साक्षात्कार में कहा, 'मेरे पास लैपटॉप है ही नहीं.'

इस साक्षात्कार के कुछ अंश देखें:
''दैनिक जागरण ने लगातार अपमानजनक रिपोर्टें छापीं और इसकी कीमत मुझे तिहाड़ जेल में चुकानी पड़ी क्योंकि अधिकतर कैदी उसी अखबार को पढ़ते थे. तीन हत्या़ओं के आरोप में कैद एक अपराधी ने मुझ पर हमला कर दिया यह कहते हुए कि मैं भारतीय नहीं हूं, गद्दार हूं. उसने इन रिपोर्टों को पढ़ा था. कुछ हिंदी और उर्दू के अखबार खबर का शीर्षक लगा रहे थे, 'इफ्तिखार गिरफ्तार, अनीसा फरार'. (अनीसा इफ्तिखार की पत्नी हैं).

''लेकिन असल चीज जिसने मुझ पर और मेरे परिवार पर सबसे ज्यादा असर डाला, वह 11 जून को हिंदुस्तान टाइम्स में छपी चार कॉलम की स्टोरी थी जो कहती थी कि मैं आईएसआई का एजेंट हूं. यह खबर नीता शर्मा के नाम से थी. आश्चर्यजनक रूप से रिपोर्टर ने मेरे हवाले से बताया कि मैंने एक सेशन कोर्ट में सुनवाई के लिए पेश होते वक्त स्वीकार कर लिया है कि मैं एजेंट हूं और मैंने गैर-कानूनी काम किए हैं. बाद में एक पुलिस अधिकारी ने मुझसे पूछा कि क्या मैंने किसी रिपोर्टर से बात की थी, तो मैंने इनकार कर दिया. इसने वास्तव में मेरे परिवार को और मुझे काफी दुख पहुंचाया. अगले ही दिन मेरी पत्नी ने एचटी की कार्यकारी और संपादकीय निदेशक शोभना भरतिया से इसकी शिकायत की और कहा कि यह सब गलत है, उन्हें माफी मांगनी चाहिए. अखबार ने अगले दिन माफी छापी.''

सिर्फ एचटी ने ही नहीं, गिलानी के रिहा होने पर कई पत्रकारों ने उनसे माफी मांगी, खेद जताया. सिर्फ नीता शर्मा उन्हें भूल गईं और कामयाबी की सीढि़यां चढ़ते हुए एनडीटीवी पहुंच गईं. आज वह सर्वश्रेष्ठ रिपोर्टर भी बन गई हैं.

गिलानी पत्रकार हैं, सो मामला सामने आ गया. कौन जाने, कितने लोग होंगे जिन्होंने इस तरह की रिपोर्टिंग के कारण पुलिस का दंश झेला होगा और झेल रहे होंगे.

सिद्धार्थ वरदराजन ने नीता शर्मा से मुलाकात में जो कहा, वह छह साल पहले की बात है. उन्हें उम्मीद नहीं रही होगी कि गिलानी वाले मामले पर गलत रिपोर्टिंग में जिस व्यक्ति को वह 'पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठा पर एक दाग' झेलने की बात कह रहे थे, उसे आज मीडिया पुरस्कार देगा. लेकिन क्या गिलानी के मामले में नीता शर्मा ने जो कुछ लिखा था, उसे पत्रकारिता माना जाना चाहिये ?

पत्रकार तो इफ्तिखार हैं, जिन्होंने हुर्रियत नेता गिलानी का दामाद होने के बावजूद अपनी कलम की रोशनाई पर रिश्ते् की धुंध कभी नहीं छाने दी, जबकि नीता शर्मा जैसे मीडियाकर्मी उस चरमराती लोकतांत्रिक मूल्य व्यवस्था के लोग हैं जिसके पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे खंभे पिघल कर आज एक खौफनाक साजिश के दमघोंटू धुएं में तब्दील हो चुके हैं- जिसमें हर मुसलमान आतंकवादी दिखता है, हर असहमत माओवादी और हर वंचित अपराधी.

 

03.09.2010, 13.03 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Puneet K Malaviya (missing.me.f@gmail.com) Allahabad

 
 अभिषेक जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं वास्तव मे नीता शर्मा को सर्वश्रेष्ठ रिपोर्टेर का पुरस्कार मिलना इस देश की जुगाड पत्रकारिता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. ये लाइने अन्दर तक झकझोर हिला गईं :
"नीता शर्मा जैसे मीडियाकर्मी उस चरमराती लोकतांत्रिक मूल्य व्यवस्था के लोग हैं जिसके पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे खंभे पिघल कर आज एक खौफनाक साजिश के दमघोंटू धुएं में तब्दील हो चुके हैं- जिसमें हर मुसलमान आतंकवादी दिखता है, हर असहमत माओवादी और हर वंचित अपराधी."
 
   
 

shahroz_wr@yahoo.com (shahroz) india

 
 नीता शर्मा जो तुमने किया, वह हमेशा एक पत्रकार के रूप में तुम्हारी प्रतिष्ठा पर दाग की तरह बना रहेगा, जब तक कि तुम इफ्तिखार से माफी नहीं मांग लेती. नीता से ज्यादा गुस्सा उस ज्यूरी पर आना चाहिए जिसमें विनोद मेहता के नेतृत्व में कई बड़े नाम हैं और उन्हें एक सही अच्छा संवाददाता नज़र नहीं आया. 
   
 

ABDUL ASLAM (aslamimage@rediffmail.com) KORBA

 
 अभिषेक जी आप ने एनडीटीवी की नीता शर्मा और इफ्ताखर गिलिनी की पत्रकरिता को दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया. अफ़सोस अवार्ड तो आज कल बिकता है. आप की लेखनी काबिले तारीफ है. 
   
 

dewender sharma (dewbpl2005@yahoo.co.in) bhopal

 
 नीता शर्मा ने क्या किया, यह बात सभी जानते हैं मगर और भी बहुत से जर्नलिस्ट हैं जो सिर्फ नफरत फैलाने का काम करते है. भोपाल के एक दंगे में एक अखबार के संपादक ने मुख्य भूमिका निभाई थी. आज भी वो जर्नलिस्ट अपने एक जर्नलिज़्म के कॉलेज से जुड़ा है. जाहिर है, उसके कॉलेज से उस जैसे ही जर्नलिस्ट पैदा होगे. मगर ऐसे लोगो की इज्ज़त नहीं होती चाहे वो नीता शर्मा हों या कोई और. 
   
 

रौशन विक्षिप्‍त (roshanvikshipt@hotmail.com) शिमला

 
 अच्‍छी जानकारी दी आपने कि ऐसा भी होता है. 
   
 

sanjay k singh (sanjay.k.singh@yahoo.com) Patna

 
 ऐसे पत्रकार सब जगह हैं. यही कारण है कि पत्रकारिता का मान सम्मान घटा है. ऐसे पत्रकारों के लिखे के कारण ही जनता ने उन पर विश्वास बंद कर रखा है. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 गिलानी साहब के पीछे सारा शातिर और मक्कार निजाम क्यों इस तरह से पड़ गया? यह बताने की ज़रुरत है क्या? मुझे और मेरी को-राइटर स्नोवा बोर्नो को क्यों आसानी से छोड़ दिया गया, इसे भी समझा जा सकता है, जबकि मीडिया के एक शातिर तबके से सहयोग लेकर हिंदी साहित्य के नीच माफिया ने हमें भी संदिग्ध आतंकवादी घोषित किया और सरकार से हमारी जांच कराई.

वजह ? इतनी अनोखी कहानियां हमसे पूछे बिना कैसे लिख ली? चलो, हमारे दरबार में आओ, वर्ना लिखने ही नहीं देंगे. झूठे मामलों में फंसा देंगे. अगर हम गिलानी साहब की तरह एक ख़ास मजहब से ताल्लुक रखते पाए जाते तो हमारे साथ जो होता वो कम.

जिस महान देश में हर रोज़ कहीं न कहीं किसी मासूम औरत को सरे-आम नंगा घुमाया और दौड़ाया जाये और प्रेम करने की उम्र में लड़के-लड़कियों को पापी पंचायतों द्वारा मौत के घाट उतार दिया जाए, वहाँ ये कौन मुर्दे हैं जो किसी महान तहजीब के दावेदार बने हुए हैं? ये कौन लोग हैं जो सच्चाई और प्रेम के खिलाफ इस देश को अपने बाप की जागीर माने बैठे हैं? ये मुर्दे खुद को जिंदा कैसे समझ बैठे हैं? हिन्दू या मुसलमान जैसे शब्दों से पहले इनकी जुबां पर इंसान क्यों नहीं आता ?

अगर मीडिया और साहित्य का ही एक तबका गिलानी साहब के लिए जोर से न चिल्लाता तो क्या होता? हमारा साथ भी मीडिया और साहित्य के ही जागरूक लोगों ने दिया, वरना साहूकारी के चारण नए ज्ञान के उदय वालों के कथाकार हमारे खिलाफ जाने क्या-क्या करते? जागरूक और सच्चे साहित्य और मीडिया को सलाम !
 
   
 

SHAMS TAMANNA (shamstamanna@yahoo.co.in) New Delhi

 
 मुझे नीता शर्मा से ऐसी उम्मीद नहीं थी. अफ़सोस होता है ऐसे ऐसे रिपोर्टर से. खैर मैं नीता को एक सलाह देता हूँ बेहतर होगा कि मेरी इस सलाह को वो गाँठ बांध लें- नीता याद रखना सच कभी न कभी सामने आता ही है. और रही बात जिस पुलिस के साथ वो मिल कर झूठी कहानी बनाती हैं वो तो अपने सगे बाप की भी नहीं होती है. खैर मैं सच के सामने आने और नीता जैसी जर्नलिस्ट के सच उजागर होने का इन्तज़ार करूँगा. वक़्त आने में देर नहीं है. 
   
 

Asrar khan (askasra@yahoo.co.uk) Delhi

 
 एनडीटीवी को चाहिए कि नीता शर्मा को तुरंत निकाल दे और देश का दूसरा कोई मीडिया घराना उन्हें अपनी ईमारत के सामने फटकने ना दे तथा उनको दिए गए अवार्ड को वापस ले ले. इनके जैसे पत्रकार देश के नाम पर काले धब्बे की तरह हैं. 
   
 

prabhakar (rakesh1936@gmail.com) agra

 
 नीता शर्मा को सर्वश्रेष्ठ रिपोर्टेर का पुरस्कार मिलना इस देश की ब्राह्मणवादी पत्रकारिता का भी सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है.जो हर दलित-आदिवासी को मुजरिम और हर मुसलमान को आतंकवादी मानने के पूर्वाग्रह से भी ग्रस्त है. 
   
 

आलोक तोमर (aloktomar@hotmail.com) नई दिल्ली

 
 अभिषेक ने जो लिखा है वह न भी लिखा जाता तो भी नीता शर्मा और उनकी तरह के पुलिस की खबरें प्लांट करने वाले तथाकथित अपराध संवाददाताओं की चांदी है… मैं कई को जानता हूं जिनके थानों से हफ्ते बंधे हुए हैं… नीता शर्मा के बारे में पता नहीं… नीता से ज्यादा गुस्सा उस ज्यूरी पर आना चाहिए जिसमें विनोद मेहता के नेतृत्व में कई बड़े नाम हैं और उन्हें एक सही अच्छा संवाददाता नज़र नहीं आया…इफ्तिखार गिलानी की गिनती हमेशा उन पत्रकारों में होती है जो जन्म और संस्कार से कश्मीरी होने के बावजूद भारत विरोधी या आलगाववाद समर्थक नहीं हैं…

मगर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल किसी को कुछ भी बना सकती है और झूठ बोलने में तो दिल्ली पुलिस का जवाब ही नहीं है… आप मेरी कहानी भी सुन लीजिए…
दिल्ली पुलिस का एक मुख्य हवलदार हुआ करता था केके पॉल उसका बेटा वकील था (अब भी है) उस समय बाप केके पॉल के जिम्मे जिन अपराधियों को सज़ा दिलवाने की जिम्मेदारी हुआ करती थी उनके सपूत अमित पॉल उनके वकील हुआ करते थे… बाप का असर काम आता था और अमित पॉल ने बड़े बड़े ठगों, हत्यारों और जालसाजों को जमानतें दिलवाईं… बड़ी तगड़ी फीस मिलती थी.. ज़ाहिर है कि एक जूनियर वकील को मोटा पैसा मिले तो उसकी औकात के हिसाब से फीस उसकी और बाकी माल उसके बाप का..यही सब छापा था और पॉल सफाई देने के लिए तैयार नहीं थे… इसके बाद डेनमार्क के पैगम्बर वाले हरामीपन भरे कार्टूनों को बनाने और प्रकाशित करने की मानसिकता के खिलाफ एक छोटी-सी टिप्पणी लिखी तो स्पेशल सेल वाले उठा ले गए… अदालत से झूठ बोला कि बाहर दंगा हो रहा है और सीधे तिहाड़ पहुंचा दिया… वहां हाई सिक्योरिटी में और उसी वार्ड में जहां गिलानी रहे थे… आतंकवादियों और हत्यारों के साथ बंद कर दिया गया… और तो और उस मीडिया समूह के मालिक विजय दीक्षित को भी अंदर कर दिया गया… उनका कसूर ये था कि उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय से माफी मांगी थी…

स्टार टीवी, आजतक और जीटीवी ने तो पुलिस हिरासत में मुझसे फोन पर बात की मगर थाने से मुश्किल से एक किलोमीटर दूर एनडीटीवी में यही नीता शर्मा बकवास कर रही थी (मुझे बाद में पता लगा) कि मेरे डेनमार्क के उस अखबार से (जहां पैगम्बर वाले कार्टून छपे थे) सीधे संबंध हैं…वाशिंगटन से लेकर फ्रांस और लंदन से लेकर जोहानिसबर्ग के प्रेस क्लब भारत के राष्ट्रपति और गृहमंत्री को इस गिरफ्तारी के खिलाफ पत्र भेज रहे थे… मेरे पास वकील को देने के लिए पैसे भी नहीं थे… मगर एनडीटीवी और एक अखबार ने लिखा कि आलोक तोमर के पास करोड़ों रुपए का एक मकान है जो विवादास्पद कमाई से खरीदा गया है… एक अखबार के संपादक एक टीवी चैनल पर बैठकर सवाल कर रहे थे कि आलोक तोमर को पत्रकार मानता कौन है… मेरे घर पर भी छापा पड़ा था और सबकुछ तितर-बितर कर दिया गया था… ऑफिस के सारे कम्प्यूटर जांच के लिए पुलिस उठा ले गई थी… एक तरफ स्वर्गीय प्रभाष जोशी और स्वर्गीय कमलेश्वर बिना किसी समन के अदालत में हाजिर होकर मेरे निर्दोष होने की कसम उठाने के लिए तैयार थे… दूसरी तरफ नीता जैसे पत्रकार मुझे पेशेवर आतंकवादी साबित करने पर तुले हुए थे.

इफ्तिखार गिलानी उम्र में छोटे हैं और मुझसे ज्यादा वक्त उन्होंने तिहाड़ में काटा है… कायदे से इस देश के प्रधानमंत्री वाजपेयी को या कम से कम चकाचक कपड़े पहनने वाले गृहमंत्री आडवाणी को गिलानी के चरणों पर गिर कर माफी मांगनी चाहिए थी. गिलानी का कसूर सिर्फ ये था कि वो कश्मीरी हैं और दिल्ली पुलिस और खासतौर पर स्पेशल सेल हर कश्मीरी को शक की निगाह से देखती है. गिलानी से अनुरोध है कि तिहाड़ जेल में ही बंद सैकड़ों निर्दोष कश्मीरियों को आजाद कराने की मुहिम चलाएं और मेरी जितनी औकात होगी मैं साथ देने के लिए तैयार हूं. आखिर में अभिषेक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं.
 
   
 

prakash nw delhi

 
 This shows the nexus and game behind the curtain . This also shows the methodology of choosing and distributing prizes. Well researched article. If version of Neeta Sharma could have been added, the article would have become more balanced. and yes sorry for writing in English as i do not have Hindi font . 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 पुरस्कार या सम्मान का लेनदेन आज सबसे बड़ा अपमान है. अब बहुत ज्यादा बताने की जरुरत नहीं रही कि रंगे सियार और चालाक लोमड़ियां ही ऐसे सम्मान की हकदार हैं. धन्य हो! धिक्कार है! 
   
[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in