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सियासत में गाय की वापसी

मुद्दा

 

सियासत में गाय की वापसी

सुभाष गाताडे


गोवंश हत्या पर पाबंदी को लेकर कर्नाटक सरकार द्वारा पारित बिल का मामला इन दिनों सुर्खियों में है. भारत के पूर्वप्रधानमंत्री जनाब देवेगौड़ा ने एक उच्चस्तरीय शिष्टमण्डल के साथ राष्ट्रपति सुश्री प्रतिभा पाटील से मुलाकात कर इस बात का अनुरोध किया कि वह ‘कर्नाटक प्रिवेन्शन आफ स्लॉटर एण्ड प्रिजर्वेशन आफ कैटल बिल, 2010’ पर अपनी सहमति प्रदान करने के पहले गम्भीरता से सोचें कि ऐसा करना किस हद तक विवेकपूर्ण और न्यायसंगत होगा. गोवंश की हत्या करने के लिए इसमें एक से सात साल तक की सज़ा मुकर्रर की गयी है.

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गौरतलब है कि गोवंश की हत्या रोकने के नाम पर भाजपा द्वारा प्रस्तुत विधेयक पर पिछले दिनों कर्नाटक विधानसभा तथा विधानपरिषद में मुहर लगायी गयी है और इसे अपनी मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा गया है.

प्रश्न उठता है कि क्या कर्नाटक सरकार के पास ऐसा कोई कानून पहले से नहीं था, जिसकी वजह से सख्त प्रावधानों वाला ऐसा कानून बनाया जा रहा है. पहले से चले आ रहे कानून के तहत 12 साल के ऊपर की गायों को -जब वे दूध देना बन्द करती हैं- बूचड़खानों में देने की अनुमति दी गयी थी, हालांकि इसे करने के पहले प्रशिक्षित वेटरनेरी डॉक्टरों से प्रमाणपत्र हासिल करना पड़ता था.

अपने बहुमत के आधार पर प्रस्तुत विधेयक को पारित करवाने में भले ही भाजपा सरकार को कामयाबी मिली हो, मगर इसे लेकर व्यापक किसान आबादी में ही नहीं दलितों, मुसलमानों, ईसाईयों के बीच भी जबरदस्त असंतोष है. कर्नाटक विधानसभा में जब इस बिल पर चर्चा हो रही थी तब बेंगालुरू में दस हजार से अधिक लोगों ने, जिनमें भारी संख्या में किसान शामिल थे, उग्र प्रदर्शन कर सरकार पर यह दबाव बनाने की कोशिश की कि वह कम से कम अन्तिम घड़ियों में ही उसके नकारात्मक परिणामों पर गौर करे.

विशुद्ध आर्थिक कारणों के हिसाब से भी सोचें तो पहले से ही आर्थिक संकटों से जूझ रही किसान आबादी को अब अनुत्पादक हो चुकी गायों को भी लगातार खिलाते रहना पड़ेगा क्योंकि पहले के कानून में बूढ़ी हो चुकी गाय को बूचड़खाना में भेजने की व्यवस्था थी.

इसमें एक अन्य विवादास्पद प्रावधान यह भी है कि यह बिल गैर राज्यकारकों को अर्थात गोरक्षा के नाम पर सक्रिय तत्वों को यह अधिकार भी देता है कि वे ऐसे स्थानों पर छापे डालें, जहां उन्हें यह सन्देह हो कि वहां गोवंश हत्या हो रही है. वे सभी कुछ साल पहले मवेशियों के व्यापारी शेख रहमान की ओडीशा में हुई हत्या से परिचित हैं - जिन्हें अराजक तत्वों ने पीट-पीट कर यह कहते हुए मार डाला था कि वह गायों को मारने के लिए ले जा रहे हैं ; या जो सात साल पहले दुलीना, झज्जर, हरियाणा में मरी हुई गाय को ले जा रहे पांच दलितों की उपद्रवी तत्वों द्वारा की गयी हत्या से वाकीफ हैं, बता सकते हैं गैर राज्यकारकों को मिलनेवाली छूट किस कदर साम्प्रदायिक उपद्रवों की नयी जमीन तैयार कर सकती है.

इसे क्या महज संयोग कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश में भी गोहत्या रोकने के कानून को अधिक सख्त बनाने के लिए जो संशोधित बिल पेश हुआ है, उसमें भी इसी किस्म का प्रावधान है. सदन में मध्यप्रदेश प्राहिबिशन आफ काउ स्लॉटर बिल पेश करते हुए सरकार की तरफ से कहा गया कि पहले के कानून में कमियां थी. यह बिल भी गैरराज्य कारकों को कहीं भी छापा डालने की छूट देता है, कि वह ऐसे किसी परिसर में छापा डाले तथा वहां माल को जब्त करे जहां उनके हिसाब से गोहत्या का अपराध घटा हो, घट रहा हो या घटने की सम्भावना हो.

राम मन्दिर मुद्दे को लेकर जनता में किसी किस्म के उत्साह के अभाव को देखते हुए संघ-भाजपा की तरफ से गाय के मुद्दे को लेकर नयी गोलबन्दी करने की योजना बनायी जा रही है.


इतना ही नहीं अब बिल के तहत अपने आप को निर्दोष साबित करने का जिम्मा अभियुक्त पर डाला गया है. आम तौर पर कानून में आप तब तक निर्दोष समझे जाते हैं, जब तक आप पर दोषसिद्ध नहीं होता. विभिन्न दमनकारी कानूनों की आलोचना, जैसे टाडा, पोटा - इसी आधार पर होती है कि वे अगर आप इस कानून के चपेट में आए तो आप प्रथम दृष्टया दोषी हैं, अपने आप को निर्दोष साबित करना आप का काम है. प्रस्तुत बिल के तहत अब गोहत्या करने के लिए सात साल की सज़ा मुकर्रर की गयी है और राज्य में से अगर गायों को ले जाना है तो उसके लिए विशेष परमिट हासिल करने की बात कही गयी है.

कोई किसी जानवर से प्रेम करे या न करे यह निश्चित ही व्यक्तिगत चुनाव का मसला है, मगर बहुधर्मीय, बहुभाषिक, बहुसांस्कृतिक, बहुनस्लीय समाज में- जहां अलग अलग आस्थाओं के लोग लम्बे समय से एक साथ रहते आए हों- वहां यह कहां तक उचित होगा कि एक समुदाय विशेष की आस्था राज्य की नीतियों को निर्धारित करने लगे.

ऐसा प्रतीत हो रहा है कि राम मन्दिर मुद्दे को लेकर जनता में किसी किस्म के उत्साह के अभाव को देखते हुए संघ-भाजपा की तरफ से गाय के मुद्दे को लेकर नयी गोलबन्दी करने की योजना बनायी जा रही है. इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर इन कानूनों पर राष्ट्रपति की मुहर लगी तो निश्चित ही समाज में विघटन और बढ़ेगा.

वैसे सियासत में गाय की वापसी महज भाजपा शासित प्रदेशों से ही नहीं बल्कि अन्य पार्टियों द्वारा संचालित सूबों से भी हो रही है. झज्जर के दलितों के कत्लेआम में शामिल आठ लोगों को पिछले दिनों स्थानीय अदालत ने सज़ा सुनायी. पिछले दिनों झज्जर में एक विशाल जनसभा हुई और दलितों के इन हत्यारों को गौभक्त का दर्जा देकर उनके साथ एकजुटता प्रगट की गयी और इन गौभक्तों की रिहाई के लिए आन्दोलन चलाने की बात कही गयी.

 

04.09.2010, 15.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ramesh kumar (rk140676@gmail.com) azamgarh

 
 गो हत्या ही क्यों? पशु हत्या पर रोक लगनी चाहिए. उसमे कुत्ता, बिल्ली, भेड़, बकरी-बकरा, मुर्गा-मुर्गी जैसे निरीह प्राणी आते है. इन भाजपाइयों को सिर्फ गाय ही क्यों दिखती है. क्या धर्म से मानवता कमतर है जो गाय और अन्य जानवरो में विभेद करता है. ये राजनीतिक स्टंट है. क्यों नहीं हर भाजपाई अपने घर में एक गौ शाला खोल लेता है जिसमे कमजोर और असक्त गाय को रखे और उसे पाले पोसें. गौर कीजिये भाजपाइयों इसमें फायदे ही फायदे है, एक तो आप लोगो को पुण्य मिलेगा जिस से आप स्वर्ग में जायेंगे, दूसरा आपकी गौ माता काटने से बचेगी. 
   
 

sunil kumar bansingh (sunilbansingh@yahoo.com) ghatsila

 
 आज बीजेपी में एक भी ऐसा नेता नहीं है, जो उनका बेडा पार कर सके ऐसे में उन लोगों को लगता है कि अब गाय माता ही उनका बेडा पार करेगी. 
   
 

gangveer singh rathour (gang_sr@rediffmail.com) rahon , nawanshaher , punjab

 
 मैं इस बात से सहमत हूं कि देश में बूचड़खाना बनना चाहिये. पर मैं उन गो भक्तों से ये भी कहना चाहूंगा कि अगर वो गो से प्यार करते हैं तो उसे सड़कों पर मरने के लिये क्यों छोड़ते हैं ? अगर सचमुच गो वंश हत्या रोकनी है तो पहले उसके रहने का इंतजाम करना होगा. 
   
 

Snowa Borno (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 किसी भी जीव को तब तक न मारा जाए, जब तक उस जीव से अधिकाँश जीवों की जान को खतरा न हो. जो लोग मांस खाते हैं और अल्पसंख्यक लोगों के लिए आतंक पैदा करते हैं, उनकी बात गाय या किसी भी जीव को बचाने या मारने के मामले में न सुनी जाये. इस बुनियादी समझ के बिना गाय को बचाने की बात करना या क़ानून बनाना पाप और मूर्खता है. 
   
 

rajesh kapoor (dr.rk.solan@gmail.com) solan

 
 क्या आप नहीं जानते कि भारतीय गोवंश के गोबर से केवल 3 माह में बंजर, रसायनों से बेकार हुई ज़मीन भी भरपूर उपज देने लगती है? अतः भारत की बर्बादी के लिए खेती की बर्बादी और खेती की बर्बादी के लिए भारतीय गोवंश की बर्बादी के सूत्र पर कुछ ताकतें काम कर रही है. ये भी जानना ज़रूरी है कि विदेशी गो-वंश में ज़हरीला प्रोटिन 'अ-1' तथा भारतीय में बीटा कैसीन अ-2 है जो अनेकों रोगों को समाप्त करता है. अतः गो का विषय केवल राजनैतिक व साम्प्रदायिक नहीं, राष्ट्र हित की नज़र से भी देखना चाहिए. 
   
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