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इस अंक में

 

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

चुनावी मसाले की सोंधी महक

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
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गांधीवादियों का पत्र, स्वामी अग्निवेश के नाम

बात निकलेगी तो...

गांधीवादियों का पत्र, स्वामी अग्निवेश के नाम



छत्तीसगढ़ में 5 से 8 मई 2010 में देश के प्रमुख विचारकों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और गांधीवादियों की शांति यात्रा के बाद बंधुआ मुक्ति मोर्चा के नेता और समाजसेवी स्वामी अग्निवेश परिदृश्य में उभरे और माओवादियों और भारत सरकार के बीच बातचीत की बात हवा में तैरने लगी. दोनों तरफ से पत्रों के आदान-प्रदान हुये और फिर माओवादी नेता आजाद और पत्रकार हेमचंद पांडेय की हत्या के साथ मामला जहां का तहां रुक गया.
माओवादी और सरकार की हिंसा के खिलाफ शांति यात्रा निकालने वाले समूह ने हाल ही में एक पत्र लिखते हुये स्वामी अग्निवेश पर पूरी शांति प्रक्रिया के प्रयासों को एक राजनीतिक प्रक्रिया में बदलने और अंततः उसे तृणमूल नेता ममता बैनर्जी की गोद में डालने का आरोप लगाया है. यहां प्रस्तुत है वह पत्र और उस पर स्वामी अग्निवेश का जवाब.

peace-March-Bastar



19 अगस्त 2010

प्रिय अग्निवेश जी,

हम यह पत्र मई 2010 में हुए छत्तीसगढ़ शांति और न्याय यात्रा में भाग लिए सदस्यों की तरफ से लिख रहे हैं. हम ने अभी तक अपना मुंह नहीं खोला, जबकि कई सदस्य सच्चाई सामने लाने की खातिर हम पर दबाव डाल रहे थे. अब ऐसा करने का समय आ गया है.

तथ्यों को सामने लाने के लिए हम शुरु से ही बताना चाहते हैं कि आपने इस प्रक्रिया (जिसकी शुरुवात वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, गांधीवादियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक विशिष्ट टीम द्वारा की गई थी, निश्चित रूप से आपके द्वारा नहीं) को हाइजैक किया है, उसे पटरी से नीचे उतार दिया (पहले आज़ाद और फिर हेमचंद्र पांडे की हत्या के द्वारा) और आखिर में उसे (ममता बैनर्जी की) राजनीतिक टोकरी में डाल दिया.

आप शांति और न्याय यात्रा के स्व निर्वाचित नेता बन गए और पी. चिदंबरम के साथ नजदीकियां बढ़ाने लगे, जिन्होंने 11 मई को (शांति और न्याय यात्रा के बाद) एक चिठ्ठी लिखी थी, जिसके पहला वाक्य था : “मुझे पता चला है कि आपने रायपुर से दंतेवाड़ा तक एक शांति जुलूस में सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह का नेतृत्व किया....”

आप इस यात्रा के नेता कैसे बन सकते हैं, जबकि आप इस जुलूस के पहले सदस्य थे, जिसने 6 मई को कांग्रेसी और भाजपाई गुंडों के विरोध के बाद जगदलपुर के एक लॉन में हुई रात्रि बैठक के दौरान, घोषणा की थी कि “हम यहां शहीद होने नहीं आए हैं, यात्रा को रोकें और कल वापस चलें”

हम में से एक (डॉ. बनवारी लाल शर्मा) द्वारा टेलीफोन पर दी गई चेतावनियों और अनुरोधों के बावजूद, आप गुप्त रूप से कदम उठाते रहे. उदाहरण के लिए थॉमस कोचेरी ने एक सुझाव दिया था कि इस अभियान के कुछ सदस्यों को जेल में जाकर माओवादी नेताओं से मुलाकात करनी चाहिए. इस सुझाव को श्री नारायण देसाई समेत कई अन्य सदस्यों का समर्थन मिला था. डॉ. शर्मा ने आपसे गृह मंत्रालय से अनुमति प्राप्त करने का अनुरोध किया था क्योंकि आप अक्सर वहां जाते थे. लेकिन समूह के लिए पी. चिदंबरम से अनुमति लेने के बजाय आप गुप्त रूप से तिहाड़ और रायपुर में माओवादी नेताओं से मिले. एक और उदाहरण है, कि आपने बिना किसी से परामर्श किए, श्री राजगोपाल (जो कि इस पहल के साथ जुड़े नहीं हैं) के साथ मिलकर दिल्ली में 9 जुलाई को एक गोल मेज के आयोजन की घोषणा कर दी. हमें इसके बारे में जानकारी तब हुई जब हमने एक बैठक, जिसमें यात्रा में मौजूद वरिष्ठ गांधीवादी राधा भट्ट और डॉ. शर्मा मौजूद थे, में हस्तक्षेप किया.

आपने जाहिर किया कि आपको आज़ाद की ओर से एक चिठ्ठी मिली, यह चिठ्ठी चिदंबरम की उस चिठ्ठी के उत्तर में थी, जो आप आज़ाद तक पहुँचाने में कामयाब रहे थे. आपने ये चिठ्ठी हमें नहीं दिखाई हालांकि ये सार्वजनिक हो गई और हमारे हाथ में भी आई. जब इस बात पर जोर दिया गया कि वो कौन सी शर्ते थीं जिन्हें आज़ाद ने बातचीत के लिए रखा था, तो आपने कुछ जानकारी दी. हमने जोर दिया कि जब तक सरकार माओवादियों की शर्तों का कम से कम कुछ भाग स्वीकार कर गंभीरता नहीं दिखाती, तब तक सरकार, माओवादियों और संबंधित नागरिकों के बीच गोलमेज बैठक का कोई मतलब नहीं है.

डॉ. शर्मा के साथ हुए एक लंबे विचार-विमर्श में आप उन्हें ये विश्वास दिलाने की कोशिश करते रहे कि सब कुछ ठीक है, लेकिन ये निकल कर आया कि कुछ भी ठीक नहीं है और आपने स्वयं ही ये स्वीकारा कि चीज़ें आगे बढ़ नहीं रही हैं और आप इस दृश्य से बाहर होना चाहते हैं (वास्तव में किसी ने आपसे इस दृश्य का हिस्सा बनने को ही नहीं कहा था). आपने ये घोषणा उन्हें 25 जून को की, जब आपको चिदंबरम और कुछ अन्य मित्रों जिन्हें आप माओवादियों के प्रतिनिधि के रूप में बरताव कर रहे थे, द्वारा बड़ा झटका मिला.

इन प्रतिनिधियों ने आपको आज़ाद की चिठ्ठी सार्वजनिक करने पर मजबूर किया, चूंकि आपने चिदंबरम की चिठ्ठी को सार्वजनिक किया था (आपने इसकी स्कैन की हुई प्रतियां ईमेल के द्वारा भेजी थीं). आपने फैसला लिया कि आप दिल्ली में 9 जून को 3 बजे एक पत्रकार वार्ता में इसे प्रेस के सामने सार्वजनिक करेंगे. आपने उसे आखिरी समय में रद्द किया क्योंकि पी.चिदंबरम ने आपको ऐसा करने का आदेश दिया था.

इस घोषणा के बाद भी कि आप समझौते के परिदृश्य से बाहर हैं, आपने आज़ाद को एक चिठ्ठी लिखी और उसका परिणाम एक भयंकर असफलता के रुप में सामने आया. ना सिर्फ आज़ाद और हेम मारे गए, उनके साथ (कम से कम कुछ समय के लिए) शांति प्रक्रिया भी खत्म हो गई.

चलिए, हम ऐसा कहते हैं कि आप देश के एक आज़ाद नागरिक हैं और आपको जैसी इच्छा हो, वैसा करने की स्वतंत्रता है. कोई आपको रोक नहीं सकता है. पर हमें ये कहने में दर्द हो रहा है कि चिंतित नागरिकों की मुश्किल-पहल से उभरा एक “शांति मध्यस्थ”, एक चुनावी एजेंट निकला और उसने 9 अगस्त को लालगढ़ में एक दमदार चुनावी भाषण दिया. आपके कोलकाता से लालगढ़ तक 9 अगस्त से लेकर 15 अगस्त के बीच प्रस्तावित शांति जुलूस का क्या हुआ, जिसका काफी प्रचार किया गया था और जिसमें कई सामाजिक संगठन भाग लेने वाले थे? इसका आप और मेधा नेतृत्व करने वाले थे और लालगढ़ में 15 अगस्त को धारा 144 तोड़कर भारतीय झंड़ा लहराने वाले थे?

आपने एक शांति प्रक्रिया को एक राजनीतिक प्रक्रिया में तब्दील कर दिया है. हमें ये कहते हुए खेद हो रहा है कि आपने अपने निजी राजनीतिक स्वार्थों के लिए शांति और न्याय जुलूस के 60 सदस्यों के साथ छल किया है. वे यह घोषणा करना चाहते हैं कि वो आपके द्वारा किए गए गलत कामों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं.

आपने शांति प्रक्रिया को पर्याप्त नुकसान पहुँचा दिया है. इसके बावजूद, शांति और न्याय का अभियान देश में हिंसा रोकने और हिंसा उत्पन्न करने वाले बुनियादी मुद्दों से लड़ने के लिए जनसाधारण का दबाव बनाने को प्रयासरत है.

सादर
थॉमस कोचेरी, अमरनाथ भाई, राधा भट्ट, डॉ. वी एन शर्मा, गौतम बंदोपाध्याय, जनकलाल ठाकुर, राजीव लोचन शाह, नीरज जैन, विवेकानंद माथने, डॉ. बनवारी लाल शर्मा, मनोज त्यागी, डॉ. मिथलेश डांगी



स्वामी अग्निवेश का जवाब


21 अगस्त 2010

प्रिय डॉ. बनवारी लाल शर्मा जी और मित्रों (जिनका नाम इस मेल के साथ दर्ज है),

मैं आपके द्वारा लगाये गये तमाम तरह के अनुचित आरोपों वाले इस अहस्ताक्षरित मेल को पाकर थोड़ा आश्चर्यचकित हूं.

मैं आरोप-प्रत्यारोपों के आदान-प्रदान में विश्वास नहीं करता, विशेषकर उन मित्रों के बीच, जिन्हें सामाजिक बदलाव के लिए लंबी दूरी तय करनी हो, भले ही उनके विचारों और दृष्टिकोणों में असमानता हो.

अतः अगर मेरे हिस्से की कोई चूक या किसी कार्य से आपकी भावनाओं को कोई दुख पहंचा हो तो मैं पूरी इमानदारी से क्षमा मांगता हूं. क्या मैं आपको अपने 7 जंतर मंतर रोड, दिल्ली स्थित दफ्तर में किसी पारस्परिक रूप से सुविधाजनक समय और तारीख पर आमंत्रित कर सकता हूं, जिससे कि एक कप चाय के साथ इन विवादग्रस्त मुद्दों को सुलझाया जा सके ?

हम प्रो. यशपाल और मेधा पाटकर जैसे कुछ और विख्यात व्यक्तियों को भी बुला सकते हैं.

ईश्वर मुझे अपनी गलतियों से शिक्षा लेने की (और उन्हें न दोहराने की) विनम्रता दे

सादर
अग्निवेश

06.09.2010, 15.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sudhanshu Shekhar (sudhanshushekhar50@yahoo.com) Bhagalpur, Bihar

 
 स्वामी अग्निमेश अगर मओवादियो से बातचीत करना चाहते हैं तो यह अच्छी बात है. मगर यह काम चिदंबरम या मनमोहन के एजेंट के रूप में नहीं होना चाहिए. साथ ही अपने आप को 'स्वामी' कहलाने वाले को किसी भी तरह का लोभ-लालच भी नहीं होना चाहिये. भले ही वह लालच पद या पैसा का हो या प्रतिष्ठा या पुरुस्कार का. यहाँ ध्यान रहे कि भारत में दार्शनिक सत्ता राजसत्ता को दिशा देती है और हमारे 'संतो' के पास नैतिक बल होता है जो जनशक्ती के सहारे राजशक्ति को भी चुनौती देती रही है. यही गाँधी-मार्ग भी है. अब अग्निवेश और अन्य स्वघोषित गांधीवादियो को अपना आत्म-मूल्यांकन करना है. सचमुच असली सवाल यही है कि हम कहां है? 
   
 

bhagat singh raipur c.g.

 
 स्वामी अग्निवेश जी की मंशा पर शक करना तो ठीक नहीं हैं, नेतृत्व जैसे विषय पर बात करना गाँधी जी के अनुयइयो को भी शोभा नहीं देता. ये सही हैं कि अग्निवेश जी यात्रा के समय चिदंबरम की माला जपते थे. बार बार 72 घंटे नहीं 72 दिन के युद्ध विराम की बात करते थे जिससे यात्रियों को असुविधा होती थी. वे दोनों तरफ की हिंसा की कंम नक्सली हिंसा की जियादा बात करते थे, एक स्थानीय समचारपत्र जिसने पूरी यात्रा को ही सरकार की झोली में डाल दिया था यह लिख कर कि "नक्सली हिंसा के खिलाफ शांति की यात्रा" इसी पेपर को स्वामी जी हमेशा विरोध करने वालो को दिखाते थे, उनकी सारी कोशिश अपने आपको चिदंबरम के नजदीक दिखाने की थी.

जैसा कि हमेशा होता हैं कि जो मीडिया का चेहरा होता हैं उसे ही attention मिलता हैं, ऐसा ही अग्निवेश जी के साथ हुआ. छत्तीसगढ़ में उनके खिलाफ खूब लिखा और कहा गया, किसी ने उन्हें गद्दार कहा किसी ने उन्हें माओवादी. उन्हें यहाँ नाक्सलियो का समर्थक ही माना गया, इसी कारण सरकार से लेकर नक्सलियों तक ने उनको इस यात्रा को नेता मान लिया, और उन्हें पत्र दिए गए, यह बात बिलकुल सही है कि वे चिदम्बरम के षड़यंत्र के शिकार हो गए. ऐसे ही एक बार हिमांशु ने इनकी बात पर भरोसा करके दंतेवाडा में जनसुनवाई रख ली थी, और इसका क्या परिणाम हुआ हम सब जानते हैं.

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट चिदंबरम की चल में फंसने वाले पर गुस्सा करने की यह सही जगह नहीं हैं. अग्निवेश जी ने माफ़ी मांगी हैं यह सही कदम है, मेरा अनुरोध हैं कि हम सब मिलकर दुबारा शांति की कोशिश करे, क्योंकि इस तरह के पत्रों का मीडिया में आने से लाभ शांति के प्रयासों को नुकसान पहुँचता हैं.
 
   
 

Dr.V.N. Sharma (vnsh44@gmail.com)

 
 I am sorry to point out that you did not take the following msg of 23rd Aug 2010, the latest response from me to Swami Ji into consideration while circulating the exchange of letters. It is yet to be answered by him. I am one of the signatories of the original letter.

Dr.V.N.sharma

Date: 2010/8/23

Dear Swami ji,

Thank you for your offer of a cup of tea at Jantar Mantar. At the outset I find it a bit too costly, time consuming and not worth the trouble I may have to take in traveling.

In view of this I request you to please consider taking advantage of the Internet - high speed communication technology- meant to save time, energy and money and send a reply to our letter dated 19th August 2010 if you think it feasible.

Hope this finds favor with you.

vns
 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 स्वामी अग्निवेश जी,आपने बनवारी लाल शर्मा जी और साथिओं को एक कप चाय के साथ बात करने का निमंत्रण दिया है. इसमें एक बाधा है. आपको बता दूं कि जब मुझे बनवारी जी के आज़ादी बचाओ आन्दोलन की तरफ से बोलने के लिए इलाहाबाद के गाँधी भवन में कुछ दिन के लिए आमंत्रित किया गया था तो इन्होंने बताया था कि आज़ादी बचाओ आन्दोलन ले लोग न तो चाय पीते हैं न पिलाते हैं, बल्कि चाय के खिलाफ भी आन्दोलन चला रहे हैं. मुझे बाज़ार जाकर चोरी-छिपे चाय पीनी पड़ती थी. रात को मैं बनवारी जी के घर पर ठहरता था. वहाँ भी यही हालत थी.
स्वामी जी, क्यों नहीं आप सब लोग मेरे यहाँ हिमालय में चले आते? यहाँ चाय से लेकर सेब-रस और सोमरस तक के सारे विकल्प उपलब्ध रहेंगे. यह तो आप सब जानते ही हैं कि लचकीले हुए बिना आन्दोलन कभी सफल नहीं हुए.

कृपया मेरी बात को मज़ाक में लेकर घाटे में न रहें. यहाँ आप सब लोगों के लिए मुद्दे भी मौजूद है. हिमालय खतरे में है. जहां देखो विकास के नाम पर सत्यानाश! कल से मलाना गाँव के बच्चे-बूढ़े नर-नारी अपने गाँव को बिजली प्रोजेक्ट से बचाने के लिए कुल्लू मुख्यालय में धरने पर बैठे हैं.
 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 बनवारी लाल जी,

आप सब ने मिल कर स्वामी अग्निवेश जी से जो कहा है, उसमे ज़रूर वज़न होगा, लेकिन स्वामी जी ने जो जवाब दिया है, उसमे निश्चय ही बहुत बेहतर सुझाव है. किसी वक्त सती प्रथा को लेकर मैंने अग्निवेश जी के विचारों पर सवाल खड़े किये थे. उसके अच्छे नतीजे आये थे. स्वामी जी ने उदारता का परिचय दिया था.

बनवारी जी, आपको याद होगा की किसी समय मैं आपके आन्दोलन से भी जुड़ा रहा और आपके साथ आपके घर में रहने का भी सौभाग्य मिला. मुझे याद है आपने अपने विचारों के लिए बन्दूक की गोलियां भी अपने जिस्म पर झेली हैं.

आशा है, अपने स्वभाव के अनुसार आप सब लोग इस नाज़ुक मौके पर अपनी नीतियों या सिद्धांतों पर ज़रूर पुनर्विचार और मंथन कर रहे होंगे. स्वामी जी ने जो कहा है, वह इस समय की बड़ी मांग है. जो बीत गया उस पर बहस करने से बेहतर है वर्तमान आधार बना कर साथ चलना. इस से ज्यादा कहना 'छोटा मुंह बड़ी बात' होगा.

आप सब को मिस्टिक हिमालय के सदस्यों के प्रणाम.
 
   
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