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पंचायती व्यवस्था का बलात्कार

मुद्दा

 

पंचायती व्यवस्था का बलात्कार

शिरीष खरे राजस्थान से लौटकर


group of dalit women in Rajasthan
















बाड़मेर और अजमेर. राजौ और गीता. एक ही दुनिया के दो अलग-अलग किस्सों के दो किरदार हैं. इधर है अपनी अस्मत गंवा चुकी राजौ, जो गांव के विरोध पर भी अपनी अर्जी अदालत तक दे तो आती है, मगर लौटकर गांव से छूट जाती है. उधर है कमजोर दलित महिला होने का दर्द झेलनी वाली गीता, जो डर के मारे अपनी गुहार अदालत से वापिस ले आती है, और गांव से दोबारा जुड़ जाती है. दोनों ही मानते हैं कि थाने के रास्ते अदालत आना-जाना और इंसाफ की लड़ाई लड़ना तो फिर भी आसान है, मगर समाज के बगैर रह पाना बड़ा मुश्किल है.

एक को अदालत की लड़ाई मंजूर है, दूसरे को गांव में रहना. दोनों का हाल आपके सामने है. मगर कौन ज्यादा अंधेरे में है, और कौन कम उजाले में. चलिए आप ही तय कीजिए- गांव....थाने....अदालत....पंचायत....समाज के बीच मौजूद इनके फासलों, अंधेरे, उजाले से होकर.

राजौ के यहां जाने से पहले, उस रोज का अखबार भरतपुर जिले के गढ़ीपट्टी में ‘बंदूक की नोंक पर पांच लोगों के दलित औरत से बलात्कार’ की खबर दे रहा था. राजौ का गांव सावऊ, बाड़मेर जिले के गोड़ा थाने से 12 किलोमीटर दूर है. वहां तक पहुंचने में 30 मिनिट भी नहीं लगे, मगर राजौ के भीतर की झिझक ने उसे 45 मिनिट तक बाहर आने से रोके रखा.

राजौ के साथ जो हुआ वो घटना के चार रोज बाद यानी 9 जून, 2003 की एफआईआर में दर्ज था : "श्रीमान थाणेदार जी, एक अरज है कि मैं कुमारी राजौ पिता देदाराम, उम्र 15 साल, जब गोड़ा आने वाली बस से सहरफाटा पर उतरकर घर जा रही थी, तब रास्ते में टीकूराम पिता हीराराम जाट ने पटककर नीचे गिराया, दांतों से काटा, फिर.......और उसने जबरन खोटा काम किया. इसके बाद वह वहां से भाग निकला. मैंने यह बात सबसे पहले अपनी मां को बतलाई. मेरे पिता 120 किलोमीटर दूर मजूरी पर गए थे, पता चलते ही सबेरे लौट आएं. जब गांव वालों से न्याय नहीं मिला तो आज अपने भाई जोगेन्दर के साथ रिपोर्ट लिखवाने आई हूं. साबजी से अरज है कि जल्द से जल्द सख्त से सख्त कार्यवाही करें."

मुंह मोड़ने वाला समाज
राजौ अब 20 साल की हो चुकी है. उसकी मां से मालूम चला कि बचपन में उसकी सगाई अपने ही गांव में पाबूराम के लड़के हुकुमराम से हो चुकी है. मगर वह परिवार अब न तो राजौ को ले जाता है, न ही दूसरी शादी की बात करता है. गांव वालों से किसी मदद की तो पहले ही कोई गुंजाइश नहीं है, मगर 2 किलोमीटर दूर पुनियो के तला गांव में जो ताऊ है, 60 किलोमीटर दूर बनियाना में जो चाचा है, 80 किलोमीटर दूर सोनवा में जो ननिहाल है, वहां से भी कोई खैर-खबर नहीं आती है. उसका झोपड़ा भी गांव से 2 किलोमीटर दूर उसके खेत में आ पहुंचा है, और गृहस्थी का हाल पहले से ज्यादा खराब है. पंचों में चाहे खेताराम जाट हो या रुपाराम, खियाराम हो या अमराराम, सारे यही कहते हैं कि चिड़िया जब पूरा खेत चुग जाए तो उसके बाद पछताने से क्या फायदा है ?

राजौ के पिता देदाराम यह खोटी खबर लेकर सबसे पहले गांव के पंच खियाराम जाट के पास पहुंचे थे. पंच खियाराम जी ने पहले तो इसे अंधेर और जमाने को घोर कलयुगी बतलाया, फिर देदाराम से पूछे बगैर दोषी टीकूराम के पिता के यहां यह संदेशा भी भिजवा दिया कि 20,000 रूपए देकर मामला निपटा लेने में ही भलाई है. मगर टीकूराम के पिता हीराराम जाट ने साफ कह दिया कि वह न तो एक फूटी कोड़ी देने वाला है, न निपटारे के लिए कहीं आने-जाने वाला है. फिर मजिस्ट्रेट की दूसरी पेशी पर बाड़मेर कोर्ट के सामने दोषी समेत गांव के सारे पंच-प्रधान जमा हुए. सबने मिलके राजौ को समझाया कि केस वापिस ले लो, कोर्ट-कचहरी का खर्चापानी भी दे देंगे. पर टीकूराम को साथ देखकर राजौ बिफर पड़ी. उसने राजीनामा के तौर पर लाये गए 50, 000 रूपए जमीन पर फेंक दिए और ऐसी खरी-खोटी सुनाई कि वहां एक न ठहरा.

लड़ाई जारी है
इसके बाद जिस चाचा ने राजौ का नाता जोड़ा था, उसी के जरिए पंचों ने बातें भेजीं कि- राजीनामा कर लो तो हम साथ रहकर गौना भी करवा दें. छोटे भाई की भी शादी करवा दें. नहीं तो सब धरा रह जाएगा. कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़ने से अच्छा है आपस में निपट लेना. वो तो लड़का है, उसका क्या है, जितना तुम्हें पैसा देगा, उतना कचहरी में लुटाकर छूट जाएगा, तुम लड़की हो, उम्र भी क्या है, बाद में कोई साथ नहीं देता बेटी. फिर बदनामी बढ़ाने में अपना और अपनी जात का ही नुकसान होता है.

जब राजौ पर ऐसी बातों का भी असर नहीं हुआ तो कभी राजौ की जान की फिक्र की गई, तो कभी उसके छोटे भाई जोगेन्दर की जान की.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sunil kumar bansingh (sunilbansingh@yahoo.com) ghatsila

 
 अगर देश की सामाजिक व्यवस्था में बदलाव नहीं आ रहे और प्रशासन नहीं सुधर रहा और न अदालत से इन्साफ मिल रहा हो तो ऐसे में लड़कियों को फूलन देवी का अनुसरण करना चाहिए. We need another Phoolan Devi in every nook and corner of this country. 
   
 

VISHAL MANKERE (vishal.mankere@icicilombard.com) Indore

 
 Heart touching. Excellent reporting, but this report has to be telecast on television. Vishal Mankere 
   
 

पशुपति शर्मा (pashupati15@rediffmail.com) दिल्ली

 
 शिरीष ने जो सवाल उठाए हैं वो वाकई हर गांव हर मोहल्ले की समस्या है। इंसाफ के लिए लड़ने निकलो तो हर कदम पर मुश्किलें आ खड़ी होती हैं। गांव-समाज से लेकर सरकारी तंत्र हर जगह इंसाफ की जगह मामले को रफा -दफा और उसे निपटाने की कोशिश ही होती है। शिरीष को इस तरह की स्टोरी करने के लिए साधुवाद। 
   
 

sanjeev pandey () bilaspur

 
 राजौ के हौसले को सलाम. कहते हैं कि भारत गांव में बसता है. इस रिपोर्ट से देश की स्थिति को ठीक-ठीक समझा जा सकता है. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 इस कश्मकश के दौरान या तो हर गीता हर राजो से आ मिले या समाज और अदालत के रास्तों पर आती-जाती जोर-जोर से अपनी आप-बीती सुनाती हुयी निकले. ज़ाहिर है, जब किसी गीता और किसी राजो को पूरा जोर लगाने के बाद भी कुछ हासिल नहीं होगा तो उनमें से कोई और फूलन देवी निकल आएगी.
राजस्थान मीरा से लेकर रूपकुंवर तक की गाथाएँ सुनाता आया है. लम्बे अरसे से वह एक नयी तरह की अधिक खूंखार फूलन देवी भी मांगता आया है.
 
   
 

meenu lucknow

 
 Heart touching... Excellent reporting. 
   
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