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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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माओवादियों का पत्र, स्वामी अग्निवेश के नाम

बात निकलेगी तो...

माओवादियों का पत्र, स्वामी अग्निवेश के नाम


maoist











माओवादियों और सरकार के बीच मध्यस्थ बने स्वामी अग्निवेश से सभी तरह की हिंसा का विरोध करने वाले गांधीवादी तो नाराज हैं ही, माओवादियों ने स्वामी अग्निवेश पर विश्वास करने के बाद भी एक पत्र में साफ किया है कि स्वामी अग्निवेश के कारण ही सीपीआई माओवादी के प्रवक्ता आजाद को मार डाला गया. सीपीआई माओवादी की केंद्रीय कमेटी के सदस्य श्रीकांत ऊर्फ सुकांत ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार बातचीत के बहाने माओवादियों को निशाना बना रही है. पत्रों के आदान-प्रदान को खतरनाक बताते हुए माओवादियों ने स्वामी अग्निवेश से कहा है कि वे भविष्य में अपने पत्र सार्वजनिक तौर पर लिखें.

जाहिर है, देश के गृहमंत्री पी चिदंबरम की पहल के बाद सरकार और माओवादियों के बीच शांति वार्ता को लेकर जो कुछ चल रहा है, उसमें इस तरह से पत्रों का सार्वजनिक होना, इस पूरी संवाद की प्रक्रिया को समझने में मदद करेगा. यहां प्रस्तुत है माओवादी नेता श्रीकांत ऊर्फ सुकांत का पत्र.



प्रिय स्वामी अग्निवेश जी,

मुझे आपका 22 जुलाई को लिखा ताजा पत्र मिला. मैं कामरेड आजाद की शहादत पर आपकी भावनाएं, और शांति प्रक्रिया के लिए आपकी गंभीर चिंता समझ सकता हूं. हालांकि आपने पत्र में जिस अटैचमेंट का जिक्र किया है, वह मुझे नहीं मिल सका, लेकिन मैंने प्रिंट मीडिया को दिए गए आपके सारे इंटरव्यू पढ़े हैं. मेरे लिए आपके पत्र का जवाब देना ही मुश्किल नहीं है, बल्कि इसे अपने उन कामरेडों तक पहुंचाना भी मुश्किल है, जिन्हें आपके पत्र पर फैसला लेकर कुछ करना है. इसलिए यह खुला पत्र पेश है. मेरे पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था.

धोखा जारी है. चिदंबरम का धोखा, वह ‘मूक कूटनीति’ में यकीन रखते हैं. वह ठंडे कलेजे से चुपचाप सब करते जा रहे हैं. वह शांतिवार्ता में आपको मध्यस्थ बनाने पर आधिकारिक रूप से सहमत हुए. आपने हम तक प्रस्ताव पहुंचाने के रास्ते खोले, वह बहुत सफाई से एक गढ़ी गई योजना के तहत हमारे रास्तों पर चले आए, अच्छी तरह यह जानते हुए कि यह बात कामरेड आजाद तक पहुंचनी ही थी, चिदंबरम के स्पष्ट निर्देशों पर कुख्यात एपीएसआईबी ने इस योजना को अंजाम दिया.

मुझे लगता है कि अब तक आप भी यह समझ चुके होंगे. लेकिन आपके लिए यह स्वीकार करना मुश्किल होगा. मैं यह समझ सकता हूं. अगर चिदंबरम के हाथ कामरेड आजाद ही नहीं, उनकी जीवन साथी सितक्का उर्फ पद्मा और पत्रकार हेमचंद्र पांडे के खून से रंगे ना होते, जिनको गढ़चिरौली में 6 जुलाई को शायद मुठभेड़ में मारा गया बताया गया है, तो वह आपकी आंखों में आंखें डालकर देख सकते, और इस पूरी तरह फर्जी मुठभेड़ की जांच की मांग मान लेते.

वह जानते हैं कि इस कार्रवाई के पीछे उनका ही दिमाग है, और यही वजह है कि वह यह मांग नहीं मान सकते थे. कौन जाने सोहराबुद्दीन मामले में असल गुनहगार निकले अमित शाह की तरह जांच होने पर चिदंबरम पर भी किसी दिन मामला चले.

उन्होंने एक वैध मांग मानने से इंकार करके एक मध्यस्थ के रूप में आपके दर्जे को नुकसान पहुंचाया. आपका 26 जून का पत्र कामरेड आजाद के पास 30 के पहले ही पहुंचा. तब तक हरकत में आ चुकी एपीएसआएबी यह जानती थी. वह जानते थे कि कामरेड आजाद को रास्ते से हटाकर वह शांति प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसी इरादे से वह उन रास्तों में घुस आए जो आपने अपना पत्र हम तक भेजने के लिए खोला था.

हम चिदंबरम के बिछाए धोखे के इस जाल मे फंस गए. हमें लगता है कि इस पूरी प्रक्रिया में आपका इस्तेमाल किया गया-साफगोई के लिए माफी चाहूंगा!!!

श्रीमान चिदंबरम से एक बात पूछिए- एपीएसआईबी आंध्र प्रदेश के बाहर कई राज्यों में क्या कर रही है ? यूपी, पश्चिम बंगाल, दिल्ली में, और जाने कहां कहां ? क्या वह उनकी जानकारी के बाहर काम कर रही है? क्या वह नहीं जानते कि वह एपीएसआईबी ही थी, जिसने कामरेड कोबाद घांधी को गिरफ्तार कर तीन दिनों तक अवैध हिरासत में रखने के बाद 20 सितम्बर को उन्हें दिल्ली पुलिस को सौंपा?

क्या मैं आपको कामरेड कोबाद घांधी को गिरफ्तार करने वाले एपीएसआईबी के लोगों, और उनकी अगुवाई करने वाले का नाम बताऊं?

शायद यह एक छोटा मोटा विकी लीक्स हो जाए,और मीडिया को एक स्कूप मिल जाए. लेकिन बात फिर उसी धोखे की है. वह बात शांति के करते हैं. लेकिन अपने भरोसेमंद एपीएसआईबी के साथ मिलकर ठंडे कलेजे से हत्याओं की योजना बनाते हैं.

अब आपने हमारी केंद्रीय समिति को शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अपील करते हुए पत्र लिखा है. आपका पत्र मुझ तक 22 जुलाई को पहुंचा. अकेला पत्र ही नहीं, एपीएसआईबी भी मुझ तक पहुंची. अब इसे हम क्या समझें?

पहली अगस्त को मैं बाल-बाल बच पाया. अगर हम कभी मिल पाएं, जैसे कि 1983 में करीम नगर में किसान मजदूर संघ के मंच पर मिले थे, जहां हमने दूसरों के साथ सभा को संबोधित किया था (आपने तब एन टी आर सरकार द्वारा मारे गए कामरेड हरिभूषण को हार्दिक श्रद्धांजलि दी थी), तो मैं आपको सब बता सकूंगा.


अगर मैं कुख्यात भारतीय मोसाद के हाथों लग गया होता, तो आपका 22 जुलाई का पत्र भी चिदंबरम तक वापस पहुंच जाता. शायद उस पर खून के कुछ छींटे रहे होते, जैसे उन तक पहुंचे आपके 26 जुलाई के पत्र पर रहे होंगे.

शांति प्रक्रिया के प्रति आपकी गंभीरता पर हमें लेशमात्र भी संदेह नहीं. लेकिन मुझे डर है कि आप बिल्लियों के बीच कबूतर की तरह हैं. इस प्रक्रिया में हमें पकडऩे के लिए बिल्लियां आपका इस्तेमाल कर रही हैं.

एपीएसआईबी ने मुझे घेर ही लिया था. कुछ समय के लिए मैं उससे छूट निकला. इन परिस्थितियों में किसी के जरिये कोई जवाब भिजवाना या आपका पत्र हमारे साथियों तक पहुंचाना मेरे लिए मुश्किल है. मेरी विनती है कि आप अपना पत्र अखबारों में खुलकर छपवा दें. किसी और तरीके से अगर आप भेजने की कोशिश करेंगे, तो उससे फिर कोई नुकसान होगा.

मैं समझता हूं कि हम यह खतरा नहीं उठा सकते, चिदंबरम बेइमानी से खेलना जारी रखेंगे. वह पहले ही हमारे प्यारे साथियों और एक पत्रकार की जानें ले चुके हैं. अगर आप अपने पत्र मीडिया में प्रकाशित कर सकें, तो
हमारे साथी आपके प्रस्ताव का जवाब दे सकेंगे.

यह ताज़ा पत्र, और 26 जून का पत्र भी , क्योंकि 26 जून का पत्र भी हमारे साथियों तक नहीं पहुंचा है. चूंकि यह पत्र आपने लिखे हैं इन्हें प्रकाशित करवाना है या नहीं, यह फैसला लेने का अधिकार भी आपका ही है. शायद यह काम चुपचाप ना करके आप चिदंबरम के खिलाफ जाएंगे.

वह चुपचाप काम करने की अपनी योजना पर चल रहे हैं. आपकी भारी चिंता और भलमनसाही की कोशिशें चिदंबरम अपनी गंदी चालों से बेकार कर रहे हैं. वह कामरेड आजाद को मारकर शांति प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाने में कामयाब हो गए होंगे. लेकिन क्या क्रांति को रोक पाएंगे? हिटलर का इतिहास हमारे सामने है. मैंने कड़वा सच कहा है.

सप्रेम
श्रीकांत उर्फ सुकांत
केंद्रीय समिति सदस्य
सीपीआई ( माओवादी)

3 अगस्त

09.09.2010, 15.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

kamlesh pandey (kamlesh.pandey8@gmail.com) Allhahabad

 
 आपने जो भी कहा वो तो ठीक है लेकिन बात ये भी है कि आज ये स्वामी अग्निवेश और तमाम इनके जैसे लोगो को जैसे व्यवसाय मिल गया है. छत्तीसगढ़ में तो नक्सली हमले आज राजनीति का एक हिस्सा बन गया है. इन राजनेताओ की भी बात और है. ये देश को बेच खाने में अपनी कामयाबी समझते है. लेकिन जब देश को सभ्य समाज का चोला पहनने का जिम्मा लिए नारे लगाने वाला ही अगर, उन तमाम नेताओ की तरह करने लगे तो आदमी सोचने पर मजबूर हो जाता है. संयोग की बात है कि जब अग्निवेश छत्तीसगढ़ गए थे तब वहीं कुछ लोगो ने इन्हें नक्सली कहा था. 
   
 

Rajkamal (samandartal@gmail.com) manali

 
 अशेष जी का सुझाव गौर करने लायक है, लेकिन लगता है आज किसी के पास मूल-भूत चीज़ों को समझने का समय ही नहीं है. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 हे, गिने-चुने क्रांतिवीरो !
आप सब एक बार सचमुच एक साथ बैठ ही जाएँ. और बैठने से पहले उन सब स्त्रियों को सबसे पहले साथ बैठाएं, जो अब चिल्लाने लगी हैं कि माओवादी स्त्री के रूप में माओवादी पुरुषों के बीच रहते उनके साथ बलात्कार हो रहे हैं. या तो उन्हें बड़े माओवादी नेता की रखैल बन जाना पड़ता है या सबकी सामूहिक संपत्ति.
9 सितम्बर के जनसत्ता अखबार में मृणाल वल्लरी की रिपोर्ट में माओवादी उमा ने यही बताया है. सामाजिक क्रांति के दावेदारों पर और भी कई संगीन आरोप हैं. आप सब लोग एक बार मूलभूत आधार पर बात करें और यह भी देखें की संगठित रूप से क्यों कभी कोई भी हिंसक या अहिंसक क्रांति कभी कामयाब नहीं होती?
मेरा निवेदन है कि अकेले होकर सबसे पहले अपनी पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही एक स्तर के लोग मिलजुल कर कुछ कर सकते हैं. भीड़ को न तो आज़ादी चाहिए और न ही उसे आजादी दी जा सकती है. क्रान्ति का तो भीड़ को अर्थ भी मालूम नहीं है. हर संगठन में अहंकारी, जल्दबाज़ और गुस्सैल लोग भरे पड़े हैं. उन्हें साथी बना कर कोई भी सच्ची क्रान्ति नहीं की जा सकती.
यह अच्छी बात है कि आप लोग अभी तक एक-दूसरे से बहुत सलीके से बात कर रहे हैं. आपके पत्र भी 'प्रेम पत्र' हैं. देखना यह है कि आप लोग मिल कर कब सिर्फ सजग लोगों का सहयोग लेकर आगे चलते हैं ?
अगर क्रांति या बदलाव चाहने वाले लोगों के बीच काम करने वाली स्त्रियाँ अपने ही आन्दोलन के बड़े नेताओं पर ऊँगली उठाएंगी तो आप कभी भी किसी चिदंबरम या किसी आडवानी से सही लड़ाई नहीं लड़ पायेंगे. अग्निवेश जी चूंकि एक सन्यासी हैं, इसलिए उन पर सबसे ज्यादा आरोप लग जायेंगे.
सन्यासी सबसे पहले स्वयं को सही करता है. उसके ऐसे ऐलान की कोई कीमत है भी कि नहीं? क्या इस ऐलान पर अमल करवाए बिना कोई गांधीवादी या कोई सन्यासी किसी माओवादी या नक्सलवादी का साथ दे सकता है ? अगर हाँ, तो कैसे ?
 
   
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