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माओ ने कहा था

बात पते की

माओ ने कहा था

विश्वजीत सेन पटना से

mao-charu-kanu













कामरेड कानू सान्याल के मरणोपरांत उनका लिखा ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का इतिहास’ एक छोटे निबंध की शक्ल में प्रकाशित हुआ है. इतिहास-पुरूष कानू सान्याल का निधन, कुछ लोगों के अनुसार आत्महत्या; दुखद है, चुंकि उन्होंने अंत-अंत तक सी.पी.आई. (एम.एल.) को एक सुदृढ़ आधारभूमि दिलाने का प्रयास किया. वह सफल नहीं हुए, यह अलग बात है, लेकिन उनकी मानसिकता जनान्दोलनमुखी थी और वह व्यक्ति केन्द्रिक आतंकवाद के विरुद्ध थी. भारत में, जहाँ तक कम्युनिस्ट पार्टियों की बात है, दो में से एक चीज होती है- या तो जनान्दोलनमुखी होने के नाम पर वे कांग्रेस की छाया-प्रतिलिपि बन जाते हैं या नही तो सीधे तौर पर आतंकवाद का रास्ता अपना लेते हैं. दोनों ही गलत और अवांछनीय है.

बहरहाल, कानू सान्याल द्वारा लिखित ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (एम.एल.) का इतिहास’ कई मायनों में दिलचस्प है- खासकर उनकी चीन यात्रा से जुड़े अंश. इसमें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंदरूनी अंतर्विरोध साफ झलकते हैं, साथ ही साथ माओ का व्यक्तित्व फिर एक बार अपनी पूर्ण गरिमा के साथ प्रतिष्ठित होता है. यद्यपि वह दौर चीन में अंध व्यक्तिपूजन का था, और पूजा माओ की हो रही थी, फिर भी माओ के मन में बिरादराना कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए गहरा सम्मान था. यह तथ्य कानू सान्याल के लेख से साफ जाहिर होता है.

कानू सान्याल के साथ चार साथी चीन की यात्रा पर गए थे- दीपक विश्वास, खूद्दन मल्लिक, खोकन मजूमदार और कानू सान्याल. वे करीब तीन महीने तक चीन में रहे. काठमांडु के रास्ते 25 दिसम्बर, 1967 को वे भारत लौटे.

अपने चीन प्रवास के दौरान माओ त्से तुंग से उनकी भेंट हुई. माओ के अलावे चाऊ-एन-लाइ, कांग शेंग, ली निंग ई और सेनाध्यक्ष से भी उनकी भेंट हुई.

भेंट के दौरान माओ ने पूछा-‘‘पढ़ाई लिखाई कैसी रही? ’’

कानू सान्याल के अनुसार चीन-प्रवास के दौरान उन्हें माओ-विचारधारा पढ़ाई गई. प्रश्न पूछने के तुरंत बाद माओ ने खुद ही उसका जबाब हाजिर कर दिया ‘‘यहाँ आपने जो भी सीखा, उसे भूल जाएं और अपने देश की स्थिति के अनुसार काम करें.’’

यह जबाब आश्चर्यजनक है और उस परिस्थिति में यह अचरज का भाव और बढ़ जाता है जब आदमी इस सच्चाई से रु-ब-रु होता है कि माओ के ही व्यक्तित्व की पूजा हो रही थी और माओ खुद लोगों से यह कह रहे थे कि ‘‘अपने देश की परिस्थिति के अनुसार काम करें’’.

इससे भी विचित्र बात तब हुई, जब कानू सान्याल, चारू मजुमदार के सामने बाकायदा अपनी चीन यात्रा का रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे थे. यह सुनते ही कि कानू सान्याल से माओ त्से तुंग की भेंट हुई थी, चारू बाबू भावुक हो उठे. उनके मुंह से अनायास निकल गया-‘‘माओ को देखकर तुम्हें रूलाई नहीं आई?’’

कानू सान्याल बोले-‘‘मैं अचंभित जरूर हुआ, पर मुझे रूलाई नहीं आई.’’ इसके बाद कानू सान्याल बोलें-‘‘चीन की कई बातें मुझे पसन्द नहीं आईं’’.

कानू सान्याल के अनुसार, चीन में रेड बुक का बोलबाला था. रेड बुक का प्रयोग बिल्कुल बाइबिल की तरह किया जाता था. खाने के लिए बैठने से पहले, हवाई जहाज पर बैठने से पहले, नई जगह में जाने से पहले रेड बुक पढ़ना जरूरी होता था. खासकर, चीनी कामरेड इन बातों पर जोर डालते थे. कानू सान्याल की यह बात सुनते ही चारू बाबू भड़क उठे. उन्होंने कहा कि इन आदेशों का निर्वाह धर्म के तर्ज पर किया जाना चाहिए. कानू सान्याल चारू बाबु के सुझाव से सहमत नहीं हुए.

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चीन में उन दिनों लिन पियाओ का गुट माओ का ही नाम लेकर सत्ता पर काबिज होने की ओर अग्रसर था. जिन बुद्धिजीविओं ने चीनी क्रांति को अंजाम दिया था, जिन मजदूर नेता, किसान नेताओं ने समाजवादी निर्माण का बीड़ा अपने कंधे पर उठाया था, उनका सफाया सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति के दौरान, योजनाबद्ध तरीके से कर दिया गया था. माओ कहाँ तक उस जनोन्माद के लिए जबाबदेह थे, इस पर आज भी प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है. चूंकि बाद में माओ के खुद कैद होने की बारी आ गई. चाऊ-एन-लाई के हस्तक्षेप से स्थिति संभली और लिन-पियाओ हवाई जहाज से मंगोलिया भागने के क्रम में मारे गए.

लिन पियाओ को मार्क्सवाद-लेनिनवाद से लेना देना नहीं था. उनकी विचारधारा ‘सैन्यवाद’ का ही दूसरा नाम थी. माओ को आगे रखकर वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में ‘सैन्यवाद’ को स्थापित करने में लगे थे. कुछ वैसा ही जैसे आज के ‘माओवादी’ करने पर तुले हैं. ठीक-ठाक दार्शनिक आधार वाली पार्टी बनने से पहले ही वे ‘कमांडरों’ की बहाली करने में लग जाते हैं. ‘कमांडर’ बहाल होते ही लेवी वसूलने में लग जाते हैं. उस लेवी वसूली के क्रम में हर किस्म के समाज विरोधी दुष्कर्म को अंजाम दिया जाता है. जनता, भेड़-बकरी की तरह उनके पीछे चलने को मजबूर है. न जनता का सैद्धांतिक प्रशिक्षण पूरा हो पाता है, न ही वैचारिक शुद्धिकरण. जात-पात, ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा की घेरेबंदी में वह उसी तरह से फंसा रह जाता है, जिस तरह युग-युग से फंसा रहा है. सरकार और व्यवस्था उन्हें यूं मसल देती हैं, जैसे वे ‘पार्टी’ नहीं हों, चीटियों का झुंड हों.

‘‘अपने देश की स्थिति के अनुसार काम करें’’-माओ ने कहा था. जिस देश में एक मजबूत संसदीय व्यवस्था अस्तित्व में है, वहाँ ‘सैन्यवाद’ के लिए गुंजाइश नहीं बचती. इस बात को समझने और अपना लेने में ही माओवादियों की भलाई है और देश की भी. वरना देश तबाह होगा और माओवादी बर्बाद होंगे.

10.09.2010, 14.12 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

arunlal (arunlal.y@gmail.com) mumbai

 
 मात्र माओ ने ही नहीं, बल्कि लेनिन ने भी कहा था कि जो मैं कर रहा हूँ जरूरी नही कि वह विश्व के सभी देशों के लिए उचित हो. प्रत्येक देश की परिस्थितियां तय करेंगी कि वहां कैसे बेहतर मानवता का निर्माण किया जाये. 
   
 

neelabh (neelabh1945@gmail.com) delhi

 
 i would have liked to react in hindi in which i am comfortably proficient but i am taking recourse to english as i am not well versed with the technique involved in changing the keyboard. however, it is very nice that comrade kanu sanyal is now in news as a great communist icon and also as a tool for bashing the maoists. when mao told kanu that he should go back to india and conduct the revolution in accordance with indian circumstances and situations it was a right stance and true marxist doctrine. but to interpret it as joining the parliamentary path for change through gandhi's philosophy and the path adopted by the congress is misinterpreting mao tse tung to say the least. no doubt, only resorting to thoughtless violence is not the right path, but where the state has declared war on a part of its populace and people are fighting for their lives, criticising c.p.i. (maoist) is totally unacceptable. this is a very short reaction to what is being written against the maoists by the very people who have betrayed the indian people in nandigram, lalgarh, kalingnagar, singur, dantewada and dozens of other places. they are now pitting dead marxists against the living ones in their nefarious conspiracy in which everyone from chidambaram and manmohan singh to prakash karat and their cohorts are involved. chidambaram has prooved beyond doubt mao's adage that power emanates from the barrel of the gun, but has not seen the corollary that it is not the gun but the hand wielding it which determines whose side the gun is being fired from.  
   
 

bhagat singh (bhagatsingh788@gmqil.com) raipur c.g.

 
 ठीक यही बात कोम्यूनिस्ट पार्टी के एक delegation से स्टालिन ने कही थी जब बी टी रणदिवे और साथी उनसे मिलने सोविएत रूस गए थे. चाहे माओ हो या लेनिन, स्टालिन सबने यही कहा था की अपने देश की परिस्थियों के हिसाब से ही बदलाव किया जा सकता हैं. यही मूल बात हैं. न रूस की तरह यहाँ क्रांति हो सकती हैं और न चाइना की तरह यहाँ तो हमारा ही मॉडल होगा, और वो किया होगा इसी बहस में कम्यूनिस्ट पार्टियों के इतने टुकड़े हुए हैं. 
   
 

विनीत राय ()

 
 बहुत सही कहा है विश्वजीत सेन ने ऐसे आलेख बहुत कम देखने को मिलते हैं बहुत बहुत बधाई. माओवादिओं के असली चरित्र को उन्होंने बहुत सही ढंग से उजागर किया है.  
   
 

ira jha noida

 
 कानु सान्याल ने 2005 में एक मुलाकात में मुझसे कहा था की अब मुझे लगता है की इस देश में गांधीवाद और अहिंसा ही आन्दोलन का एकमात्र रास्ता है. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 विश्वजीत जी, माओ ने जो कहा है, उसे यहाँ के माओवादी खूब समझते हैं. लेकिन उन्हें कैसे भी सत्ता चाहिए. सत्ता का हर लोभी जानता है की इश्वर, धर्म, जाति, पार्टी और गरीबी का नाम लेकर अपना सिंहासन बनाना आसान है. आज माओ के नाम की आड़ में माओ के खिलाफ हिंसा जारी है. नए-नए तर्क देकर कांग्रेस और भाजपा से कहीं अधिक चालबाज़ियां अपनाई जा रही हैं.

अगर हमारे राजनेता आज साधारण व्यक्ति की तरह जीना शुरू कर दें और निचले तबके के लोगों का दिल जीत लें, तो हिंसा से सत्ता चाहने वाला हर संगठन भरभरा कर गिर जाएगा. माओवादी अगर आज कह दें की वे जान की बाज़ी लगा कर सबसे पहले भ्रष्ट लोगों का सफाया करेंगे और अपने लिए सत्ता नहीं चाहेगे तो लोग उनकी हिंसा को भगत सिंह और उनके दोस्तों की हिंसा जितनी ज़रूरी हिंसा मानेंगे और उन्हें गले से लगा लेंगे. लेकिन ऐसे ईमानदार लोग सियासत और माओवाद में बहुत कम हैं. 'क्रांति' के दौरान शातिर विजेता सबसे पहले इन्हें ही मारेंगे, ताकि आगे सिंहासन उन्हीं का हो. लोग भी एक बार एक-एक सत्ता-पिपासु की साजिश का शिकार हुए बिना नहीं मानेगे.

आज उन लोगों को ही सबसे कम सुना जा रहा है, जो राजनेताओं और माओवादियों के बीच सबसे अच्छी भूमिका निभा सकते हैं. फिर भी इस देश के लिए यह स्थिति स्वाभाविक है. यह देश बातों के झूले झूलता आ रहा है. एक गहरा और सच्चा ज़ख्म खाए बिना नहीं मानेगा. इसने अब तक दूसरों की ही मार देखी है, अपनों की नहीं. इसने हिन्दू या मुसलमान मारे, अपने प्यारों को मारे हुए इसे 5000 साल हो गए. महाभारत से कम में राज़ी नहीं लगता यह देश. लेकिन अबकी धृतराष्ट्र ज्यादा हैं.
 
   
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