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नदी बचाने की जंग  प्रसून लतांत

नदी बचाने की जंग

 

प्रसून लतांत

उत्तराखंड से



अब नदियों पर संकट है, सारे गांव इकट्ठा हों
निजी कंपनी आई है, झूठे सपने लाई है
इन जेबों में सत्ता है, सारी सुविधा पाई है
अब रोटी पर संकट है, सारे गांव इकट्ठा हों.


इन दिनों जनकवि अतुल शर्मा के गीतों की ये पंक्तियां उत्तराखंड के गांव-गांव में गाई जा रही हैं. गांवों में इन गीतों के संदेशों से मिलते-जुलते विषयों पर नुक्कड़ नाटक भी खेले जा रहे हैं. यहां अब आपस में बैटकर नदियों पर बांधों के चलते उत्पन्न मसलों पर बातें की जा रही हैं. जल, जंगल और जमीन को कंपनियों के कब्जे में जाते देख कर उन्हें लगने लगा है कि अब अगर नदियां नहीं बचीं तो हम भी नहीं बचेंगे.

लंबी लड़ाई की तैयारी

उत्तराखंड में नदियों को लेकर पहली बार एक ऐसी लड़ाई शुरु हुई है, जो सिर्फ उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहने वाली है.

 

लोग उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान के आह्वान पर पदयात्रा, धरना और प्रदर्शन करने लगे हैं. इनमें महिलाएं और युवा बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे हैं.

नदियों को लेकर उत्तराखंड में शुरु हुई यह लड़ाई अब भले पूरे राज्य में सतह पर उभर कर एकजुट दिखने लगी है, लेकिन इसकी अलग-अलग शुरुवात विभिन्न नदी घाटियों में कई साल पहले ही हो गई थी, क्योंकि टिहरी शहर के डूबने और चाई जैसे गांव के जमींदोज हो जाने की घटनाएं उन्हें कभी चैन से सोने नहीं दे रही है.

ऊर्जा के नाम पर
उत्तराखंड राज्य बनते ही प्रदेश के लोगों को यहां की सरकारों ने जिस तरह ऊर्जा प्रदेश बनाने के सपने दिखाए थे, उनने यहां के लोगों को न सिर्फ ठगा है, बल्कि उन्हें अपने पैतृक स्थलों से पलायन के लिए भी विवश कर दिया है. लोग नए आसरे की ओर निकलते जा रहे हैं. ऐसे में जो पलायन नहीं कर रहे हैं, वे अपनी धरती, जंगल, पहाड़ और नदियों को बचाने के लिए अपनी कमर कसने लगे हैं.

नदियों की मौजूदा असलियत उत्तराखंड निवासियों के लिए असहनीय हो गई है. उत्तराखंड के पूर्व में काली (शारदा) से लेकर पश्चिम में तमसा (टौंस) तक उत्तराखंड की सभी हिमपोषित नदियों पर बिजली उत्पादन के लिए दो सौ से अधिक परियोजनाएं निर्माणाधीन या प्रस्तावित हैं, जिन्हें बांधों और सुरंगों के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है. इसके कारण इन नदियों का सनातन प्रवाह और इनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है. बड़े हादसे तो जैसे अभिशाप की तरह जुड़ गए हैं.

पिछले दिनों विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना के लिए बनाई गई सुरंग के धंस जाने से उसके ऊपर बसा हुआ चॉई गांव ध्वस्त हो गया और कड़ाके की सर्दी में इस गांव के लोगों को अपने टूटे-फूटे दरकते मकानों को छोड़ कर बेघर होना पड़ा.

जंगल साफ हो रहे हैं सो अलग.

लोग हैरान हैं कि नदियों पर बांध औऱ सुरंग बनाने के प्रस्तावों पर बगैर इसके नतीजे की परवाह किए केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय ने भी अपनी ओर से हरी झंडी कैसे दिखा दी !

लेकिन मामला अकेला चॉई का नहीं है.

उत्तरकाशी के करीब चौदह गांव लोहारी नाग और पाला मनेरी जल विद्युत परियोजनाओं से प्रभावित हैं. इन गांवों की महिलाओं का कहना है कि उनके यहां बांध निर्माण एजेंसियां गांव के पुरुषों को प्रलोभन देकर निर्माण कार्य में मनमानी कर रही हैं. भागीरथी घाटी में सुरंग निर्माण के लिए कंपनियां हर दस मीटर पर विस्फोट कर रही हैं, जिससे मकानों में दरारें आ रही हैं. भूजल का रंग बदल गया है.

इस इलाके में 18 कंपनियां एनटीपीसी के संरक्षण में काम कर रही हैं, जिसमें बड़ी संख्या में बाहरी लोग आ रहे हैं. जाहिर है, इससे इन गांवों में सामाजिक असुरक्षा के मामले बढ़े हैं. दूसरी ओर जिनकी जमीन अधिगृहित की जा रही हैं, उनकी सुरक्षा और आजीविका के लिए कोई बात नहीं की जा रही है.

सूख रही है गंगा

दुनिया में बढ़ते तापमान, पिघलते ग्लेशियर और मौसम के बदले मिजाज के कारण गंगा विश्व की लुप्त होने जा रही 10 नदियों में शामिल हो गई है. हिमालय पर्यावरण शिक्षण संस्थान, उत्तरकाशी के सुरेश भाई का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो बीस सालों में गंगा सूख जाएगी. गंगोत्री ग्लेशियर पिछले साढ़े तीन हज़ार सालों में मात्र आठ किलोमीटर खिसका और आज हालत ये है कि पिछले 15 सालों में ही यह 210 मीटर तक सिकुड़ गया है.

भागीरथ पर बांध बनाने की परियोजना के चलते सबसे अधिक खतरे की जद में कुंजन व तिहार गांव हैं. इन गांवों की सुरक्षा व आजीविका के लिए परियोजना में कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है. लोहारी नाग-पाला बांध परियोजना की 12.05 किलोमीटर लंबी सुरंग बनने पर इसके डंपिंग यार्ड की कोई व्यवस्था नहीं है. ग्रामीणों का आरोप है कि विस्फोट के दौरान गांव वालों को उनकी कच्ची फसलें काट लेने के लिए बाध्य किया जाता है.
 

और गंगा भी
इन हिमपोषित नदियों के अलावा उत्तराखंड की अन्य नदियों- कोसी, नयार, पनार, पश्चिमी रामगंगा, गौला, गगास, गोमती गरुड़गंगा और सरयू आदि सघन वनों से निकली और वर्षा से पोषित नदियों की जलधाराएं निरंतर घटती चली जा रही हैं.

वैज्ञानिकों की मानें तो कौसानी के पास पिनाथ पर्वत से निकलने वाली कोसी नदी का जल प्रवाह अल्मोड़ा के निकट 1994 में 995 प्रति सेकंड था, जो 10 साल बाद 2003 में घट कर मात्र 85 प्रति सेकंड रह गया है. दूसरी नदियों का भी यही हाल है. वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसी हालत बनी रही तो 10 से 15 साल के भीतर ये नदियां पूरी सूख जाएंगी.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

jai prakashk kanojia(wapgrapix@gmail.com)

 
 nadiya chahe uttranchal ki ho, bihar ki ho, ya anya jagh ki. nadiyo ki halt aaj ki bigri hue byawstha ne bigar di hai. na sarkari tantra in pur dhyan deti hai naa janta. jb kisi byakti dyara us andolan ko uthaya jata hai tb netatrant us pr apna thapa laganey ke liye khary ho jatey hain. prasun ji ne is visay ko aam janta tak laney me acha sahyog diya. jb sey is visay pur ineno likha tb say is visay pur charcaye chal rahi hai. prasun ji iskey tarif ke patra hain 
   

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