|
|
|
दिमागी सड़ांध और खाद्यान्न
बात पते की
दिमागी सड़ांध और खाद्यान्न
प्रशान्त कुमार दुबे
भारत में सड़ता अनाज और भूख से बिलबिलाता समाज, आधुनिक विकास की परिभाषा स्वमेव
व्याख्यायित कर रहा है. प्रधानमंत्री भूखों को अनाज बाटने के बजाए सर्वोच्च
न्यायालय को नसीहत दे रहे हैं जबकि आवश्यकता अपने गिरेबान में झाकने की है कि इस
मामले में न्यायालय की हस्तक्षेप क्यों करना पड़ा? इतना ही नहीं 10 वर्ष पूर्व
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय का पालन न करने के लिए किसे जिम्मेदार माना
जाए? सरकार ने सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों को पाने की बात तो कर दी लेकिन उस दिशा
में प्रयास सतही ही नजर आते हैं.
मैगसेसे पुरस्कार विजेता एवं वरिष्ठ पत्रकार पी. सांईनाथ कहते हैं – “ हमें जब
गोदामों में सड़ता हुआ अनाज दिखता है तो वह केवल सड़ा अनाज नहीं होता बल्कि एक देश
का सड़ा हुआ दिल-दिमाग भी दिखता है. इस मसले पर उच्चतम न्यायालय भी रस्म अदायगी
करता नजर आता है. अमूमन हर राज्य में अनाज सड़ रहा है लेकिन उच्चतम न्यायालय ने
किसी भी सरकार के मुख्य सचिव को सम्मन क्यों नहीं जारी किया?”
'गोदामों में सड़े अनाज, बच्चे फिर क्यूं भूखे आज' के नारे और विकट सवाल के साथ
अगस्त माह में उड़ीसा के राउरकेला के खाद्य भंड़ार निगम के भंडारगृह के सामने भोजन
एवं काम के अधिकार अभियान के कार्यकर्ताओं ने सांकेतिक प्रदर्शन किया. राउरकेला में
किया गया यह प्रदर्शन देश भर के लिये चेतावनी है कि यदि सरकार ने गोदामों में सड़
रहे अनाज को गरीबों में नहीं बांटा तो फिर भुखमरी के हालात पैदा हो जायेंगे और
लोगों को मजबूरन ताले तोड़ना पड़ेंगे.
इस प्रदर्शन के एक सप्ताह के भीतर ही उच्चतम न्यायालय ने सरकार को आदेशित किया कि
वह अनाज भंड़ारों को गरीबों के लिये खोल दे और अनाज वितरित कर दे. प्रतिक्रिया
स्वरूप केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि सरकार ऐसा कुछ नहीं करने वाली है.
बहस शुरु हुई और स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से एक आश्वासन और निकला कि
जल्द ही हम खाद्य सुरक्षा विधेयक लायेंगे. लेकिन आज की बात किसी ने नहीं की.
ऐसे कठिन समय में जबकि देश में 40 करोड़ निवासी भूखे पेट सोने को मजबूर हैं, 6 वर्ष
से कम उम्र के 47 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, महिलाओं की आधी से अधिक आबादी
खून की कमी से ग्रसित है और अर्जुन सेनगुप्ता रिपोर्ट की मानें तो देश की 77 फीसदी
आबादी प्रतिदिन बीस रुपये से कम में अपना गुजारा करती है. वर्तमान में केन्द्र
सरकार के विभिन्न गोदामों में 608.79 टन अनाज है जबकि कायदे से एक जुलाई तक देश के
केन्द्रीय पूल में 269 लाख टन अनाज होना चाहिये. ये अनाज तो केवल गोदामों में है
लेकिन अभी भी 173.83 लाख टन अनाज खुले में पड़ा है.
केन्द्र सरकार द्वारा खरीदी को बढ़ावा देने के कारण किसानों ने सरकार को गेहूं तो
जमकर बेचा लेकिन गोदामों की व्यवस्था नहीं होने के कारण यह सड़ रहा है. पंजाब जैसे
राज्यों में तो 1.36 लाख टन अनाज तीन वर्षों से खुले में पड़ा है. जिसमें से पानी
से भीगने के कारण 50 हजार टन गेहूं अब इंसानों के खाने लायक नहीं बचा है.
हाल ही में कृषि राज्यमंत्री के वी थॉमस ने लोकसभा में स्वीकार किया कि देश में
भारतीय खाद्य निगम गोदामों में 11708 टन खाद्यान्न या तो खराब है या फिर जारी करने
योग्य नहीं है. अपने देश में वर्तमान में प्रति वर्ष 20 करोड़ टन अनाज की पैदावार
होती है. यह आज की जनसंख्या के डेढ गुना आबादी के लिए यह काफ़ी है. देश के हर एक
व्यक्ति को प्रति वर्ष 200 किलो, यानि कि प्रतिमाह 16 किलो से ज्यादा अनाज इसमें से
मिल सकता है. भारत ने संयुक्त राष्ट्र शताब्दी विकास लक्ष्यों को भी स्वीकार किया
हे. इसके अन्तर्गत 2015 तक भुखमरी से निजात पाना है. भारत में पर्याप्त खाद्यान्न
के रहते हुए भी इन लक्ष्यों की पूर्ति होना कठिन जान पड़ता है.
इसका दूसरा पक्ष भी देखें कि 1997 के पहले राशन व्यवस्था सार्वजनिक हुआ करती थी.
लेकिन सरकार ने उदारीकरण के बाद से ही रोना शुरु कर दिया कि राशन व्यवस्था खर्चीली
हो रही है और यह उसकी क्षमता से बाहर है. इसलिए 1997 में लक्ष्याधारित वितरण
व्यवस्था शुरु हुई. इस तरह सरकार ने यह अनाज भी हमसे छीना. अब यदि यह व्यवस्था
सार्वभौमिक होती तो सभी के पास अनाज भी होता और अनाज गोदामों में सड़ता भी नहीं.
आगे पढ़ें
1997 से राशन दुकानों से अनाज वितरण की मात्रा आधी से कम हो गई. सरकार ने गरीबी
रेखा के नीचे वाले परिवारों को मिलने वाले 35 किलो प्रति परिवार में भी कटौती की है
और उसे 20 किलो पर ला छोड़ा है.
योजना आयोग के अनुसार, गोदामों में रखे हुए अनाज का सिर्फ़ 40 प्रतिशत् राशन
दुकानों तक पहुंचता है. बाकी का 60 प्रतिशत थोक व्यापारी, अनाज उद्योग के अन्य
निकायों, सरकारी अधिकारियों व राशन दुकान मालिकों के सहयोग से दूसरी तरफ़ घुमाया
जाता है. इस अनाज की कीमत 20 हजार करोड़ रुपयों से भी ज्यादा होती है.
इतना ही नहीं बल्कि जनता को भूखा रख कर वर्ष 2001 से 2008 के बीच सरकार ने 5 से 8
रुपये प्रति किलो की सस्ती दर से 2.8 करोड़ टन अनाज का निर्यात किया. सम्भव है कि
इस बार भी सरकार अतिरिक्त भंडारण के कारण निर्यात करे.
गोदामों में सड़ रहे अनाज की पोल खोलने वाले सूचना के अधिकार के कार्यकर्ता दिल्ली
के देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं- “यदि सरकार अनाज सड़ाती है तो वह एक सोची समझी
साजिश है क्योंकि शराब माफिया को सड़ा अनाज ही चाहिये. उन्होंने कहा कि वर्ष 1997
से 2008 तक 12 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. यह मेरा आंकड़ा नहीं बल्कि
एनसीआरबी का है और यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है. इसके पीछे के कारकों में
खाद्यान्न भंडारां का भरे रहना भी है.”
सड़ते अनाज और सरकार के उदासीन रवैये पर भोजन के अधिकार प्रकरण में उच्चतम न्यायालय
के आयुक्तों के मध्यप्रदेश के सलाहकार सचिन जैन कहते हैं कि, “अकाल को राजनीति पैदा
करती है. जिन राज्यों में भूख की स्थिति गंभीर है, वहां जब लोग मरने लगेंगे तब
सरकार खाद्यान्न की आपूर्ति करेगी, अभी तो शायद सरकार लोगों के मरने का रास्ता देख
रही है.”
दरअसल केवल भण्डारण ही समस्या नहीं है. बल्कि राज्यों द्वारा अनाज का उठाव भी
गड़बड़ है. क्योंकि यदि उठाव सही से होते तो भण्डार समय-समय पर खाली होते जाते और
नई फसल से प्राप्त अनाज का भण्ड़ारण हो पाता. यह प्रबंधन का भी विषय है.
|
600 लाख टन के
विशाल भण्ड़ार के बाद जनसामान्य को भी सरकारों को ललकारना होगा कि जब
तक सरकारें अनाज का वितरण नहीं करतीं, अनाज गोदामों में पड़े-पड़े
सड़ना नहीं चाहिये.
|
इस मसले पर सरकारों के प्रयास हमेशा से ही नाकाफी रहे हैं क्योंकि 1979 में सरकार
ने खाद्यान्न बचाओ कार्यक्रम शुरु किया था, जिसमें देश भर में 50 क्षेत्रीय
खाद्यान्न बैंक स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया था. इनमें से प्रत्येक की क्षमता 10
लाख टन तय की गई थी. परन्तु ये खाद्यान्न भंड़ार भी बन नहीं पाये, इसके लिये हमेशा
संसाधनों की कमी ही आड़े आती रही.
इसके विपरीत विगत वर्ष सरकार ने पूंजीपतियों के लिये हर घंटे 1 करोड़ रुपये की
माफी, हर मिनिट 95 लाख और प्रति सेकण्ड 1.5 लाख रुपये की माफी प्रत्यक्ष करों से कर
रही है. सरकार एक वर्ष के भीतर पूंजीपतियों को 5 लाख करोड़ रुपये की रियायत देती
है. लेकिन भूखे व गरीबों के लिये सरकार के पास धन नहीं है.
2001 में दायर 'भोजन के अधिकार' के ऐतिहासिक प्रकरण के मूल में ही यही था कि उस समय
भी लोग भूखे मर रहे थे और गोदामों में अनाज सड़ रहा था. उच्चतम न्यायालय ने कई आदेश
जारी किये लेकिन आज 10 साल बाद भी कमोबेश वही स्थिति है.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त को जारी अपने आदेश में सख्त रवैया अपनाते हुए
कहा है कि देश के गोदामों में पड़ा पचास हजार मीट्रिक टन अनाज अब इंसानों के खाने
के लायक नहीं रहा है. उन्होंने आगे यह भी कहा कि सरकार द्वारा गोदामों में लाखों
मीट्रिक टन अनाज भंडारण के लिए उचित व्यवस्था भी नहीं की है.
सरकारों को चाहिये कि आज वे एक ऐसी व्यवस्था ईजाद करें ताकि अनाज का भंड़ारण हो सके
और निश्चित समय पर लोगों को जारी करे जिससे भुखमरी पर काबू पाया जा सके. 600 लाख टन
के विशाल भण्ड़ार के बाद जनसामान्य को भी सरकारों को ललकारना होगा कि जब तक सरकारें
अनाज का वितरण नहीं करतीं, अनाज गोदामों में पड़े-पड़े सड़ना नहीं चाहिये. सरकार को
चाहिये कि वह पहले सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करे ताकि अन्न वितरण और
भंडारण दोनों ही सुनिश्चित हो सके. सरकार ने सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों को पाने
की बात तो कर दी लेकिन उस दिशा में प्रयास सतही ही नजर आते हैं.
16.09.2010,
08.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | Nidhi Verma (niidhii.verma@gmail.com) Mumbai | | | | Dear Prashant, this article of yours is a result of a thorough research, beautifully stringed together with your thoughts of course. Good work, keep it up! It really calls for an alteration in the distribution and procurement system of the food grains. Jago India Jago! | | | | | |
| | Dr.Alok Chaubey, Society for Ideal Global Needs(SIGN) (sign.global@gmail.com) | | | | Your article is impressive and creates a sound from those people who are in front of question of their survival due to unapproachable food grains. The system of governance and administration is not sensitive towards the life and death issues until their position is safe and secure. They are just doing calculation of figures or numbers of packets unused foodgrains, persons/children died from hunger or malnutrition preparing report either for assembly questions or their MPRs . Our Ministers are delivering shameless statements because they did not feel the pain of lost of their child due to hunger. In bundelkhand area of UP and MP is also facing the same challenges , but government is just making fool by showing the propaganda of Bundelkhand Vikas Package, after just merging some pre executed or running schemes.
We the common man of India are still Indians because we live our life with emotion and belief. But the system of governance, politics and administration is still like before the freedom, when outsiders were sucking the blood of Indians but now conditions are more painful .
हम किस पर यकीन करें... जब अपने ही गुनाहगार हो ... मिटा ही दे दस्तूर ख़ामोशी का, जब बहरी हमारी सरकार हो….
000
निवालो की जगह आश्वासन… अब और नहीं चाहिए….. बूख से बिलखते बच्चे.. तृप्त होने चाहिए….. सड़ रहा अनाज…या फिर.. सड़ चुकी संवेदना…… मर रहे नवजात… बदती जा रही है वेदना… अब तो हद हो चुकी गुबार से दिल भर चुक्का एक भी जीवन की बलि अब जानी नहीं चाहिए.. राजनीति के तवे पे… रोटिया जो सेंकिए… कोई भी बच्चा यहाँ भूखा सोना नहीं चाहिए. | | | | | |
| | Laxmikant (tharmal.power@gmail.com) Stafford uk | | | | प्रिय प्रशांत, कम कहूँगा ज्यादा समझना. एक बड़ा सा-महाकाव्य लिख सकते हो,इन सारी समस्याओं पर. परंतु आजादी को इंजॉय कर रहे लोगों को यह सब नहीं दिखाई देता,सुनाई नहीं देता. वो लोग जो सत्ता के सिहांसन पर विराजमान हैं, वो भी हमारे बीच के लोग हैं.हमारे देश का हर आदमी अपनी तरह से आजादी इंजॉय कर रहा है. विकास हो रहा है.पब्लिक का न सही, मंत्री जी का. वो भारत की पचासों शुगर मिलों के मालिक हैं, मुनाफा कमाने के लिए शुगर का रेट बढ़ा दिया. बीयर फेक्टरियों के मालिक हैं, आनाज सड़ा दिया, सस्ते में बेच कर, सीधे स्विस अकाउंट में क्रेडिड हो गया पैसा. हजारो बातें हैं यहां बतियाने को,पर सुनता कौन है. सुन भी ले तो कुछ नहीं होता जाता भाई. टैक्स पेयर्स के हजारों करोड़ कामन वेल्थ गेम्स में ख़तम कर दिए,अरे भाई जिस देश में भूख से मरते हों,किसान आत्महत्या करते हों,पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं मिलता हो,क्या हमारी सरकार को ये फिजूलखर्ची करनी चाहिए? | | | | | |
| | ajay rohilla (aprohilla@gmail.com) bombay | | | | बहुत ही बढ़िया और अपने देश की वर्तमान आर्थिक ,राजनातिक ,सामाजिक विसंगतियों को दर्शाता है ये लेख... | | | | | |
| | sunder lohia (lohiasunder2 @gmail.com) Mandi ( H.P}. | | | | धीरे धीरे, खुल रही हैं परतें सड़क पर आ जाएगा सच एक दिन औचक | | | | | |
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
|