आषाढ़ का एक दिन उर्फ मॉनसून की मार
बात निकलेगी तो...
आषाढ़ का एक दिन उर्फ मॉनसून की मार
जुगनू शारदेय
बात बचपन की. अब उम्र नहीं याद– बस अपने मिडल स्कूल में ही 'पग घुंघरु बांध मीरा
नाचे रे' हर शनिवार को गाता था. इतना याद है कि तब तक 1962 का चीनी हमला नहीं हुआ
था. बचपन में हमारा घर गुड़ की गंध से महका करता था. हमारा कस्बा औरंगाबाद, अब तो
नामी भी हो गया है, नक्सल गतिविधियों के कारण जाना जाता है और कस्बे के कोने में
नबीनगर में थर्मल पावर प्लांट बनने वाला है. तब करीब करीब गांव ही था. 1972 से जिला
मुख्यालय है– पर है आज भी कस्बा ही.
बिहार मन और मानसिकता से गांव ही है, जो रोजी–रोटी से ले कर पढ़ाई लिखाई के लिए
बिहार से बाहर नहीं गया हो उनके लिए. इस बिहार की बहुत सारी पहचानों में से चपर-चपर
कर खाना है और सुड़क-सुड़क कर चाय पीना है. अब तो बिहार की इज्जत बढ़ भी गई है नीतीश
कुमार के कारण– वरना भदेसपन में हम सबके बाप थे.
खैर, यह तो उस बिहार के नामवर जानें कि इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर उन्होंने क्या
दिया था. पर उस जमाने में भी चीनी की खूब मिलें हुआ करतीं थीं. हमारे औरंगाबाद के
पास कुल 15-20 किलोमीटर ही दूर था–डेहरी ऑन सोन और उसका औद्योगिक नगर डालमिया नगर.
डालमिया नगर में शुगर मिल भी थी, काग़ज भी बनता था, वनस्पति घी भी– और न जाने
क्या-क्या चीजें बनतीं थीं. अब तो किसी को पता भी नहीं होगा कि उस जमाने में
डालमिया शब्द की क्या औकात थी. क्या मजे की बात है कि अभी भी टाटा–बिड़ला बचे हुए
हैं, पर डालमिया न जाने कब का गायब हो गया है. टाटा–बिड़ला की भी वह हैसियत नहीं, जो
उस जमाने में टाटा–बिड़ला–डालमिया की थी.
वह जमाना बहुत दूर का भी नहीं था. बस एक सदी पीछे यानी 20वीं सदी में और उसका 1970
तक का काल. उसके बाद से ही तो खत्म होना शुरू हुआ था बहुत सारे नामों का आतंक या
जलवा, इसमें टाटा–बिड़ला–डालमिया भी थे.
चीनी की मीलें हम बच्चों के लिए बहुत बड़ा टाइमपास भी थीं. हमारा बहुत सारा वक्त
केतारी से लदी बैलगाड़ियों से केतारी की लाठी चुराने में बीतता था. यूं भी कह सकते
हैं कि बैलगाड़ियों में कच्चे केतारी की महक भी हमें दस पांच किलोमीटर चला देती थीं.
दरअसल हमें तो ठीक से याद भी नहीं कि हम केतारी चुराते थे या ऊख. कम से कम केतारी
की लाठी तो नहीं ही चुराते थे. यह अंग्रेजी के शुगरकेन साहब के कारण बना होगा. हम
जो अब साठ साला हो गए हैं तो बड़ा अजीब लगता है, 25 साला दुल्हन को रेल की खिड़कियों
के पार चरती हुई कॉऊज के बारे में समझाना अपनी तीन-पांच साल की बिटया को कि यही
मिल्क देती है. और मासूमियत के साथ बच्ची का पूछना कि मिल्क तो तुम देती हो मॅमा.
पर अपने बचपन में हम नहीं जानते थे कि केतारी गन्ना होता है. कभी पढ़ा होगा ई से ईख.
बहुत हुआ तो शुगरकेन सुना होगा. तब के बिहार में अच्छी खासी शुगर मिलें हुआ करती
थीं. हम उन खुशकिस्मतों में भी थे कि केतारी की पेराई बैल से चलने वाली मशीनों से
भी होती थी हमारे सामने. केतारी का रस बड़े-बड़े कड़ाह में गुड़ बनाने के लिए खौलाया
जाता था. कभी-कभी ही नहीं, अकसर ही हम बच्चों को भी बनता हुआ गरम-गरम गुड़ प्रसाद
समझ कर दिया जाता था.
कहने का कुल मतलब इतना है कि गन्ना, खौलता हुआ उसका रस और गुड़ से एक किस्म की
मुहब्बत थी मुझे–और लोगों को भी, हालांकि चीनी का चलन शुरु हो चुका था. पर प्यासे
राही की प्यास बुझाने के लिए गुड़ के साथ ही पानी का ग्लास दिया जाता था. बाद में
समाजवादी आंदोलन के दौरान की पिकनिकी जेल यात्राओं में भी जाना कि कैदियों को जिंदा
रखने के लिए गुड़ और चना दिया जाता है. पर इन गुड़वादी जानकारियों के पहले से ही उन
पर भिनभिनाती मक्खियों के बावजूद मेरा गुड़वादी प्रेम जस का तस था.
आज की पोलिटिकल पार्टियों की तरह भी दिमाग नहीं बना था कि गुड़ खाए और गुलगुला से
परहेज. ऐसे में मेरे बालक मन को भारी ठेंस पहुंची, जब दादा और पिता गुड़ के सवाल पर
एक दूसरे की माताओं से अपना संबंध स्थापित कर रहे थे. पिता-दादा के झगड़े के सामने
बालक केवल रो सकता था– सो रोने लगा. और कुछ हुआ या न हुआ पोते–बेटे की रुलाई के
सामने पिता–पुत्र का युद्ध समाप्त हो गया.
युद्ध विराम की सुबह पिता तो गुड़ निपटाने जा चुके थे और दादा ‘हे राम, ले चल धाम’
का नारा लगा चुके थे. इस नारे का मतलब यह भी होता था कि उनका गप्प दरबार आरंभ हो
चुका है. आम तौर पर मैं अकेला ही दरबारी होता था. उस दिन तो मुझे उनके दरबार में
पेश ही होना था क्योंकि मैं पिता–पुत्र के पारंपरिक माता संबंध समझना चाहता था. इस
संबंध में भी गुड़ की क्या भूमिका रही है, यह जानने के लिए तो मन गुड़ की मक्खी हो
चुका था. सो अपनी हुलासमय भिनभिनाहट के साथ दादा से रात्रि के प्रसंग के साथ गुड़ के
संबंधों का हाल पूछा. स्वतंत्रता सेनानी –गांधीवादी दादा उस दिन भूल गए थे कि
अंग्रेजों का राजपाट उनके अपने लोगों के राजपाट से बेहतर था. उन्हें लगा कि कोई तो
उनके परिवार में गुड़ की कहानी समझना चाहता है.
संक्षेप इतना ही कि मार्क्सवादी–समाजवादी बन कर कहूं तो यह मुनाफाखोरी और बिचौलिए
की कहानी थी. कुछ आज पर आ जाऊ तो फारवर्ड ट्रेडिंग का खेल है. अपने दादा का पक्ष
रखूं तो सिर्फ दो पैसा कमाते हुए किसी किसान की मदद भी नहीं करनी है, बल्कि साथ और
सहयोग देना है.
आगे पढ़ें
कुल बात इतनी कि दादा के दोस्त किसान को पैसे की जरूरत थी क्योंकि बेटी का बियाह
करना था. नकद की कमी थी, सो किसान जी ने दादा जी को अपने केतारी का खेत दिखाया और
उससे बनने वाले गुड़ का अंदाजा लगाया. जाहिर है कि मेरे दादा ने भी अपना अंदाजा
लगाया होगा और किसान के खाते में एक रुपया बनता होगा तो बारह आने का सौदा किया
होगा. कोई अचरज नहीं कि जब तक गुड़ नहीं उनके गोदाम में पहुंचा होगा तब तक एक रुपए
के हिसाब से एक पैसा महीना का सूद भी लगा दिया होगा. बनिया अगर मुनाफा ना कमाए तो
उसे अपना जीवन नाकबिल लगता है. यही काम जब तामझाम से किया जाता है तो वह बैंकेर्स
से ले कर लेंडर तक कहलाता है. जरा ज्यादा सम्मानित हुआ तो इंनवेस्टर हो जाता है.
जैसे इस जवानी नुमा बुढ़ापे में जानकारी मिली कि यूपीए 2 यानी भारत सरकार जब भी अपनी
किसी कंपनी का शेयर बाजार में पांच–दस प्रतिशत बेचती है तो उसका सबसे बड़ा खरीदार
भारतीय बीमा निगम होता है. बीमा कंपनियों में भी पैसा लोगों का ही लगा होता है. यह
समझाने के बाद भी कि ‘बीमा आग्रह की वस्तु है’ सुरक्षा की चाह में दूसरों के
इनवेस्ट के बल पर यह सबसे बड़ा इनवेस्टर हो जाता है.
बीमा कथा बहुत लंबी है क्योंकि भारत की ज्यादातर कंपनियों का असली मालिक यही है.
कंपनियों में खरीदा गया शेयर किस समय बाजार में बेचे कि बाजार भी न टूटे और बीमा
कंपनी का मुनाफा भी जमा रहे. तभी तो हमारी सरकारी बीमा कंपनी का नारा है- जिंदगी के
साथ भी, जिंदगी के बाद भी !
हमारा यह गुड़वादी किस्सा भी कुछ कुछ ऐसा ही है कि गुड़ के साथ, गुड़ के बाद भी. यही
गुड़ तो छोआ उर्फ मोलासिस बनाता है जिसके बल पर लोग बन जाते हैं किंग ऑफ गुड टाइम्स
उर्फ बिना– गाड़ी– घोड़ा– घर– मकान के किरोड़ी विजय माल्या. हमारे दादा के पास इतनी
बड़ी अक्ल नहीं थी. पर इतनी अक्ल थी कि आज के सारे इकॉनिमिस्ट उसी इकॉनॉमी को दुहरा
कर इकॉनॉमिस्ट बनते जा रहे हैं.
कुल जमा किस्सा यह कि हमारे दादा को पता था चैत का महीना आ गया है और जेठ आने वाला
है. चैत से गरमी बढ़ेगी और जेठ आते आते तक गुड़ पिघलना शुरु हो जाएगा. इस वजह से उनकी
सलाह थी कि चैत में ही गुड़ बेच दिया जाए. बिहार में चैती छठ भी मनाया जाता है.
इसमें भी गुड़ की मांग होती है. शादी-ब्याह का भी लगन आरंभ हो जाता है. इनमें भी
मिठाईयों-पकवानों में गुड़ की मिठास होती है. हमारे पिता गुड़ को बरसात बाद बेचना
चाहते थे क्योंकि तब गुड़ बाजार से गायब रहता है. उनके पास उस तकनीक की समझ नहीं थी
कि कैसे जेठ की गरमी में गुड़ को पिघलने से रोका जाए. दादा को पता था कि पिघलता हुआ
गुड़ कम भाव खाएगा. जेठ में पिता-पुत्र के माता संपर्क के बाद गुड़ बिका. उसमें भी
500 रुपए का मुनाफा ही हुआ. मगर मेरे दादा की छाती मरते दम तक फटती रही कि उनके
कहने पर गुड़ चैत में बिकता तो 1500 का मुनाफा होता.
|
हिंदी के महीने सिर्फ पंडित जी और शादी–ब्याह की तारीखों और त्योहारों
को ही तय करते रहे. हम भूलते गए मौसम का खेल. |
नतीजा: सामान सही समय पर बेचने पर मुनाफा ज्यादा होता है और खाने पीने की चीजों पर
मौसम का असर भी होता है. तब तक यह बेचारा मौसम ही था. मॉनसून नहीं बना था– कम से कम
हमारे कस्बाई इलाके में. जैसे उन दिनों तक हनीमून चलन में नहीं आया था. कुछ
बेवकूफ़ी हिंदी प्रेमी अपनी मूर्खता भरी हिंदी में मधुचंद्र कहने लगे थे. हम तो
अपने बचपन में कोहबर की रात जानते थे और हिंदी सिनेमा में सुहागरात का फूलों भरा
दृश्य देखते थे.
मौसम बदला. इकॉनॉमी का भी और मौसम का भी. घाघ–भट्ठरी की कहावतें किताबों में रह
गईं. मौसम की बाकायदा भविष्यवाणी होने लगी. उन दिनों खबरिया चैनलों का बकवास नहीं
छाया था. ले दे कर एक आकाशवाणी होता था. और उसका तयशुदा लतीफा था कि आज मौसम साफ
एवं सूखा रहेगा तो बिना छाता के घर से निकले और भीगते–तैरते हुए घर वापस आ गए. यहां
हम अंग्रेजों की नकल में यह भूल गए कि ट्रॉपिकल कंट्री होने के नाते पगड़ी-टोपी-सिर
पर छाया-छाता जरूरी था. अंग्रेज भी छाता नहीं रखता था तो टोप-टोपा तो पहने ही रहता
था. हालांकि अपने मुल्क में वह छाता ही रखता था.
वैसे भी यह मौसमी भविष्यवाणी और छाता रखने का चलन भी बिलायत के बरसाती मौसम से ही
बना. बाद में जब जरा समझ आई तो हमने मॉनसून की पैदाइश की कहानी खोजी. इसमें भी ठेठ
अंग्रेजीपन है और है आज हमारे यहां चल रहे चैनलों की कहानी कि जो हमने कहा, वही
सही. तो जान लें और पहचान लें अपने मॉनसून को. यही बेचारा आगे चल कर पर्यावरण,
क्लाइमेट चेंज और न जाने क्या-क्या बना.
यह शब्द अरबी के मौसिम से उपजा. मौसिम से बना मौसम. अंगरेज़ों ने इसे monsoon बना
दिया, और चल पड़ा यह 1783 के एक भाषण से :There prey is lodged in England; and the
cries of India are given to Seas and Winds, to be blown about, in every breaking
up of monsoon, over a remote and unhearring Ocean.(Burke's Speech on Fox’s East
India Bill)
तो जनाब, याद कीजिए अपना आषाढ़ का एक दिन !
तब बरसात होती थी. मेघदूत की दुकान न जाने कब की बंद हो गई. हिंदी के महीने सिर्फ
पंडित जी और शादी–ब्याह की तारीखों और त्योहारों को ही तय करते रहे. हम भूलते गए
मौसम का खेल. नतीजा यह होता है कि जब सूखा पड़ जाता है तो न जाने कितनी चीजों की याद
आती है. पता नहीं किसकी कहावत है कि ‘का बरसा जब कृषि सुखाने.’ कहावत कुछ गलत भी हो
सकती है.
मनचला–मस्त–मतवाला मौसम पर जैसे मॉनसून की मार पड़ी है, वैसे ही दिमाग पर भी मॉनसून
की मार पड़ी है.
16.09.2010,
13.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित