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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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आषाढ़ का एक दिन उर्फ मॉनसून की मार

बात निकलेगी तो...

आषाढ़ का एक दिन उर्फ मॉनसून की मार

जुगनू शारदेय

बात बचपन की. अब उम्र नहीं याद– बस अपने मिडल स्कूल में ही 'पग घुंघरु बांध मीरा नाचे रे' हर शनिवार को गाता था. इतना याद है कि तब तक 1962 का चीनी हमला नहीं हुआ था. बचपन में हमारा घर गुड़ की गंध से महका करता था. हमारा कस्बा औरंगाबाद, अब तो नामी भी हो गया है, नक्सल गतिविधियों के कारण जाना जाता है और कस्बे के कोने में नबीनगर में थर्मल पावर प्लांट बनने वाला है. तब करीब करीब गांव ही था. 1972 से जिला मुख्यालय है– पर है आज भी कस्बा ही.

sugar-cane


बिहार मन और मानसिकता से गांव ही है, जो रोजी–रोटी से ले कर पढ़ाई लिखाई के लिए बिहार से बाहर नहीं गया हो उनके लिए. इस बिहार की बहुत सारी पहचानों में से चपर-चपर कर खाना है और सुड़क-सुड़क कर चाय पीना है. अब तो बिहार की इज्जत बढ़ भी गई है नीतीश कुमार के कारण– वरना भदेसपन में हम सबके बाप थे.

खैर, यह तो उस बिहार के नामवर जानें कि इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर उन्होंने क्या दिया था. पर उस जमाने में भी चीनी की खूब मिलें हुआ करतीं थीं. हमारे औरंगाबाद के पास कुल 15-20 किलोमीटर ही दूर था–डेहरी ऑन सोन और उसका औद्योगिक नगर डालमिया नगर. डालमिया नगर में शुगर मिल भी थी, काग़ज भी बनता था, वनस्पति घी भी– और न जाने क्या-क्या चीजें बनतीं थीं. अब तो किसी को पता भी नहीं होगा कि उस जमाने में डालमिया शब्द की क्या औकात थी. क्या मजे की बात है कि अभी भी टाटा–बिड़ला बचे हुए हैं, पर डालमिया न जाने कब का गायब हो गया है. टाटा–बिड़ला की भी वह हैसियत नहीं, जो उस जमाने में टाटा–बिड़ला–डालमिया की थी.

वह जमाना बहुत दूर का भी नहीं था. बस एक सदी पीछे यानी 20वीं सदी में और उसका 1970 तक का काल. उसके बाद से ही तो खत्म होना शुरू हुआ था बहुत सारे नामों का आतंक या जलवा, इसमें टाटा–बिड़ला–डालमिया भी थे.

चीनी की मीलें हम बच्चों के लिए बहुत बड़ा टाइमपास भी थीं. हमारा बहुत सारा वक्त केतारी से लदी बैलगाड़ियों से केतारी की लाठी चुराने में बीतता था. यूं भी कह सकते हैं कि बैलगाड़ियों में कच्चे केतारी की महक भी हमें दस पांच किलोमीटर चला देती थीं. दरअसल हमें तो ठीक से याद भी नहीं कि हम केतारी चुराते थे या ऊख. कम से कम केतारी की लाठी तो नहीं ही चुराते थे. यह अंग्रेजी के शुगरकेन साहब के कारण बना होगा. हम जो अब साठ साला हो गए हैं तो बड़ा अजीब लगता है, 25 साला दुल्हन को रेल की खिड़कियों के पार चरती हुई कॉऊज के बारे में समझाना अपनी तीन-पांच साल की बिटया को कि यही मिल्क देती है. और मासूमियत के साथ बच्ची का पूछना कि मिल्क तो तुम देती हो मॅमा.

पर अपने बचपन में हम नहीं जानते थे कि केतारी गन्ना होता है. कभी पढ़ा होगा ई से ईख. बहुत हुआ तो शुगरकेन सुना होगा. तब के बिहार में अच्छी खासी शुगर मिलें हुआ करती थीं. हम उन खुशकिस्मतों में भी थे कि केतारी की पेराई बैल से चलने वाली मशीनों से भी होती थी हमारे सामने. केतारी का रस बड़े-बड़े कड़ाह में गुड़ बनाने के लिए खौलाया जाता था. कभी-कभी ही नहीं, अकसर ही हम बच्चों को भी बनता हुआ गरम-गरम गुड़ प्रसाद समझ कर दिया जाता था.

कहने का कुल मतलब इतना है कि गन्ना, खौलता हुआ उसका रस और गुड़ से एक किस्म की मुहब्बत थी मुझे–और लोगों को भी, हालांकि चीनी का चलन शुरु हो चुका था. पर प्यासे राही की प्यास बुझाने के लिए गुड़ के साथ ही पानी का ग्लास दिया जाता था. बाद में समाजवादी आंदोलन के दौरान की पिकनिकी जेल यात्राओं में भी जाना कि कैदियों को जिंदा रखने के लिए गुड़ और चना दिया जाता है. पर इन गुड़वादी जानकारियों के पहले से ही उन पर भिनभिनाती मक्खियों के बावजूद मेरा गुड़वादी प्रेम जस का तस था.

आज की पोलिटिकल पार्टियों की तरह भी दिमाग नहीं बना था कि गुड़ खाए और गुलगुला से परहेज. ऐसे में मेरे बालक मन को भारी ठेंस पहुंची, जब दादा और पिता गुड़ के सवाल पर एक दूसरे की माताओं से अपना संबंध स्थापित कर रहे थे. पिता-दादा के झगड़े के सामने बालक केवल रो सकता था– सो रोने लगा. और कुछ हुआ या न हुआ पोते–बेटे की रुलाई के सामने पिता–पुत्र का युद्ध समाप्त हो गया.

युद्ध विराम की सुबह पिता तो गुड़ निपटाने जा चुके थे और दादा ‘हे राम, ले चल धाम’ का नारा लगा चुके थे. इस नारे का मतलब यह भी होता था कि उनका गप्प दरबार आरंभ हो चुका है. आम तौर पर मैं अकेला ही दरबारी होता था. उस दिन तो मुझे उनके दरबार में पेश ही होना था क्योंकि मैं पिता–पुत्र के पारंपरिक माता संबंध समझना चाहता था. इस संबंध में भी गुड़ की क्या भूमिका रही है, यह जानने के लिए तो मन गुड़ की मक्खी हो चुका था. सो अपनी हुलासमय भिनभिनाहट के साथ दादा से रात्रि के प्रसंग के साथ गुड़ के संबंधों का हाल पूछा. स्वतंत्रता सेनानी –गांधीवादी दादा उस दिन भूल गए थे कि अंग्रेजों का राजपाट उनके अपने लोगों के राजपाट से बेहतर था. उन्हें लगा कि कोई तो उनके परिवार में गुड़ की कहानी समझना चाहता है.

संक्षेप इतना ही कि मार्क्सवादी–समाजवादी बन कर कहूं तो यह मुनाफाखोरी और बिचौलिए की कहानी थी. कुछ आज पर आ जाऊ तो फारवर्ड ट्रेडिंग का खेल है. अपने दादा का पक्ष रखूं तो सिर्फ दो पैसा कमाते हुए किसी किसान की मदद भी नहीं करनी है, बल्कि साथ और सहयोग देना है.
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pradeep sharma (pradeetsharma@rediffmail.com) bilaspur

 
 एकदम टाईमपास लेखन है. जुगनू जी मॉनसून की तरह unpredictable हो गये हैं. 
   
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