निशाने पर क्यों हैं किसान
मुद्दा
निशाने पर क्यों हैं किसान
मेधा पाटकर
अलीगढ़ के किसानों द्वारा एक्सप्रेस वे के अतिरिक्त इसके इदगिर्द स्थित हजारों
गांवों की कुछ किलोमीटर तक की जमीनें हड़पने का आरोप लगाने के बाद, देश की राजनीति
तय करने वाले उत्तरप्रदेश की राजनीतिक भूमि पर हलचल मच गई और तमाम राजनेताओं को इस
विषय पर अपनी भूमिका स्पष्ट भी करना पड़ी. भूमि अधिग्रहण एक बार पुन: नए सिरे से
मुद्दा बन गया है. पहले भी नर्मदा से लेकर नंदीग्राम और रायगढ़ से लेकर सोमपेटा तक
यह ज्वलंत मुद्दा था.
राज्य का सार्वभौम सत्ता का अधिकार नहीं बल्कि 'अहंकार' किसानों, आदिवासियों,
दलितों की भूमि पर आक्रमण कर भरे पूरे गांवों को खत्म कर वहां शहर बसाने के लिए
बिल्डरों और कंपनियों को कर में राहत देते हुए उन्हें उजाड़ने की साजिश कर रहा है.
यह अहंकार 'सेज', नदी व नदी-घाटियों को समाप्त कर वहां रहने वाले समाज और संस्कृति
को नष्ट करने में भी साफ दिखाई देता है. अब समय आ गया है, जब इस अधिग्रहण में कितना
विकास और कितना सार्वजनिक हित है; का जवाब जनता को दिए जाने को भूमि अधिग्रहण की
पूर्व शर्त माना जाए. इसलिए इस ब्रिटिशकालीन भूमि कानून के खिलाफ संघर्ष को तेज
करना आवश्यक है.
राज्य द्वारा 'विकास' के नाम पर किए जा रहे अत्याचारों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष कर
रहे माओवादियों से हथियार डालने के बाद चर्चा का वादा करती नजर आती सरकारें देश भर
में नदी-घाटियों से लेकर खनन और सेज के विरुध्द चल रहे अहिंसक आन्दोलनों से चर्चा
करने से न केवल बचती रही हैं बल्कि इन स्थानों पर राज्य अपना एजेंडा थोपती नजर आती
है.
अलीगढ़ में दो किसानों की शहादत के बाद ही सही पर राजनीतिक दलों द्वारा भूमि
अधिग्रहण कानून में 'नियोजित संशोधनों' को जिस तेजी से लोकसभा में पारित कराने की
घोषणा की गई है, उससे लगता है कि राजनीतिज्ञ इस मसले पर अभी भी गंभीर नहीं हैं.
इससे पहले 1998 में एक प्रयास हुआ था. इसके बाद 2008 में और इन दोनों के बीच जिस
तरह 2005 में बिना बहस के संसद ने 'सेज' कानून को पारित किया, ठीक उसी तरह इस बार
भी कुछ संशोधनों के साथ भूमि अधिग्रहण कानून को पारित करने के प्रयास होंगे.
भूमि अधिग्रहण की संकल्पना की बुनियाद में है 'राज्य की सार्वभौम सत्ता' का
सिद्धांत. इसमें भूमि और उससे जुड़े सभी प्राकृतिक संसाधन और संपदाएं शामिल हैं.
साम्राज्यवादी शासकों की इन आवश्यकताओं को आजाद भारत के शासकों ने न केवल ज्यों का
त्यों अपनाया, बल्कि 1984 में कंपनियों के लिए जमीन उपलब्ध करवाने को भी सार्वजनिक
हित की परिभाषा में लेकर औपनिवेशिक शासकों को भी पीछे छोड़ दिया.
इसके बाद शोषण का नया दौर उद्योग और रोजगार के नाम पर शुरु हो गया और आज खेती,
किसानी और खाद्य सुरक्षा विनाश के कगार पर खड़ी हैं. इसी के साथ खेती और उस पर
निर्भर समाज की अवमानना का दौर भी प्रारंभ हो गया. इसका सत्यापन इस बात से होता है
कि नए मसौदे में और भी खतरनाक प्रावधान हैं. इसके अंतर्गत निवेशक द्वारा 70 प्रतिशत
निजी भूमि क्रय करने पर बकाया 30 प्रतिशत सरकार द्वारा अधिग्रहित कर देने का
प्रावधान धमकी के रूप में कार्य करेगा.
सारी दुनिया में लोकतंत्र का डंका बजाने वाले भारत को यदि शर्मिंदा होने से बचना है
तो उसे वर्तमान भूमि अधिग्रहण कानून को रद्द ही करना होगा. इसके बदले एक व्यापक
विकास नियोजन का कानून प्रस्तावित करना होगा. इसके अन्तर्गत शासन को कुछ संसाधन
अपने हक में लेने का अधिकार तो होगा लेकिन लोकतंत्र की चुनी हुई स्थानिक इकाईयों
द्वारा अपरिहार्य न्यूनतम अधिग्रहण की मंजूरी देने के बाद ही ऐसा संभव हो पाएगा.
इसके लिए सर्वप्रथम जरूरी है, खेती से गैर खेती के कार्यों में भूमि को हस्तांतरित
करने पर रोक लगाना. जिस तरह सैद्धांतिक तौर पर भारत में धरती पर 33 प्रतिशत
वनोच्छादन को स्वीकृति मिली है, ठीक उसी प्रकार भूमि को खाद्यान्न उपजाने के लिए भी
सुरक्षित रखा जाना अनिवार्य है.
ग्रामसभाओं को प्राप्त संवैधानिक अधिकारों को मान्यता प्रदान कर उनकी असहमति की
स्थिति में अधिग्रहण स्थगित कर दिया जाना चाहिए. इसी के साथ यह भी तय करना होगा कि
विकास में समता, न्याय के साथ ही साथ न्यूनतम विनाश और विस्थापन हो. यह भी स्पष्ट
है कि अब सब कुछ सत्ता की होड़ में लगे राजनीतिक दलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.
नए कानून में देश के 6 लाख गांवों को योजना की स्वीकृति का अधिकार देना होगा. साथ
ही केंद्रीकृत सत्ता, विदेशी साहूकारी संस्थाओं या कंपनियों, पूंजीपतियों की
चापलूसी करने वाले नियोजनकर्ताओं, प्रकृति से अंजान और परावलंबी बुध्दिजीवियों को
भी अपना-अपना स्थान दिखाना होगा.
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'अगर-मगर' की रट लगाकर सिंचाई परियोजनाओं को अगर उसी जिले में शासकीय
खेत, जमीन उपलब्ध है तो मंजूरी दे दी जाएगी, जैसे प्रावधान नए पुनर्वास
कानून में भी जारी हैं. |
विकास की दौड़ में हम आज जो खोते जा रहे हैं वह हमारे जीवन व जीविका के आधार हैं. यह
दौड़ विस्थापितों को अपमानित, पूर्णत: वंचित एवं निर्वासित कर अपना असर दिखा रही है.
इस स्थिति को बदलना होगा. विस्थापन के नए और व्यापक कानून में 'पुनर्वास' की
परिभाषा और प्रक्रिया का स्पष्ट और न्यायपूर्ण होना आवश्यक है. इसके अन्तर्गत गंभीर
रूप से प्रभावित परिवारों को जीविका के वैकल्पिक आधार की उपलब्धता पर ही विस्थापित
किए जाने का प्रावधान होना चाहिए. विस्थापन को न्यूनतम रखे जाने पर ही पुनर्वास
संभव है, अन्यथा इससे भ्रष्टाचार और अत्याचार जन्म लेते रहेंगे.
नर्मदा घाटी के पिछले 25 वर्षों के संघर्ष में हमने कई बार नई राष्ट्रीय पुनर्वास
नीति लाने का प्रयास भी किया है. केंद्रीय मंत्रालयों और योजना आयोग से इस मसले पर
संवाद और संघर्ष दोनों ही किए हैं. वर्ष 2003 में मंजूर हुई राष्ट्रीय पुनर्वास
नीति पर अभी तक अमल नहीं हुआ है. इसे लागू करने हेतु सचिवों की उच्चस्तरीय समिति ने
2009-10 तक एक बार भी बैठक नहीं की है. ऐसे में न्यूनतम विस्थापन के साथ नियोजन के
उद्देश्य की पूर्ति कैसे संभव है?
'अगर-मगर' की रट लगाकर सिंचाई परियोजनाओं को अगर उसी जिले में शासकीय खेत, जमीन
उपलब्ध है तो मंजूरी दे दी जाएगी, जैसे प्रावधान नए पुनर्वास कानून में भी जारी
हैं. न्यूनतम 400 परिवारों के उजड़ने पर ही इस कानून के लागू होने के प्रावधान का
क्या अर्थ है? आवश्यकता है परिवार के साथ ही साथ पूरे गांव, समाज या प्राकृतिक इकाई
जैसे नदी-घाटी पर परियोजना के प्रभावों के आकलन करने के पश्चात ही अनुमति दी जाए.
इसलिए आवश्यक है कि प्रत्येक स्तर पर पूर्ण सामाजिक, पर्यावरणीय व आर्थिक अध्ययन
किया जाए. प्रस्तुत मसौदे में केवल अध्ययन का प्रावधान है पर उनके निष्कर्षों के
आधार पर योजना के संबंध में निर्णय लेने की बात टाल दी गई है.
इसी परिप्रेक्ष्य में देश भर के जगसंगठनो ने व्यापक 'विकास नियोजन कानून' के पक्ष
में आवाज उठाई है. इसका मसौदा भी जनसंगठनों ने वर्ष 2005 में तैयार कर लिया था. उस
समय प्रभावशील राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी इसे मंजूर
किया था. इसके बाद मंत्रीपरिषद ने इसे कृषि मंत्री की अध्यक्षता में गठित मंत्री
समूह को सौंप दिया था.
नए मसौदे को अस्वीकार करते हुए हमारा प्रश्न है कि तत्कालीन राष्ट्रीय सलाहकार
परिषद द्वारा पारित मसौदे को स्वीकार क्यों नहीं किया गया? इसका तुरंत जवाब दिया
जाना आवश्यक है. अन्यथा असंतोष बढ़ेगा और विद्रोह भी. इसलिये राज्य को ही नहीं बल्कि
समाज को भी इस विषय में तुरन्त निर्णय लेना होगा. वरना अहिंसक व शस्त्रहीन किसानों
और आदिवासियों को हम किसके भरोसे और कौन सा दूसरा मार्ग बताएंगे? यदि देश भर में
संवाद बनाए जाए तो संघर्ष के जारी रहते भी, बिना विस्थापन विकास की ओर ले जाने वाला
रास्ता अवश्य निकलेगा.
17.09.2010,
15.27 (GMT+05:30) पर प्रकाशित