लेकिन खाद्यान आएगा कहां से
मुद्दा
लेकिन खाद्यान आएगा कहां से
देविंदर शर्मा
भारत एक हजार बगावतों को झेल रहा है. देश भर में जगह-जगह गरीब किसान संघर्ष कर रहे
हैं. इन्हें डर है कि सरकार और उद्योगपति उनकी जमीन हड़प लेंगे. कर्नाटक के मंगलूर
से लेकर उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ तक और पश्चिम बंगाल के सिंगुर से लेकर पंजाब के
मनसा तक पूरा ग्रामीण अंचल उबल रहा है. बड़ी मात्रा में उर्वर कृषि भूमि गैरकृषि
कार्र्यो के लिए किसानों से छीनी जा रही है.
उदाहरण के लिए अलीगढ़ के किसानों द्वारा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किया गया संघर्ष,
जो हिंसक मोड़ लेने के बाद राजनीतिक दलों का अखाड़ा बन गया था, को किसानों द्वारा
अधिक मुआवजा हासिल करने की लड़ाई बताया जा रहा है, जबकि असलियत यह है कि अधिसंख्य
किसान अपनी पुश्तैनी भूमि छोड़ना ही नहीं चाहते. उन्हें ऐसा करने को मजबूर किया जा
रहा है. इसके खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर निहितार्थ हैं.
आबादी के हिसाब से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा प्रदेश है. साथ ही यह खाद्यान्न का
सबसे बड़ा उत्पादक भी है. सिंधु-गंगा मैदानी भाग में उर्वर भूमि को हरित क्रांति
पट्टी का अंग माना जाता है. 410 लाख टन खाद्यान्न के अलावा यहां 1.3 करोड़ टन गन्ना
और 1.05 करोड़ टन आलू की पैदावार होती है.
उत्तर प्रदेश पंजाब से भी अधिक खाद्यान्न पैदा करता है, किंतु विशाल आबादी के कारण
पूरा खाद्यान्न प्रदेश में ही खप जाता है. फिर भी यह तो उल्लेखनीय है ही कि उत्तर
प्रदेश कम से कम अपनी जनता का पेट तो भर पा रहा है. यह स्थिति बदलने वाली है. यही
चिंता की बात है.
आठ लेन का प्रस्तावित एक्सप्रेस वे और सड़क के किनारे बसने वाली टाउनशिप, साथ ही
अन्य औद्योगिक, भवन निर्माण और निवेश परियोजनाओं में करीब 23000 गांवों की जमीन खप
जाएगी. यद्यपि मायावती सरकार ने यमुना एक्सप्रेस वे के किनारे बसने वाली टाउनशिप की
एक योजना रद कर दी है, किंतु इसका निर्माण करने वाली कंपनी का कहना है कि समझौते के
अनुसार राज्य सरकार को जमीन देनी ही पड़ेगी. अलीगढ़ और आगरा में नहीं तो किसी अन्य
स्थान पर सही.
पूर्व कृषि मंत्री अजित सिंह ने एक बयान में कहा है कि उत्तर प्रदेश की कुल जमीन का
एक-तिहाई हिस्सा सरकार अधिग्रहीत करने जा रही है. इसका मतलब यह है कि उत्तर प्रदेश
में कुल 1.98 करोड़ हेक्टेयर भूमि में से करीब 66 लाख हेक्टेयर भूमि का उपयोग कृषि
के स्थान पर गैर कृषि के रूप में होगा. इस प्रकार पश्चिम उत्तर प्रदेश की बेहद
उर्वर भूमि का अधिकांश हिस्सा कंक्रीट के जंगल में बदल जाएगा. गेहूं और चावल के
अलावा गन्ना और आलू ऐसी फसलें होंगी जिन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.
मोटे अनुमान के अनुसार जो 66 लाख हेक्टेयर भूमि कृषि से मुक्त हो जाएगी उस पर 140
लाख टन खाद्यान्न पैदा होता. दूसरे शब्दों में, आने वाले वर्र्षो में उत्तर प्रदेश
में भयावह खाद्यान्न संकट खड़ा हो जाएगा. इसके बीज अब बोये जा रहे है. आलू और गन्ने
की पैदावार में काफी कमी आएगी, जिससे उत्तर प्रदेश की आगे की राह न केवल अंधकारमय
है, बल्कि सामाजिक अशांति से भरी भी है.
पहले ही बीमारू राज्यों में शामिल उत्तर प्रदेश में निश्चित तौर पर भुखमरी और
कुपोषण का खतरा बढ़ जाएगा. मैं यह सोचकर ही कांप उठता हूं कि जिस युद्धस्तर पर
सरकार भूमि अधिग्रहण के प्रयासों में लगी है उसके कितने घातक
आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक परिणाम होंगे. इस बात का अहसास नहीं किया जा रहा है कि
अकेले उत्तर प्रदेश के कारण ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम डगमगा जाएगा.
वर्तमान में, मानदंडों के अनुसार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत देश भर में वितरण
के लिए 200 लाख टन से 240 लाख टन खाद्यान्न का भंडारण होता है. हालांकि पिछले कुछ
वर्र्षो के दौरान सरकार 450 से 500 लाख टन के बीच औसत खाद्यान्न भंडारण कर रही है.
इतने भारी भंडार के बावजूद खाद्य और कृषि मंत्री शरद पवार ने प्रत्येक पात्र
परिवारों को प्रतिमाह 35 किलोग्राम खाद्यान्न उपलब्ध कराने में असमर्थता जता दी है.
जरा कल्पना करें कि जब अकेला उत्तर प्रदेश ही 140 लाख टन खाद्यान्न की अतिरिक्त
मांग करेगा तो क्या होगा? नीति निर्माताओं का कहना है कि तीव्र औद्योगिकीकरण के
कारण लोगों की औसत आय मंक वृद्धि होगी और वे खुले बाजार से खाद्यान्न खरीदने में
समर्थ हो जाएंगे. बड़ा सवाल तो यह है कि अतिरिक्त खाद्यान्न आएगा कहां से? पहले ही
देश का खाद्यान्न कटोरा कहे जाने वाले पंजाब और हरियाणा में कृषि योग्य भूमि के
अधिग्रहण की होड़ लगी है.
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पंजाब अब उद्योगों
के लिए भूमि बैंक बनते जा रहे हैं. राजस्थान ने सीलिंग सीमा को ताक पर रखते हुए
उद्योगों को सीधे किसानों से जमीन खरीदने की अनुमति दे दी है. अंतरराष्ट्रीय स्तर
पर 2008 से खाद्य पदार्र्थो की उपलब्धता नाजुक बनी हुई है. 2008 के खाद्यान्न संकट
में 37 देशों में खाद्य दंगे फैल गए थे. और अब तो खाद्यान्न की अंतरराष्ट्रीय
कीमतों में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही है.
रूस ने अगले साल की फसल तक के लिए गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे
बाजार में इसकी कीमतें बढ़ती जा रही हैं. मोजांबिक में खाद्य दंगे हुए, जिनमें कम
से कम सात लोग मारे गए. रिपोर्र्टो के अनुसार पाकिस्तान, मिस्त्र और सर्बिया में
खाद्यान्न की बढ़ती कीमतों पर लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है. यह जानते हुए कि
विश्व फिर से 2008 के खाद्य संकट में फंस सकता है, जिसके कारण 37 देशों में खाद्य
दंगे भड़क उठे थे, खाद्य और कृषि संगठन ने खाद्य संकट के परिणामों पर विचार करने के
लिए विशेष बैठक बुलाई है.
सूखाग्रस्त इलाके में वृद्धि और परिणाम स्वरूप जंगल में लगने वाली आग से रूस में
गेहूं की 20 फीसदी फसल बर्बाद हो गई है. परिणामस्वरूप गेहूं के अंतरराष्ट्रीय दामों
में आग लग गई है. इससे निश्चित तौर पर गेहूं के वायदा सौदे वाले मालामाल हो रहे
हैं.
एक वित्तीय अखबार के मुताबिक जनवरी माह से अब तक गेहूं के दाम 70 फीसदी बढ़ चुके
हैं. अगर सरकार सोचती है कि घरेलू खाद्यान्न कमी की भरपाई विदेश से करके वह
खाद्यान्न संकट से बच सकती है तो वह भुलावे में है. विदेश से गेहूं खरीदना आसान
नहीं रह गया है. यही मुख्य कारण है कि चीन और मध्यपूर्व के धनी देश अफ्रीका, लैटिन
अमेरिका और एशिया में खेती के लिए जमीन खरीद रहे हैं.
15 अगस्त, 1955 को लालकिले की प्राचीर से भाषण देते हुए जवाहरलाल नेहरू ने कहा था
कि किसी भी देश के लिए खाद्यान्न का आयात करना बहुत शर्मनाक है. यह आश्चर्यजनक है कि इसके 50 वर्ष बाद मनमोहन सिंह
सरकार का मानना है कि खाद्य सुरक्षा को आयात किया जा सकता है. उद्योगों के लिए भूमि
अधिग्रहीत करना जरूरी है, क्योंकि अकेले औद्योगिक क्षेत्र के कारण उच्च विकास दर
हासिल की जा सकती है. इस गलत सोच से खतरनाक और कुछ नहीं हो सकता.
18.09.2010, 08.47 (GMT+05:30) पर प्रकाशित