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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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गुहामानव के भित्तिचित्र

साहित्य

गुहामानव के भित्तिचित्र

रणेन्द्र

क्या ढूँढ़ना चाहता हूँ इनमें
कौन सी नवीनता, अनूठापन
उन्होंने सिर्फ शिल्प बदले हैं
कथ्य नहीं बदले,

eye


पूरी दुनिया के गुफा-भित्तिचित्रों के
पैटर्न एक से हैं
रेखांकनों में अनोखी एकरूपता

हथियार, शिकार
और उनकी घेराबन्दी,
काँधे लटके, रक्तसने शिकार

पर कहीं नहीं
टपके रक्त के दाग
न कोई आह! ना चीत्कार
इतिहास, शिकारियों की ही रचना है,

देश और काल
इन्हीं गुफाओं में कर रहे कदमताल,

फर्क सिर्फ इतना कि
गुहामानवों ने चमचमाती संज्ञाओं के
टाँग लिए टैग
कमर के वल्कल, मृगछाल के ऊपर
वर्दियाँ, पतलून, जिन्स, सुट, अगड़म-बगड़म
ड्रेस डिजाइनिंग नई संज्ञा है शायद
कि विशेषण, कि प्रदर्शन, कि छलावा,

दरअसल ऍंधेरी गुफा ही शाश्वत है
शाश्वत हैं, रक्तसने, काँधे लटके शिकार,

देश-काल के साथ
कदमताल करता गुहामानव
चतुर, होशियार
देता रहा हथियारों पर धार
उन पर चढ़ाता रहा
शहद के लेप पर लेप
गढ़ता रहा नये-नये टैग
पुनर्जागरण, ज्ञानोदय, आधुनिकता,

दरअसल, ये ऍंधेरी गुफाओं को
दिमाग की सुराख में
छुपाने की तरकीबें थीं

गैर कबिलाई, गन्दे गुलाम, घटिया नस्लें, छोटी जातियाँ,
बागी, विधर्मी, विद्रोही, नक्सली, सारी की सारी स्त्रियाँ
शिकारों की लम्बी होती गर्इं सूचियाँ

हाँका और घेरे के सात्विक सिद्धांत
कब के स्थापित हो चुके

राज्य, धर्म, समाज, परिवार
सुविधा और हिस्सानुसार
भरपूर शिकार के लिए गढे ग़ए
छोटे-बड़े घेरे हैं,

खून की धार जो बहती रही
सभ्यता नाम का खुजलाहा कुत्ता
आक्षितिज जिह्वा फैला, चाटता रहा
और संस्कृति
उसी की संगिनी
हव्यों के ढ़ेर को चबा-चबा
धूल बनाती रही,

खाकी शिकारियों के काँधे की
काठ पर लटकी
बागी स्त्री की लाश,
शिकार के इस नये चित्र पर
अलग से कुछ नहीं कहना

माँ धरती की गोद में
कहीं कोई निष्कंटक कोना नहीं शेष

बस शेष है
धुँधला सा एक स्वप्न
तीलियाँ इक्कट्ठा करने की चाह।

 

23.09.2010, 12.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

राहुल राजेश () अहमदाबाद

 
 कविता और काल का कैनवास तो बड़ा है पर शिल्प-कथ्य, बुनावट सब का सब कहीं कसा, कहीं ढीला-ढाला है। कविता में समय को इतिहास की तरह नहीं, पाँवों की छाप की तरह आना चाहिए।

खैर, बधाई!
 
   
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