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हरसूद-लोक और तंत्र की आशा का डूबना

हरसूद: लोक और तंत्र की आशा का डूबना

 

दयाशंकर मिश्र

भोपाल से


रोशनी के लिए विकास चाहिए, विकास के लिए विस्थापन. आजादी के बाद से अब तक लगभग पंद्रह से बीस करोड़ लोग इस मुहावरे के चरितार्थ होने की कीमत चुका रहे हैं. आजादी के बाद रिकार्ड तेजी से देश में बांधों का निर्माण हुआ. सरदार सरोवर से लेकर इंदिरा सागर बांध तक का लंबा इतिहास है, जिनके नाम पर देश की समृध्द सांस्कृतिक विरासत, जनजातियों को तहस- नहस करने का आरोप है. इसका बीते वर्षो में सबसे प्रासंगिक उदाहरण है, इंदिरा सागर बांध की डूब में आए 249 गांव और इस संघर्ष का प्रतीक बना हरसूद.


बहुत रोमांटिक हिसाब है, 1000 मेगावाट बिजली के लिए 249 गांव की तबाही. अरुंधति राय, मेधा पाटेकर से लेकर तमाम संघर्षशील लोगों ने यहां आकर लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरवी का असफल प्रयास किया. एक अरब से अधिक आबादी वाले देश में इस हरसूद के आंदोलन पर गहरी नकारात्मकता रही है.


जगमगाती बिजली की रोशनी में शहर के लोग लगातार यह भूल रहे हैं कि दूसरों के घरों से चुराया हुआ सुकून लंबे समय तक अपने घर में शांति, समृध्दि का कारण नहीं बन सकता. इस रोशनी की अंधी चाह में हजारों के घर-बार कुचलना, उनको सहज मानवीय अधिकार न देना भी एक अरब की आबादी वाले देश को विचलित नहीं करता. हरसूद के विरोध में कहीं कोई लामबंद नहीं होता. क्या यह समाज के अपनी जड़ों से विलग होने का प्रमाण नहीं है. क्या यह विकास के नाम पर निरंकुश हो रहे पूंजीपतियों और सरकारों को शोषण का खुला आमंत्रण नहीं है?

जिस तरह से हरसूद के चुने हुए जनप्रतिनिधि हरसूद से भागकर सत्ता के गलियारे में प्रविष्ट हुए वह अधिक दुखदायी था. हरसूद ने देखा होगा कि कैसे उसके वोटों से चुने लोग उसकी चिता को मुखाग्नि देने को व्याकुल थे. आधुनिक विकास के मुरीद ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो विस्थापितों को मिले मुआवजे का बखान करते नहीं अघाते. जो बताते हैं कि कितना पैसा और जमीन मिली.


पूंजीपति तो विकास के नाम पर विस्थापन के प्रबल पक्षधर हैं. इनसे किसी को शिकायत नहीं. हरसूद और उसके लोक को असल शिकायत उनकी अपनी चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार से है. वह सरकार, जो आम आदमी के विशुध्द वोट से सत्ता में आती है, तो भला वह इस बात की इजाजत कैसे दे सकती है कि कुछ लोगों की रोशनी खुशी के लिए बाकी के घरों को खंडहरों में तब्दील कर दिया जाए. उनसे उनका इतिहास, भूगोल, संस्कृति सब कुछ छीन लिया जाए.

चार बरस पहले 30 जून 2004 को हरसूद खंडहर में तब्दील हुआ था. इस दौरान वहां कुछ नहीं बदला सिवाए दुखों के गहरे होने, सरकार के प्रति गहराते अविश्वास के प्रबल होने के. बीते चार सालों से हर बरसी पर हरसूद के विस्थापित अपने प्यारे शहर को श्रध्दांजलि देते हैं, उसे नमन करते हैं. इस मौके पर बुजुर्गों,विस्थापितों की आंखों में नमी, निराशा उन सभी को व्यथित कर देती है, जो न्याय के शासन में यकीन रखते हैं.

कभी राजा हर्षवर्धन की नगरी रहे स्वर्गीय हरसूद के लोगों ने जो कुछ झेला वह आर्थिक संकटों से अधिक मानवीय अविश्वास का दर्द था. जिन हजारों लोगों को यह भरोसा था कि लोकतंत्र लोक का, लोक के लिए शासन है, यह भरोसा जिस तेजी से ढहा, उससे सबसे अधिक पीड़ा हुई.

जिस तरह से हरसूद के चुने हुए जनप्रतिनिधि हरसूद से भागकर सत्ता के गलियारे में प्रविष्ट हुए वह अधिक दुखदायी था. हरसूद ने देखा होगा कि कैसे उसके वोटों से चुने लोग उसकी चिता को मुखाग्नि देने को व्याकुल थे. आधुनिक विकास के मुरीद ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो विस्थापितों को मिले मुआवजे का बखान करते नहीं अघाते. जो बताते हैं कि कितना पैसा और जमीन मिली.

लेकिन वह उस लाल धरती पर एक रात भी बसर नहीं कर सकते, जो नया छनेरा के नाम पर खदेड़े गए लोगों को मिली. जहां हजारों दलित बच्चे और महिलाएं दूसरों की मेहरबानी पर छोड़ दिए गए. दलित हर जगह दलित होते हैं. व्यवस्थित समाज में उनका उत्पीड़न फिर भी कुछ कम होता है, लेकिन विस्थापन के बाद बिखरे समाज में तो उनके जीवन पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि हरसूद जैसी त्रासदी में भी भ्रष्टाचार के असीम अवसर होते हैं. बानगी देखिए ...दो दर्जन पेड़ों का दो हजार रुपया. एक कुएं का एक सौ बीस रुपया. घर डूब में लेकिन कुंआ नहीं. सब कुछ डूब में, मुआवजा बना ही नहीं.


हरसूद के मामले में सरकार और विपक्ष दोनों एक साथ रहे. पक्ष-विपक्ष को न तो उस समय कुछ गलत लगा और न ही आज कुछ लगता है. यह भी नहीं कि पच्चीस हजार से अधिक लोग सम्मानीय विदाई के हकदार भी नहीं थे. चलो विदाई में गलतियां हुईं तो उसे बाद में सुधारते. लेकिन हरसूद से खदेड़े गए लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. जो जैसा था, अब उससे भी बदतर है. किसान मजदूर हो गए, मजदूर बेगार हो गए. व्यापारी कर्जदार हो गए, कर्जदार फांसी पर झूल गए.

जिस तरीके से हरसूद के विस्थापन के विरोध में लोगों ने पुलिस की पिटाई सही, बुलडोजरों से अपने घरों को टूटते देखा, बुजुर्गों ने अपनी विरासत दफन होते देखी. एक सवाल बार बार सामने आ रहा है कि क्यों लोगों की आस्था हिंसा में बढ़ी है ? हिंसा न्याय पाने का सहारा क्यों बन रही है? सिंगुर और नंदीग्राम इसकी पुष्टि करते हैं, हरसूद इस पर अपनी मुहर लगाता है. नंदीग्राम में कथित बड़े प्रोजेक्ट को आकार नहीं दिया जा सका, क्योंकि वहां की जनता ने शस्त्र उठा लिए. इसे अगर सरलीकरण न माना जाए तो क्या यह गंभीर संकेत नहीं है कि हिंसा से विस्थापन टल गया और हरसूद का शांतिपूर्ण विरोध हार गया. राजस्थान में हिंसक आंदोलन का जीतना और हरसूद के हारने के भविष्य में गंभीर परिणाम हो सकते हैं. बेदखल लोग अगर यह संदेश ग्रहण कर लें कि हक से बेदखली और अपने वजूद को बचाए रखने के लिए हिंसा अपरिहार्य है तो इससे अधिक खतरनाक बात हमारे लोकतंत्र के लिए दूसरी नहीं हो सकती.

 

30.06.2008, 19.44 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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