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अयुद्धा जन्मभूमि में मजहबी युद्ध

मुद्दा

अयुद्धा जन्मभूमि में मजहबी युद्ध

कनक तिवारी

राम भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े योद्धा हैं. रावण से उनका युद्ध एक सामंतवादी, अत्याचारी, बौद्धिक अहंकारी साम्राज्यवाद की ताकत से था. राम ने भील, वानर, दलित, किन्नर, आदिवासी की मदद से उन राक्षसी मूल्यों का नाश किया जो आज फिर अमरीकी सरमाएदारों की छत्रछाया में पनप रहे हैं.

ayodhya


सुप्रीम कोर्ट ने देश को राहत देते हुए एक बार फिर जनता के विवेक को झकझोरने की ऐतिहासिक कोशिश की है. हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथी उस पर भी फब्तियां कस रहे हैं. सभी पक्ष इस संवेदनशील धार्मिक-सांस्कृतिक मसले को राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं. राम इस पूरे मुद्दे के केंद्र में रखे जाते हैं, लेकिन उनका केवल कंधा इस्तेमाल किया जाता है. उनके विवेक, ज्ञान, कर्म और धर्म मीमांसा का भारतीय लोकतंत्र के लिए कोई अर्थ नहीं रह गया है.

एक-एक कर प्याज के छिलकों की तरह यदि तर्कों की बखिया उधेड़ी जाए तो आश्चर्यजनक परिणाम सामने आते हैं.

1. इसमें कहां शक है कि राम का चरित्र भारत में ही पैदा हुआ है. बाल्मीकि संभवत: पहले कवि हैं जिनकी कल्पना या आंखों देखे विवरण से राम का चरित्र लिखा गया है. इतिहास के पास राम का कोई प्रामाणिक ब्यौरा नहीं है. इतिहास लेखन की वैसी कोई परंपरा भारत में नहीं रही है. फिर भी राम को एक मिथक, अवतार या प्रतीक पुरुष मानने के बदले उन्हें अयोध्या में मनुष्य के रूप में जन्मा माना जा रहा है.

2. इसमें भी कोई शक नहीं है कि नए धर्म के रूप में जन्में इस्लाम के अनुयायी सम्राट बाबर भारत में कोई पांच सौ वर्ष पहले आए. बाबर के नाम पर ही बाबरी मस्जिद अयोध्या में बनाई गई थी. वहां पहले राम मंदिर होने की बात कही जा रही है, जिसे मुगल बादशाह के काल में तोड़ दिया जाने का आरोप है.

3. अंगरेजी सल्तनत के भारत में रहते हिन्दू-मुस्लिम पक्षों के विवाद गहराया और अदालती कार्रवाई शुरू भी हुई. अंगरेज ही तो भारत में हिंदू-मुसलमान झगड़ों को लगातार हवा देता रहा है. उसने इस बड़े विवाद का बड़ा फायदा उठाया.

4. राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में कांग्रेस में घुसे संघ परिवारीय तत्वों ने उनसे राम मंदिर के ताले खुलवाकर ऐतिहासिक गलती करवाई. ऐसी ही गलती युवा प्रधानमंत्री से शाहबानो के मामले में संसद के जरिए भी करवाई गई. साफ है कांग्रेस, हिन्दू और मुस्लिम फिरकापरस्तों के सामने घुटने टेकते आई है.

5. पहले भी राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट को राय देने के लिए यह मामला रेफर किया था. सुप्रीम कोर्ट ने कोई राय नहीं देते हुए रेफरेन्स को लौटा दिया था. जस्टिस वर्मा ने ही शिवसेना वाले मामले में हिन्दुत्व को लेकर दक्षिणपंथियों के लिए सहूलियत वाला फैसला दिया था.

6. मौजूदा प्रकरण लखनऊ बेंच में ठीक हालत में नहीं था. एक न्यायाधीश शर्मा ने तो यह भी आरोप लगाया कि उनसे कुछ मुद्दों पर दूसरे दो जजों ने सलाह ही नहीं ली. जस्टिस शर्मा 30 सितंबर को रिटायर भी हो जाएंगे.

संघ परिवार और सुन्नी बोर्ड दोनों हाईकोर्ट से फैसले चाहते हैं, जिसका वे पालन भी करना चाहते हैं? क्या ऐसा वे कर पाएंगे?


7. रमेशचंद्र त्रिपाठी नामक सज्जन यदि इस मामले में कभी पक्षकार नहीं रहे हों तो क्या फर्क पड़ता है. संविधान के अनुच्छेद 21 तथा 32 सहित मूल अधिकारों के परिच्छेद में प्रत्येक भारतीय को अधिकार है कि, वह अपने तथा देशवाशियों के मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाए. इस सिलसिले में हिन्दू-मुस्लिम कठमुल्ला तत्व एक स्वर से त्रिपाठी पर आरोप लगा रहे हैं.

8. सुप्रीम कोर्ट ने अब तक इस विवाद में फूंक-फूंककर ही कदम रखे हैं. वह रवैया जारी है. जस्टिस गोखले ने अंधेरे में तीर मारने की शैली में टिप्पणी जरूरी की है, यद्यपि वह सद्भावनापूर्ण है. दोनों पक्ष पहले से कह रहे हैं कि समझौता अब संभव नहीं है क्योंकि जब पचास, साठ वर्षों में पक्षकारों में समझौता नहीं हो सका तो अब क्या होगा? क्या पुरानी पक्षकार जीवित भी हैं? क्या ऐसी लड़ाइयां सदियों तक चलनी है?

9. संघ परिवार और सुन्नी बोर्ड दोनों हाईकोर्ट से फैसले चाहते हैं, जिसका वे पालन भी करना चाहते हैं? क्या ऐसा वे कर पाएंगे? यदि फैसला मुसलमानों के पक्ष में होता तो बिहार के चुनावों में भाजपा को फायदा नहीं होता? यदि हिन्दुओं के पक्ष में होता तो कश्मीर में क्या होता? आतंकवादी क्या करते? क्या धार्मिक और राजनीतिक नेता कट्टरपंथी तत्वों और अनुयायियों को बेकाबू कर पाते?

10. सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल इतने ज्ञानी क्यों हैं कि उन्होंने मामला पहले फौजदारी बेंच को भेज दिया, फिर बेंच ने ही उसे लौटा दिया. इतने गंभीर मामले में भी यह हालत है जैसी सुरेश कलमाड़ी की कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर है.

11. 28 सितंबर को सभी पक्ष क्या जवाब पेश भी कर पाएंगे या और वक्त मांगेंगे? क्या सुप्रीम कोर्ट 29 सितंबर को ही मामला हाईकोर्ट को भेज पाएगा? क्या रिटायर होने वाले न्यायाधीश शर्मा उसी दिन अंतिम फैसला लिख भी पाएंगे? सुप्रीम कोर्ट ने यदि कुछ सलाह दे दी तो क्या होगा?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sujay Ghosh (sujay_ghosh@hotmail.com) Kolkata

 
 Mr Tiwari, i am just referring an article of Dr. Koenraad Elst. In his book- 'Ayodyha, The Finale' he write that the irresponsible and downright evil campaign of history denial by the secularist opinion-makers has prolonged the Ayodhya dispute by at least a decade. Denouncing all pragmatic deals, these secular fundamentalists insisted on having it their way for the full 100%, meaning the total humiliation of the Hindus. They exercised verbal terror against Rajiv Gandhi, Narasimha Rao and all politicians suspected of wanting to compromise with the Hindu movement, making them postpone the needed steps towards the solution. This way, they exacerbated the tensions in return for the pleasure of indulging their self-image as implacable secularists. A real secularist would have sought to minimize a religious conflict, but this lot insisted on magnifying it and turning it into a national crisis. For them, it was a holy war, a jihad, just as it was for their Islamist pupils and paymasters.

So, the blood of all the people killed in Ayodhya-related riots from 1989 onwards is at least partly on their heads. The spate of violence in Gujarat in 2002, the “genocide” about which they can’t stop talking, and which was triggered by the Godhra massacre of Hindu pilgrims returning from Ayodhya, may well have been a late result of their slanderous effort to identify Ayodhya with deceitful Hindu fanaticism. Those holier-than-thou secularists are not so innocent.

But now, the historical evidence has definitively been verified. After every single historical and archaeological investigation had confirmed the old consensus, the secularists have now been defeated in the final test. The deceit turns out to be their own. Their lies stand exposed and recorded for all to see. Their strategy to sabotage peace and justice in Ayodhya was based on history falsification. With all the blood on their hands, they have disgraced the fair name of secularism. Henceforth, we should be kind enough to ignore them except to hear the confession of their sins.
 
   
 

Abbas mustaq (abbas2010@gmail.com) New Delhi

 
 not only the people in the world filled with infrastructure lives, some people love spirituality and they mean for it so for them it is really a concerned matter. 
   
 

Kumkum Sharma Vladike Platona bb 78000 , Banja Luka, Bosnia and Herzegovina

 
  The Preamble of the Constitution says we should work for "Justice, liberty and equality and to promote fraternity amongst us all and to ensure the integrity and unity of India." This we have not been able to do. In the last two decades, the spirit of fraternity has been damaged to the maximum. The very soul of the Constitution is Article 14: "Equal protection of law and equality before law" is not there at all! A noted expert like Grenville Austin has said in his book Supreme but not infallible that the Supreme Court, the custodian of the Constitution, had failed in implementing Article 14.  
   
 

Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) NOIDA

 
 आपने बहुत तार्किक तरीके से मुद्दों को सामने रखा है. अफसोस की बात ये है कि देश के लोग इन बातों को नहीं समझना चाहते. 
   
 

Navin Joshi (saharanavinjoshi@gmail.com) Nainital

 
 तिवारी जी, लेकिन मसला निपटना भी तो चाहिए. अच्छा हो कि न्यायालय दोनों धर्मों के अगल-बगल या जैसा संभव हो, राम मंदिर और मस्जिद बनाने कि इजाजत देकर हमेशा के लिए इस समस्या को दफना दें.
 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 बहुत प्यारे और करारे सवाल पूछे हैं कनक तिवारी ने!

इस आलेख से साबित हो जाता है कि रामायण और कुरान से इन झगडालू लोगों को कुछ नहीं सीखना है. दर-असल ये लोग मुनाफाखोर भवन-निर्माता की तरह हैं. इन्हें ईंट चिनाई के नाम पर राम या अल्लाह की आड़ में अपने अहंकार की इमारत ही बनानी है. जिस देश में अभी तक किसी मोहल्ले में ठीक-सा सार्वजनिक शौचालय तक नहीं टिक पाटा, वहाँ एक इमारत के लिए ज़िन्दगी लगा देने वाले लोगों के अहंकार को आसानी से समझा जा सकता है. धर्म या मजहब के नाम ही अलग हैं, भीतर एक जैसा खून खौल रहा है. दोनों तरफ के जो नौजवान भीतर से बूढ़े होकर मरने-मारने को तैयार नहीं बैठे हैं, और रंगे सियारों के हाथों मुर्दा नहीं बना दिए गए हैं, उन्हें चाहिए की पूरे जोर से चिल्लाएं: "हमें नफरतों के हाथों चीनी जाने वाली कोई भी इकतरफा ईंट या इमारत नहीं चाहिए. अपना सर फोड़ लो अपनी ईंटों से !"

वर्ना फैसला कोई भी आएगा, हमें यह देश राम-भरोसे या अल्लाह की मर्ज़ी पर छोड़ देना पड़ेगा. यानी हम खुदा या कायनात के ऐसे बन्दे कहलाने लायक नहीं बचेंगे, जो सही फैसले लेने या उन्हें मान लेने वाले इंसान कहला सकें. अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद से लेकर आज की तारीख तक नए लड़के-लड़कियों से मुखातिब मुहम्मद रफ़ी का एक गीत गूंजता आया है : "तू हिन्दू बनेगा, न मुसलमान बनेगा; इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा."

है कोई इंसान की औलाद ? अगर नहीं है, तो इकट्ठे होकर मुहम्मद रफ़ी के खिलाफ मान-हानि का मुकदमा तो चला ही सकते हो, चतुर-चालाको.
 
   
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