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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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वेदांता, गोदावरी और विश्वसनीय छत्तीसगढ़

मुद्दा

 

वेदांता, गोदावरी और विश्वसनीय छत्तीसगढ़

दिवाकर मुक्तिबोध रायपुर से

22 सितम्बर की दो खबरें गंभीर एवं उद्वेलित करने वाली हैं. पहली खबर है वेदांता चिमनी हादसे में मृत श्रमिकों के आश्रितों को अब तक नौकरी नहीं मिली जबकि राज्य की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना में 41 से अधिक मजदूर मारे गए थे. इस दुर्घटना को 23 सितम्बर 2010 को एक वर्ष पूर्ण हो गए.

vedanta-chhattisgarh


इस खबर के बाद विचलित करने वाली दूसरी खबर है. गोदावरी पावर एवं इस्पात संयंत्र में घटित दुर्घटना के लिए प्रबंधक को दोषी मानते हुए रायपुर के श्रम न्यायालय ने दो मामलों में उन्हें तीन-तीन महीने की सजा सुनाई. यह दुर्घटना दो वर्ष पूर्व 12 जनवरी 2008 को घटित हुई थी, जिसमें 8 श्रमिक मारे गए थे. उस दिन संयंत्र में कार्यरत श्रमिकों के उपर गर्म राख का पहाड़ गिर पड़ा, जिसकी चपेट में 8 श्रमिक आए और जाहिर है, वे भस्म हो गए. इन बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाओं का अंतत: नतीजा क्या निकला?

कोरबा चिमनी हादसे में तो अभी फैसला आना बाकी है लेकिन गोदावरी पावर एवं इस्पात संयंत्र में घटित दुर्घटना के लिए सिर्फ तीन महीने की सजा और वह भी ढाल की तरह इस्तेमाल किए गए नौकर को? 8 श्रमिकों की जान गई और दंड इतना कम? क्या यही है विश्वसनीय छत्तीसगढ़? तेजी से औद्योगिक प्रगति करता छत्तीसगढ़ जहां श्रमिकों के खून से कथित औद्योगिक बुलंदियों की इबारत लिखी जा रही है? कहां हैं राज्य सरकार, कहां हैं प्रशासन? कहां हैं श्रमिकों के रहनुमा श्रमिक नेता और उनके संगठन?

दसवीं वर्षगांठ मनाने जा रहे राज्य के औद्योगिक इतिहास में इससे बड़ी विद्रूपता और क्या होगी कि कोरबा चिमनी हादसे के लिए आरोपित चीनी अधिकारियों की न्यायालय में जमानत मजदूरों ने ली और ऐसे मजदूरों ने जो गरीब हैं, बेहद गरीब. क्या छत्तीसगढ़ इसी तौर-तरीके से आगे बढ़ेगा? क्या ऐसा राज्य बनेगा जहां केवल कुछ हजार पूंजीपतियों का साम्राज्य होगा तथा गरीब और गरीब होता जाएगा. लक्षण तो कुछ ऐसे ही नजर आ रहे हैं. दोनों खबरें इसीलिए संवेदनशील जमात के लिए व्याकुल करने वाली हैं.

दरअसल 1 नवम्बर 2000 को नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के बाद राज्य के नीति निर्धारकों ने कल्पना की जो उड़ानें भरीं वे जमीनी हकीकत से काफी दूर थीं. हर क्षेत्र में सीधे आसमान को छूने की ललक ने प्रगति के साथ विसंगतियों का भी अम्बार खड़ा कर दिया जिसका दुष्परिणाम अनेक रूपों में सामने आ रहा है लेकिन उनकी और दुर्लक्ष्य करके ढिंढोरा केवल विकास का पीटा जाता है.

23 सितम्बर 2009 को निर्माणाधीन 225 फीट ऊंची चिमनी के धराशायी होने से 41 श्रमिक मारे गए और उनके आश्रितों में से कुछ को नौकरी मिल पाई. शेष अभी भी आस लगाए बैठे हैं.


भाजपा शासन के इन 7 वर्षों में यदि उद्योग के क्षेत्र में जबर्दस्त प्रगति हुई है और इस्पात बनाने वाली 20 कम्पनियों ने छत्तीसगढ में 427.61 अरब रुपए के निवेश के लिए राज्य सरकार के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं तो श्रमिकों का कितना भला हुआ है? क्या बेरोजगारों की फौज कम हुई? क्या श्रमिकों के हित में श्रम कानूनों का पालन सख्ती से किया गया? क्या औद्योगिक सुरक्षा के माकूल बंदोबस्त किए गए तथा उन पर निगरानी रखी गयी? दुर्घटना की स्थिति में क्या उनके परिवारों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी सुनिश्चित की गयी?

यदि ऐसा हुआ होता तो तो गोदावरी हादसे में मृत 8 श्रमिकों के परिवारों की परवाह की जाती, दुर्घटना के लिए केवल प्रबंधक को बलि का बकरा नहीं बनाया जाता. उसे सिर्फ तीन महीने सजा नहीं मिलती और उसके साथ संचालकों की गर्दन भी नापी जाती. अदालतें सबूत मांगती हैं तथा उसके आधार पर फैसला सुनाया जाता है. श्रम न्यायालय ने भी यही किया. कानून मजबूत है लेकिन केस को कमजोर बनाना आसान है. और यदि बड़ा उद्योग समूह हो और दुर्घटना कितनी भी बडी क्यों न हो, संचालकों पर कोई आंच नहीं आती.

गोदावरी इस्पात संयंत्र से कई गुना बड़ा वेदांता है. 23 सितम्बर 2009 को निर्माणाधीन 225 फीट ऊंची चिमनी के धराशायी होने से 41 श्रमिक मारे गए और उनके आश्रितों में से कुछ को नौकरी मिल पाई. शेष अभी भी आस लगाए बैठे हैं. यह सोचने की बात है कि मौत के मुआवजे में मिली राशि से क्या 5 सदस्यों के एक परिवार की ताउम्र जिंदगी चल सकती है? क्या कम्पनी प्रबंधन एवं जिला प्रशासन ने कभी इन परिवारों की सुध ली?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

bloodredab korba

 
 being in Korba have seen this disaster. Count of 41 is no where, it was over 100, believe me. China has killed our people in our land and still enjoying the guest of honor treatment in hospitals. 
   
 

Sujay Ghosh (sujay_ghosh@hotmail.com) Kolkata

 
 छत्तीसगढ़ के मजदूर यूं ही मारे जाते रहेंगे औऱ सरकार इनको मार डालने वालों के साथ गलबहियां डाले घूमते रहेंगी, दावतें करती रहेगी. 
   
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad/Jaunpur

 
 छत्तीसगढ़ हो या झारखण्ड मरना तो गरीब मज़दूरों को ही है,इंडस्ट्रीयललिस्ट और नेता नहीं मरेगा. पहले बड़े घड़ियाल इन्हें निगल रहे थे अब और बड़े आ गए है. जब छोटा राज्य बना तब.रही बात न्याय की तो वह तो इन्हें कभी नहीं मिलेगा क्योंकि जो न्याय देने के लिए तैनात है 'मज़दूर और मजबूर का मरना' या मर जाना ही उन्हें शुकून देता है क्योंकि वह जानते है..ये बड़े शौक से यह कहते हुए मरे होंगे-

मै अब विदा लेता हूँ मेरी दोस्त/ मुझमे जीने की बहुत चाह थी/ तुम मेरे भी हिस्से का जी लेना मेरी दोस्त/..सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना/तड़प का न होना/ सब कुछ सहन कर जाना/ घर से निकलना काम पर/ और काम से लौटकर घर आना/सबसे ख़तरनाक होता है/ हमारे सपनों का मर जाना/ सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है/ आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो/ आपकी नज़र में रुकी होती है/ सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है/ जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है/ और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है/ सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है/ जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है....
(अवतार सिंह पाश)
अतः इनके हालत पर रोना आया !
 
   
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