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बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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यह सबके लिये चेतावनी है

 
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लोहिया की लड़ाई का रास्ता

स्मरण

लोहिया की लड़ाई का रास्ता

रघु ठाकुर

लोहिया आम आदमी के प्रवक्ता थे. वे आम व खास का फर्क मिटाना चाहते थे तथा गरीब के मन में विषमता के प्रति आक्रोश पैदा कर उसे बदलाव व परिवर्तन की लड़ाई के लिये तैयार करना चाहते थे. उनके चिंतन का मूल आधार ही भेदभाव के खिलाफ संघर्ष और संघर्षशील मन तैयार करने का था. वे सबसे कमजोर व्यक्ति के मन में सिविल नाफरमानी या सविनय अवज्ञा के अहिंसक हथियारों के प्रति विश्वास तथा इनके प्रयोग के लिये आदत बनाना चाहते थे.

राम मनोहर लोहिया


लोहिया समग्र परिवर्तन में विश्वास रखते थे. उनके ही शब्दों में '' हिन्दुस्तान की सामान्य जनता, मामूली लोग अपने में भरोसा करना शुरू करें कि कल तक जो अंग्रेजी राज था, वह पाजी बन गया तो उसे खत्म किया. आज कांग्रेसी सरकार है वह पाजी बन गई तो उसे खत्म करेंगे. कल मान लो कम्यूनिस्ट सरकार बने व पाजी बन जाये तो उसे भी खत्म करेंगे. परसों सोशलिस्ट सरकार बनेगी, मान लो वह भी पाजी बन जाये तो उसे भी खत्म करेंगे. जिस तरह तवे पर रोटी उलटते-पलटते सेंक लेते हैं, उसी तरह हिन्दुस्तान की सरकार को उलटते-पलटते ईमानदार बनाकर छोड़ेंगे. यह भरोसा किसी तरह हिन्दुस्तान की जनता में आ जाये तो फिर रंग आ जायेगा राजनीति में. ''

लोहिया आम आदमी को लड़ना सिखाकर राजनैतिक परिवर्तन की क्रिया को तेज करना चाहते थे. उनके ही शब्दों में '' बिना हथियारों के अन्याय से लड़ने का तरीका निकालना पड़ेगा. इसका तरीका निकला भी है. सिविल नाफरमानी की क्रिया में न्याय और समता प्राप्त करने की उस मनुष्य की अदम्य प्रवृत्ति प्रकट होती है, जिसके हाथ में हथियार नही है. हथियारों के खात्मे की तरह गरीबी का अंत भी अपने आप नही हो जायेगा. दोनों के लिये लगन के साथ यत्न करना पड़ेगा. हथियार और गरीबी में गरीबी बिलाशक ज्यादा मारक रोग है. ''

लोहिया का हर संघर्ष आम आदमी से जुड़ा हुआ था और आम आदमी का विश्वास जगाने आम और विशेष का फर्क मिटाने, आदमी में आत्म विश्वास और साहस पैदा करने के लिये था. लोहिया बम्बई की यात्रा पर थे और जिस मकान में ठहरे हुए थे, उस मकान के सामने बम्बई की झोपड़ पट्टी के लोग सार्वजनिक नल के सामने लाईन लगाये थे तथा परेशान महिलायें नजर आयीं.

लोहिया ने अपने साथियों से सवाल पूछा कि उन्हें संगठित कौन करेगा ? एक विचारधारा और पार्टी का आधार ऐसे संगठन ही हो सकते है. श्रीमती मृणाल गोरे ने यह जबाबदारी स्वीकार की और बम्बई के झोपड़ पट्टी वालों को संगठित करना शुरू किया तथा पानी के लिये परेशान महिलाओं को संगठित कर सड़कों पर निकलना शुरू किया. कुछ ही समय में मृणाल ताई बम्बई की ‘पानी वाली ताई’ बन गई और बम्बई के उन गरीब आम असंगठित लोगों ने लड़ना सीख लिया, जो मायानगरी की माया के डर से घरों से निकलते नही थे.

उ.प्र. में जब तत्कालीन राज्य सरकार ने सिंचाई की दरें बढ़ाई तब लोहिया ने इस दर वृद्धि के खिलाफ किसानों का आंदोलन शुरू कराया, जिसे नहर रेट आंदोलन कहा गया. उसी आंदोलन की अगुवाई के चलते अर्जुनसिंह भदौरिया को कमाण्डर की उपाधि दी गई और इसी आंदोलन का परिणाम था कि मुलायम सिंह यादव जैसे लोग कमाण्डर साहब का झोला उठाकर एक अति गरीब परिवार से निकलकर आज की पहचान हासिल कर सके.

इस किसान आंदोलन में स्वयं डॉ. राममनोहर लोहिया लम्बे समय जेल में रहे और उ.प्र. में सैकड़ों किसानों को राजनैतिक कार्यकर्ता और नेता बना दिया. जन समस्या के साथ-साथ नये नेतृत्व को गढ़ने की उनकी कला अद्भुत थी, जो आम आदमी को स्वत: नेतृत्व की क्षमता का विश्वास लेकर नेता बनाती थी.

जब वे अमरीका की यात्रा पर गये और उन्हे काले होने के कारण होटल में प्रवेश से रोका गया तो उन्होने दिल्ली लौटकर संसद में उठाने का इंतजार नही किया बल्कि वहीं विरोध कर गिरप्तारी दी.


देश में आदिवासियों की जमीन के सवाल को आजादी के बाद सबसे पहले लोहिया ने ही उठाया और तत्कालीन रायपुर जिले से 150 किमी दूर के घने जंगल के गाँव उमरादिहान में जमीन पर खेती करने का आंदोलन चलाया. हजारों बेरोजगार आदिवासियों के लिये यह जमीन की ''मांग जमीन'' का आंदोलन बन गया.

रायपुर के सुदुर क्षेत्रों से लेकर बस्तर तक सैकड़ों गाँव के आदिवासी खेती के लिये जमीन की मांग को लेकर संघर्ष के लिये सड़कों पर निकल पड़े. तीन-तीन पीढ़ियाँ उनकी जेलों में जा चुकी है. हजारों लोग जमीन के मालिक बन चुके हैं. वन भूमि अधिकार विधेयक जो सन् 2006 में भारतीय संसद में पारित हुआ, उसका वास्तविक बीज लोहिया ने ही डाला था.

बस्तर में जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार के इशारे पर बस्तर के शासक प्रवीर चन्द्र भंजदेव और उनके साथ बड़ी संख्या में आदिवासियों को गोली से भून दिया गया तब डॉ. लोहिया के निर्देश पर स्व. लाडली मोहन निगम बस्तर पहुँचे. जहाँ सरकार ने उन्हे झूठे मुकदमे के अंर्तगत धारा 302 ताजेराते हिन्द का मुलजिम बनाकर जेल में डाल दिया. बाद में लोहिया जी बस्तर के दौरे पर गये और उन्होने बस्तर के गोलीकांड को व्यापक स्तर पर संसद में उठाया. वह पुलिस के शिकार आम आदमी और भारत का लोकतांत्रिक मंदिर कहे जाने वाली संस्था संसद के भविष्य को लेकर था.

बम्बई के टैक्सी ड्राईवरों की हड़ताल में लोहिया शामिल हुए और बम्बई के होटल मजदूरों का जब पहला संगठन बना, जिसे तोड़ने के लिये बम्बई के होटल मालिकों ने उनके नेताओं को निकाल दिया.तब एक बार नही अनेक बार लोहिया उनके साथ छोटे-छोटे कम संख्या वाले धरना प्रर्दशनों में शामिल हुए.

लोहिया जहाँ अन्याय, वहीं प्रतिकार के सिद्धांत को प्रयोग में लाते थे. वे किसी घटना के बाद उसके लिये लम्बी तैयारी के बजाय तत्काल संघर्ष शुरू करने में विश्वास रखते थे. इसीलिये जब वे अमरीका की यात्रा पर गये और उन्हे काले होने के कारण होटल में प्रवेश से रोका गया तो उन्होने दिल्ली लौटकर संसद में उठाने का इंतजार नही किया बल्कि वहीं विरोध कर गिरप्तारी दी.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Ajay Singh (ajay.singh_patna@rediffmail.com) Kankadbagh, Patna

 
 आज की तारीख में लोहिया की प्रासंगिकता बढ़ गई है लेकिन यह दुखद है कि देश की संसद में सबसे अधिक तथाकथित समाजवादी बैठे हैं और देश लोहिया के ठीक उल्टा चल रहा है. लालू से लेकर शरद बाबू तक अपने को समाजवादी और लोहिया जा का चेला कहते हुये शर्माते नहीं हैं. रघु जी, कभी संभव हो तो लोहिया के चेलों के पतन पर भी कुछ प्रकाश डालें. 
   
 

Suman Kirti (suman.2010@hotmail.com) Kolkata

 
 रघु ठाकुर जी ने बहुत विस्तार से लिखा है और जिस तरीके से उन्होंने विवेचना की है, उससे समझ में आता है कि लोहिया आधुनिक भारत के पहले ऐसे मौलिक चिंतक थे, जिन्होंने देशज तरीके से समस्याओं को हल करने की दिशा में चिंतन किया. यह भी प्रेरणादायी है कि लोहिया केवल बंद कमरों की बौद्धिक राजनीति में विश्वास नहीं करते थे, लगातार संघर्ष करने का हौसला और इस पर अमल भी उनके जीवन का हिस्सा था. 
   
 

Raghu Thakur (socialistraghu@gmail.com) India

 
 1. शैलेन्द्र जी, डॉ लोहिया निजी यात्रा पर गोवा गए थे, जहां उन्होंने अपनी सभा से रोकने के गोवा सरकार के आदेश को नहीं माना और गिरफ़्तारी दी. उनकी गिरफ़्तारी के बाद महात्मा गाँधी ने सार्वजनिक रूप से बयान देकर न केवल लोहिया की गिरफ़्तारी का विरोध किया बल्कि गोवा की आज़ादी का समर्थन भी किया. आशा है आप इस तथ्य को अपने विद्वत लेख में शामिल करेंगे.
2. प्रभाकर जी आपकी जानकारी पूरी तरह गलत और द्वेषपूर्ण भी है. लोहिया ने कभी भी मनुस्मृति का समर्थन नहीं किया. आप लोहिया की जातिप्रथा पुस्तक पढ़ सकते हैं. लोहिया और आंबेडकर की सामाजिक दृष्टि लगभग एक-सी है. लोहिया ने कभी भी हिटलर का न तो समर्थन किया और न धरना दिया. कृपया अपनी जानकारी के स्त्रोत बताएं ताकि हम भी ज्ञानवर्धन कर सकें अन्यथा झूठी प्रतिक्रिया बंद करें.
 
   
 

ravi singh (singhravimj@gmail.com)

 
 सही है रघु जी. आज तो समाजवादी बहुत कम बचे है. गरीबी हटाओ के जगह अब गरीबों को हटाया जा रहा है. हम सभी देखते हुए भी चुप हैं. क्यों न अगर इस पर भी विमर्श किया जाये तो बढ़िया होगा. वैसे आज जरुरत इस बात की है की हम अपना मुह खोले और कुछ बोलने का हिम्मत दिखाए. वरना समय तो बीत ही रहा है और देश भी विकसित हो रहा है.पर अपनी आत्मा से विकास का सच भी पूछने से हमें परहेज नहीं करना चाहिए. रवि,रांची - 08986800740 
   
 

arun patel bhopal

 
 इस बात का आज तक इंतजार है कि जनता ईमानदार सरकार बना कर छोड़े और राजनीति में नया रंग लाए. रघु जी का लेख अच्छा है. 
   
 

Prabhakar (rakesh1936@gmail.com) Agra

 
 हुज़ूर, जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़(?) लड़ने वाले लोहिया मनुस्मृति के बड़े प्रशंसक थे। और हां, लोहिया ने ही हिटलर के समर्थन में धरना भी दिया था। तो अंग्रेजी की जगह मनुवादी-ब्राह्मणशाही हिन्दी और साम्राज्यवाद की जगह तानाशाही? व्हाट एन आईडिया सर जी!  
   
 

Hitendra Patel (hittisaba@gmail.com) Kolkata

 
 पसंद आया. यह बहुत ही ज़रूरी बात है लोहिया के सन्दर्भ में की वे तुरंत और तत्काल पर महत्त्व देते थे. 
   
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