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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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भगतसिंहः जीवन की उद्दाम लय

स्मरण

 

भगतसिंहः जीवन की उद्दाम लय

कनक तिवारी

Bhagat-singh-handwriting















भगतसिंह का जीवन प्रकाश की तरह उजला और सूरज के ताप की तरह उष्ण था. अध्ययन और अध्यवसाय के बिना क्रांति की कोई भी कल्पना उन्होंने नहीं की. किसान मजदूर और विद्यार्थी उनके लिए क्रांति के आधार थे. वे अनोखे और मौलिक नेता थे.

अनोखे इसलिए कि वे किसी लीक पर नहीं चले. उन्होंने भारतीय क्रांति और स्वतंत्रता-युद्ध के मूल्य स्थिर और विकसित करने में परंपरावादी राजनीतिशास्त्र का मुखौटा नहीं लगाया. वे समर्पित नौजवानों की एक बड़ी टीम बनाए जाने के पक्षधर थे जो इन राजनीतिक आदर्शों के सपने को यथार्थ में तब्दील कर सके. उनके बहुत से साथी तार्किक दृष्टि से सम्पन्न और समान बौद्धिक घनत्व के थे. लेकिन विचार और कर्म के समन्वय को ध्रुव तारे की तरह आकाश में टांक देने की भगतसिंह की बौद्धिक कुशलता उन्हें इतिहास में ईर्ष्या योग्य बनाती है. उनमें खतरों से खेलने का रूमानी एडवेंचर शुरुआत में भले रहा हो, बाद की वैचारिक प्रौढ़ता गाढ़े वक्त हिन्दुस्तान की आजादी को लेकर बहुत काम आई.

समाजवाद और साम्यवाद के प्रति गहरा झुकाव उन्हें क्रान्तिकारी आन्दोलन की बौद्धिकता का भगवतीचरण वोहरा तथा शचीन्द्र नाथ सान्याल की तरह जिज्ञासु शिल्पकार बनाता है. यह कहना लेकिन तथ्यात्मकता के प्रतिकूल है कि भगतसिंह का पहला चयन साम्यवाद के प्रति समर्थन था. समाजवाद के सिद्धान्तों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का इतिहास गहन छानबीन का विषय है. इस महान वैचारिक नवयुवक को लेकर लाल या भगवा फतवा आसानी से नहीं दिया जा सकता. उनकी वास्तविक पहचान स्वतंत्रता आंदोलन के निकष का जरूरी अंश है.

उनके साथी भगवानदास माहौर के अनुसार भगतसिंह ने उन्हें बाकुनिन की पुस्तक 'दी गॉड एन्ड दी स्टेट' पढ़ने को दी थी. उन्होंने माहौर को मार्क्स की 'केपिटल' भी पढ़ने को दी लेकिन बकौल माहौर वह उनके पल्ले नहीं पड़ी. माहौर के अनुसार अपनी समाजवादी प्रतिबद्धताओं के बावजूद “भगतसिंह समाजवाद के अच्छे पंडित नहीं थे. परन्तु भगतसिंह की विशेष क्रान्तिकारी देन यही है कि उनके समय से क्रान्तिकारियों का आर्दश समाजवादोन्मुख हो गया.”

भगतसिंह ने पूरी तौर पर सशस्त्र क्रांति को खारिज भी नहीं किया. लेकिन उन्होंने साफ कहा कि सशस्त्र क्रांति उस समय ही अनिवार्य विकल्प है, जब जनता पूरी तौर पर क्रांति के नियामक मूल्यों के लिए सुशिक्षित हो जाए. यक्ष प्रश्न यह है कि क्या भगतसिंह और उनके साथियों का हिंसा में तात्विक विश्वास था? सीधा उत्तर है-नहीं.

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सशस्त्र क्रांति का समर्थन भगतसिंह की थ्योरी में हिंसा का समर्थन नहीं है. दरअसल असेंबली में भगतसिंह और दत्त ने बम नहीं, क्रांति के अग्निमय शोलों से लकदक लाल परचे फेंके, जो किसी भी मुर्दा कौम में बगावत के स्फुलिंग भर सकते हैं. वह ब्रिटिश सम्राज्यवाद को भारतीय युवकों की एक प्रतीकात्मक चुनौती थी. फांसी की सजा के पहले उनके जैसा बेहतर बयान आज तक किसी राजनीतिक कैदी ने वैधानिक इतिहास में नहीं दिया.

भगतसिंह के साथियों का पूरा जीवन धर्म निरपेक्षता को परवान चढ़ाते बीता. भगतसिंह हिन्दुस्तान के पहले महत्वपूर्ण वैचारिक थे जो पूरी तौर पर प्रचलित मजहबी रूढ़ियों के दायरों से बाहर थे.

1931 के पहले से यह भगतसिंह का इतिहास को उद्बोधन था कि गरीब के लिए इंकलाब और आर्थिक बराबरी लाने, समाजवाद को साकार करने, देश का निर्माण करने, चरित्र के नये आयाम गढ़ने तथा दुनिया में हिन्दुस्तान का यश रेखांकित करने के लिए मजहबों के अहसान की जरूरत नहीं होनी चाहिए. ऐसी चुनौतियों का जवाब इक्कीसवीं सदी भी ढूंढ़ नहीं पा रही है.

शहादत के अस्सी वर्ष बीत जाने पर भी दुनिया और भारत उन्हीं सवालों से जूझ रहे हैं जिन्हें भगतसिंह ने वक्त की स्लेट पर स्थायी इबारत की तरह उकेरा था. साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, अधिनायकवाद और तानाशाहियां अपने जबड़े में लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, सर्वहारा और पूरे भविष्य को फंसाकर लीलने के लिए तत्पर हैं. वे भविष्यमूलक इबारत गढ़ रहे थे.

उन्होंने जो कुछ पढ़ा, अधिकांश अंग्रेजी और पंजाबी में, लेकिन जो कुछ लिखा और बोला उसका अधिकांश हिन्दी में. यह भगतसिंह की नए भारत के बारे में सोच है. इसकी डींग उन्होंने नहीं मारी. हिंदी वांग्मय में अपना स्थान सुरक्षित करने के लिए भगतसिंह के यश को वर्षों तक इंतजार करना पड़ा.

जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय और यशपाल वगैरह के साहित्य में भगतसिंह और क्रांति आंदोलन रेखांकित है. यद्यपि उसे पूरी तौर पर भगतसिंह के व्यक्तित्व का चित्रण नहीं कहा जा सकता. अज्ञेय और यशपाल तो क्रांतिकारी भी रहे हैं. इसके बावजूद जिस धारदार गद्य की उनसे अपेक्षा थी वह दिखाई नहीं पड़ता. अज्ञेय धीरे-धीरे आभिजात्यपूर्ण और कुलीन होते गए थे. यशपाल पर क्रांतिकारी आंदोलन में विवादग्रस्त भूमिका अदा किए जाने का आरोप है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) MYSTIC HIMALAYAS

 
 भगत सिंह को समझना उन लोगों के वश की बात नहीं है जो दूसरों की मौत में अपनी ज़िन्दगी की तलाश करते हैं. कनक तिवारी सही कहते हैं कि "हिंदी वांग्मय में अपना स्थान सुरक्षित करने के लिए भगत सिंह के यश को वर्षों इंतज़ार करना पड़ा."

सच यह भी है कि सच प्रतीक्षा नहीं करता, मगर सच को समझने में ज़माने इन्तजार करते हैं. भीड़ में जीने वालों के होश ठिकाने आने में ज़माने लगते हैं. जो नौजवान अपनी जान बचाने वाले हर उपाय की धज्जियां उदा दे और फांसी रुकवाने की कोशिश में लगे अपने पिता और जेल से निकाल ले जाने को समर्थ अपने साथियों की तरकीब को मिटटी में मिला दे, उस नौजवान को वे लोग कैसे समझ सकते हैं, जो ईंटों की पाखंडी चिनाई करने और उन ईंटों को गिराने में लगे रहते हैं और ज़िन्दगी को नपुंसक लोगों के हाथों बेच कर अपने देश के लोगों का खून बहाने के लिए संगठित होते हैं ?

सच तो यह है कि भगत सिंह को वे लोग कभी नहीं समझ सके जो मार्क्सवाद के किताबी चश्मे के बिना कुछ देख ही नहीं सकते. आँखें ही फूट गिन हैं. अब वह "भगत सिंह" साकार होने को ही है जो हिन्दू और मुसलमान के गिरोह बना कर फसाद कराने वालों को मिटटी में मिलाने के लिए कभी भी फांसी चढ़ने को तैयार है.
 
   
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