मरते ग़रीब और मिटती ग़रीबी
मुद्दा
मरते ग़रीब और मिटती ग़रीबी
आलोक तोमर
दक्षिण राजस्थान के चंपाखेड़ा गांव में पैतालीस साल के किशन सिंह से भूख बर्दाश्त
नहीं हुई और उनकी जान चली गई. वैसे भी उनकी ज़िंदगी में कोई बहुत आकर्षण नहीं था. न
ज़मीन थी न घर और मजदूरी मिल नहीं रही थी.
उनके पास उनके और उनकी पत्नी गंगा के नाम राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना
यानी मनरेगा का रोजगार कार्ड ज़रूर था मगर उन्हें किसी ने नहीं बताया था कि भारत की
सरकार ने उन पर यह महिमा बरसाई है कि उन्हें साल में सौ दिन रोजगार ज़रूर मिलेगा.
बाकी के दो सौ पैसठ दिन ये ग़रीब कहां से खाएंगे, इसकी चिंता सरकार क्यों करेगी?
जो रोजगार कार्ड उन्हें दिए भी गए हैं, वे बताते हैं कि किशन सिंह की पत्नी गंगा ने
एक अगस्त से ले कर तीस सितंबर तक 27 दिन काम किया था और इस हिसाब से 73 दिन का
रोजगार उसके हिस्से में अब भी बचता है. गंगा को भी मनरेगा का पता नहीं था मगर यह
पता था कि उसे सरकार ने काम दिया है. इसीलिए उसने अपना सौ दिन के रोजगार का अधिकार
नहीं मांगा.
सरकार नोट बांटने और सरकारी व गैर सरकारी दलाल उन्हें हड़पने और हजम करने में इतने
व्यस्त हैं कि वे किसानों को क्यों बताएं कि आखिर केंद्र सरकार ने राज्य सरकार के
जरिए उनके कल्याण के लिए क्या-क्या अनिवार्यताएं तय की है.
चंपाखेड़ा भीलवाड़ा जिले में हैं, जहां की जनता ने सीपी जोशी को सांसद बना कर भेजा है
और वे भारत सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री के नाते मनरेगा और अन्य कल्याणकारी
योजनाओं के लिए भाग्य विधाता है.
यह एक दिल कचोटने वाला संयोग हैं कि किशन सिंह की मौत जिस दिन हुई उस दिन पूरा देश
क्रिसमस की पार्टियां कर रहा था.
कई संगठनों और खुद सरकार ने भी मनरेगा के पालन पर जांच की और पाया कि गांवों तक इस
योजना की जानकारी तक ठीक से नहीं पहुंची हैं, मदद की बात करना तो अलग बात है.
चितौड़गढ़ उदयपुर राजमार्ग पर मनरेगा के बोर्ड लगाए गए हैं मगर राजमार्गों तक पहुंचने
की जिनकी हैसियत होती है, वे भूखे नहीं मरते. वैसे भी यह कहानी सिर्फ राजस्थान की
नहीं हैं. देश और समाज के दलालों को गरीबों के नाम पर खुद के लिए कुबेर का खजाना
मिल गया है और लूट जारी है. बेचारे सीपी जोशी कहां कहां जांच करते फिरेंगे. उनके
जिम्मे प्रदेश कांग्रेस और देश की क्रिकेट का भी काम है.
भारत सरकार के पास इस बात के सबूत बड़ी संख्या में मौजूद हैं कि पहले नरेगा और फिर
मनरेगा में दबा कर भ्रष्टाचार चल रहा है. महात्मा गांधी का नाम जोड़ने से कोई फर्क
नहीं पड़ा. आखिर महात्मा गांधी के गुजरात में भी शराब बिकती है और मनरेगा की दलाली
में जो नोट मिलते हैं, उन सब पर महात्मा गांधी छपे होते हैं. इस देश में बच्चा होना
ही भला है. स्कूल में नाम लिखवाओ तो कम से कम दोपहर को जैसा भी है, कुछ खाना तो मिल
जाता है.
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कागजों पर बनाई गई योजनाओं की तरह यह भी कम चमकदार नहीं दिखती थीं.
लेकिन जल्दी ही इनकी चमक धुंधली पड़ती चली गई. |
इन बच्चों का भविष्य भी एक पहेली है. अपवाद होते हैं और इस बात के उदाहरण भी हैं कि
लोग मिट्टी से उठ कर आसमान भी छूते हैं. मगर इस आसमान में राजनीति की जो रंगीन
पतंगे उड़ रही हैं, वे गरीबों की डोर काटने के लिए हमेशा उत्सुक जान पड़ती हैं. यही
वजह है कि न गरीबी की सीमा रेखा का आंकड़ा बदल रहा है और न उस आंकड़े को बदलने वाले
आंकड़े बदल रहे हैं.
सांसदों और अफसरों ने अपनी पगार मनचाहे तरीके से बढ़ा ली है, उनके बच्चे अंग्रेज़ी
स्कूलों में पढ़ते हैं और टिफिन के अलावा तीन-चार सौ रुपये का जेब खर्च भी ले जाते
हैं. ज़ाहिर है कि उन्हें, अगर वे कभी ग़रीब भी रहे हों तो अपने उस ज़माने की कोई
याद नहीं. उन्हें कोई रोजगार कार्ड नहीं चाहिए .
हाशिए पर पड़े समाज के वर्गों के लिए जब यह योजना बनाई गई थी तो चमकदार कागजों पर
बनाई गई योजनाओं की तरह यह भी कम चमकदार नहीं दिखती थीं. लेकिन जल्दी ही इनकी चमक
धुंधली पड़ती चली गई.
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सरकार किसी भी तर्क से 26 फीसदी से ज़्यादा लोगों को देश में गरीबी की रेखा के नीचे
मानने को तैयार नहीं है. मगर पचास प्रतिशत आबादी को नरेगा या मनरेगा में शामिल किया
गया था. 29.4 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 24.1 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोगों को
मिला कर लगभग पचास फीसदी आबादी को साल में लगभग सौ दिन रोजगार की गारंटी हो गई.
श्रम कल्याण मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि जिनको वास्तव में रोजगार मिल पा रहा
है, उनमें सबसे बड़ी संख्या अप्रशिक्षित मजदूरों की है. योजना लागू होते ही दावा
किया गया कि ढाई करोड़ परिवारों के लोगों को 85 करोड़ 70 लाख दिनों का रोजगार दे दिया
गया.
इतने श्रम दिवसों की गिनती अगर वर्षों में की जाए तो हम भक्तिकाल तक पहुंच जाएंगे.
मगर देश का ढांचा बदलता हुआ नहीं दिखता. ये श्रम दिवस ज़्यादातर फाइलों तक और
अदृश्य और अज्ञात नामों तक ही सीमित हैं. दोषियों को सूली पर लटकाने का कोई इंतजाम
अभी तक नहीं हुआ है.
जैसा कि योजना में प्रावधान था, ग्रामीणों को भुगतान करने के लिए 2 करोड़ 71 लाख नए
बैंक खाते फौरन बगैर किसी भुगतान के खोल दिए गए. इनमें से आधे से ज़्यादा खातों में
आज तक कभी पैसा जमा नहीं हुआ और अब तो सारी बैंकों में कंप्यूटर है, ज़्यादा से
ज़्यादा एक सप्ताह में सारे आंकड़े सामने आ जाएंगे. मगर सच जानना कौन चाहता है.
इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओं का नारा दिया था और प्रपंच की तमाम राजनीति के बावजूद
उसमें एक ईमानदारी थी. प्रयोग वह भी सफल नहीं हुआ क्योंकि दलाल तब भी थे. हम एक
अमीर देश के ग़रीब नागरिक हैं. करोड़ों श्रम दिवसों का अगर विकास के लिए वाकई
इस्तेमाल किया जाता तो सदियों का काम महीनों में निपटता और हमें अपनी झूठी शान
दिखाने के लिए कॉमनवेल्थ नहीं करना पड़ता और अपनी गुलामी का जय जयकार नहीं करना
पड़ता.
बड़ा जय जयकार हो रहा है कि हमने कॉमनवेल्थ की शुरूआत बहुत शान से और रंग रोशनी और
संगीत के साथ कर ली . किसी भी सरकारी महकमे में कॉमनवेल्थ के नाम पर सारे काम रुके
पड़े हैं. ए आर रहमान ने पंद्रह करोड़ रुपये लेकर भी अपने जीवन का सबसे घटिया संगीत
सुनवाया.
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अकाल और भूख के पर्यटक यहां आते हैं. सरकार सबसे कह देती है कि मरने
वाले कुपोषण के शिकार हुए और सुनने वाले मुर्गे खाकर चले जाते हैं. |
लेकिन यह कम लोगों को पता है कि जो बच्चे कॉमनवेल्थ की ध्वजा लेकर स्टेडियम और
दिल्ली सड़कों पर दिन भर धूप में और रात को उत्सव के बाहर खड़े थे उन्हें सिर्फ सौ
रुपये दिए गये. उनके लिए शायद सरकार के नजर में इतना ही काफी है, यही उनकी औकात है.
ये वे बच्चे हैं जो हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार और बंगाल के
देहातों के हैं और जिन्हें पता भी नहीं होगा कि उनके कल्याण के लिए उनकी कल्याणकारी
सरकार ने बहुत सारे इंतजाम किए हुए हैं.
जिस देश में होटल कैटरिंग सिखाई जाती है, सीखकर पढ़े लिखे बच्चे होटलों में वेटर
बनते हैं, वहां भूख से निपटने का कोई प्रशिक्षण किसी को नहीं दिया जाता. आपदा
नियंत्रण के लिए पढ़ाई है. आग बुझाने के लिए पढ़ाई है. बाढ़ से जूझने के लिए पढ़ाई
है. इंटरनेट और एयरकंडीशनर ठीक करने के लिए पढ़ाई है. लेकिन भूख से जूझने और सड़ते
गलते अनाज को गरीबों तक पहुंचाने का प्रबंधन करने के लिए कोई पढ़ाई नहीं है. यह
हमारे समाज की प्राथमिकता नहीं है.
उड़ीसा के कालाहांडी में भूख से सबसे ज़्यादा मौते होती है. भूखे पेट सबसे ज़्यादा
पलायन यहां से होता है. चावल और गेहूं भी सबसे ज़्यादा यहीं पैदा होते हैं और चावल
का तो बकायदा यहीं से निर्यात होता है. फिर भी लोग भूखे इसलिए मरते हैं कि अफसरों
और दलालों के हाथ में यहां भी सारा वितरण तंत्र है. गरीबी से जूझने की भरे पेट
वालों को क्या ज़रूरत? अकाल और भूख के पर्यटक यहां आते हैं. सरकार सबसे कह देती है
कि मरने वाले कुपोषण के शिकार हुए और सुनने वाले मुर्गे खाकर चले जाते हैं.
गरीबी मिट रही है और कम से कम फाइलों में तो मिट ही रही है. जो फाइलें बनाते हैं,
वे लंबी गाड़ियों में आते हैं, डाक बंगलों या सर्किट हाउसों में ठहरते हैं, रातों को
नरेगा के दाम से जाम चलते है और आखिरकार जो दलाल या ठेकेदार बता देते हैं, वह
फाइलों में दर्ज हो जाता है. गरीबी फाइलों से दूर हो जाती है.
आखिर जिस देश का प्रधानमंत्री गरीबों को अनाज बांटने के मामले पर देश के सर्वोच्च
न्यायालय को जवाब दे सकता है कि अदालत अपने काम से काम रखे उस देश में आपको क्या
लगता है, गरीबी ऐसे ही मिट जाएगी?
06.10.2010, 23.28 (GMT+05:30) पर प्रकाशित