पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
 पहला पन्ना > बहस > समाजPrint | Send to Friend | Share This 

धर्मनिरपेक्ष भारत और इस्लामिक पहचान

बहस

धर्मनिरपेक्ष भारत और इस्लामिक पहचान

डॉ. असगर अली इंजीनियर

बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक व बहुभाषी देशों में प्रजातांत्रिक राजनीति अक्सर धार्मिक, भाषायी, नस्लीय व जातिगत पहचानों पर आधारित होती है. यह एक बहुत जटिल मुद्दा है जिसे गहन विचार और विश्लेषण से ही समझा जा सकता है. परंतु एक बात बहुत साफ है कि वोटों पर आधारित किसी भी शासन व्यवस्था में, पहचान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

Islam


पहचानों को हम दो हिस्सों में बाँट सकते हैं. पहली हैं वे पहचानें जो जन्म आधारित होती हैं और दूसरी वे जो हम स्वयं बनाते हैं. जन्म-आधारित पहचानें भावनात्मक ज्वार पैदा करने में सक्षम होती हैं. बाद में बनाई गई पहचानें व्यक्ति की भावनाओं से जुड़ी नहीं रहतीं. हमारी जन्म-आधारित पहचानों को हम चुन नहीं सकते. हाँ, अपने जीवन में हम अपनी क्या पहचान बनाएं, यह हम पर निर्भर रहता है.

अपने ज्ञात इतिहास में भारत हमेशा से बहुसांस्कृतिक व बहुधार्मिक देश रहा है. यहाँ कभी एक संस्कृति या एक धर्म का राज नहीं रहा. बाहर से आये आर्यों, हूणों, शकों, मुगलों आदि ने भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक व भाषायी विविधता को और बहुरंगी बनाया. ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भी भारत की सांस्कृतिक विविधता को नए आयाम दिए. हर नए प्रवासी, हर नए आक्रमणकारी ने देश की संस्कृति को और समृद्ध किया. ऐसा नहीं है कि केवल बाहर से आए लोगों ने भारत की संस्कृति पर असर डाला. भारत की संस्कृति से वे भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके. उनकी पहचानों, प्रथाओं व परंपराओं पर भी भारतीय संस्कृति का प्रभाव पड़ा. यही कारण है कि आज हम ''भारतीय इस्लाम'' या ''भारतीय ईसाई धर्म'' की बात करते हैं.

इस लेख में हमारी विषयवस्तु है आधुनिक, धर्मनिरेपक्ष भारत में इस्लामिक पहचान और राजनीति. इस विषय का ऐतिहासिक पहलू तो है ही, ब्रिटिश राज ने इसमें कई नई समस्याएं व जटिलताएं पैदा कर दी हैं. हमारा जोर मुख्यत: वर्तमान परिस्थतियों पर होगा.

इस्लाम, भारत में उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं से आया. दक्षिण भारत में वह अरब व्यापारियों के जरिए आया. इस्लाम के प्रादुर्भाव के पहले से ही, अरब देशों व केरल, मालाबार के बीच व्यापारिक रिश्ते थे. यह व्यापार, इस्लाम के आगमन के बाद भी जारी रहा. कई अरबी व्यापारियों ने स्थानीय स्त्रियों से विवाह कर लिया. इन महिलाओं ने इस्लाम अपनाया और इस तरह केरल में इस्लाम का प्रसार होने लगा.

केरल में देश की सबसे पुरानी मस्जिद है, जिसके बारे में माना जाता है कि उसका निर्माण पवित्र पैगंबर के एक साथी मलिक दिनार ने करवाया था. उत्तर में इस्लाम मुहम्मद बिन कासिम के हमले के साथ भारत आया. ऐसा कहा जाता है कि मुहम्मद बिन कासिम ने यह हमला, सिंध के राजा दहीर को सबक सिखाने के लिए किया था क्योंकि दहीर ने उन लुटेरों को कासिम को सौंपने से इंकार कर दिया था जिन्होंने कुछ अरबी व्यापारिक नौकाओं को लूटा था. राजा दहीर की हार हुई और बिन कासिम, सिंध में इस्लाम की विरासत छोड़ गया.

जिस तरह दक्षिण में केरल, भारत का पहला इस्लामिक केन्द्र था, उसी तरह उत्तर में सिंध देश का पहला वह स्थान था जहाँ इस्लाम पहुँचा. सिंध धीरे-धीरे समृद्ध साझी सभ्यता व संस्कृति का केन्द्र बन गया. सूफी इस्लाम का सबसे ज्यादा प्रभाव सिंध पर ही पड़ा. मुहम्मद बिन कासिम के बाद उत्तर भारत पर तुर्कों और अनेक मध्य एशियाई आक्रान्ताओं ने हमले किए.

हर मुस्लिम आक्रान्ता अपने साथ अपनी अलग संस्कृति लेकर आया. गौरी, गजनवी, खिलजी, तुगलक, लोदी आदि अलग-अलग सांस्कृतिक व भाषायी पृष्ठभूमि से आए थे. वे सत्ता की खातिर एक दूसरे से लड़ते-भिड़ते रहते थे. इस तरह यह साफ है कि शुरूआती दौर से ही भारतीय मुसलमान एकसार नहीं थे. न तो उनकी संस्कृति समान थी और न ही भाषा.

यह दिलचस्प है कि तुर्की, अरबी व फारसी के साथ कुछ उत्तर भारतीय भाषाओं जैसे मैथिली, खड़ी बोली, पूरबी, पंजाबी व संस्कृत (जो सामान्यजनों की भाषा नहीं थी व केवल हिन्दू धार्मिक विद्वानों तक सीमित थी) के सम्मिश्रण से एक नई भाषा उभरी जो उर्दू कहलाई. कुछ ही पीढ़ियों में उर्दू, श्रेष्ठि वर्ग की प्रिय भाषा बन गई.

ब्रिटिश शासन के साथ भारत में कई नई राजनैतिक व सामाजिक अवधारणाएं, आधुनिक सोच व नई वैज्ञानिक तकनीकें भी आईं परंतु भारत के आमजनों के लिए ब्रिटिश शासन, मुगलों के शासन की तुलना में कहीं अधिक दु:खदायी था.


आज, उत्तर भारत में उर्दू मुसलमानों की पहचान का भाग और सांप्रदायिक राजनीति करने वालों के लिए एक मुद्दा बन गई है. उत्तर भारत में एक नई, मिली-जुली संस्कृति उभरी जिसे ''गंगा-जमुनी तहज़ीब'' का नाम दिया गया. यह साझा सांस्कृतिक विरासत-कम से कम शहरी श्रेष्ठि वर्ग के मामले में-हिन्दुओं व मुसलमानों दोनों की पहचान बन गई. भारत की इस सांझा संस्कृति ने कई महान संगीतज्ञों, चित्रकारों, वास्तुविदों व कवियों को तो जन्म दिया ही, उसने धार्मिक सहिष्णुता को भी जन्म दिया. परंतु साम्राज्यवादी दौर में उभरी सांप्रदायिक राजनीति ने हिन्दुओं व मुसलमानों की सांझा संस्कृति की बजाय उनके धर्मो के बीच के अंतर पर ज्यादा जोर देना शुरु कर दिया.

धर्म को संस्कृति से अधिक महत्व दिया जाने लगा और गलाकाट राजनैतिक प्रतिस्पर्धा ने श्रेष्ठि वर्ग की जीवन शैली व संस्कृति की एकरूपता पर कुप्रभाव डाला. जैसा कि पहले कहा जा चुका है, जन्म-आधारित पहचानें निश्चित व अपरिवर्तनीय होती हैं व इसलिए वे व्यक्ति को सुरक्षा व स्थायित्व का भान कराती हैं.

तुलनात्मक रूप से, सांस्कृतिक पहचान की प्रकृति कहीं अधिक जटिल होती है. यद्यपि एक दृष्टि से सांस्कृतिक पहचान भी जन्म-आधारित होती है तथापि उसमें परिवर्तन आते रहते हैं. संस्कृति कभी स्थिर नहीं रहती.

उदाहरणार्थ, भारत पर मुस्लिम राजवंशों के राज करना शुरु करने के बाद, भारतीय संस्कृति में बदलाव आने लगे. मुगलों के आने के बाद संस्कृति का फारसीकरण हो गया. फारसी संस्थाओं, भाषा, व्यंजनों आदि को प्रमुखता मिलने लगी. इसी तरह, ब्रिटिश शासन में, शहरी श्रेष्ठि वर्ग ने अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ ब्रिटिश जीवन शैली भी अपना ली. ब्रिटिश शासन के साथ भारत में कई नई राजनैतिक व सामाजिक अवधारणाएं, आधुनिक सोच व नई वैज्ञानिक तकनीकें भी आईं परंतु भारत के आमजनों के लिए ब्रिटिश शासन, मुगलों के शासन की तुलना में कहीं अधिक दु:खदायी था. मुगल राजवंश, भारतीय संस्कृति में घुलमिल गए थे. उन्होंने हिन्दू सामंती व श्रेष्ठि वर्ग से संबंध स्थापित कर लिए थे. उन्हें ''बाहरी'' नहीं समझा जाता था. वे भारतीय संस्कृति व समाज का हिस्सा बन गए थे.

ब्रिटिश शासकों ने ऐसा नहीं किया. वे स्वंय को भारतीयों की अपेक्षा अधिक सभ्य व सुसंस्कृत मानते थे और उनसे दूरी बनाए रखते थे. भारतीय भी अंग्रेजों को ''विदेशी'' मानते थे और उनके शासन को ''गुलामी''. अंग्रेजों के खिलाफ चले राजनैतिक संघर्ष को गुलामी से मुक्ति का संघर्ष ही माना जाता था. यह मुस्लिम शासन व ब्रिटिश शासन के बीच मूल व महत्वपूर्ण अंतर था.
आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Oshiya http://snowaborno.blogspot.com

 
 बहुत बेहतर कोशिश है असगर साहब के इस मज़मून में.मगर पता नहीं कितने ज़मानों से हम ऐसी बातें लोगों को समझाते-बताते आ रहे हैं और पछताते भी आ रहे हैं.शायद यह सिलसिला ख़त्म होने में नहीं आएगा.
क्या अब हमें अपने बुजुर्गों की यह बात सचमुच नहीं मान लेनी चाहिए कि सिर्फ व्यक्ति के तौर पर ही हम अपने भीतर क्रान्ति कर सकते हैं. इसी कोशिश की सच्चाई से आगे कोई और चराग जले तो जले, वरना हिन्दू या मुसलमान बने रह कर कोई भी आदमी इंसान होने को राज़ी नज़र नहीं आता. अच्छे और सच्चे लोगों की सारी ऊर्जा भीड़ को समझाने में जा रही है. गाँधी जी कितना चकराए थे अपनी तमाम कोशिशों के बावुजूद ! अपने आप को सही कर लेना और आगे की फिक्र छोड़ कर जीना ही सबसे बड़ी जीत है. जहां तक मरने और मारने वालों की बात है, उन्हें अब शब्द नहीं, उनकी आँखों में आँखें दाल कर देख सकने वाले साहसी लोग चाहिए. आज तक कोई भी युद्ध बुद्ध हुए बिना नहीं जीता गया. सबसे पहले अपने मन की गहरी चिकित्सा या उसका गहरा अवलोकन. यानी ध्यान!
 
   
 

sitaram singh (indian_uncle@mail.ru) new delhi

 
 बहुत ही अच्छा लेख है. 
   
[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in