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बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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यह सबके लिये चेतावनी है

 
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फिरौती देने वाली सरकार

मुद्दा

 

फिरौती देने वाली सरकार

देविंदर शर्मा


पंजाब में सरकारी संरक्षण में लूट का खेल जारी है. इस बार यह काम पंजाब के आढ़तियों द्वारा किया गया है. उन्होंने 2009-10 के दौरान 783 करोड़ रुपए लगभग 'कुछ न करने के लिए' ले लिए. इससे पहले कि आप अपनी भृकुटियां ताने, मैं आपको बता दूं कि पिछले एक दशक में पंजाब के आढ़तियों को 6400 करोड़ रुपए कमीशन के रूप में 'कुछ नहीं करने के लिए' दिए जा चुके हैं.

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पंजाब में गेहूं और धान की खरीदी में आढ़तियों का कोई सार्थक योगदान नहीं होता है. इन मुख्य अनाजों और कपास के लिए एक निश्चित बाज़ार है और ये आढ़तिए सिर्फ मंडियों में मजदूर दिलाने का काम करते हैं. भारतीय खाद्य निगम आढ़तियों के जरिए किसानों को भुगतान करता है, जिसके लिए इन बिचौलियों को 2.5 प्रतिशत कमीशन मिलता है. वे किसानों के पिछले सारे बकाए घटाने के बाद, बाकी रकम को चेक के द्वारा भुगतान कर देते हैं.

आज की तारीख में पंजाब में लगभग 20000 आढ़तिए हैं. लेकिन उनके राजनीतिक प्रभाव को देखें. कुछ सप्ताह पहले, एफसीआई ने बिचौलियों का हटा कर एक सुधार करने का निश्चय लिया. उसने किसानों को मंडियों में आने वाली धान की फसल के लिए सीधा भुगतान करने का निर्णय लिया. लेकिन आढ़तियों ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए कुछ ही दिनों में शुरु होने वाली धान खरीदी की प्रक्रिया के बहिष्कार करने की धमकी दी.

उसके बाद इन आढ़तियों ने पंजाब सरकार के साथ मिलकर लॉबी करना शुरु कर दिया और कुछ रिपोर्टों के अनुसार मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के साथ दिल्ली भी गए. आखिरकार कुछ दिनों की व्यस्त समझौता-वार्ता के बाद, एफसीआई को अपना आदेश वापस लेना पड़ा.

5 अक्टूबर को एफसीआई द्वारा दिया गया दो लाइन का आदेश कहता है, “किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का सीधा भुगतान करने संबंधी आदेश पंजाब और हरियाणा राज्यों में 30 सितंबर 2011 या अगले आदेशों तक स्थगित रखा गया है.”

दूसरे शब्दों में पंजाब के आढतियों के पास अभागे किसानों को एक साल और लूटने का खुला अधिकार मिल गया है. वर्ष 2010-11 के दौरान अनुमानतः 800 करोड़ रुपए आसानी और चुपचाप उनकी जेब के हवाले कर दिये जाएंगे.

यह निश्चय ही ‘समावेशी’ विकास है.

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के डॉ. सुखपाल सिंह की अध्यक्षता में अर्थशास्त्रियों की एक टीम द्वारा हाल ही में किया गया एक अध्ययन कहता है, “पंजाब कृषि उत्पाद बाजार अधिनियम 1961 के आधार पर पंजाब मंडी बोर्ड ने अलग-अलग फसलों जिनमें फल और सब्जियां भी शामिल हैं; का कमीशन तय किया था. कमीशन की दर 26 मई 1961 को दर वजन के आधार पर कृषि उपज के मूल्य का 1.50 प्रतिशत तय की गई थी. लेकिन चूंकि आढ़तियों के पास मजबूत राजनीतिक लॉबी है, उन्होंने समय-समय पर इस दर को बढ़वाने में सफलता पाई. 11 अप्रैल 1990 को ये दर बढ़ाकर 2 प्रतिशत कर दी गई; जबकि 22 मई 1998 को सभी कृषि उपजों के लिए ये दर 2.5 प्रतिशत और फल एवं सब्जियों के लिए 5 प्रतिशत कर दी गई”

“लंबे समय से पंजाब का बाज़ार शुल्क सबसे ज्यादा है. मौजूदा समय में कुल बाज़ार शुल्क उपज के मूल्य का 13.5 प्रतिशत है. इसमें से 4 प्रतिशत खरीदी कर, अधोसंरचना उपकर (गेहूं और धान पर 3 प्रतिशत की दर से. जबकि कपास पर 2 प्रतिशत की दर से, 2 प्रतिशत बाजार शुल्क के लिए, 2 प्रतिशत ग्रामीण विकास निधि के लिए और बाकी 2.5 प्रतिशत बिचौलियों को कमीशन देने के लिए लिए जाते हैं. इस तथ्य के बावजूद कि ये कमीशन एजेंट इन फसलों (धान और गेंहू) जिनमें निश्चित विपणन ज्यादा काम करती हैं, की खरीदी में कुछ ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाते हैं. अपना कमीशन समय समय पर बढ़वाने में कामयाब होते हैं”

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय का अध्ययन इन बिचौलियों के द्वारा किए जाने वाली गड़बड़ियों के बारे में विस्तार से बताता है. ये खेती से जुड़े संकट के बारे में उत्कृष्ट अंतर्दृष्टि देता है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आधे-अधूरे मन से मिल रहे ध्यान के बावजूद खेती की तरफ से कुछ उम्मीद की किरण आई है.

इस अध्ययन में आगे दिए गए विवरण पर नज़र डालें : “इन कमीशन एजेंटों की मुख्य आय फसलों की खरीदी/बिक्री से हुई आय से नहीं बल्कि किसानों को दिए गए कर्जों से मिले ब्याज से होती है. एक औसत कमीशन एजेंट किसानों को 65 लाख 74 हज़ार का लोन देता है. वर्ष 2008-09 के दौरान पंजाब के किसानों को दिए गए कुल 35000 करोड़ के ऋण में से अंदाजन 13300 करोड़ (38 प्रतिशत) गैर-संस्थागत ऋण प्रदाता दिए गए हैं, जिसमें भी ये कमीशन एजेंट प्रमुख वित्त प्रदाता हैं.

बजाय इसके कि इन बिचौलियों द्वारा पिछले दस सालों में अपनी जेब के हवाले किए गए 6400 करोड़ रुपयों को वसूला जाए, पंजाब सरकार इन्हें एक और साल तक लूटने का अधिकार दे रही है.


“कानून के अनुसार जो व्यक्ति साहूकारी के व्यवसाय में लिप्त हो उसे साहूकार के रूप में अपना पंजीकरण करवाना चाहिए. पंजाब साहूकार पंजीकरण कानून 1938 कहता है कि ऋण की वसूली के लिए मुकदमा वैध लाइसेंसधारी पंजीकृत साहूकारों द्वारा दर्ज कराया जा सकता है. कानून ने साहूकारों को हर ऋणी के लिए अलग-अलग खाता रखने का दायित्व दिया है, इन खातों में उस ऋणी को दिए गए हर ऋण के बारे में सारी जानकारी मौजूद होनी चाहिए. सरकार ने इस खाते में लेखापलन के तरीके भी बताएं हैं.”

“इसके साथ ही ऋणदाता द्वारा उधार लेने वाले को छह महीने के अंतराल में खातों का एक सुपाठ्य विवरण प्रदान करना चाहिए, जिसमें ऋणप्रदाता या उसके एजेंट के हस्ताक्षर हों और इसमें 30 जून या 31 दिसंबर में बकाया रकम दर्शायी गई हो. लेकिन व्यवहारिक रूप में इस कानून का हर स्तर पर उल्लंघन होता है. अपने जमीनी सर्वेक्षण के दौरान हमने पाया कि उधार देने वाले कमीशन एजेंटो में से कोई एक भी साहूकारी के कार्य के लिए पंजीकृत नहीं था.”


मुझे पता नहीं, नीति बनाने वाले और किसान यूनियनें इन बिचौलियों की पकड़ से बाहर आ भी पाएंगी या नहीं. बजाय इसके कि इन बिचौलियों द्वारा पिछले दस सालों में अपनी जेब के हवाले किए गए 6400 करोड़ रुपयों को वसूला जाए, पंजाब सरकार इन्हें एक और साल तक लूटने का अधिकार दे रही है. यह बेशक कुत्सित तौर तरीका है.

यह हमें बताता है कि कैसे मुठ्ठी भर साधन-संपन्न (इस मामले मे 20000 बिचौलिए) एक राज्य को फिरौती देने पर मजबूर कर सकते हैं. राष्ट्रीय स्तर पर सालाना 500000 करोड़ की कर छूट “पूर्वनिश्चित राजस्व” के रूप में व्यापार और उद्योग को दिया जाना एक बिल्कुल सही उदाहरण है कि किस तरह अमीर गरीबों की भलाई के लिए मौजूद संसाधनों को हड़प जाते हैं. फिलहाल तो लूट जारी है.

12.10.2010, 02.34 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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