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गांधी-लोहिया का पुनर्पाठ

बहस

 

गांधी-लोहिया का पुनर्पाठ

रघु ठाकुर


21 वीं सदी का पहला दशक गांधी और लोहिया के पुनर्पाठ का दशक बनकर उभरा है. गांधी की बीज पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ लिखे सौ वर्ष पूरे हुए और लोहिया जन्म के भी सौ वर्ष पूरे हुए. हिंद स्वराज और गांधी की याद भारत और भारत के बाहर दुनिया में व्यापक रूप से हुई. यहां तक कि जिन मुल्कों ने पहले कभी गांधी को स्वीकार नहीं किया था और व्यक्ति में बदलाव की तमाम संभावनाओं के बावजूद जिन मुल्कों के हालात को गांधी ने अपनी कार्यसूची की प्राथमिकता में बदलाव के लिए उपयुक्त नहीं माना था, उन मुल्कों में भी गांधी की चर्चा न केवल जनता में बल्कि व्यवस्था और तंत्र में भी गंभीर रूप से शुरू हुई है.

लोहिया और गांधी जी

गांधी जी के साथ लोहिया


चालीस के दशक में जब महात्मा गांधी को अमरीका की यात्रा का निमंत्रण दिया गया था और उनके अमरीका समर्थकों ने गांधी जी से अमरीका दौरे का आग्रह किया था तब उन्होंने अमरीका प्रवास पर जाने से इनकार करते हुए कहा था कि मेरे अमरीका यात्रा से कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि आपका समाज डॉलर भगवान को पूजता है और मैं दरिद्र नारायण भगवान को.

गांधी की यह पंक्ति अमरीकी समाज के प्रति गांधी के विश्लेषण को दर्शाती है और अमरीका ने भी कभी गांधी को मान्यता नहीं दी थी. परंतु आज वही अमरीका का प्रशासन तंत्र जिसके प्रतीक राष्ट्रपति बराक ओबामा है, शान से यह कहते हैं कि गांधी मेरे आदर्श हैं और मैं गांधी की फोटो अपने साथ रखता हूं.

हो सकता है कि अगर गांधी जिंदा होते तो अमरीका की पिछले समय की आर्थिक मंदी के दौर में अमरीका प्रवास का निमंत्रण स्वीकार करते और अमरीकावासियों से कहते कि देखो तुम्हारा भगवान अस्थिर हो गया है और मेरा दरिद्र नारायण ही सत्य है.

डाक्टर राममनोहर लोहिया ने भी अपने एकल अमरीकी प्रवास के अवसर पर अमरीकी विकास के प्रतीकों पर प्रश्न चिह्न लगाये थे और उन्हें विनाश की संभावनाओं के रूप में देखा था, जिसका शब्दस: वर्णन लोहिया अमरीका वीट पुस्तक में लोहिया के मित्र ने किया है. लोहिया गांधी के विचारों से और उनकी स्थापनाओं से बहुत दूर तक सहमत थे और शायद वे लोहिया की विचार स्थापनाओं के मूल आधार भी थे.

यद्यपि लोहिया समाजवादी थे और वे समाजवाद को एक परिपूर्ण वैचारिक सिद्धांत और कार्यक्रम के रूप में स्वीकार करते थे. गांधीवाद को वे न तो पूर्णत: नकारते हैं और न ही पूर्णत: स्वीकारते है. परंतु लोहिया समाजवाद को स्वीकारते हैं तथा विशेषत: वे समाजवाद की अपनी परिभाषा को भारतीय संदर्भ के साथ तालमेल बिठाते हुए गांधी और मार्क्स के साथ सामंजस्य और अलगाव प्रस्तुत करते हुए एक विचार सपने के रूप में प्रस्तुत करते हैं.

गांधी ने वर्ग संघर्ष को स्वीकार नहीं किया. गांधी सत्याग्रह के अनुयायी थे और उनका सत्याग्रह एक समूची जीवन शैली के रूप में है, जो हर असत्य को नकारता है तथा सतत् हर क्षण हर पल सत्य के लिए आग्रह करता है. गांधी का सत्याग्रह वर्ग संघर्ष के बजाय आत्म संघर्ष था जिसमें व्यक्ति स्वत: अपने असत्य से लड़ता है और उसे मिटाने का प्रयास करता है.

लोहिया ने आदर्श के रूप में सत्याग्रह को स्वीकार किया परंतु समाज की फौजी संरचना और विचार स्तर को देखते हुए वर्ग संघर्ष और सिविल नाफरमानी के हथियार स्वीकार किए. लोहिया के मन में चिंता थी कि भारतीय समाज, जो जाति मानस में विभाजित है, उसमें वर्ग संघर्ष अहिंसक और हिंसक किसी भी रूप में संभव नहीं है. इसलिए लोहिया पहले जाति को मिटाकर समाज को वर्गीय विभाजन में ले जाना चाहते थे और जब वे- ‘पावे सौ में साठ’ का नारा देते हैं तब उनका उद्देश्य देश के जातीय ढांचे को तोडक़र उसे वर्ग में बदलने का था. वे जानते थे कि तब तक बदलाव की पटकथा लिखा जाना संभव नहीं है, जब तक जाति का विनाश नहीं हो जाता.

सिविल नाफरमानी से लोहिया का तात्पर्य सरकार के उन कानून और नियमों को मानने से इंकार करना था, जो उनके विचार की कसौटी पर खरे नहीं है. सत्याग्रह जीवन शैली है और सिविल नाफरमानी मानव स्वभाव होना चाहिए. दरअसल लोहिया हर इंसान को सिविल नाफरमानी का अभ्यस्त बनाना चाहते थे ताकि उन में हर क्षण, हर जगह, हर व्यवस्था को नकारने की क्षमता और अभ्यास पैदा हो और इसलिए लोहिया ने हर संभावित अवसर पर सिविल नाफरमानी का प्रयोग किया.

वे निजी यात्रा पर गोवा गए थे परंतु जो चुनौती उन्हें प्राप्त हुर्ह उसे स्वीकार कर पुर्तगाली सरकार के कानून को नकारने के लिए उन्होंने किसी अवसर और तैयारी का इंतजार नहीं किया बल्कि उसी क्षण सिविल नाफरमानी की थी.

डा. लोहिया जब अमरीका के प्रवास पर गए थे, संसद सदस्य थे और उन्हें जब होटल प्रवेश से रंगभेद के आधार पर रोका गया था तब उन्होंने उस चुनौती को स्वीकार करने में देर नहीं की. उन्होंने मामले को संसद में उठाने या भारतीय दूतावास को लिखने आदि का परंपरागत और व्यवस्था परक नुस्खों के बजाय अमरीकी होटल के नियम को तोड़ा और सिविल नाफरमानी की.

लोहिया के गोवा की सिविल नाफरमानी ने समूचे गोवा के मन को हिला दिया और पुर्तगाली शासन के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन की मानसिक आधारशिला तैयार कर दी. अमरीका में उनके व्यक्ति सिविल नाफरमानी की घटना ने न केवल भारत में व्यवस्था को नकारने वाले विचारों को उत्प्रेरित किया बल्कि अमरीका के रंग भेद से पीडि़त समाज के उन लोगों के मन में भी आत्मविश्वास का संचार किया जो रंगभेद के क्रूर विभाजन से पीडि़त और दुखी थे.
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BRAJ KISHOR (DRBKPSINGH@GMAIL.COM) BILASPUR

 
 लोहिया जी ने ट्रावनकोर की समाजवादी सरकार के खिलाफ भी आन्दोलन छेड़ा था, सच्चे थे, पर शायद जातिवाद को जाति से नहीं हरा सकते. ठाकुर साहब , मुझे तो ऐसा ही लगता है.
 
   
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