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मुसलमानों के खिलाफ अमरीकी अभियान

बहस

 

मुसलमानों के खिलाफ अमरीकी अभियान

राम पुनियानी


संयुक्त राज्य अमरीका ने सभ्य समाज के काफी रूप-गुण विकसित कर लिए हैं. अमरीकी समाज, विकास और बदलाव के एक लंबे दौर से गुजरा है. उसने अंतर्धार्मिक व अंतर्सांस्कृतिक रिश्तों का ‘रंगोली’ मॉडल अपनाया है. यह उस मॉडल से भिन्न है, जिसमें सभी संस्कृतियाँ, देश की मुख्यधारा में घुल-मुल जाती हैं व अपनी अलग पहचान खो देती हैं, ठीक वैसे ही जैसे समुद्र में मिलने के बाद नदियों का अलग अस्तित्व समाप्त हो जाता है.

कुरान


इस पृष्ठभूमि में, फ्लोरिडा के पॉस्टर टेरी जोन्स द्वारा 9/11 की बरसी पर कुरान जलाने की धमकी देने का हालिया घटनाक्रम दु:खद है. पॉस्टर का कहना था कि कुरान एक शैतानी किताब है, जिसने आतंकवाद को जन्म दिया है. अनेक व्यक्तियों व संस्थाओं ने उससे यह इरादा त्यागने की अपीलें कीं. कई दूसरे तरीकों से भी इस दिशा में प्रयास किए गए. अंतत: वह अपने इस कुत्सित इरादे को छोड़ने के लिए इस शर्त पर राजी हुआ कि ग्राउंड जीरो के निकट मस्जिद बनाने की योजना त्याग दी जाएगी. किसी कारणवश, उसकी यह माँग भी अस्वीकार कर दी गई.

पहले ग्राउंड जीरो के नजदीक मस्जिद के निर्माण का विरोध और फिर कुरान व मुसलमानों पर निशाना साधे जाने की यह मुहिम क्या प्रतिबिंबित करती है? यही कि मुसलमान ही आतंकवाद के लिए जिम्मेदार हैं. इस समय सब तरफ मुसलमानों का दानवीकरण करने का अभियान चल रहा है. इसमें इंटरनेट वेब साईटों, ब्लागों व ई-मेल से लेकर मुंहजबानी प्रचार तक- हर तरीका इस्तेमाल हो रहा है. यह लगभग वही रणनीति है जो भारत में सांप्रदायिक तत्वों द्वारा इस्तेमाल की जाती रही है. सांप्रदायिक ताकतों ने अपने अनवरत प्रचार से यह भ्रम फैलाने में 'सफलता' प्राप्त कर ली है कि भारत के अल्पसंख्यक मुसलमान, यहाँ के बहुसंख्यक हिन्दुओं के लिए खतरा हैं!

अमरीका से भी मस्जिदों में तोड़-फोड़ और मुसलमानों को घृणा-जनित हिंसा का शिकार बनाए जाने की खबरें आती रहती हैं. अमरीका में दबी जुबान से यह प्रचार किया जा रहा है कि मुसलमान देश पर 'कब्जा' करने की तैयारी कर रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा, मुसलमानों को प्रोत्साहन दे रहे हैं, जिससे उनकी हिम्मत और ताकत बढ़ रही है.

इस संदर्भ में यह दावा किया जा रहा है कि इस्लाम अमरीका का सबसे तेज़ी से बढ़ता हुआ धर्म है. अमरीका में इस बढ़ते टकराव के पीछे प्रभुत्वशाली श्वेतों व दबे-कुचले अफ्रीकी-अमरीकियों का आपसी संघर्ष है. इस्लाम की ''आक्रामकता'' की इस टकराव में कोई भूमिका नहीं है.

भारत में भी यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि बहुपत्नी प्रथा व परिवार नियोजन के उपायों का प्रयोग न करने के कारण, मुसलमानों की आबादी में बेतहाशा वृद्धि हो रही है. इस दुष्प्रचार के जरिए बहुसंख्यक समुदाय में यह डर पैदा किया जा रहा है कि वे देर-सबेर अपने ही देश में अल्पसंख्यक बन जायेंगे. कहने की जरूरत नहीं कि आंकडे और तथ्य इस आशंका को पूरी तरह नकारते हैं.

यह भी कहा जाता है कि मुसलमानों को कुरान यह आदेश देती है कि वे काफिरों का वध करे. यह सफेद झूठ है. कुरान तो यह कहती है कि एक निर्दोष इंसान की हत्या, पूरी मानवता की हत्या के समकक्ष है (5:32). यह प्रचार भी किया जा रहा है कि ओबामा ने यह घोषित किया है कि अमरीका अब ईसाई देश नहीं रह गया है. अगर ओबामा ने ऐसा कहा भी है तो उसका अर्थ मात्र यह है कि अमरीका जैसे प्रजातांत्रिक राष्ट्र में सभी धर्मो को बराबरी का स्थान प्राप्त है. ओबामा के इस कथित वक्तव्य के अर्थ को तोड़-मरोड़ कर अमरीकी जनता को आतंकित किया जा रहा है.

इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध चल रहे इस योजनाबद्ध व अनवरत दुष्प्रचार के कारण एक आम मुसलमान आज स्वयं को उतना सुरक्षित, सुखी और प्रसन्न अनुभव नहीं करता जितना कि पच्चीस-तीस साल पहले तक करता था. अमरीका में मुसलमानों का एक बड़ा तबका इस दुष्प्रचार से अत्यंत व्यथित व असहज महसूस कर रहा है कि इस्लाम कोई धर्म नहीं बल्कि एक राजनैतिक पंथ है, यह कि मुसलमान, देशभक्त अमरीकी नहीं बन सकते और यह भी कि मस्जिदें, दरअसल जिहादी मुसलमानों के अड्डे हैं.

ग्राउंड जीरो के निकट मस्जिद निर्माण के मुद्दे ने मुसलमानों के विषय में आम अमरीकियों के पूर्वाग्रहों को सामने ला दिया है. अमरीका में आज जिस तरह का इस्लाम-विरोधी दुष्प्रचार चल रहा है उसकी तुलना केवल सन् 1920 व 1930 के दशक में जर्मन मीडिया द्वारा यहूदियों के विरुद्ध चलाए गए प्रचार अभियान से की जा सकती है.

'न्यूयार्क टाईम्स' में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि भले ही यह निश्चित तौर पर न कहा जा सके कि अमरीका में पिछले साल की तुलना में इस साल मुसलमानों के विरुद्ध घृणा से प्रेरित अपराधों की संख्या में वृद्धि हुई है या नहीं पंरतु यह पक्का है कि आम अमरीकी, पिछले साल की तुलना में आज मुसलमानों से ज्यादा घृणा करने लगा है.

हम भारतीयों ने भी पिछली एक सदी और विशेषकर सन् 1980 के दशक के बाद से इसी प्रक्रिया को देखा-भोगा है. अमरीका में 9/11 2001 के बाद से यह प्रक्रिया शुरू हुई.

भारत और अमरीका के मुस्लिम-विरोधी अभियानों में कई समानताएं हैं तो कई अंतर भी हैं. भारत में मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने के नतीजे में मुसलमानों के कत्लेआम हुए, वे अपने मोहल्लों में सिमट गए और उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिशें हुईं. अमरीका में इस अभियान- जिसमें मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है- से प्रजातांत्रिक संस्थाओं व परंपराओं का क्षरण हो रहा है.

अमरीका में मुसलमानों व इस्लाम के चेहरे पर कालिख पोतने के अभियान के गंभीर दूरगामी प्रभाव होंगे.


सन् 1980 के दशक में अमरीका ने ही पाकिस्तान में स्थापित मदरसों में अलकायदा के लड़ाके तैयार करने के लिए पाठयक्रम बनाया था. उद्देश्य था अफगानिस्तान पर काबिज रूसी सेनाओं से लडने के लिए कट्टर मुस्लिम युवकों की फौज तैयार करना. इसी उद्देश्य से 'काफिर' व 'जिहाद' जैसे शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा गया. इन मदरसों से निकले भस्मासुरों ने न केवल इस्लामिक मूल्यों पर कालिख पोती वरन् मुसलमानों की छवि को गहरा आघात पहॅुचाया. यही लड़ाके, अब पाकिस्तान के लिए बड़ी मुसीबत बन गए हैं.

यह दिलचस्प है कि मुसलमानों के दानवीकरण ने कम्यूनिस्टों के दानवीकरण का स्थान लिया है. सन् 1950 से 1980 तक अमरीकी मीडिया, कम्यूनिस्टों को क्रूर खलनायक और सोवियत संघ को शैतान का साक्षात रूप सिध्द करने में लगा हुआ था. मेकार्थीवादियो का नारा था ''कम्यूनिस्टों से घृणा करो''. अमरीका में कम्यूनिस्टों को ''कॉमीज'' कहा जाता था. उन्हें देश में आने का वीजा नहीं मिलता था. अमरीकी प्रशासन ने यह स्पष्ट कर दिया था कि न तो देसी और न ही विदेशी कम्यूनिस्टों के लिए अमरीका में कोई जगह है. इस मामले में सभी प्रजातांत्रिक सिध्दांतों को ताक पर रख दिया गया था.

ईरान में अमरीकी पिट्ठू शाह रजा पहलवी को अपदस्थ कर अयातोल्लाह खुमैनी के शासन में आने के बाद अमरीकी मीडिया का स्वर बदल गया. अब उसे इस्लाम में ''नया खतरा'' नजर आने लगा. 9/11 के बाद अमरीकी मीडिया ने ''इस्लामिक आतंकवाद'' शब्द गढ़ कर दुनिया भर के 135 करोड मुसलमानों को कटघरे में खड़ा कर दिया.

जहाँ तक कम्यूनिस्ट-विरोधी अभियान का प्रश्न है, उसने सामाजिक ढ़ांचे पर अधिक कुप्रभाव नहीं डाला क्योंकि कोई व्यक्ति जन्म से कम्यूनिस्ट नहीं होता. परंतु कोई व्यक्ति जन्म से मुसलमान हो सकता है. हर मुस्लिम बच्चे के माथे पर उसके पैदा होते ही 'आतंकवादी' 'काफिरों का हत्यारा' व 'जिहादी' का स्टिकर चस्पा हो जाता है. और यह, उसके एक महाशक्ति के प्रभुत्व वाले इस विश्व के क्रूर राजनैतिक यथार्थ को समझने से बहुत पहले हो जाता है.

अमरीका में मुसलमानों व इस्लाम के चेहरे पर कालिख पोतने के अभियान के गंभीर दूरगामी प्रभाव होंगे. इससे अंतर्धार्मिक रिश्तों व प्रजातांत्रिक मान्यताओं को गहरा आघात पहुंचेगा. क्या अमरीकी सरकार व वहाँ का समाज, प्रजातंत्र के लिए इस बड़े खतरे के प्रति जागरूक होगा? मुस्लिम-विरोधी अभियान से मुसलमान तो मुसीबतें झेल ही रहे हैं, इससे अमरीकी प्रजातंत्र की नींव भी कमजोर हो रही है. यह अभियान, मानव सभ्यता के लिए अभिशाप है.

19.10.2010, 10.35 (GMT+05:30) पर प्रकाशित