इंदौर का यह दौर
इंदौर डायरी
इंदौर का यह दौर
श्रीप्रकाश
इंदौर
से
पहले दंगाग्रस्त और फिर कर्फ्यूग्रस्त इंदौर
शहर में आज उस वक्त कर्फ्यू हटाने को लेकर उत्सुक जनता के मुसूबों पर पानी फिर गया,
जब कांग्रेस महासचिव व मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह सहित अन्य
कई कांग्रेसी नेताओं को इंदौर एअरपोर्ट पर ही प्रशासन ने रोक दिया.
दिग्विजय सिंह ने घोषणा कर रखी है कि दंगापीड़ितो से मिले बिना वे इंदौर से वापस
नहीं लौटेंगे. या तो कर्फ्यू पास दो या फिर कर्फ्यू हटाओ. लेकिन सरकार एवं प्रशासन
की कोशिश है कि दिग्विजय सिंह और उनके सहयोगी कांग्रेसी नेता शहर में न जायें और
लौट जायें.
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कर्फ्यू पास दो या कर्फ्यू हटाओ |
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एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने एक कदम
आगे बढ़कर इस 'षडयंत्र' में काग्रेस का भी नाम ले लिया है. |
प्रशासन की समस्या है कि वह दिग्विजय सिंह और उनके सहयोगी
कांग्रेसी नेताओं की सुरक्षा करे या फिर जनता की. प्रशासन ने साफ कहा भी है कि जब
तक एअरपोर्ट पर तैनात बल मुक्त नहीं हो जाता, शहर में जारी कर्फ्यू में ढील देना
संभव नहीं है.
उधर भाजपा के प्रमुख नेता और प्रदेश सरकार में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने जहां
दंगे में सिमी का हाथ होने का संदेह जताया है, वहीं एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने एक कदम
आगे बढ़कर इस 'षडयंत्र' में काग्रेस का भी नाम ले लिया है. हालांकि आज सुबह 13
कर्फ्यूग्रस्त थानाक्षेत्रों में 7-9 बजे तक और बाद में रात 8-9 बजे तक की ढील दी
गयी, इंदौर में फिर से पूरी तरह से कर्फ्यू हटने और अमन-चैन का माहौल कायम होने
में, लगता है, अभी कुछ दिन और लग ही जायेंगे.
अशांति के अखाड़े में
पूरे शहर में तीन दिनों पहले पूरे शहर में कर्फ्यू लगा देने और दो दिन पहले एसएएफ
की पांच कंपनिया और बुला लेने के बाद प्रशासन भले ही अपना कार्य मुस्तैदी से करने
की भूमिका दिखा रहा है, लेकिन शहर में अमन-चैन कायम करने का संकल्प लेने वाली शांति
समितियों की बैठके कुछ ठोस तय नहीं कर पा रही है.
एक ऐसी ही शांति कमेटी की बैठक हुई, जिसमें मीडिया को तो बाहर कर दिया लेकिन सड़कों
पर सांप्रदायिक तनाव फैलाने वाले बैठक में नजर आये. 5 जुलाई की रात पुलिस कंट्रोल
रूम में हुई यह शांति समिति की बैठक जैसा कि एक स्थानीय अखबार ने टिप्पणी की है, कई
बार अशांति के अखाड़े में बदलती नजर आयी.
बैठक में कलक्टर-एसपी जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों सहित सांसद, विधायक, शहर
काजी और भाजपा, कांग्रेस एवं बसपा के कई नेता एवं गणमान्य लोग मौजूद थे. बैठक में
उपस्थित एक व्यक्ति ने कहा कि दंगाप्रभावित क्षेत्र खजराना में हिंदू-मुस्लिम एकता
का सौ सालों का इतिहास कलंकित हुआ है. इस बैठक की नतीजा जो भी निकला हो लेकिन बैठक
में दी गयी कम से कम एक राय पर गौर किया जाना चाहिए : टीवी चैनल के फुटेज देखे
जायें और जो भी दहशतगर्द हो, उसे बख्शा नहीं जाये.
शादी बिन बाराती
1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के वक्त पूरे इंदौर में कर्फ्यू लगा था. तब से आज तक
16 सालों में इंदौर काफी कुछ बदल गया है. नये बसे इंदौर के पॉश इलाकों में बसने
वाले मॉल्स और कॉरपोरेट संस्कृति के दीवाने वर्ग के लिए इस कर्फ्यू ने एक झटका भी
दिया है. उन्हें भी लगा है कि इंदौर में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है, भले ही सरकार
ग्लोबल मीट कराकर विकास के बारे में बढ़-चढ़ कर दावे करे. लोगों को लगा कि कर्फ्यू ने
संस्कारो के सामने भी संकट खड़ा कर दिया.
वाकया एक उद्योग समूह के निदेशक के खानदान की नयी पीढ़ी के प्रथम विवाह के अवसर पर
आयोजित 6 जुलाई को होने वाले विवाह समारोह का था. इस शादी में इंग्लैंड, अमेरिका,
जर्मनी, जापान, पोलैंड आदि कई यूरोपीय देशों से मेहमान आने वाले थे. हालांकि देश के
अन्य शहरों में रहने वाले परिजनों-मेहमानों सहित विदेश से आने वाले मेहमानों को भी
शहर में कर्फ्यू लगने के बारे में सूचनाएं भेजी गयीं, फिर भी चेकोस्लाविया के मेरेक
और माइकल इंदौर पहुंच गये और फिलहाल हिंदुस्तानी शादी की रंगीनियां देखने की बजाय
वे होटल सयाजी में बंद पड़े अपनी बालकनी से विकसित होते इंदौर को निहार रहे होंगे.
आखिर एक बारात में एनआरआई मेहमानों का न पहुंच पाना निवेश के लिए आमंत्रित विदेशी
निवेशकों को क्या संदेश देगा? क्या भूमंडलीकरण के दौर में बहुचर्चित ग्लोबल मीट की
सफलता में डूबे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस बात का अहसास
है कि जिस इंदौर को वे सपनों का शहर बनाने का ख्वाब लेकर चल रहे हैं, वह इंदौर आज
सारी दुनिया में किस कदर बदनाम हो चला है?
लेकिन रथयात्रा तो निकली
चर्चा कई दिनों से जोरों पर थी कि भारत की तीसरी और मध्य प्रदेश की पहली विशाल
रथयात्रा निकलने वाली है. लेकिन कर्फ्यू के कारण इदौर के अन्य मोहल्लों से इस
यात्रा में शामिल होने की मंशा रखने वाले भक्त एवं भक्तिनें रथयात्रा में जाने का
विचार त्याग दिये फिर भी पुरी के जगन्नाथ रथयात्रा की तर्ज पर (अहमदाबाद से भी)
निकलने वाली यह बहुप्रतीक्षित रथयात्रा शहर के छत्रीबाग इलाके से निकली. लेकिन अन्य
वर्षों की तुलना में यह अपने पूरे मार्ग से न गुजरकर मंदिर के आसपास की गलियों में
एक किलोमीटर की दूरी तय कर वापस लौट आयी. यात्रा में इंदौर की सांसद सुमित्रा महाजन
शामिल रहीं. भाजपा के अन्य नेताओं के अतिरिक्त बजरंग दल और हिंद रक्षक दल के नेता
भी थे.
हालांकि शहर की बिगड़े माहौल और कर्फ्यू के दौरान रथयात्रा को मंदिर तक ही सीमित
रखने का सुझाव कलक्टर राकेश श्रीवास्तव ने दिया था, लेकिन मंदिर और रथयात्रा से
जुड़े एक पदाधिकारी का कहना था कि हमारे ऐसे कई भक्त हैं जो अपने युवावस्था में
प्रतिदिन मंदिर आकर भगवान का दर्शन कर प्रसाद ग्रहण करते थे लेकिन अब अपनी
रुग्णावस्था के कारण वे मंदिर नहीं आ सकते इसलिए भगवान खुद उनके दरवाजे पर पहुंच
उनको दर्शन देकर ही मानेंगे.
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि इस भगवत यात्रा में तलवारें भी निकल आई थीं, जिनको
कुछ समझदार पदाधिकारियों ने फिर से म्यान में रखवा दिया.
खुदा गवाह! परंपरा 125 साल पुरानी है और थोड़ी कतर-ब्योंत के
साथ यह बनी भी रही लेकिन धन्यवाद किसका करें - सहयोगी-समर्पित प्रशासन का कि
धार्मिक-राजनीतिक दबंगई का.
जो हम देख चुके हैं
पिछले वर्षों के दौरान दर्जनों साम्प्रदायिक उपद्रवों को झेल चुके प्रशासन ने कोई
सबक नहीं सीखा है. इंदौर में बीते चार दिनों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो कहीं ना
कहीं प्रशासन की नाकामी भी साफ झलकती है. हालांकि इसके लिए प्रशासन अर्चना भवन
(इंदौर में आरएसएस का मुख्यालय) जाने में भी नहीं हिचका. वैसे लोगों को राहत
पहुचाने के उद्देश्य से सदभावना प्रेरित गैर सरकारी प्रयास भी चलते रहे. जहां
संस्थागत एवं व्यक्तिगत स्तर पर शहर में भोजन, दूध आदि घर तक पहुंचाने के धर्मार्थ
कदम उठाये गये, वहीं एक-दो लोग रेलवे स्टेशन से अपनी निजी गाड़ियों के जरिये बाहर से
आने वालों को गंतव्य स्थान तक पहुचाने में भी मदद की.
स्थानीय भरोसा न्यास से जुड़े समाजसेवी अरविंद मंडलोई ठीक ही कहते हैं कि लोग जानते
हैं कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की जद्दोजहद में फंसा आम आदमी कभी दंगों में शामिल
नहीं होता. ये तो चंद सिरफिरों का ही काम है.
मंडलोई का विश्लेषण है कि राज्य में दंगो के पीछे जो भी शक्तियां या ताकतें सक्रिय
हों, आगे चलकर उनको राजनीतिक नुकसान ही होने वाला है. राज्य को सबसे अधिक राजस्व
देने वाले व्यापार केद्रित इस शहर में हम ऐसा पहले भी देख चुके हैं. और ऐसे माहौल
में यदि कोई अल्पसंख्यक सोचता है कि ये दंगे-फसाद उसे भयाक्रांत करके उसकी जमीन को
औने-पौने कीमतों पर हड़प लेने की साजिश है तो क्या वह कुछ गलत सोचता है?
06.07.2008, 04.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशित