देसी को क्यों बाय-बाय
बात पते की
देसी को क्यों बाय-बाय
देविदर शर्मा
एक अमरीकी कंपनी-वर्ल्डवाइड सिरेस लिमिटेड पंजाब में डेयरी किसानों को क्रास
ब्रीडिंग के लिए उच्च गुणवत्ता वाला सीमेन उपलब्ध कराने की योजना बना रही है ताकि
दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जा सके. कुछ दिनों पहले मैंने सुना था कि केरल के पशुपालन
मंत्री स्थानीय गायों की क्रास ब्रीडिंग के लिए डेनमार्क से अच्छी प्रजाति के जानवर
आयात करने की योजना बना रहे हैं.
यह सब एक ऐसे समय हो रहा है जब ब्राजील भारतीय प्रजाति की गायों का सबसे बड़ा
निर्यातक बन गया है. इनकी तीन महत्वपूर्ण प्रजातियां-गिर, कंकरेज और ओंगोल वास्तव
में जर्सी और होल्स्टेन फ्रीजियन की तुलना में अधिक दूध देती हैं.
ब्राजील में हाल में हुई दुग्ध उत्पादन प्रतियोगिता में शुद्ध गिर प्रजाति की गाय
ने एक दिन में 48 लीटर दूध देकर पहला स्थान प्राप्त किया. तीन दिन चली इस
प्रतियोगिता में जिस गाय को दूसरा स्थान मिला वह भी शुद्ध गिर प्रजाति की थी. उसने
एक दिन में 45 लीटर दूध दिया. ओंगोल प्रजाति की गाय को तीसरा स्थान मिला, जिसने 45
लीटर प्रतिदिन दूध दिया.
यह कितना विचित्र है कि हमारे अपने देश में अपनी घरेलू प्रजाति की गायों को अहमियत
नहीं दी जाती. वे इसलिए सड़कों पर घूमने के लिए छोड़ दी जाती हैं, क्योंकि उनकी
उत्पादकता कम है और इसलिए उनकी आर्थिक कीमत भी अधिक नहीं है, लेकिन इन्हीं प्रजाति
की गायें ब्राजील में अपने मालिकों को बहुत लाभ दिला रही हैं.
क्या यह हम सभी के लिए आश्चर्य का विषय नहीं बनना चाहिए कि हाल के वर्र्षो में
ब्राजील भारतीय प्रजाति की गायों का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है? ब्राजील भारतीय
प्रजाति की गायें निर्यात करता है और भारत घरेलू दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए
अमेरिका और यूरोपीय प्रजाति की गायें आयात करता है.
निश्चित रूप से विदेशी प्रजाति की गायों पर निर्भरता हमारे दुग्ध उद्योग के विनाश
का कारण रही है. हमारे नीति-निर्माताओं और योजनाकारों ने घरेलू प्रजाति की क्षमता
का आकलन किए बिना दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए विदेशी प्रजाति का सहारा लिया.
वे यह भूल गए हैं कि भारतीय प्रजातियां घरेलू स्थितियों के लिए सर्वथा अनुकूल होती
हैं. वे प्रचंड गर्मी का भी सामना कर लेती हैं और कम पानी में भी अपना काम चला लेती
हैं. वे लंबी दूरी तय कर सकती हैं, स्थानीय घास के सहारे जिंदा रह सकती हैं और
मौसमी बीमारियों से अपना बचवा कर सकती हैं. यदि उन्हें सही तरह का खाना और माहौल
उपलब्ध कराया जाए तो वे दुग्ध उत्पादन को भी बहुत अधिक बढ़ा सकती हैं.
एक ऐसे देश, जिसने शायद ही अपनी प्राकृतिक संपदाओं पर गर्व किया हो, से यह अपेक्षा
नहीं की जा सकती कि वह अपनी पवित्र गाय को वैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर विकसित कर
सकता है. जहां भारत ने घरेलू प्रजाति की गायों की खूबी समझने से इनकार किया और इस
तरह से दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की संभावनाएं ही समाप्त कर लीं वहींब्राजील ने भारतीय
प्रजाति की गायों की खासियत समझने में देर नहीं लगाई. ब्राजील में आज गायों की जो
सुधरी हुई प्रजातियां हैं उनका मूल वास्तव में भारत में निहित है.
यह 1960 के दशक की बात है, जब ब्राजील ने गायों की कुछ प्रजातियां भारत से मंगाईं,
जिनमें गुजरात की गिर और कंकरेज तथा आंध्र प्रदेश की ओंगोल प्रजाति की गायें शामिल
हैं. शुरुआत में उन्हें मांस निर्यात बढ़ाने के लिए आयात किया गया था, लेकिन जब वे
वहां पहुंची तो ब्राजील ने महसूस किया कि दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की दृष्टि से भी ये
बहुत अच्छा स्त्रोत हैं. अफ्रीका और दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों की तुलना में भारतीय
प्रजाति की गायों की मांग बहुत ज्यादा है.
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पशुओं की सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत में उत्पत्ति संबंधी मिलावट ने
गायों की एक दर्जन से अधिक भारतीय प्रजातियों को लगभग विलुप्त कर दिया
है. |
दुर्भाग्य से अपने देश में नीति-निर्माताओं और योजनाकारों को घरेलू प्रजाति की
अहमियत समझना बाकी है. मुझे इसका कोई कारण नजर नहीं आता कि भारत अपनी कुछ
सर्वश्रेष्ठ प्रजातियों को वापस लाने के लिए ब्राजील के साथ मिलकर काम क्यों नहीं
कर सकता? यदि केवल भारतीय डेयरी और पशु वैज्ञानिकों ने घरेलू प्रजातियों की अनदेखी
नहीं की होती तो भारतीय गायों की नियति एकदम अलग होती. इन पवित्र गायों को सही
अर्थों में हमारे समाज में पूजा जाता और वे आज की तरह सड़कों पर आवारा घूमने के लिए
अभिशप्त नहीं होतीं.
आप भरोसा करें या न करें, लेकिन विश्व की सर्वश्रेष्ठ गिर प्रजाति की गाय वर्ष में
दूध देने के अपने कुल समय में औसतन 5500 लीटर दूध दे सकती है. इनकी तुलना में अपने
देश में उपेक्षित पड़ीं घरेलू प्रजातियों की बात करें तो वे 980 लीटर से अधिक दूध
नहीं दे सकतीं.
स्पष्ट है कि ब्राजीली गिर मोटे तौर पर छह गुना अधिक दूध देती है. यह अधिकतम सीमा
नहीं है. ब्राजील में वर्ष में दूध देने की कुल अवधि में 9000 लीटर दूध तक प्राप्त
किया गया है. इसके आधार पर आप कल्पना कर सकते हैं कि भारतीय प्रजाति की गिर गाय किस
तरह दूध की नदियां बहा सकती है और इस तरह हमारे अपने घरेलू पशुओं की तकदीर बदल सकती
है.
दूसरी ओर उन्नत जर्सी प्रजाति की गाय जिन्हें भारत में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए
बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया, एक वर्ष में औसतन तीन हजार से पांच हजार लीटर दूध
देती हैं. इतना ही नहीं, क्रास ब्रीड के रूप में उत्पन्न की गई जर्सी प्रजाति की
गाय 2500 से 3000 लीटर के आगे नहीं जा पाती.
कल्पना करें कि यदि देश ने विदेशी प्रजातियों का सहारा लेने के बजाय घरेलू
प्रजातियों को विकसित-उन्नत करने पर ध्यान दिया होता तो भारत में दुग्ध उत्पादन
सारे रिकार्ड तोड़ देता. दुर्भाग्य यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि पशुओं की सबसे अधिक
आबादी वाले देश भारत में उत्पत्ति संबंधी मिलावट ने गायों की एक दर्जन से अधिक
भारतीय प्रजातियों को लगभग विलुप्त कर दिया है.
ब्राजील ने भारतीय प्रजाति की गायों के सहारे न केवल दुग्ध उत्पादन को कई गुना
बढ़ाया, बल्कि व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण कई मिश्रित प्रजातियां भी तैयार कर ली
हैं, जो अनेक तरह से लाभ पहुंचा रही हैं. बावजूद इसके अपने देश में तर्क दिया जाता
है कि भारत की घरेलू प्रजातियां अनुत्पादक हैं और दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए
विदेशी प्रजातियों का सहारा लेना एकमात्र उपाय है. हमें इस धारणा से बाहर निकलने की
जरूरत है.
देश का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराना चाहिए कि हमने किस तरह अपनी घरेलू प्रजातियों की
अनदेखी की और इस तरह अपने कृषि और पशु पालन उद्योग को भी भारी क्षति पहुंचाई. जब तक
यह आत्ममंथन नहीं होगा तब तक स्थिति बदलने वाली नहीं है.
29.10.2010, 00.44 (GMT+05:30) पर प्रकाशित