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यह सब करके गये सौदागर ओबामा
बात पते की
यह सब करके गये सौदागर ओबामा
सचिन कुमार जैन
आजकल माहौल यह है कि जो हमें यानी भारत को महाशक्ति कह दे, हम उसके सामने नतमस्तक
हो जाते हैं और यदि ओबामा कहें कि भारत अब विकासशील नहीं है, वह तो विकसित और
शक्तिशाली राष्ट्र बन चुका है, तब तो शाष्टांग मुद्रा यानी उनके चरणों में बिछ कर
प्रणाम करना ही एक मात्र विकल्प बचता है, उनका धन्यवाद करने का! पर यह तो सामने की
बात है, ओबामा ने भारत की तारीफ़ की और जाने क्या-क्या बेच कर चले गये. हम मुग्ध भाव से ओबामा-ओबामा करते रहे.
वह अपना काम करके यह बता गए कि हमारी अपनी सरकार कमज़ोर और समझौतावादी है, इसके
एजेंडे भी साफ़ नहीं हैं और इस पर पूंजीखोरों का कब्ज़ा हो चुका है. ओबामा इस धौंस के
साथ भारत के दौरे पर रहे कि भारत अमरीका के लोगों के रोज़गार और विकास के अवसर छीन
रहा है, और वह उन रोजगारों को वापस लेने आये हैं, पर हमारे प्रधानमंत्री सौम्यता से
ही कह सके कि नहीं, हम आपके रोज़गार नहीं छीन रहे हैं. हमारी सरकार ने किसी मसले पर
यह एक बार भी नहीं कहा कि मिस्टर ओबामा, आपकी बात सही नहीं है.
भारत अपने लिए हर कीमत पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई पद पाने के लिए
पिछले पांच सालों से अमरीका की अघोषित गुलामी-सी ही करता रहा. याद रहे कि छोटे और
अपेक्षाकृत कमज़ोर डेढ़ सौ देशों की आवाज़ और अस्तित्व को दबाने के लिए इस परिषद का
इस्तेमाल किया जाता रहा है. पर अमरीका खुद इस परिषद के निर्णयों का सम्मान नहीं
करता, जैसे ईराक युद्ध की मामले में हुआ था.
भूख और गरीबी को छिपा कर केंद्रीयकृत विकास का कृत्रिम चित्र बना कर मनमोहन,
मोंटेक, चिदंबरम और अब प्रणब यह बताते हैं कि भारत एक महाशक्ति है. इस शक्ति को
हथियारों पर ज्यादा से ज्यादा खर्च, स्वास्थ्य-शिक्षा पर कम से कम सरकारी खर्च और
व्यवस्था के निजीकरण के सूचकों पर तौला जाता है. 78 करोड़ लोग 20 रूपए से कम खर्च
करके जिन्दा रहते हैं, पर उनकी जिंदगी चुनी हुई सरकार की प्राथमिकता में नहीं है.
वह सुरक्षा परिषद का डमरू चाहती थी, जिसके लिए मिस्टर प्रेसिडेंट 8 नवम्बर 2010 को
अपने समर्थन का वायदा कर गए. इस डमरू के लिए भारत की सरकार और कूटनीतिज्ञों ने
कृषि, रोज़गार, उद्योग, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में अमरीका की गुलामी को स्वीकार
कर लिया.
अब सुरक्षा परिषद की सदस्यता को बनाए रखने के लिए भारत को हथियारों और सेना पर अपना
खर्च खूब बढ़ाना होगा, फिर चाहे शिशु मृत्यु दर ऊँची बनी रहे, भुखमरी बढती रहे,
बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और सामान शिक्षा ना मिले, पर हथियारों और युद्धों को चलाये
रखने में भारत भी अपना योगदान देगा. यही था गांधी को अपना आदर्श मानने वाले ओबामा
का मकसद, आखिर हथियारों के उनके उद्योग तभी तो जिन्दा रह पायेंगे जब युद्ध होते
रहेंगे. भारतीय लोकतंत्र की यह सही दिशा नहीं है.
दीवाली पर गैरजिम्मेदाराना व्यवहार करने के साथ-साथ हमारा मीडिया अमरीका के
राष्ट्रपति ओबामा की चरण वंदना में लग गया. वह बार-बार यह बताना चाहता था कि ओबामा
ही भारत देश और भारत के समाज के खेवनहार हैं. पूंजीवाद और बेहद गड़बड़ अर्थव्यवस्था
के कारण बेरोज़गारी-भुखमरी की हालत में पहुँच रहे अमरीका के लोगों के लिए व्यापार और
रोज़गार तलाशने के लिए ओबामा भारत आये और उन्होंने अहसान जताया और यहाँ से डेढ़ लाख
करोड़ रूपए का व्यापार ले गए. इससे 50 हज़ार अमेरिकियों को रोज़गार के अवसर मिलेंगे.
उन्होंने जिन कंपनियों के साथ करार किये हैं, उन कंपनियों को भारत सरकार साढ़े पांच
लाख करोड़ की रियायत देती है. उन्हें किसानों की जमीन छीन कर दी जाती है. उन्हें
शिक्षा और स्वास्थ्य का खुलेआम व्यापार करने की स्वतंत्रता देने वाली नीतियां बनायी
जाती हैं. एक आम भारतीय द्वारा खून पसीने की कमाई पर चुकाए गए करों से इन
व्यापारियों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाया जाता है. अब ये
कम्पनियाँ अमरीका को रोज़गार, व्यापार और ताकत देंगी! हमारा माध्यम वर्ग, जिसमें से
ज्यादातर केवल साम्प्रदायिकता के जी रहे रहे हैं, बस भारत-पाकिस्तान के मसले में ही
उलझे रहे, और परदे की पीछे ओबामा भारत की संभावनाओं का व्यापार करते रहे.
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क्या ओबामा की चालबाज़ी इतनी
बारीक है कि हमारे अर्थशास्त्री और समाज विज्ञानी उसे समझ ही नहीं पाए. |
अब सरकार है कहाँ, जब मीडिया बड़े ही हर्षित भाव से कहता है कि अम्बानी का मतलब कोई
ऐरा-गैरा नत्थू खैरा नहीं है, अम्बानी का मतलब है देश के सकल घरेलु उत्पाद यानी
जीडीपी का 5 फीसदी और वृद्धि दर का 15 फ़ीसदी! यानी जो सरकार जीडीपी पर कुर्बान हो
उसके लिए तो अम्बानी एक भगवान हैं. अम्बानी जैसे 20 पूंजीपति मिल कर देश के 55
प्रतिशत विकास पर नियंत्रण करते हैं. ये 20 पूंजीपति अब ओबामा के बगल में बैठते हैं
और भारत की तरफ से हर वह समझौता करते हैं, जिससे यहाँ भूख, गरीबी तो बढ़ेगी ही, यहाँ
से संसाधन भी पराधीन हो जायेंगे. पर मीडिया न केवल इस विश्लेषण पर मौन रहा, बल्कि
उसने कोशिश की कि इन मूल सवालों को चर्चा या बहस में कोई स्थान ना मिल पाए.
अमरीका का एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक भारत की कंपनियों को लगभग 6 बिलियन डालर का क़र्ज़
देंगे, जिससे अमरीका में बना सामान ही खरीदा जाएगा. दुनिया के स्वयंभू चौधरी का
जलवा देखिये कि उनके आने से उनके देश की कंपनी बोईंग को 4.1 बिलियन डालर के 10
सी-17 परिवहन विमान भारतीय वायु सेना को बेचने का ठेका ही मिल गया. इससे 22160
अमेरिकियों को रोज़गार मिलेगा. यही कंपनी 2.7 बिलियन डालर के 30 व्यापारिक विमान
भारत की स्पाइस जेट कंपनी को बेचेगी. इसके अलावा जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी 822 मिलियन
डालर के वायुयान इंजन इंडियन एरोनाटिकल डवलपमेंट एजेंसी को बेच कर 4440 अमरीकी
लोगों को रोज़गार देगी. क्या ओबामा की चालबाज़ी इतनी बारीक है कि हमारे अर्थशास्त्री
और समाज विज्ञानी उसे समझ ही नहीं पाए या फिर दिल-ओ-दिमाग को बंद रखने की मजबूरी
भारी रही.
भारत की रिलायंस पावर कम्पनी 750 मिलियन डालर की 9 टर्बाइन जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी
से खरीदेगी. इसी कंपनी को एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक 5 बिलियन डालर का क़र्ज़ इसलिए
देगी ताकि उर्जा उत्पादन के लिए रिलायंस अमरीका से सामान खरीदे. इस क़र्ज़ से वह कहीं
और से उपकरण और सामान नहीं खरीद सकेगी.
अमरीका का यही बैंक रिलायंस को मध्य प्रदेश स्थित सासन उर्जा संयंत्र पर खनन के लिए
उपकरण खरीदने में 641 मिलियन डालर की मदद करेगा यानी क़र्ज़ देगा, खुश मत होईये!
रिलायंस को यह क़र्ज़ केवल अमरीका की ही कंपनियों से उपकरण खरीदने के लिए दिया जा रहा
है. अब जरा व्यापार की कुटिलता देखिये. एक तरफ तो इस तरह के समझौते से अमरीका की
कम्पनियाँ लाभ कमाएंगी, वहीँ दूसरी ओर वहां के बैंकों को भी भारत के संसाधनों से
खूब लाभ कमाने का मौका मिल रहा है.
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यह तो केवल कूटनीतिक व्यापार की बानगी भर है. हमें याह जान लेना चाहिए कि वर्ष 2002
से 2009 के बीच अमरीका से भारत को होने वाले निर्यात की राशि 4.1 बिलियन डालर से
चार गुना बढ़ कर 16.4 बिलियन डालर हो गयी है और भारत की तरफ से बढ़ते आयत के कारण
देश की अमरीका पर आर्थिक निर्भरता भी तेजी से बढ़ रही है. ओबामा ने जो रणनीति अपनाई
है, उससे अमरीका के उद्योग ताकतवर बनेंगे और शायद वहां रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे.
लेकिन जब ज्यादातर वस्तुएं और सेवाएँ अमरीका से आयात की जायेंगी, उससे भारत में
रोज़गार के अवसर कम होंगे. इन परिस्थितियों में जबकि भारत में साढ़े चार करोड़
रोज़गार के स्थायी मौके तलाशने की जरूरत है, तब भारत की सरकार ने ओबामा की इस एक
यात्रा में उन्हें 70 अरब रूपए का व्यापार दे दिया.
यह एक नैतिक मसला हो सकता है कि अमरीकी लोगों के भी रोज़गार मिले, परन्तु 53 हज़ार
लोगों के लिए 70 अरब रूपए का व्यापार, यह बहुत भारी कीमत है, जो मनमोहन सिंह के
कूटनीति के चलते चुकाई गयी है.
ओबामा एक ही मकसद से भारत आये थे और वह मकसद था भारत से हर तरह से संसाधनों के
अमेरीकी फायदे के लिए दोहन की संभावना को खुरच-खुरच कर अपने खीसे में डाल कर चल
देना. उनकी नज़र केवल उद्योगों पर ही नहीं रही. खेती और खाद्य सुरक्षा पर भी
उन्होंने गहरे खेल को आगे बढ़ाया.
ओबामा का एक कार्यक्रम है- भविष्य को खिलाना (फीड द फ्यूचर)! खेती के क्षेत्र में
अमरीका भयंकर तरीके से शोध, तकनीकों, उपकरणों और बीजों-उर्वरक-कीटनाशकों के व्यापार
से ही लाभ नहीं कमाना चाह्हता है बल्कि अब कई कम्पनियाँ सीधे खेतों पर कब्ज़ा जमा
चुकी हैं. वे उत्पादन से लेकर खाने की थाली तक को नियंत्रित कर रहे हैं.
भारत में भ्रष्टाचार, लापरवाही, गैर-जिम्मेदारी और गैर जवाबदेहिता का शाप अब अपना
रूप दिखा रहा है. किसानों के सामने हर रोज़ एक संकट खड़ा किया गया, बीज कहाँ से
मिले, सिंचाई कैसे हो, उर्वरक मिलने में देरी होना, नए नए कीटों और बीमारियों के
फसलों को सुनियोजित तरीके से प्रभावित करवाना और फिर बाज़ार का जाल, ये ऐसी समस्याएं
रहीं जिनके कारण 1 करोड़ से ज्यादा किसानों ने खेत छोड़ दिए और 2 लाख किसानों ने
आत्महत्या कर ली.
यह ओबामा के व्यापार के लिए बिलकुल माकूल समय है, जब अमरीकी अंतर्राष्ट्रीय सहायता
एजेंसी (युएसएड), अमरीका के कृषि विभाग और सी आई आई (भारतीय उद्योग परिसंघ) तकनीक,
नवाचार, नए बीजों और किसान पर नियंत्रण के जरिए खेत-व्यापार पर कंपनियों का
नियंत्रण सुनिश्चित करना चाहते हैं.
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एक आंकलन के मुताबिक मिस्टर
प्रेसिडेंट की यह यात्रा लगभग 10 हज़ार करोड़ की पड़ी. |
ओबामा के भारत दौरे के मौके पर जो प्रदर्शनी लगाई गईं, उसका मकसद यह साबित करना था
कि जो भी चुनौतियां खेती और किसानों के सामने हैं उन्हें सरकार के कृषि उत्पाद मंदी
नहीं बल्कि आईटीसी के ई-चौपाल, डूपौं के बीज ही मिटा सकते हैं. इस साल के अंत तक एक
लाख गाँव आईटीसी के ई-चौपाल के कब्जे में होंगे. मतलब यह कि वहां धीरे-धीरे मंडियों
का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा और इसे बाद यह निजी व्यवस्था खेत और किसानों की
दशा-दिशा तय करेगी.
यह भी बताया गया कि आज पेप्सी कंपनी 80 हज़ार किसानों के साथ अनुबंध खेती कर रही है
यानी जो कंपनी चाहे वह किसान से उगवाए. डूपौं नए-नए हायब्रिड बीज लाकर देशी बीजों
को पूरी तरह से ख़त्म करने की और बढ़ रही है, इसी साल इस कंपनी ने धान और मक्का के
16 नए बीजों को बाज़ार में उतारा है. हर नया बीज किसान को कंपनी और उसके तमाम
उत्पादों पर निर्भर बनाता है. मोबाइल, डिजिटल तकनीकों, फिल्मों और प्रशिक्षणों के
साथ-साथ ये कम्पनियाँ अब युवा किसानों को गहरे तक प्रभावित कर रही हैं, ताकि अगली
पीढ़ी तक खेती पर, या कहें कि खेती की सांस्कृतिकता और सामाजिकता पर पूंजीखोर
घरानों-नीतियों-राजनीति का नियंत्रण हो सके. पर हम सब खुश रहे कि ओबामा आये, हमें
उन्होंने गले लगाया, हमारी तारीफ़ की और हमें बेच कर चले गए.
हमारी मीडिया ने यह खूब बताया कि ओबामा की सुरक्षा के लिए अनाप-शनाप इंतजाम किये गए
हैं. इसके लिए अमरीका के 34 युद्धपोतों का पूरा बेड़ा मुंबई के समुद्री इलाके में
तैनात किया गया. कोस्टगार्ड, नौसेना, फास्ट ट्रेक बोट, ढ़ेरों हेलीकाप्टर, सीआईए,
ऍफ़बीआई और ना जाने क्या-क्या उनकी सुरक्षा में आगे थे. इतना ही नहीं उपग्रह के
जरिये उनके आस पास के 4 किलोमीटर के दायरे में नज़र रखी जा रही थी. पहली बार
फैब्रोस्कोप, एम् ओ-8 और एम्-9 जैसे उपकरण लगाए गए. दिल्ली में इस सबके अलावा 15
हज़ार पुलिस जवानों को तैनात किया गया. ओबामा की रहस्यमयी उद्देश्यों से भरपूर 3 दिन
की इस यात्रा में व्यवस्थायों पर 2700 करोड़ रूपए और उनकी सुरक्षा पर 1800 करोड़
रूपए खर्च किये गए.
जो बताया गया, वह तो सरकारी आंकड़ा ही है. भारत की सरकार द्वारा किये गए प्रबंधन पर
कितना खर्च किया गया यह अभी साफ़ नहीं है, पर एक आंकलन के मुताबिक मिस्टर प्रेसिडेंट
की यह यात्रा लगभग 10 हज़ार करोड़ की पड़ी. इसके ठीक दूसरी तरफ 26 सालों से इन्साफ के
लिए लड़ रहे भोपाल के गैस पीड़ितों को मुआवजा और बुनियादी सेवाएँ अनिवार्य रूप से
दिलाने में इस अमरीकी राष्ट्रपति ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिन पर 8 से 9 करोड़
रूपए खर्च करने पड़ते.
मतलब साफ़ है कि ये 3 दिन और ओबामा की यात्रा किसी भी कोण और दृष्टिकोण से मानवीय और
ईमानदार नहीं थी. सिर्फ एक सवाल अमरीकी राष्ट्रपति ने ऐसा क्या किया है जिससे उनकी
जान को इतना खतरा है! लगता तो ऐसा है कि उन्हें हर व्यक्ति से खतरा है. फिर भी
ओबामा बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यही कूटनीति है. और इस दौरान मीडिया एक निर्जीव
मशीन की तरह काम करता रहा. अमरीका के प्रेस सचिव जो भी जारी करते रहे, उसकी नए-नए
रूपों में पैकेजिंग करने भर का काम हमारे मीडिया ने किया, बिना कोई बुनियादी सवाल
किये ! कौन जाने, ओबामा की इस यात्रा पर कोई सवाल हवा में तैरेगा भी या नहीं और ऐसा
होने पर भी उसका जवाब देने की कोई कोशिश होगी या नहीं.
09.11.2010,01.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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