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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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यह सब करके गये सौदागर ओबामा

बात पते की

 

यह सब करके गये सौदागर ओबामा

सचिन कुमार जैन


आजकल माहौल यह है कि जो हमें यानी भारत को महाशक्ति कह दे, हम उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं और यदि ओबामा कहें कि भारत अब विकासशील नहीं है, वह तो विकसित और शक्तिशाली राष्ट्र बन चुका है, तब तो शाष्टांग मुद्रा यानी उनके चरणों में बिछ कर प्रणाम करना ही एक मात्र विकल्प बचता है, उनका धन्यवाद करने का! पर यह तो सामने की बात है, ओबामा ने भारत की तारीफ़ की और जाने क्या-क्या बेच कर चले गये. हम मुग्ध भाव से ओबामा-ओबामा करते रहे.

ओबामा


वह अपना काम करके यह बता गए कि हमारी अपनी सरकार कमज़ोर और समझौतावादी है, इसके एजेंडे भी साफ़ नहीं हैं और इस पर पूंजीखोरों का कब्ज़ा हो चुका है. ओबामा इस धौंस के साथ भारत के दौरे पर रहे कि भारत अमरीका के लोगों के रोज़गार और विकास के अवसर छीन रहा है, और वह उन रोजगारों को वापस लेने आये हैं, पर हमारे प्रधानमंत्री सौम्यता से ही कह सके कि नहीं, हम आपके रोज़गार नहीं छीन रहे हैं. हमारी सरकार ने किसी मसले पर यह एक बार भी नहीं कहा कि मिस्टर ओबामा, आपकी बात सही नहीं है.

भारत अपने लिए हर कीमत पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई पद पाने के लिए पिछले पांच सालों से अमरीका की अघोषित गुलामी-सी ही करता रहा. याद रहे कि छोटे और अपेक्षाकृत कमज़ोर डेढ़ सौ देशों की आवाज़ और अस्तित्व को दबाने के लिए इस परिषद का इस्तेमाल किया जाता रहा है. पर अमरीका खुद इस परिषद के निर्णयों का सम्मान नहीं करता, जैसे ईराक युद्ध की मामले में हुआ था.

भूख और गरीबी को छिपा कर केंद्रीयकृत विकास का कृत्रिम चित्र बना कर मनमोहन, मोंटेक, चिदंबरम और अब प्रणब यह बताते हैं कि भारत एक महाशक्ति है. इस शक्ति को हथियारों पर ज्यादा से ज्यादा खर्च, स्वास्थ्य-शिक्षा पर कम से कम सरकारी खर्च और व्यवस्था के निजीकरण के सूचकों पर तौला जाता है. 78 करोड़ लोग 20 रूपए से कम खर्च करके जिन्दा रहते हैं, पर उनकी जिंदगी चुनी हुई सरकार की प्राथमिकता में नहीं है. वह सुरक्षा परिषद का डमरू चाहती थी, जिसके लिए मिस्टर प्रेसिडेंट 8 नवम्बर 2010 को अपने समर्थन का वायदा कर गए. इस डमरू के लिए भारत की सरकार और कूटनीतिज्ञों ने कृषि, रोज़गार, उद्योग, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में अमरीका की गुलामी को स्वीकार कर लिया.

अब सुरक्षा परिषद की सदस्यता को बनाए रखने के लिए भारत को हथियारों और सेना पर अपना खर्च खूब बढ़ाना होगा, फिर चाहे शिशु मृत्यु दर ऊँची बनी रहे, भुखमरी बढती रहे, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और सामान शिक्षा ना मिले, पर हथियारों और युद्धों को चलाये रखने में भारत भी अपना योगदान देगा. यही था गांधी को अपना आदर्श मानने वाले ओबामा का मकसद, आखिर हथियारों के उनके उद्योग तभी तो जिन्दा रह पायेंगे जब युद्ध होते रहेंगे. भारतीय लोकतंत्र की यह सही दिशा नहीं है.

दीवाली पर गैरजिम्मेदाराना व्यवहार करने के साथ-साथ हमारा मीडिया अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा की चरण वंदना में लग गया. वह बार-बार यह बताना चाहता था कि ओबामा ही भारत देश और भारत के समाज के खेवनहार हैं. पूंजीवाद और बेहद गड़बड़ अर्थव्यवस्था के कारण बेरोज़गारी-भुखमरी की हालत में पहुँच रहे अमरीका के लोगों के लिए व्यापार और रोज़गार तलाशने के लिए ओबामा भारत आये और उन्होंने अहसान जताया और यहाँ से डेढ़ लाख करोड़ रूपए का व्यापार ले गए. इससे 50 हज़ार अमेरिकियों को रोज़गार के अवसर मिलेंगे.

उन्होंने जिन कंपनियों के साथ करार किये हैं, उन कंपनियों को भारत सरकार साढ़े पांच लाख करोड़ की रियायत देती है. उन्हें किसानों की जमीन छीन कर दी जाती है. उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य का खुलेआम व्यापार करने की स्वतंत्रता देने वाली नीतियां बनायी जाती हैं. एक आम भारतीय द्वारा खून पसीने की कमाई पर चुकाए गए करों से इन व्यापारियों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाया जाता है. अब ये कम्पनियाँ अमरीका को रोज़गार, व्यापार और ताकत देंगी! हमारा माध्यम वर्ग, जिसमें से ज्यादातर केवल साम्प्रदायिकता के जी रहे रहे हैं, बस भारत-पाकिस्तान के मसले में ही उलझे रहे, और परदे की पीछे ओबामा भारत की संभावनाओं का व्यापार करते रहे.

क्या ओबामा की चालबाज़ी इतनी बारीक है कि हमारे अर्थशास्त्री और समाज विज्ञानी उसे समझ ही नहीं पाए.


अब सरकार है कहाँ, जब मीडिया बड़े ही हर्षित भाव से कहता है कि अम्बानी का मतलब कोई ऐरा-गैरा नत्थू खैरा नहीं है, अम्बानी का मतलब है देश के सकल घरेलु उत्पाद यानी जीडीपी का 5 फीसदी और वृद्धि दर का 15 फ़ीसदी! यानी जो सरकार जीडीपी पर कुर्बान हो उसके लिए तो अम्बानी एक भगवान हैं. अम्बानी जैसे 20 पूंजीपति मिल कर देश के 55 प्रतिशत विकास पर नियंत्रण करते हैं. ये 20 पूंजीपति अब ओबामा के बगल में बैठते हैं और भारत की तरफ से हर वह समझौता करते हैं, जिससे यहाँ भूख, गरीबी तो बढ़ेगी ही, यहाँ से संसाधन भी पराधीन हो जायेंगे. पर मीडिया न केवल इस विश्लेषण पर मौन रहा, बल्कि उसने कोशिश की कि इन मूल सवालों को चर्चा या बहस में कोई स्थान ना मिल पाए.

अमरीका का एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक भारत की कंपनियों को लगभग 6 बिलियन डालर का क़र्ज़ देंगे, जिससे अमरीका में बना सामान ही खरीदा जाएगा. दुनिया के स्वयंभू चौधरी का जलवा देखिये कि उनके आने से उनके देश की कंपनी बोईंग को 4.1 बिलियन डालर के 10 सी-17 परिवहन विमान भारतीय वायु सेना को बेचने का ठेका ही मिल गया. इससे 22160 अमेरिकियों को रोज़गार मिलेगा. यही कंपनी 2.7 बिलियन डालर के 30 व्यापारिक विमान भारत की स्पाइस जेट कंपनी को बेचेगी. इसके अलावा जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी 822 मिलियन डालर के वायुयान इंजन इंडियन एरोनाटिकल डवलपमेंट एजेंसी को बेच कर 4440 अमरीकी लोगों को रोज़गार देगी. क्या ओबामा की चालबाज़ी इतनी बारीक है कि हमारे अर्थशास्त्री और समाज विज्ञानी उसे समझ ही नहीं पाए या फिर दिल-ओ-दिमाग को बंद रखने की मजबूरी भारी रही.

भारत की रिलायंस पावर कम्पनी 750 मिलियन डालर की 9 टर्बाइन जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी से खरीदेगी. इसी कंपनी को एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक 5 बिलियन डालर का क़र्ज़ इसलिए देगी ताकि उर्जा उत्पादन के लिए रिलायंस अमरीका से सामान खरीदे. इस क़र्ज़ से वह कहीं और से उपकरण और सामान नहीं खरीद सकेगी.

अमरीका का यही बैंक रिलायंस को मध्य प्रदेश स्थित सासन उर्जा संयंत्र पर खनन के लिए उपकरण खरीदने में 641 मिलियन डालर की मदद करेगा यानी क़र्ज़ देगा, खुश मत होईये! रिलायंस को यह क़र्ज़ केवल अमरीका की ही कंपनियों से उपकरण खरीदने के लिए दिया जा रहा है. अब जरा व्यापार की कुटिलता देखिये. एक तरफ तो इस तरह के समझौते से अमरीका की कम्पनियाँ लाभ कमाएंगी, वहीँ दूसरी ओर वहां के बैंकों को भी भारत के संसाधनों से खूब लाभ कमाने का मौका मिल रहा है.
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