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जमायत-ए-इस्लामी का इस्लाम

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जमायत-ए-इस्लामी का इस्लाम

डॉ. असगर अली इंजीनियर


जमायत-ए-इस्लामी-ए-हिन्द के संस्थापक मौलाना मौदूदी, धर्मनिरपेक्ष-प्रजातांत्रिक राजनीति को दूर से ही सलाम करने में विश्वास रखते थे. वे उसे हराम मानते थे. भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने से पहले उन्होंने अपने समर्थकों को पाबंद किया था कि वे भारत की धर्मनिरपेक्ष-प्रजातांत्रिक राजनीति में भाग न लें. परंतु अपनी विचारधारा-चाहे वह धार्मिक हो या राजनैतिक-के अनुरूप आचरण करना किसी व्यक्ति के लिए हमेशा संभव नहीं होता क्योंकि ऐसा करने से उसके समक्ष कई समस्याएं खड़ी हो जाती हैं, जिनका हल उसे ढूंढे नहीं मिलता.

maududi

जमायत-ए-इस्लामी-ए-हिन्द के संस्थापक: मौलाना मौदूदी


मौदूदी द्वारा प्रतिपादित जमायत-ए-इस्लामी की विचारधारा के अनुरूप आचरण में कौन सी व कैसी समस्याएं थीं इसका विस्तृत विवरण इरफान अहमद की हालिया प्रकाशित पुस्तक ''इस्लामिज्म एंड डेमोक्रेसी इन इंडिया'' यानी भारत में इस्लामियत व प्रजातंत्र में है.

यह पुस्तक, दरअसल, एक शोधपत्र है जो कि विभाजन के बाद के भारत में जमायत के मानववैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित है. इसमें उन विचारधारात्मक व व्यावहारिक दिक्कतों व दुविधाओं का उत्कृष्ट विश्लेषण किया गया है, जिनका सामना जमायत और उसके पूर्व छात्र संगठन सिमी को करना पड़ा. सिमी अब जमायत से संबद्ध नहीं है और उसे कथित आतंकवादी संगठन होने के आरोप में प्रतिबंधित कर दिया गया है.

पुस्तक तीन खण्डों व सात अध्यायों में विभाजित है. पहले खण्ड में इरफान ने विषय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उनके द्वारा किए गए शोधकार्य का वर्णन किया है. दूसरे खण्ड का शीर्षक है ''जिगजेग्स टू अल्लाहज़ किंग्डम'' यानी अल्लाह तक पहुंचने का टेढा-मेढा रास्ता और तीसरे का ''अपोजीशन एण्ड निगोसिएशन'' यानी विरोध व वार्ता.

इस पुस्तक के लिए शोधकार्य मुख्यत: अलीगढ व आज़मगढ में किया गया और यह पुस्तक जमायत-ए-इस्लामी-ए-हिन्द की विचारधारा और कार्यशैली को समझने में खासी मददगार हो सकती है.

पुस्तक में जमायत की विचारधारा की अपेक्षाकृत कम और सिमी की सोच की अधिक चर्चा है. जमायत अपने विचारों पर उतनी दृढ़ नहीं रह सकी जितनी कि सिमी. ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि जमायत की तुलना में सिमी कहीं अधिक उग्र व अतिवादी थी. चूंकि सिमी केवल छात्रों का संगठन थी इसलिए व्यावहारिक समस्याओं का संतुलित व परिपक्व हल निकालने की जिम्मेदारी उसके कंधों पर नहीं थी. उसके लिए उग्रवाद व अतिवाद का रास्ता अपनाना आसान था.

धीरे-धीरे सिमी इतनी अतिवादी बन गई कि वह जमायत के लिए शर्मिंदगी का सबब बनने लगी और अंतत: जमायत को उससे अपने संबंध तोड़ने पड़े.

शुरूआती दौर में जमायत ने भी मौदूदी के बताए रास्ते पर चलने की कोशिश की परंतु जल्दी ही उसे यह एहसास हो गया कि यह रास्ता उसे कहीं नहीं ले जायेगा. ज्यादा से ज्यादा वह एक दूसरी सिमी बनकर रह जाएगी. परंतु जमायत के लिए भी अपनी नीतियों व कार्यक्रमों में तुरत-फुरत परिवर्तन करना आसान नहीं था और इसके लिए उसे एक लंबी व जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ा.

हर मुसलमान बड़े गर्व के साथ कहता है कि इस्लाम की नजरों में सभी मुसलमान बराबर हैं. कुरान कहती है कि सभी मुसलमान आपस में भाई-भाई हैं. कुरान सभी मुसलमानों, बल्कि सभी मनुष्यों की समानता पर जोर देती है. परंतु, जैसा कि इरफान लिखते हैं, जमीनी हकीकत इसके ठीक विपरीत है. सभी मुसलमानों को तो छोड़िए, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के परिसर में रहने वाले जमायत के सदस्य, अपने ही संगठन के अलीगढ़ शहर में रहने वाले सदस्यों को अपने समकक्ष मानने के लिए तैयार नहीं हैं.

वे कहते हैं कि चूंकि शहर में रहने वाले जमायत के सदस्य गरीब व अशिक्षित हैं अत: वे उनसे नीचे दर्जे के हैं. यह साफ है कि इस्लाम की शिक्षाओं को अपने रोजमर्रा के जीवन में उतारने की ईमानदार कोशिश बहुत कम मुसलमान करते हैं. किसी भी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति व उसके कुल-खानदान को विचारधारा व धार्मिक शिक्षा की तुलना में कहीं अधिक महत्व दिया जाता है.

अलीगढ़ शहर में रहने वाले मुसलमानों में साक्षरता का प्रतिशत मात्र 10 है और उनमें से 28 प्रतिशत गरीबी की रेखा से नीचे रहकर अपना जीवनयापन करते हैं. इसके विपरीत, अलीगढ़ विश्वविद्यालय परिसर में रहने वाले मुस्लिम, समृद्ध व उच्च शिक्षित हैं और अपने उन साथियों को नीची निगाह से देखते हैं, जो शहर के निवासी हैं.

जमायत को धर्मनिरपेक्षता से कितना परहेज़ था, यह इरफान द्वारा वर्णित इकराम बेग नामक एक नवयुवक की आपबीती से स्पष्ट है. इकराम की शिक्षा एक धर्मनिरपेक्ष स्कूल में हुई थी. वह जमायत की अलीगढ़ शहर इकाई का अमीर बन गया था. उसके पिता वकालत करते थे. इकराम को जमायत का सदस्य बनाए रखने से इस आधार पर इंकार कर दिया गया कि उसके पिता धर्मनिरपेक्ष अदालतों में अपने मुवक्किलों की पैरवी करते हैं.

इकराम को अपने ही पिता से जेहाद करना पड़ा. इकराम का मानना था कि धर्मनिरपेक्ष अदालतों में वकालत कर उसके पिता गुनाह कर रहे हैं. वे अल्लाह के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं और बुतपरस्ती को मजबूती दे रहे हैं.

इकराम का यह भी मानना था कि उसके पिता वकालत से जो पैसा कमा रहे हैं वह हराम है और उस पैसे से खरीदा गया खाना उसे नहीं खाना चाहिए. नतीजतन, इकराम ने इस्लाम की उसकी समझ की खातिर, अपने पूरे परिवार के खिलाफ विद्रोह कर दिया. इतनी संकीर्ण और कट्टर थी जमायत की विचारधारा.
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