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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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ओबामा के 104 शब्द

बाईलाइन

 

ओबामा के 104 शब्द

एम जे अकबर


बराक ओबामा की आत्मकथा फेथ, होप एंड मिसकैरिज, जिसे वे 2013 में लिखेंगे, में भारत पर कितने शब्द होंगे? यदि किताब दो लाख शब्दों की हुई तो अनुपात के हिसाब से इसमें भारत पर 100 से 104 शब्द होने चाहिए.

bush-obama


मेरे अच्छे दोस्त केपी नायर ने अपने एक कॉलम में बताया है कि डॉ मनमोहन सिंह के ‘सबसे अच्छे दोस्त’ जॉर्ज बुश ने एक लाख 95 हजार 456 शब्दों की अपनी किताब डिसीजन पॉइंट्स में भारत पर ठीक 208 शब्द लिखे हैं. और ये 208 शब्द भी स्पष्टीकरण के रूप में हैं, जिनमें 2006 में भारत यात्रा के फौरन बाद इस्लामाबाद जाने को लेकर सफाई दी गई है.

आपको असैनिक एटमी डील तो निश्चित ही याद होगी. 2008 की गर्मियों में यह डील सुर्खियों में थी. तब हर टीवी चैनल ‘सिंह इज किंग’ का ही राग अलाप रही थी. बुश की किताब के 208 शब्द अमरीकी परिप्रेक्ष्य में एटमी डील के महत्व का आकलन नहीं करते. वे यह आकलन करते हैं कि अमरीका की निर्णय क्षमता की केंद्रीय स्थिति में भारत की हैसियत आखिर कितनी है. ये तीन पैरेग्राफ एक दोस्ताना राष्ट्रपति ने लिखे थे, व्हाइट हाउस में रहने वाले किसी दुश्मन ने नहीं.

किताबें ठंडी दलीलों की बुनियाद पर लिखी जाती हैं और उनका स्थान लाइब्रेरी की आलमारियों में होता है. उनमें वह गर्मी नहीं होती, जिन्हें राजकीय यात्रा के दौरान की जाने वाली राजनीतिक लफ्फाजियों में महसूस किया जाता है.

पाकिस्तान की भू-राजनीतिक स्थिति ने उसे दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुए दो महत्वपूर्ण संघर्षो में एक प्रासंगिक ‘रियल एस्टेट’ बना दिया. पहला संघर्ष पश्चिमी जगत और पूर्वी यूरेशिया के बीच हुआ था, जिसे शीतयुद्ध कहा जाता है. दूसरा संघर्ष अमरीका और मुस्लिम जगत में उसके वास्तविक या काल्पनिक शत्रुओं के बीच फिलवक्त जारी है.

पाकिस्तान के नीति निर्माताओं ने पचास के दशक में इस बात को बहुत जल्द समझ लिया था, जब उन्होंने पेंटागन को अपना गॉडफादर स्वीकार लिया. जब विजेता अमरीका ने शीत युद्ध का समापन करने वाले जिहाद में अहम योगदान देने वाले पाकिस्तान की अनदेखी कर दी तो उन्होंने स्वयं को अपमानित अनुभव किया.

लेकिन यही तो दस्तूर रहा है. जज्बात कभी भी जरूरत की जगह नहीं ले सकते. अमरीका से संबंधों के ठंडेपन के दौर में पाकिस्तान ने चीन से मेलजोल बढ़ाना शुरू किया और उसे अपना गॉडफादर 2 मान लिया. यह भी रणनीतिक गठजोड़ था, क्योंकि चीन हिमालयीन संघर्षो की थोड़ी-सी हिस्सेदारी इस भारत विरोधी मुल्क को सौंप देना चाहता था.

9/11 के बाद पाकिस्तान के दिन फिरे और परवेज मुशर्रफ ने इसका फायदा उठाने का मौका नहीं चूका. अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई गठजोड़ चिरस्थायी नहीं होता, क्योंकि सभी को अपने हितों का ख्याल रखना पड़ता है. लेकिन गंभीर अंतर्निहित तनावों के बावजूद अमरीका-पाकिस्तान-चीन के शक्ति संतुलन में एक खास तरह की नफासत भी थी.

चीन ने अमरीका की अर्थव्यवस्था पर ताला जड़ रखा था और पाकिस्तान ने अमरीका की सामरिक नीतियों पर. यदि शाह या उनके वंशज तेहरान में सत्ता में होते तो तस्वीर कुछ और होती, लेकिन ईरान के अड़ियल रुख के चलते अमरीका के सामने कोई और विकल्प नहीं रह गया था, सिवाय इसके कि वह अफगानिस्तान में अपने अभियान का संचालन पूर्वी दिशा से करे. वॉशिंगटन को इसी त्रिकोण के भीतर सतर्कतापूर्वक अपना रणनीतिक खेल खेलना था.

बुश और ओबामा दोनों के ही लिए भारत मुख्यत: एक बाजार है. वे हमारे साझेदार नहीं, सौदागर हैं.


अमरीकी नीतियां चूंकि अमरीकी हितों को देखकर संचालित होती हैं, इसलिए वे हमेशा तर्कसंगत रहती हैं. फिर चाहे राष्ट्रपति बुश हों या ओबामा. बुश और ओबामा दोनों के ही लिए भारत मुख्यत: एक बाजार है. वे हमारे साझेदार नहीं, सौदागर हैं. अमरीकी अर्थव्यवस्था के लिए चीन एक मैन्युफेक्चरिंग बुनियाद है तो भारत वॉलमार्ट के लिए एक अवसर.

अमरीका लगातार यह साफ करता रहा है कि उसकी दिलचस्पी भारत से ज्यादा उसके मध्य वर्ग में है. क्या आपने कभी बुश या ओबामा को पाकिस्तान या यहां तक कि चीन के मध्य वर्ग के बारे में बात करते हुए सुना? बुश इस मामले में खासे स्पष्ट रहे हैं. उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि ‘भारत के शिक्षित मध्य वर्ग में अमरीका के नजदीकी साझेदार होने की क्षमता है.’

दोस्ती कभी ‘किंतु-परंतु’ के दायरे में परवान नहीं चढ़ती. असहमत होना दुश्मनी का सबूत नहीं है और वॉशिंगटन और दिल्ली दोनों के लिए यह बेहतर होगा कि वे असहमतियों से मुंह फेर लेने के बजाय उन्हें स्पष्ट कर लें. अगर ओबामा और मनमोहन सिंह एक-दूसरे से प्रेम न भी करते हों, तब भी वे साथ-साथ हो सकते हैं.

मैं उम्मीद करता हूं कि ओबामा अपनी किताब 2013 में नहीं, 2017 में ही लिख पाएं, लेकिन यह फैसला तो अमरीकी मतदाताओं को लेना होगा.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

14.11.2010, 00.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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