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कहानी- चंद्रकिशोर जायसवाल

कहानी

 

दिवंगत शुभकामनाएं

चंद्रकिशोर जायसवाल


बेटा घर से अपने दफ्तर के लिए चला, तो बूढ़े बाप ने हाँक लगाकर उसे अपने कमरे में बुलाया और एक पत्र थमाते हुए बोला, ''इस पत्र को डाक में डाल देना.''

चंद्रकिशोर जायसवाल


बेटे ने पत्र ले लिया. उसकी नजर पत्र पर लिखे पते पर गयी, तो वह चौंका. उसने पिता से कहा, ''आप किन्हें भेज रहे हैं यह शुभकामना पत्र?''

''अविनाश को भेज रहा हूँ,'' पिता राजीव ने बेटे को जवाब दिया, ''तुम्हें अचरज क्यों हो रहा है? उसे तो हर साल भेजता हूँ नववर्ष की शुभकामनाएँ, पिछले पचास सालों से भेज रहा हूँ. एक उसे ही तो भेजता हूँ.''

''हाँ, मगर उनका तो देहान्त हो गया है न,'' बेटा विजय बोला, ''अब तो लगभग छह महीने हो रहे हैं.''

''अविनाश मर गया?''

''हाँ, मैंने आपको बताया तो था.''

''मुझे बताया था?''

''हाँ, बताया था,'' कमरे में प्रवेश करते हुए विजय की माँ सुनन्दा बोली, ''मेरे सामने ही तो बताया था. आपको कुछ याद नहीं रहता. कई दिनों तक खाना भी नहीं खाया गया था आपसे.''

''मर गया!'' बूढ़े ने पत्नी के चेहरे पर निगाह टिका दी और बुदबुदाया, ''मगर उसे अभी मरना नहीं था.''

''यह तो आपने उस बार भी बुदबुदाया था,'' पत्नी बोली, ''अमर होकर कोई नहीं आया है. एक दिन सबको मरना है.''

''हाँ, मरना है, मगर मुझसे पहले उसे नहीं मरना था,'' पत्नी के चेहरे से निगाह हटाते हुए बूढ़ा बोला, ''यह बात टीस रही है मुझे.''

''मरना-जीना भगवान के हाथ में है.'' पत्नी बोल गयी, मगर बोलकर गयी नहीं, वहीं खड़ी रह गयी.

बाप ने बेटे की ओर निगाह की, ''तुम्हें किसने बताया था?''

''शालिनी का पत्र आया था, उनकी बेटी का.''

''छह महीने पहले पत्र आया था!'' बूढ़ा बुदबुदाया और फिर बेटे से पूछा, ''पत्र तुमने मुझे दिखाया था?''

''नहीं.''

''कहाँ है पत्र?''

''उस पत्र को भी क्या अविनाश बाबू के पत्रों के साथ रख देते?'' सुनन्दा बोलने लगी, ''मरनी का पत्र था, मैंने तत्काल फड़वा दिया था. आपको यह बुरी खबर भी हम लोगों ने बहुत सोच-विचार करने के बाद तीसरे दिन दी थी.''

''जब मर ही गया, तो खबर तुरन्त मिले या तीन दिनों के बाद, क्या फर्क पड़ता है!'' बोलकर चुप हुआ बूढ़ा, तो पत्नी और बेटे को लगा कि वे फिर लम्बी चुप्पी में चले गये.

''इस पत्र का क्या करूँ?'' शुभकामना पत्र की ओर इशारा करते हुए बेटे ने पूछा, ''फाड़ दूँ इसे?''

''नहीं,'' पिता की दृष्टि कठोर थी, ''फाड़ोगे क्यों?''

''तो फिर रख देता हूँ आपकी मेज पर ही.''

''नहीं, मेज पर मत रखो,'' बूढ़े ने कहा, ''इसे साथ ले जाओ, डाक में डाल देना.''

बेटा माँ की ओर देखने लगा.

''जो मैंने कहा, वह करो,'' बूढ़े ने बेटे से कहा, ''इसे डाक में डाल ही देना. मुझे जवाब चाहिये इस पत्र का. फिर से सुनूँ तो कि वह मर गया, कि अविनाश मर गया.''

लम्बी चुप्पी में जाने के पहले बूढ़ा एक बार फिर बुदबुदाया, ''अगर इस एक का जवाब नहीं आता है, तो मैं दूसरा-तीसरा भी भेजूँगा.''

दिवंगत मित्र के नाम भेजे जा रहे उस 'शुभकामना पत्र' को विजय बड़े डाकघर के ढोल में गिराकर ही निश्चिन्त हुआ था.

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पन्द्रहवें दिन डाकिये ने एक पत्र सुनन्दा को थमाया. पत्र लिये हुए सुनन्दा पति के पास आ गयी और उन्हें थमाते हुए बोली, ''यह कैसा पत्र आ गया?''

लिफाफा फाड़कर पति ने अन्दर से एक चिट्ठी निकाली. चिट्ठी पर निगाह जमाते ही उन्होंने पत्नी को सुनाया, ''शुभकामना पत्र है.''

''किसका?''

उसने लिखा था, 'उम्र की आखिरी ढलान पर अब मैंने अपने को समेटना शुरू कर दिया है, राजीव; सारे माया-मोह से मुक्त हो रहा हूँ.


''अविनाश का.''

''किसका?'' पत्नी ने दुबारा पूछा.

''अविनाश नायक का.'' चिट्ठी से निगाह हटाये बिना पति ने जवाब दिया.

पत्नी कई आशंकाओं से घिरी वहीं खड़ी रह गयी. उसने पति को दुबारा-तिबारा चिट्ठी पढ़ लेने दिया और तब पूछा, ''क्या लिखा है?''

''सुनो, मैं पढ़कर सुना देता हूँ,'' बोलकर पति चिट्ठी पढ़ने लगा, ''प्रिय राजीव! ऐसा इस बार नहीं हुआ कि जिस दिन तुम्हारा शुभकामना पत्र मुझे मिले, उसी दिन, या एक दिन आगे पीछे, मेरा शुभकामना पत्र भी तुम्हें मिल जाये. विलम्ब से जा रहा है मेरा पत्र. अब मेरे सारे काम विलम्ब से ही हो रहे हैं.

''ऐसे तो मैं अभी भी काफी स्वस्थ महसूस कर रहा हूँ और अगले दस-पन्द्रह वर्षों तक चोला छोड़ने वाला नहीं हूँ, मगर मेरे हाथ अब काँपने लगे हैं और इस तरह काँपने लगे हैं कि मैं अपना नाम तक नहीं लिख सकता. तुम्हें दुख होगा, यह सोचकर मैं तुम्हें यह बताना नहीं चाहता था, मगर यह मजबूरी थी कि तुम मेरी लिखावट पहचानते हो. अब ऐसा तो नहीं ही हुआ होगा कि बहुत कुछ पहचान के बाहर करते हुए तुमने मेरी लिखावट को भी अपनी पहचान के बाहर कर दिया होगा! मुझे खुशी हो रही है कि तुम्हारे हाथ नहीं काँपते और तुम अभी भी लिख सकते हो. तुम कह सकते हो कि तुम मुझसे अधिक स्वस्थ हो.

''पत्र में मेरे हस्ताक्षर की जगह शालिनी ने मेरा नाम लिख दिया है. मेरे साथ शालिनी को भी याद रखना होगा तुम्हें. शालिनी, मेरी बेटी; इसी शहर में उसकी ससुराल है; सप्ताह में एक बार जरूर आ जाती है मुझे देखने.

''हाँ, अपने नाम के नीचे मैंने अपने अंगूठे की छाप डाल दी है. यह मुझसे सम्भव हो गया. यह निशान नहीं होगा तुम्हारे पास; इसे सुरक्षित रख लेना.''

सुनन्दा को लगा कि वह किसी अथाह में डूबी जा रही है. उसने अचानक बहुत थकावट महसूस की और अपने कमरे में बिस्तर पर जाकर लेटने की इच्छा हो गयी उसकी. वहाँ से खिसकने को हुई, तो पति ने रोक लिया, ''रुको, सुनन्दा, बैठो मेरे पास.''

पति का आग्रह आदेश की तरह लगा. उसका चित्त स्थिर नहीं था; चुपचाप बैठ गयी वह. पति ने खिन्न मुस्कुराहट के साथ बोलना प्रारम्भ किया, ''पत्र में जो कुछ लिखा हुआ है, वह अविनाश का लिखाया हुआ नहीं है. सारा कुछ शालिनी का है. वह हमारे सम्बन्धों को बचपन से जानती आयी है. पत्र में जो कुछ लिखा है शालिनी ने, उसे अपने पिता से उधार ले रखा होगा उसने.''

इतना बोलकर पति ने पत्नी के चेहरे पर निगाह टिकायी, कई क्षणों तक टिकाये रहा और फिर निगाह हटाकर धीरे से बोला, ''चिट्ठी झूठी है. अविनाश मर चुका है.''

सुनन्दा ने कोई जवाब नहीं दिया.

पति ने आगे सुनाया, ''अविनाश के घर में तो अभी कोई नहीं होगा. पत्नी का स्वर्गवास बहुत पहले हो चुका था और उसके दोनों बेटे विदेश में नौकरी कर रहे हैं. शालिनी अभी भी हर सप्ताह आती होगी उस घर में झाड़-बुहार करने. डाकिया मेरा शुभकामना पत्र फेंककर चला गया होगा. जब आयी होगी शालिनी, तब उस पत्र को उठाया होगा.''

कुछ क्षण सुस्ताकर वे फिर बोलने लगे, ''तुम्हारे मुँह से मैंने कितनी ही बार सुना था कि अविनाश की पत्नी बड़ी ही अच्छी औरत है. अब देखो कि उसकी बेटी शालिनी कितनी अच्छी है! उसने तुरन्त अपनी गलती सुधार ली और अब मेरे लिए अपने पिता को मरने देना नहीं चाहती.

''अविनाश मर गया, मगर मैंने यों ही नहीं कहा था कि उसे मुझसे पहले नहीं मरना था. दो साल पहले उसकी एक लम्बी चिट्ठी आयी थी. उस चिट्ठी की कुछ पंक्तियाँ मुझे अभी भी याद हैं. उसने लिखा था, 'उम्र की आखिरी ढलान पर अब मैंने अपने को समेटना शुरू कर दिया है, राजीव; सारे माया-मोह से मुक्त हो रहा हूँ. मगर लगता है कि सारे बंधनों को काट लेने के बाद भी मैं तुम्हारा बंधन नहीं काट पाऊँगा. क्या करूँ मैं?' इस बंधन से बँधा मर गया वह. मेरे मरने के बाद मरता, तो आपसे आप कट जाता उसका यह बंधन भी.''

इतना सुनाकर उन्होंने पत्नी से कहा, ''तुम कहीं जा रही थी; जाओ.''

पत्नी कुछ बोली नहीं, वहाँ से उठी भी नहीं. पति ने उसके चेहरे पर निगाह डाली और बोला, ''अब मुझे कुछ याद नहीं रहता. तुम हर साल मुझे याद दिला दिया करना अविनाश को शुभकामना पत्र भेज देने के लिए.''

पत्नी की आवाज नहीं फूटी, मगर उसने हाँ में अपना सिर हिला दिया.

14.11.2010, 09.03 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

pawan's consultancy services [pawans.consultancy@hotmail.com] New Delhi

 
  i am agree with other readers, such an example of friendship and care. 
   
 

shefali [shefaligemini@gmail.com] delhi

 
  सिर्फ शुभकामनाएं. इससे ज्यादा कुछ नहीं सुझ रहा है. बहुत मर्मस्पर्शी. 
   
 

shyam bihari shyamal [shyamal@vns.jaggran.com] varanasi

 
  बहुत मर्मस्पर्शी रचना. 
   
 

praveen pathak [praveen.pathak1980@gmail.com] raipur (chattishgarh)

 
  कहानी पढ़कर आंसू निकल गए. बहुत बधाई.  
   
 

श्याम [rajbhasha1@gmail.com]

 
  कहानी काफी मर्मस्पर्शी है. दिल की गहरार्इयों को छू गर्इ. 
   
 

श्याम [rajbhasha1@gmail.com]

 
  कहानी काफी मर्मस्पर्शी है. दिल की गहरार्इयों को छू गई. 
   
 

GURU SARAN LAL [gurusaranlal@gmail.com] BILASPUR(C.G.)

 
  कहानी बहुत अच्छी है. दोस्ती की पराकाष्ठा है कहानी में. गहरी संवेदना है. शुभकामनाएं. 
   
 

बृजेश उपाध्याय [brijesh.ekdost@gmail.com] भोपाल

 
  चन्द्रकिशोर जी, मैंने आपकी कहानी पढ़ी , कहानी भावना प्रधान है , इस भावना को आपने शब्दों के जरिये एक सुन्दर अभिव्यक्ति दी है जो पूरे दृश्य को पाठक के सामने रख देता है .... 
   
 

बृजेश उपाध्याय [brijesh.ekdost@gmail.com] भोपाल

 
  चन्द्रकिशोर जी, मैंने आपकी कहानी पढ़ी , कहानी भावना प्रधान है , इस भावना को आपने शब्दों के जरिये एक सुन्दर अभिव्यक्ति दी है जो पूरे दृश्य को पाठक के सामने रख देता है .... 
   
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