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अरुण देव की दो कवितायें

कविता

 

अरुण देव की दो कवितायें


राष्ट्र

arun-dev

छूट गया वह यात्री मैं
जिसकी कोई मंजिल नहीं
न घर, न पता, न देश

जहां-जहां से गुजरती है ट्रेन
जहां-जहां है गति
जहां से कोई जा सकता है कहीं
हूँ मैं वहीँ
उसके अंतिम छोर पर
टाट और मूँज की ओट में अपने घाव सुखाता
अपने को छिपाता, गुम करता हुआ

न मेरा राशन कार्ड है
न राशन
कोई सरकार नहीं मेरी
मेरा मत नहीं

कहीं लोहा गलाता
कहीं कठफोड़वा की तरह लकड़ी खट-खटाता
अपनी मुर्गियों और बकरियों के साथ

मेरे दुधमुहें बच्चे घूम-घूम दिखाते हैं करतब
रस्सी पर चलते हुए
आग से गुजरते, कील पर सोते हुए
यह तो हमारा जीवन ठहरा

मैं तो देखता रहता हूँ वह करतब
जिसने इस धरती के सबसे भले लोगों को
सीखा दिया आग, रस्सी और काँटों के साथ जीना

मेरी औरतें अपने काले जिस्मों से घिस-घिस कर
छुडाती हैं न जाने किसके पाप
सहचर हैं हमारी
इस विपदा में भी रही हमारे साथ

मेरे ये छोटे-छोटे छौने
जो घूमते नंगे-बेखटक
मलिन और अधपके
देश के भविष्य ने जैसे इनके भविष्य से
अपने को अलग कर रखा है

हाँ! बेदखल कर दिया गया है मुझे
इस धरती के मेरे ही हिस्से से
हमारी छाया से भी बेखबर है राष्ट्र!

यह भी पुराने खुदाओं की तरह निकला


मिटकौवा
जब भी मैं उसे पुकारता
पहले पेन्सिल आ खड़ी होती ताज़ी छिली हुई नुकीली

मिटाने की एक उम्र होती है
गलतियों की नहीं

गलतियाँ छिपाईं जा सकती हैं
इस छिपाने को भी दिखाते हुए

प्रारम्भिक पाठशाला में हम मिटा-मिटा कर लिखते हैं
गिरते हुए गर्द के साथ निखरता है हमारा होना
धीरे-धीरे गाढ़ी होती है रौशनाई

जीवन की स्पेलिंग अगर बिगड़ जाए
मिटकौवा नहीं देता अवसर

या तो क्षमा होकर झुक जाएँ
प्रायश्चित में गिर जाएँ
सबसे बेहतर है सज़ा का इरेज़र
धीरे धीरे काली पर्त उतारता हुआ

एक बार फिर मैं कहूँगा
मिटाने की उम्र होती है
गलतियों की नहीं.

17.11.2010, 16.09 (GMT+05:30) पर प्रकाशित