जेम्स बांड को मारने का लाइसेंस
मुद्दा
जेम्स बांड को मारने का लाइसेंस
देविंदर शर्मा
मैं हमेशा से ये समझने में नाकाम रहा हूं कि क्यों सरकारें बचत खातों पर मिलने वाली
ब्याज दर घटाती रहती है. इंग्लैंड में 1996 में बैंक बचत पर सिर्फ एक प्रतिशत ब्याज
दिया जाता था. भारत में बचत पर ब्याज दर क्रमशः घटते-घटते 3.5 प्रतिशत रह गई है. और
यदि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति को मौका दिया जाए तो वो इसे और घटाना
चाहेगी.
इन सालों में घरेलू बचत करने की आदत पर एक तीखा प्रहार हुआ है. कई रुढ़िवादी
अर्थशास्त्रियों के दबाव से और तेजी से बढ़ते हुए उपभोक्ता वस्तुओं के बाज़ारों से
प्रभावित होकर सरकारों ने जानबूझकर बचत करने पर मिलने वाले प्रोत्साहनों को घटा दिया
है.
इसके पीछे उसका कहना है कि आप जितना खर्च करते हैं, उतना ही योगदान आप राष्ट्रीय
अर्थव्य़वस्था में दे रहे हैं. खैर, अगर आप मुझ पर भरोसा नहीं करते हैं तो रूसी
वित्त मंत्री एलेक्सेल कुदरिन के हालिया बयान पर गौऱ फरमाएं, “अगर आप एक पैकेट
सिगरेट पीते हैं, तो इसका मतलब यह है कि आप सामाजिक सेवाओं के विकास, जनसंख्या
वृद्धि करने, बढ़ती जन्मदर को बनाए रखने जैसे सामाजिक समस्याओं को सुलझाने में मदद
करते हैं. लोगों को समझना चाहिए- जो शराब पीते हैं, जो धुम्रपान करते हैं वो
राष्ट्र को ज्यादा मदद कर रहे हैं.”
इसके पीछे का तर्क ये है कि जितना ज्यादा लोग खर्च करते हैं, उतना ज्यादा आर्थिक
विकास होगा. दुर्भाग्य से ये सच नहीं है. जितना ज्यादा लोग खर्च करते हैं और जितनी
कटौती अपनी बचत में करते हैं, लंबे समय के परिप्रेक्ष्य में, उतनी ही देश की
अर्थव्यवस्था अस्थायित्व की ओर जाती है. ये लोगों को आर्थिक दबावों को झेलने की
अक्षमता बढ़ाता है. इसीलिए उनके किसी भी आर्थिक अस्थिरता का सामना करने की कमज़ोरी
भी कई गुना बढ़ जाती है.
उल्टे ये सरकारों पर खर्चों का भारी बोझ डाल देता है और अर्थव्यवस्था खतरनाक ढंग से
झूलना शुरु कर देती है. ऐसी दोषपूर्ण सोच ने ही अमरीकी रियल एस्टेट बुलबुले को 2008
में जन्म दिया था, जहां लोगों के पास अपने ऋण चुकाने के लिए बचत ही नहीं थे और इसी
ने वैश्विक मंदी को हवा दी थी.
ऐसी हिंसक उधार नीतियां, पर्याप्त कानूनी संरक्षण के अभाव में माइक्रोफाइनेंस के
नाम पर गरीबों का “खून चूस” रही हैं. इसी तरह की दोषपूर्ण और कई तरह से अपराधिक
उधार नीतियां पूरे विश्व में गरीबों को लूट रही हैं.
अगर आपको ऐसा लगता है कि जी-20 अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं ने कुछ सीख ले ली है, तो
उसका जवाब न है. वे अपनी उन्हीं दोषपूर्ण नीतियों को जारी रखेंगे और सारा दोषारोपण
किसी “विदेशी हाथ” के उपर कर देंगे. भले ही वो माइक्रोफाइनेंस हो या वैश्विक पूंजी,
वो एक ही रास्ते पर जाते हैं.
इस अनियंत्रित घोड़े पर लगाम लगाने के बजाय अमरीका वो कर रहा है, जो वालस्ट्रीट
चाहता है. वो अपने अल्पकालिक संकट से बचने के लिए अतिरिक्त पैसों का मुद्रण कर रहा
है और चीन को अपने मौजूदा संकट के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है.
हम सभी जानते हैं कि अमरीका और उसके साथी देशों ने बड़े-बड़े डूबंत के लिये राहत
बनाए, जो कि फिर से बैंकों के और कुछ विशेषाकृत लोगों के ही काम आए, इसने वहां के
लोगों को सदमे और खौफ में डाल दिया.
अमरीका अब चीन का व्यापार अधिशेष कम करने की कोशिश कर रहा है और चीन उसकी बात मानने
से इंकार कर रहा है, सही भी है.
क्या ये हास्यास्पद नहीं है कि अमरीका और उसके सहयोगी देश अन्य देशों के मध्य
संतुलित विकास की बात करते हैं, जिससे के कुछ देश तेजी से विकास न कर पाएं और कुछ
अन्य इसका फायदा उठाएं ? कब से अमीर और औद्योगीकृत देश दूसरे देशों में संतुलित
विकास के बारे में सोचने लगे? क्यों न इसी नीति को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के
परिप्रेक्ष्य में भी अपनाया जाए?
कृषि को ही लें. कृषि के वैश्विक व्यापार का लगभग 35 प्रतिशत अमरीकी और यूरोपियन
यूनियनों के पास है. अमरीका ने बार-बार विकासशील देशों के बाजारों में जबरदस्ती
प्रवेश करने की इच्छा दोहराई है. विश्व व्यापार संगठन को विकसित देशों के कृषि
व्यापार के हितों की सेवा करने के लिए ही बनाया गया है. इस प्रक्रिया में, तीसरी
दुनिया के 149 में 105 देश अभी से ही खाद्य निर्यातक देश बन गए हैं. दोहा विकास
सम्मेलन के सफलतापूर्वक पूरे होने से बाकी देश भी खाद्य निर्यातक बन जाएंगे.
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भारत में, अमीर कॉरपोरेट घरानों
को टैक्स छूटों के नाम पर 5.16 लाख करोड़ रुपए मिलते हैं, जो कि देश के
कुल सालाना बजट का लगभग आधा है. |
अमरीका जिस तरह से विश्व व्यापार संगठन का उपयोग सिर्फ अपने फायदे के लिए करता है,
इसमें उसे कुछ भी गलत नहीं लगता. यहीं पर शुक्रवार को संपन्न हुआ जी-20 देशों का
सियोल सम्मेलन अपन सार्थकता सिद्ध करने में नाकामयाब रहा. न ही जी-20 नेताओं ने
बढ़ते वैश्विक संकट के पीछे आधारभूत परेशानियों में बदलाव लाने के लिए कोई आह्वान
किया.
विश्व का ज्यादातर आर्थिक संकट अमरीका से उत्पन्न होता है, जिसने कई सालों में
विकास को मजबूती देने के लिए प्राकृतिक संसाधनों को खत्म किया है और ऋण को कई गुना
बढ़ाया है. दूसरे शब्दों में अमीर देशों ने आक्रमकता से ऐसी नीतियों का पालन किया
है, जिन्होंने आर्थिक विषमता को बढ़ाया है.
शोध बताते हैं कि अमरीका में हर साल कुल कमाई का आधा, सिर्फ 10 प्रतिशत जनता के हाथ
में जाता है. इसके साथ ही डेविड रॉकफेलर और टेड टर्नर (बहुराष्ट्रीय कंपनियों के
साथ) असाधारण कृषि सब्सीडी पाते हैं. अमरीका का सरकारी बांड्स में अतिरिक्त 600
बिलियन डॉलर बढ़ाने का फैसला व्यापार के नियमों को और मुश्किल बना देता है. भारत
में, अमीर कॉरपोरेट घरानों को टैक्स छूटों के नाम पर 5.16 लाख करोड़ रुपए मिलते
हैं, जो कि देश के कुल सालाना बजट का लगभग आधा है. ज्यादातर बड़ी अर्थव्यवस्थाओं
में 10 प्रतिशत जनसंख्या के पास संसाधनों के 80 प्रतिशत हिस्सा पर नियंत्रण रहता
है.
कमाई में बढ़ती असामानता, साथ ही घरेलू बचत को हतोत्साहित करने वाली राजकोषीय नीतियां,
शेयर बाजारों को बढ़ावा देते हैं. इस स्थिति में सट्टेबाजी चीजों को नियंत्रित करने
लग जाती है और कठिन नियमों के अभाव में पूंजी प्रवाह आर्थिक नीतियों पर अपना हुक्म
चलाते हैं. पिछले कुछ महीनों में, कृषि वस्तुओं की कीमतें फिर से उत्तरोत्तर
बढोत्तरी देख रहे हैं. कीमतों में 30 प्रतिशत बढ़ोत्तरी के साथ हम नहीं जानते कि
क्या विश्व 2007 में हुए खाद्य दंगों का फिर से गवाह बनेगा. सही मायनों में, जी-20
नेताओं का न सिर्फ अतिरिक्त नकदी प्रवाह पर से बल्कि वैश्विक खाद्य प्रणाली पर से
नियंत्रण हट गया है.
इयान फ्लेमिंग ने जेम्स बांड को मारने का लाइसेंस दिया था. जी-20 सट्टेबाजी करने का
लाइसेंस छीनने में नाकामयाब रही है. इसीलिए वैश्विक पूंजी लगातार एक हत्यारी होड़
में लगी हुई है.
17.11.2010, 18.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित