तबाही के बीज
मुद्दा
तबाही के बीज
देविंदर शर्मा
पिछले कुछ सप्ताह के दौरान मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, बिहार
और झारखंड के हजारों किसान संकट में फंस गए हैं. इन किसानों ने उड़द और तिल की फसल
बोई थी, किंतु फसल में दाने नहीं आए. आर्थिक नुकसान को उठाने में असमर्थ कम से कम
चार किसानों ने आत्महत्या कर ली. हजारों किसान आर्थिक संकट में फंस गए हैं. अनेक
छोटे शहरों, गावों और कस्बों में धरना-प्रदर्शन कर किसानों ने अपना रोष प्रकट किया
है, लेकिन वे इस सरकारी वायदे से अधिक कुछ हासिल नहीं कर पाए कि उन्हें उचित मुआवजा
दिलाया जाएगा.
यह पहली बार नहीं हुआ कि तथाकथित उन्नत बीजों ने किसानों को गच्चा दे दिया. न केवल
राष्ट्रीय बीज निगम, बल्कि मोंसेंटो, पायोनियर हाई-ब्रीड और मायको जैसी
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीज भी अकसर बांझ निकल रहे हैं. या तो इनसे पौधा ही नहीं
बनता या फिर दाना नहीं पनपता. फिर भी, सरकार द्वारा दोषी बीज कंपनियों के खिलाफ कोई
कार्रवाई नहीं की जा रही है और न ही किसानों को उनसे मुआवजा दिलाया जा रहा है.
संसद के वर्तमान सत्र में पेश किए जाने वाला विवादित बीज बिल 2010 किसानों की लंबे
समय से की जा रही मांगों की पूर्ति नहीं करता. इस बिल का मूल मसौदा 2004 में तैयार
किया गया था. खासे विचार-विमर्श के बाद पेश किए जाने वाले इस बिल में बीज कंपनियों
के प्रति नरम रुख अपनाया गया है, जिसमें किसानों के लिए राहत नहीं है. कृषि संसदीय
समिति और अनेक नागरिक समूहों व किसान यूनियनों के महत्वपूर्ण सुझावों की अनदेखी करते
हुए यह बिल बीज उद्योग के सुर में सुर मिला रहा है.
लगता है कि बीज बिल 2010 का मसौदा बीज उद्योग द्वारा तैयार किया गया है और इसका
उद्देश्य किसानों के बजाय बीज उद्योग को लाभ पहुंचाना है. प्रस्तावित संशोधन एक बार
फिर से किसानों की कीमत पर निजी बीज कंपनियों के पक्ष में है.
उदाहरण के लिए, 26 अरब डॉलर की विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनी डूपोंट पहले ही स्पष्ट कर
चुकी है कि वह अपनी प्राथमिकता बदल रही है और अब उसका ध्यान कृषि केमिकल के स्थान
पर बीज की बेहतर नस्लें बेचने पर रहेगा. मोंसेंटो पहले ही बीज बाजार में अपना
सिक्का जमा चुकी है. अन्य बहुराष्ट्रीय बीज कंपनी स्विटजरलैंड की सिनगेंटा भी बीज
बाजार में जड़ें जमा रही है. फिलहाल, पांच सौ से अधिक कंपनिया भारत में अपनी दुकान
सजाने की तैयारी कर रही हैं.
जैसे-जैसे बीज उद्योग विकसित हो रहा है, निम्नस्तरीय और घटिया बीजों की फसल लहलहा
रही है. खासतौर पर हाई-ब्रीड बीजों की बिक्री एक बड़ा फायदेमंद व्यापार बन गया है.
बड़ी संख्या में कुकुरमुत्तों की तरह उभरने वाली बीज कंपनिया घटिया बीज बेचकर
किसानों को मरने के लिए मजबूर कर रही हैं. कड़े नियंत्रणों के अभाव में, किसानों पर
मुसीबत टूट रही है.
बीज बिल 2010 में बीजों की शुद्धता और उर्वरता को मानकों के अनुरूप न रखने पर
अधिकतम एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया है. जाली बीज बेचने
पर एक साल तक की जेल और अधिकतम पांच लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है. खराब बीजों
के कारण किसानों को होने वाले नुकसान का आकलन क्षेत्रीय विशेषज्ञ समिति के सहयोग से
किया जाएगा, जिसके आधार पर किसानों को मुआवजा अदा किया जाएगा.
यह बिलकुल अनुचित है. जब बीज उर्वर नहीं होता और इससे दाना नहीं बनता तो किसान
बर्बाद हो जाता है. यह किसानों के लिए विनाश से कम नहीं है. बहुत से किसान इसका
नुकसान झेलने के बजाय मौत को गले लगाना पसंद करते हैं. इसलिए यह किसानों के लिए
जीने-मरने का सवाल है.
अच्छी फसल न केवल देश की खाद्यान्न सुरक्षा के लिए, बल्कि किसान की आर्थिक सुरक्षा
के लिए भी जरूरी है. इसलिए इनके कारण किसानों को होने वाले नुकसान की पूर्ति महज
बीज के दामों से नहीं हो सकती. क्षतिपूर्ति में आजीविका का खर्च और न्यूनतम दायित्व
राशि होनी चाहिए. इसलिए जरूरत नए बीज दायित्व विधेयक की है.
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टमाटर का बीज 475 रुपये से 76000
रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है. |
परमाणु दायित्व विधेयक की तर्ज पर नए बीज दायित्व विधेयक में भी फसल बर्बाद होने की
स्थिति में न्यूनतम आर्थिक क्षतिपूर्ति का प्रावधान होना चाहिए, जिसकी जिम्मेदारी
बीज कंपनी को वहन करनी चाहिए. कृषि मंत्री शरद पवार बीज उद्योग के प्रति नरम नहीं
हो सकते क्योंकि यह महज उपभोक्ता उत्पाद नहीं है, बल्कि किसान परिवारों की आजीविका
का साधन है. एक फसल की बर्बादी किसानों को कर्ज के मकड़जाल में फंसा सकती है.
नए बीज बिल में बीजों की कीमतों पर नियंत्रण होना चाहिए. किसानों को उचित दामों में
बीज मिलने चाहिए. आजकल कंपनिया अपनी मर्जी से बीजों की कीमतें बढ़ा रही हैं. उदाहरण
के लिए टमाटर का बीज 475 रुपये से 76000 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है.
चूंकि खराब बीजों पर जुर्माना बहुत कम है, इसलिए सरकार निम्नस्तरीय और घटिया बीजों
पर अंकुश नहीं लगा पा रही है. जो कंपनिया ऐसे बीज बेच रही हैं, वे ब्लैकलिस्टेड
होनी चाहिए. इसके अलावा, फसल पूरी तरह बर्बाद होने की स्थिति में बीज कंपनी को फसल
की पूरी कीमत जितना जुर्माना भरने का प्रावधान होना चाहिए.
पुनर्पंजीकरण के प्रावधान से बीज कंपनियों का एकाधिकार बढ़ता है. बीजों का पंजीकरण
नेशनल रजिस्ट्रार ऑफ सीड्स में कराया जा सकता है. यह उचित होगा कि राज्य सरकारों को
भी अधिकार दिया जाए कि उनके राज्य में पंजीकृत बीजों में से किनका इस्तेमाल होगा.
बीज नियंत्रण आदेश, 1983 के तहत पौधारोपण सामग्री और फूलों, सब्जियों व बागवानी
बीजों के अनियंत्रित खुले आयात की अनुमति दे दी गई. इसके बाद गुणवत्ता जांच के बगैर
ही खराब बीजों के खुले आयात की बाढ़ आ गई. इन बीजों के कारण देश में अनेक खतरनाक
कीटों की आवक हो गई है. जिन पर नियंत्रण के लिए भारी मात्रा में कीटनाशकों का
छिड़काव करना पड़ता है. इसलिए तमाम बीज आयात पर गुणवत्ता की स्वतंत्र जाच आवश्यक कर
देनी चाहिए.
नए बिल में क्षतिपूर्ति और खराब बीजों से उपजी फसल के खेतों से निपटान के प्रावधान
की भी आवश्यकता है ताकि फसल बर्बाद होने पर बीजों का निर्यात करने वाली कंपनियों को
जवाबदेय बनाया जा सके. भोपाल गैस त्रासदी के बाद यह और भी आवश्यक हो गया है, जहां
यूनियन कार्बाइड कंपनी जहरीले कचरे की सफाई की जिम्मेदारी से बच निकली थी.
20.11.2010, 01.49 (GMT+05:30) पर प्रकाशित