मनमोहन के 2जीः सोनिया जी, राहुल जी
बाईलाइन
मनमोहन के 2जीः सोनिया जी, राहुल जी
एम जे अकबर
बनावटी लहजे में बात करना अगर जुर्म होता तो मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के कितने लोग
सलाखों के पीछे होते? जिस देश में अंग्रेजी उत्तराधिकार में मिली हो, वहां अच्छी
अंग्रेजी बोलना तारीफ की बात है. अगर कोई खराब अंग्रेजी बोलता है तो इसे भी समझा जा
सकता है क्योंकि यह विदेशी भाषा है.
लेकिन जब कोई ऐसे बनावटी लहजे में अंग्रेजी बोलता है, जिसे बीबीसी ने भी शर्म के
साथ चुपचाप छोड़ दिया था, तो इसे माफ नहीं किया जा सकता. सोलिसिटर जनरल गोपाल
सुब्रह्मण्यम के अस्फुट शब्दों का अर्थ आप नहीं समझ पाए होंगे, लेकिन यह छोटा पाप
है.
जो लोग बनावटी लहजे में बोलते हैं, उनके तर्क भी शायद उतने ही बनावटी होते हैं. यह
बिल्कुल संभव है कि वह मानते हों कि उन्हें तथ्यों की जरूरत नहीं है. उन्होंने पहले
सर्वोच्च न्यायालय और फिर टेलीविजन के माध्यम से भारत के लोगों को बताया कि
उन्होंने मामले से संबंधित सभी फाइलें देख ली हैं और वह अधिकारपूर्वक कह सकते हैं
कि प्रधानमंत्री ने 2जी स्पेक्ट्रम पर अडिग डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी के हर सवाल का
जवाब दे दिया था.
जल्द ही प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि सरकार के दूसरे सबसे बड़े वकील ने अदालत
से भी झूठ बोला और लोगों से भी और उन्होंने अपना वकील बदलकर देश के सबसे बड़े वकील
गुलाम वाहनवटी की सेवाएं लीं. वकीलों का जवाब अब बदल गया और इनमें प्रधानमंत्री
द्वारा नियुक्त राजनीतिक वकील भी शामिल हैं, वे अब टालमटोल की भाषा में बोलने लगे.
जब भी कोई संकट सरकार के घुटनों पर चोट करता है तो पहली प्रवृत्ति के वशीभूत वह
मीडिया की तरफ मुट्ठियां तानने लगती है. कपिल सिब्बल सरीखे एक अपवर्डली मोबाइल
मंत्री मीडिया को सलाह देते हैं कि वह प्रधानमंत्री को दंडित न करे. लेकिन
प्रधानमंत्री दबाव में हैं तो टेलीविजन या अखबारों के कारण नहीं हैं.
उनकी साख कठघरे में है तो प्रशांत भूषण जैसे इंटिग्रिटी-एक्टिविस्टों की कर्मठता और
सर्वोच्च न्यायालय के जजों के कारण है, जिन्हें मजबूर होकर पूछना पड़ा कि जब सबकी
नजरों के सामने यह घोटाला हो रहा था तो उन्होंने उसे रोकने की जहमत क्यों नहीं
उठाई.
यह कोई अचानक, पलक झपकते, छीनो और भागो जैसी कार्रवाई नहीं थी. यह डीएमके का बहुत
सावधानी और समझ-बूझ से बिछाया गया जाल था. उसने जिद के साथ टेलीकॉम मंत्रालय इसीलिए
लिया था क्योंकि वह जानती थी कि लाइसेंसों के आवंटन में कितनी शानदार रेवड़ियां
छिपी हैं.
प्रधानमंत्री मुश्किल में इसलिए हैं क्योंकि डीएमके लगातार पत्र लिखकर उन्हें बताती
रही कि वह किस तरह नियम-कायदों को ताक पर रखकर सलाह-मशविरे या उचित प्रक्रिया का
पालन किए बगैर कीमतें तय करने जा रही है.
प्रधानमंत्री की सहमति उसे अपने पत्रों की पावती के जरिये मिलती रही. इनमें सबसे
महत्वपूर्ण पत्र ए राजा ने नहीं, दयानिधि मारन ने भेजा था, फरवरी 2006 में. मारन ने
साफ-साफ लिखा था कि वह चाहते थे कि कीमतें तय करने का काम, यानी खजाने की चाबी,
निगरानी के दायरे से बाहर हो. यह सत्ता में रहने की कीमत थी, जो डॉ सिंह और सोनिया
गांधी ने चुकाई.
अगर आप इस पूरी कहानी की राजनीतिक पहेली को समझना चाहते हैं तो केवल एक सवाल का
जवाब खोजिए. वह सवाल है : मारन का यह पत्र एक टेलीविजन चैनल को किसने लीक किया? खुद
मारन ने तो यह लीक नहीं ही किया होगा क्योंकि ऐसा करके वह अपने ही पैरों पर
कुल्हाड़ी मारते और उनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति नहीं है.
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वायरल में बदल गए 2जी स्पेक्ट्रम
के बारे में भेजा गया यह मजाक बेहद शानदार था : ‘प्रधानमंत्री ने
चुप्पी तोड़ी. मैं जिन 2 जी को जानता हूं, वे सिर्फ सोनिया जी और राहुल
जी हैं.’ |
ठीक इसी कारण से यह प्रधानमंत्री के पक्ष से भी लीक नहीं किया गया होगा. भाजपा या
दूसरे विपक्षी दलों के पास इस पत्र की प्रति नहीं थी, अगर होती तो वे बाकायदा प्रेस
कांफ्रेंस बुलाते, महज एक विश्वासपात्र संवाददाता को चुपचाप पत्र नहीं सौंप देते.
यह पत्र सरकार के भीतर से ही किसी ने लीक किया, जो डॉ सिंह को कमजोर करना चाहता था.
क्यों? साफ तौर पर इसलिए कि उसे यकीन है कि कमजोर प्रधानमंत्री ज्यादा हमलों की मार
सहने लायक नहीं रह जाएंगे और इसलिए शिखर की कुर्सी जल्दी ही खाली हो सकती है, चूंकि
राहुल तैयार नहीं हैं, इसलिए वह अगला प्रधानमंत्री बन सकता है.
प्रधानमंत्रियों और उनके प्रेस सलाहकारों को दरअसल पत्रकारों की चिंता करना छोड़
देना चाहिए. इसके बजाय उन्हें उन ढेरों गुमनाम लोगों के बारे में चिंता करनी चाहिए,
जो एक से एक मजेदार एसएमएस गढ़ते हैं. प्रधानमंत्री ने भले ही सोची-समझी चुप्पी ओढ़
रखी है, लेकिन जिन मोबाइल कंपनियों ने डीएमके की रेवड़ियां बटोरी हैं, वे न चुप हैं
और न निष्क्रिय.
वायरल में बदल गए 2जी स्पेक्ट्रम के बारे में भेजा गया यह मजाक बेहद शानदार था :
‘प्रधानमंत्री ने चुप्पी तोड़ी. मैं जिन 2 जी को जानता हूं, वे सिर्फ सोनिया जी और
राहुल जी हैं.’ मजाक आलोचना से ज्यादा मारक होता है.
सोनिया जी और राहुल जी अपने-अपने तरीके से डॉ सिंह के समर्थन में आए. श्रीमती गांधी
ने किसी का भी नाम लिए बगैर छोटा-सा उपदेश दिया, मानो अपराध यूएस कांग्रेस ने किया
हो, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने नहीं. जो नुकसान हुआ, वह उन सब बातों से नहीं जो
विपक्ष ने कहीं. नुकसान उन बातों से हुआ जो प्रधानमंत्री ने नहीं कहीं- उनकी खामोशी
से.
जब शब्द खुद आपकी तरफ उंगली उठाने लगें तो खामोशी ही सबसे अच्छा बचाव है. खामोशी की
ताकत क्या है? वकीलों के लिए संभव है कि वे अपनी बातों को उतनी ही आसानी से
तोड़-मरोड़ लें, जैसे अपने लहजे को. डॉ सिंह की प्रामाणिक आवाज हुआ करती थी और यही
कारण है कि लोगों ने उनका विश्वास किया था. अपने लंबे जीवन के बदतरीन संकट के दौरान
वह आवाज उन्होंने गंवा दी है.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और
इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
21.11.2010, 02.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित