मनोज कुमार झा की कवितायें
कविता
मनोज कुमार झा की कवितायें
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तस्वीरः लाल रत्नाकर |
तासीर
मेरी खिड़की के पास केले के पेड़ थे
रात में धुलकर हुई भारी बूँदें बजती थीं टप-टप
तेरे आँगन में नीम के पेड़ थे
मद्धम बोलते बारिश से
मुझे केले के पत्तों पर बारिश जुड़ाती थी
और तुझे नीम के पत्तों पर
वो हमारे होने का वसन्त था
हमने माना कि हर जगह की बारिश होती है सुन्दर
मेरा धूप मांजता था तेरी हरियाली
तेरा धूप मांजता मेरी हरियाली को
हमारी जड़ों ने तज दी मिट्टी
हमारी तनाओं ने तजा पवन
हम ब्रह्माण्ड के सभी बलों से मुक्त थे
नाचते साथ-साथ
अब मुझे मेरी मिट्टी बाँध रही है
मुझे मेरा पवन घेर रहा है
हर दिशा से बलों का प्रहार
आओ, कहो कि कहीं भी हो अच्छी लगती है बारिश
कहो कि बारिश अच्छी केले पर भी नीम पर भी
निर्णय
स्वयं ही चुनने प्रश्न
और उत्तरों को थाहते धँसते चले जाना स्वप्नों के अथाह में
कहीं कोई यक्ष नहीं
कि सौंपकर यात्रा की धूल उतर जाएँ प्यास की सीढ़ियाँ
समय के विशाल कपाट पर अँगुलियों की खटखट
लौट-लौट गूँजती है अपने ही कानों में
ये घायल अँगुलियाँ अन्तिम सहयात्री शरशैय्या-सी
जितना भींग सका पानी में
बदन में जितना घुला शहद
जितना नसीब हुआ नमक
कौन कहेगा-कम है या ज्यादा
खुद ही तौलना
तौलते जाना
जरा सा भी अवकाश नहीं रफवर्क का
और कोई सप्लीमेंट्री कॉपी भी नहीं.
उत्तर-जीवन
खाँसना भी न आया था जब पानी चढ़ गया था ओसारे पर
सब भाग कर एकत्र गाँव में एक ही थी उँची परती
बाँस-काठ पत्ता-पन्नी कुछ जुटा हुए कुछ कच्चे-अधकच्चे खोह
जिसमें कुछ मनुष्य-सा रहे हम,
पाँच बच्चे थे हमारे आस-पास की उमर के जिन्हें
पाँच-पाँच माँओं के दूध का सुख हुआ, पेड़ों के भी दूध
चखे हमने एक गूलर है स्मृति में उपरान्त-कथाओं से झाँकता
अब इतना खाँसता कि कोई कमरा नहीं देता किराए पर
बार-बार हाथ से छूट जाता है भरा हुआ लोटा
ठंढ़ सहने की भी जुगत नहीं गर्मी की भी नहीं
पहली बार एसी देखा शवगृह से लाते वक्त चाचा का पीला शरीर
टूटता गया साही का एक-एक काँटा
कब तक छुछुआये भादो की रात में साही जिनके सारे काँटे झड़ गए
एक मन हुआ था कि सिमरिया-पुल से दे दूँ देह को गंगा में पलटी
आस लगाए मल्लाह की जाल में बाहर आएगा चवन्नी, अठन्नी के साथ नरपिंजर
कि देखो क्या हाल है मनुष्य का गंगा के कछार में
मगर बार-बार बाँध लेती है ब्रह्माण्ड की यह हरी पुतली जिसमें हहाता जल अछोर
नीला
बार-बार पाँव लग जाते हैं खाट के नीचे रखे लोटे में
पूरी मिट्टी पिचपिचा जाती है
कि तभी अँधियाला बिखेर जाता है नाभि की कस्तूरी
खाँसता हूँ तो चतुर्दिक् हवाओं से धुना धूप का कपास फेफड़ा सहलाता है
मलिन मन उतरा जल में कि फाल्गुन बीता विवर्ण
लाल-लाल हो उठता है अंग-अंग अकस्मात्
कौन रख चला गया सोए में केशों के बीच रंग का चूर.
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उत्तर-यात्रा
बहुत दूर से आ रहा हूँ
चिरइ की तरह नहीं
चिरइ तो माँ भी न हुई जो वह चाहती थी
कथरी पर सुग्गा काढ़ते, भरथरी गाते
जुते हुए बैल की तरह आया हूँ
बन्धनों से साँस रगड़ता और धरती से देह
हरियाली को अफसोस में बदल जाने की पीर तले
मेरी देह और मेरी दुनिया के बीच की धरती फट गई है
कि कहीं से चलूँ रास्ते में आ जाता कोई समन्दर
किसके इशारे पर हवा
कि आँखों में गड़ रही पृथ्वी के नाचने की धूल
इतनी धूल
इतना शोर
इतनी चमक
इतना धुँआ
इतनी रगड़
हो तो एक फाँक खीरा और चुटकी भर नमक
कि धो लूँ थकान का मुँह.
डर
यह एक कथा है- यह मैं भूल जाता था, अन्य दर्शक भी भूल जाते थे
इस दृश्य को बहुत अधिक
खींच दिया गया था
सब्जी खरीदने बाजार आई लड़की के पीछे
चार-पाँच शोहदे लग गए थे
ये एक बड़े गुंडे के लड़के थे
लड़की भागती जा रही थी-शॉपिंग मॉल, पुराना चर्च,
नय चमकता मंदिर, मिठाई वाली गली-सब कुछ के पास से
गुजरती लड़की भागती जा रही थी
बगल में नया जोड़ा बैठा था- युवती दुनिया की तरफ
थोड़ी कम खुली हुई निश्चिंत कि उसके जीवन में
नहीं होगा ऐसा कुछ-युवक के कन्धे पर झुकी हुई थी
फिर लड़की गिर पड़ी-एक वृद्धा ने ओह कहा और फिर
तीन चार वृद्धाएँ
जो शायद बचपन की सहेलियाँ थीं
उस दृश्य को वहीं पर्दे पर छोड़
धीमे-धीमे कोई लोकगीत
गाने लगीं
फिर लड़कों ने सीटियाँ बजानी शुरू की
और ठहाके उठने लगे
सीटियाँ, ठहाके और ठहाके
ऊमस के रोऐं कड़े हो गये, अन्धेरे का पानी सूख गया
और लगा बल्व जला दे कोई-चुप रहा, बहुमत इसके खिलाफ था
इतना डर कभी नहीं लगा था इस शहर में
वृद्धाओं का चेहरा घूमा द्वार की तरफ
मगर शोर ने कस दिया था घेरा
मेरी टाँगों में बचा था थोड़ा बल
तड़फड़ बाहर निकला, नया जोड़ा भी
हाथ में हाथ डाले सटे हुए
हाँफते बेटी को फोन किया-
वो घर में माँ से कोई कहानी सुन रही थी
फिर लौटा, नया जोड़ा भी-
अब तक हीरो आ गया होगा.
22.11.2010, 00.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित