आत्मघाती दस्ते में शामिल सांसद
बात पते की
आत्मघाती दस्ते में शामिल सांसद
रघु ठाकुर
देश की संसद और विधानसभाओं का सत्र काल निरंतर कम होता जा रहा हैं. संविधान की
कल्पना तो यह थी कि वर्ष में कम से कम 6 माह संसद चले और देश की समस्याओं पर
प्रस्तावित कानूनों पर गंभीरता से विचार हो परंतु 1952 के बाद से ही क्रमशः संसद का
सत्र काल अनेक प्रकार से कम होता चला गया. चूँकि 6 माह के संसद चलने की अनिवार्य
संवैधानिक व्यवस्था नहीं है अतः इसे सत्ताधीशों ने क्रमशः अपनी सुविधा के अनुसार कम
करना स्वीकृत किया और 21 वीं सदी के आरंभ होते-होते यह घटकर 3 माह के आस पास आ गया.
संसद सत्र के काल में जो छुट्टियाँ होती है उनके दिन गणना में तो आते है परंतु उनमें
बैठके नहीं होती हैं यानी कि अगर एक माह का सतत सत्र हो तो केवल शनिवार रविवार के
आठ दिन के अवकाश स्वमेव कम हो जाएंगे. फिर अन्य त्यौहार और पर्वो के दिन भी घट
जायेंगे. अमूमन ऐसा होता है कि किसी त्यौहार या पर्व के पूर्व संसद के सत्र की एक
मुश्त 4-4, 5-5 दिन की छुट्टी हो जाती है और इस प्रकार सत्र अवधि में बैठक के दिनों
की संख्या और भी कम हो जाती है.
अक्सर माननीय सांसदगण संसद की बैठक के दौरान भी या तो हस्ताक्षर करने के लिए कुछ
समय को हाजिर होते हैं ताकि हाजिरी लग जाए और तकनीकी आवश्यकता पूरी हो जाए या फिर
कभी-कभी अपने प्रश्न आदि के लिए उपस्थित हो जाते है.
अमूमन संसद खाली सीटों से चलती रहती है और कभी कभार जब कोई दल कोरम के अभाव का मुददा
उठाता है तब संसद की घंटियां लम्बे समय तक चिंघड़ती रहती है ताकि कम से कम इतने लोग
सदन में आ जाएं जिससे कोरम पूरा हो जाए. यहां तक कि कई बार तो बड़े महत्वपूर्ण
प्रस्तावों के समय तक कोरम का अभाव हो जाता है और बाद में दलीय नेतृत्व अपने सांसदों
को झिड़की लगाकर या शाब्दिक चेतावनी देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है. शायद
शालाओं के छात्र अपनी स्व प्रेरणा से ज्यादा उपस्थित रहते हैं बजाए हिन्दुस्तान के
सांसदों के.
यही स्थिति लगभग विधानसभाओं की भी है और पिछले कुछ दशकों से खासकर 1985 के बाद से
ऐसी परिपाटी बन रही है कि संसद और विधान सभाओं के सत्र केवल हंगामा, मारपीट,
तोड़-फोड़ नारेबाजी धरना और बहिष्कार में निकल जाते हैं. बहिष्कार की महामारी तो इतनी
आम हो गई है कि लगभग संसद और विधानसभा का सत्र इसी महामारी का शिकार होकर मृत्यु को
प्राप्त हो जाता है. पिछले लगभग 20 दिनों से संसद ठप्प है क्योंकि विपक्ष संयुक्त
संसदीय समिति से 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जाँच की माँग कर रहा है और सरकार संयुक्त
संसदीय समिति के गठन को तैयार नही है बल्कि अन्य कई संस्थाओं यथा सीवीसी आदि से
जाँच की बात कह रही है.
2जी स्पेक्ट्रम घोटाला कोई मामूली घोटाला नहीं है. इसकी अनुमानित राशि 1 लाख 36
हजार करोड़ की है ओर इसी आरोप के आधार पर भारत सरकार के पूर्व संचार मंत्री जो
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के हैं, ए राजा को इस्तीफा देना पड़ा.
जब इस घोटाले की चर्चा को लेकर संसद में हंगामा हुआ और समाचार पत्रों में श्री राजा
के इस्तीफे की चर्चा आई तब डीएमके नेता एम करूणानिधि ने श्री राजा के इस्तीफा देने
से इनकार करते हुए अप्रत्यक्ष धमकी दी कि राजा निर्दोष हैं और अगर इस्तीफा ही देना
होगा तो डीएमके के सभी मंत्री इस्तीफा देंगे.
सुश्री जयललिता ने अपना राजनैतिक दाँव फेकते हुए भारत सरकार के समक्ष चारा फेंका कि
अगर श्री राजा को हटाने से डीएमके इस्तीफा देती है और समर्थन वापिस लेती है तो वे
और उनकी पार्टी केन्द्र सरकार के समर्थन को तैयार हैं. यानी डीएमके और एडीएमके
करूणानिधि और सुश्री जयललिता के लिए 1- 35 लाख करोड़ का भष्टाचार महत्वपूर्ण नहीं है
केवल सियासी दाँव पेच और भष्टाचार के लिए सत्ता की भागीदारी महत्वपूर्ण है.
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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस न तो राजा को ईमानदार कहती है और न ही भष्ट्र
कहने का साहस जुटा पाती है. प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेतृत्व केवल अपनी सरकार को
चलाते रहना चाहते हैं भले भी वह भष्ट्राचार के खम्बों पर खड़ी हो. इतना बढ़ा घोटाला
जो तमिलनाडू की सरकार के वार्षिक बजट से दोगुने के बराबर है. उत्तर प्रदेश, जो देश
के 16 करोड़ की आबादी वाला सूबा है, के वार्षिक बजट से कुछ ज्यादा है. भारत सरकार के
अनेकों मंत्रालयों के वार्षिक बजट से ज्यादा है, यह इन राजनेताओं की परेशानी का सबब
नहीं है.
संसद के सत्र अवधि में औसतन एक दिन का खर्चा 40 से 45 करोड़ रूपया होता है. देश की
जनता की गाढ़ी कमाई का लगभग एक हजार करोड़ रुपया बर्बाद हो चुका है परंतु माननीय
सांसदगण केवल हंगामें में लगे हैं. संसद के सदन में एक दूसरे के खिलाफ नारे लगाते
हैं और फिर दिन भर बाजार में जाकर बीबी-बच्चों या दोस्तों के साथ खरीदी करते हैं,
सिनेमा देखते हैं, होटल बाजी करते हैं और कभी-कभी रात के दौरों में साथ-साथ जाम भी
टकराते हैं.
कांग्रेस के एक अति वरिष्ठ राजनेता की टिप्पणी की थी कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की
जेपीसी से जांच की मांग को स्वीकार करने में क्या परेशानी है. फिर वे खुद ही हॅंसकर
बोले कि वैसे भी आज तक किसी जेपीसी की सर्वसम्मत रिर्पोट न तो आई है न स्वीकारी गई
है. बल्कि अधिकांश संयुक्त संसदीय समितियों की रिर्पोट ही नही बन सकी और जानकारी के
लिये यह उल्लेख करना जरूरी है कि संयुक्त संसदीय समितियों में संसद में दलीय संख्या
के आधार पर प्रतिनिधित्व होता है याने अगर संसदीय समिति बन भी जाय तो उसमे बहुमत
कांग्रेस ओर यूपीए के घटक दलों का ही होगा तथा अध्यक्ष भी यूपीए का ही होगा.
दूसरा ये कि संसद की अवधि समाप्त होने के बाद सयुक्त संसदीय समितियॉं अपने आप
डिंफक्ट यानी निष्क्रिय हो जाती हैं और नई संसद के गठन के बाद अगर पुनः यह मांग उठे
तो नई संयुक्त संसदीय समिति का गठन करना होगा.
इन प्रावधानों के बाद अब देश को यह सफाई कांग्रेस और भाजपा को ही देना होगी कि वे
नूरा कुश्ती के माध्यम से क्या हासिल करना चाहते हैं, और किसे बचाना चाहते हैं.
निष्कर्ष यही निकलता है कि कांग्रेस भाजपा को बचाना चाहती है और भाजपा कांग्रेस को
क्योंकि दोनो ही दागदार हैं.
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जब अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत के दौरे पर आए थे और संसद को
संबोधित किया था तब उनके संबोधन के बाद उनसे हाथ मिलाने माननीय सांसदगण
टेबिल पर लेट-लेटकर झपटे थे. |
लगभग भाजपा की तर्ज पर मप्र की राजधानी भोपाल में विधानसभा के सत्र में कांग्रेस ने
भी वही तरीका अख्तियार किया और विधानसभा नही चलने दी. केवल 11 दिन का सत्र होना था
लेकिन वह भी 4 दिन में ही समाप्त हो गया. 7 दिन पूर्व ही विधान सभा के सत्र अवसान
की घोषणा कर दी गई. अनेकों महत्वपूर्ण प्रस्ताव बगैर प्रतिपक्ष की भागीदारी के
ध्वनिमत से पारित हो गए और कांग्रेस पार्टी उस डंफर घोटाले को आधार बनाकर बहस का और
विरोध का नाटक करती रही, जिसकी चर्चा पिछली विधानसभा के दौरान पटल पर हुई थी तथा
कांग्रेस ने जूलूस निकालकर अपनी नौंटकी की इतिश्री कर ली थी.
उसके बाद पिछले साल 2009 में इस नई विधानसभा का चुनाव भी हो चुका है और नई विधानसभा
का गठन भी हो चुका है. कांग्रेस पार्टी के इस प्रहसन से भाजपा की सरकार और विधायकों
को 29 नवंबर 2010 को उनके दलीय आयोजन गौरव दिवस की तैयारियों के लिए वक्त मिल गया
है. अनेकों भाजपा के विधायकों के मुँह से तथा भोपाल के वरिष्ठ पत्रकारों के मुँह से
मैंने सुना है कि कांग्रेस का यह निर्णय भाजपा नेतृत्व के साथ छिपे समझौते के आधार
पर लिया गया है
हिन्दुस्तान के सांसदों का चरित्र इतना गिर चुका है और उनके आचरण इतने संदिग्ध हो
चुके हैं कि इस बार अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा जब भारत आये तब संसद के
कार्यालय द्वारा माननीय सांसदों को सलाह के रूप में निर्देश दिये गये थे कि वे
शालीनता से पेश आयें और इसका संदर्भ यह था कि पिछले बार जब अमरीकी राष्ट्रपति बिल
क्लिंटन भारत के दौरे पर आए थे और संसद को संबोधित किया था तब उनके संबोधन के बाद
उनसे हाथ मिलाने माननीय सांसदगण टेबिल पर लेट-लेटकर झपटे थे.
संसद या विधान सभायें केवल विधायिका मात्र नहीं हैं बल्कि लोकतंत्र का मंदिर मानी
जाती हैं. लोकतंत्र की आत्मा संसद या विधान सभाओं की दीवालों में नही बसती बल्कि
संसद की कार्यवाही, चर्चा और बहस में होती है. अगर संसद या विधानसभा में बहस और
चर्चा बंद हो जाए तो यह संसद के उपर अंदरूनी हमला होगा.
लगभग 6 वर्ष पूर्व जब हिन्दुस्तान की संसद पर आंतकवादियों ने हमला बोला था तब उस
हमलों से संसद की दीवारों को खतरा था, कुछ सांसदों की जान को खतरा था और कुछ
सुरक्षाकर्मियों की जान को खतरा था जिसकी भरपाई तो हो सकती है परंतु अगर
हिन्दुस्तान की संसद की आत्मा रूपी बहस समाप्त हो जायेगी तो फिर यह सही मायने में
संसद की हत्या होगी और इसके लिए जबावदार कोई बाहरी आतंकवादी नहीं बल्कि माननीय
सांसदगण ही माने जायेंगे.
समूची लोकतांत्रिक प्रणाली के प्रति आम लोगों में जो अविश्वास पैदा हो रहा है, वह
भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है. मैं माननीय सांसदों से अनुरोध करूंगा कि
वे लोकतंत्र के मंदिर को नष्ट करने वाले आत्मघाती दस्ते न बने जिसमें मारने वाला भी
मरता है और मरने वाला भी.
30.11.2010, 16.25(GMT+05:30) पर प्रकाशित