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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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आत्मघाती दस्ते में शामिल सांसद

बात पते की

 

आत्मघाती दस्ते में शामिल सांसद

रघु ठाकुर


देश की संसद और विधानसभाओं का सत्र काल निरंतर कम होता जा रहा हैं. संविधान की कल्पना तो यह थी कि वर्ष में कम से कम 6 माह संसद चले और देश की समस्याओं पर प्रस्तावित कानूनों पर गंभीरता से विचार हो परंतु 1952 के बाद से ही क्रमशः संसद का सत्र काल अनेक प्रकार से कम होता चला गया. चूँकि 6 माह के संसद चलने की अनिवार्य संवैधानिक व्यवस्था नहीं है अतः इसे सत्ताधीशों ने क्रमशः अपनी सुविधा के अनुसार कम करना स्वीकृत किया और 21 वीं सदी के आरंभ होते-होते यह घटकर 3 माह के आस पास आ गया.

मानव बम


संसद सत्र के काल में जो छुट्टियाँ होती है उनके दिन गणना में तो आते है परंतु उनमें बैठके नहीं होती हैं यानी कि अगर एक माह का सतत सत्र हो तो केवल शनिवार रविवार के आठ दिन के अवकाश स्वमेव कम हो जाएंगे. फिर अन्य त्यौहार और पर्वो के दिन भी घट जायेंगे. अमूमन ऐसा होता है कि किसी त्यौहार या पर्व के पूर्व संसद के सत्र की एक मुश्त 4-4, 5-5 दिन की छुट्टी हो जाती है और इस प्रकार सत्र अवधि में बैठक के दिनों की संख्या और भी कम हो जाती है.

अक्सर माननीय सांसदगण संसद की बैठक के दौरान भी या तो हस्ताक्षर करने के लिए कुछ समय को हाजिर होते हैं ताकि हाजिरी लग जाए और तकनीकी आवश्यकता पूरी हो जाए या फिर कभी-कभी अपने प्रश्न आदि के लिए उपस्थित हो जाते है.

अमूमन संसद खाली सीटों से चलती रहती है और कभी कभार जब कोई दल कोरम के अभाव का मुददा उठाता है तब संसद की घंटियां लम्बे समय तक चिंघड़ती रहती है ताकि कम से कम इतने लोग सदन में आ जाएं जिससे कोरम पूरा हो जाए. यहां तक कि कई बार तो बड़े महत्वपूर्ण प्रस्तावों के समय तक कोरम का अभाव हो जाता है और बाद में दलीय नेतृत्व अपने सांसदों को झिड़की लगाकर या शाब्दिक चेतावनी देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है. शायद शालाओं के छात्र अपनी स्व प्रेरणा से ज्यादा उपस्थित रहते हैं बजाए हिन्दुस्तान के सांसदों के.

यही स्थिति लगभग विधानसभाओं की भी है और पिछले कुछ दशकों से खासकर 1985 के बाद से ऐसी परिपाटी बन रही है कि संसद और विधान सभाओं के सत्र केवल हंगामा, मारपीट, तोड़-फोड़ नारेबाजी धरना और बहिष्कार में निकल जाते हैं. बहिष्कार की महामारी तो इतनी आम हो गई है कि लगभग संसद और विधानसभा का सत्र इसी महामारी का शिकार होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है. पिछले लगभग 20 दिनों से संसद ठप्प है क्योंकि विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति से 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जाँच की माँग कर रहा है और सरकार संयुक्त संसदीय समिति के गठन को तैयार नही है बल्कि अन्य कई संस्थाओं यथा सीवीसी आदि से जाँच की बात कह रही है.

2जी स्पेक्ट्रम घोटाला कोई मामूली घोटाला नहीं है. इसकी अनुमानित राशि 1 लाख 36 हजार करोड़ की है ओर इसी आरोप के आधार पर भारत सरकार के पूर्व संचार मंत्री जो द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के हैं, ए राजा को इस्तीफा देना पड़ा.

जब इस घोटाले की चर्चा को लेकर संसद में हंगामा हुआ और समाचार पत्रों में श्री राजा के इस्तीफे की चर्चा आई तब डीएमके नेता एम करूणानिधि ने श्री राजा के इस्तीफा देने से इनकार करते हुए अप्रत्यक्ष धमकी दी कि राजा निर्दोष हैं और अगर इस्तीफा ही देना होगा तो डीएमके के सभी मंत्री इस्तीफा देंगे.

सुश्री जयललिता ने अपना राजनैतिक दाँव फेकते हुए भारत सरकार के समक्ष चारा फेंका कि अगर श्री राजा को हटाने से डीएमके इस्तीफा देती है और समर्थन वापिस लेती है तो वे और उनकी पार्टी केन्द्र सरकार के समर्थन को तैयार हैं. यानी डीएमके और एडीएमके करूणानिधि और सुश्री जयललिता के लिए 1- 35 लाख करोड़ का भष्टाचार महत्वपूर्ण नहीं है केवल सियासी दाँव पेच और भष्टाचार के लिए सत्ता की भागीदारी महत्वपूर्ण है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

बाबा बोतलानंद [jaaltiline@gmail.com] ब्रेवरेज कारपोरेशन

 
  क्या बात है सर. क्या बात है सर. क्या बात है सर. क्या बात है सर. क्या बात है सर. क्या बात है सर.क्या बात है सर. क्या बात है सर. सर में दर्द हो गया सर. क्या करें सर. सर गये मर. 
   
 

बाबा बोतलानंद [] ब्रेवरेज कारपोरेशन

 
  हमने आम जनता को महान बनाया है. पिला-पिला के. आप चाहें तो हमें भी देख सकते हैं पिला-पिला के. 
   
 

IQRAR [hiqrar@ymail.com] KANPUR (INDIA)

 
  DEAR WRITERS PLEASE CONTINUE YOUR JOURNEY. KEEP THIS BEFORE YOUR GOAL.
था अकेला ही चला, जानिब-ए-मंजिल,
लोग मिलते गये और कारवां बनता गया.
दूसरी बात मैं ये कहना चाहूंगा कि दूसरों को ठीक करते-करते कहीं हम तो बिगड़ नहीं रहे हैं? पहले अपनी इसलाह ज़रुरी है और अगर वही न हुई तो लिखना-पढ़ना सब बेकार है.
 
   
 

gangveer singh [gang_sr@rediffmail.com] rahon, nawanshaher,punjab

 
  मुझे लगता है कि जैसे रोमन साम्राज्य में एक कुलीन वर्ग पैदा हो गया था, जो आम लोगो के उपर राज करता था, उसी तरह भारत में एक राजनैतिक कुलीन वर्ग पैदा हो गया है, जो आपस में ही इलेक्शन लड़ते है और लोगों को बहुत बुरी तरह से दबा रहे हैं. लेकिन फिर मैं ये सोचता हूं कि एक दिन लोगों का गुस्सा फूट जायेगा और इस राजनैतिक कुलीन वर्ग का अंत हो जायेगा. जैसे फ्रांस या यूरोप में क्रांति के दौरान हुआ था. 
   
 

IQRAR [hiqrar@ymail.com] KANPUR (INDIA)

 
  गंगवीर जी, मेरा यह मानना है कि कुलीन जनम नहीं लेते बल्कि पैदा होते हैं. जो आज हमारे देश में कुलीन दिखाई दे रहे हैं या दिखने की कोशिश कर-रहे हैं, वो देश और देशवासियों को धोखा दे रहे हैं. मानुष की मानसिकता यही है कि अगर बन- और बना नहीं सकते तो बिगड़ और बिगाड़ कर अपने आपको मशहूर कर लो. हमारी मानसिकता जल्दबाज़ी की है. हम इंतज़ार नहीं कर सकते. मगर जीवधारियों को कुचलने वाले क़दमों को अपने जाती फायदे के लिए रोकेंगे नहीं बल्की बहुत शान से कुचलते हुए चले जायेंगे.
हम महान बाप की औलाद हैं मगर हमने कुलीन बनने की कोशिश नहीं की. हमको उन पर कटाक्ष नहीं करना चाहिए जो यह काम तन-मन-धन से कर रहे हैं. हमारे देश में ज्यादातर तोड़-फोड़ का सहारा लेकर महान बने हैं. जिनलोगों ने कुछ कर-के नाम-कमाया है,वो बहुत कम हैं और वही अपने-आप को कुलीन कहलाने का हक रखते हैं. मैं मजहबी देशों की बात नहीं करता जहाँ असभ्यता ही सभ्यता कहलाती है.
 
   
 

Beena Pandey [beenapandey927@gmail.com] Lucknow

 
  संसद अब सांसदों की हो गयी है.दुर्भाग्य से ये जनता के ही वोटों से सांसद बनाते हैं. रघु जी भारतीय जनता ने सांसदों को खुला छोड़ दिया है चराने-खाने के लिए. वो अलग मस्त ये अलग मस्त! भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ठीक ही लिखा था-\" ये जनता रेल गाडी के डिब्बे की तरह होती है बिना इंजन के चलती ही नहीं. इन्हें जगाने के लिए अब तो भोंपू की ज़रुरत है. 
   
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