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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

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अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

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कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

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सबको खारिज करने का अधिकार

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यह सबके लिये चेतावनी है

 
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बाबा महारिया की चिट्ठी सीएम के नाम

बात पते की

 

बाबा महारिया की चिट्ठी सीएम के नाम

प्रशांत कुमार दुबे भोपाल से


नर्मदा आंदोलन के 25 साल पूरे हो गये लेकिन लड़ाई अब भी जारी है. बाबा आमटे, मेधा पाटकर, स्व. आशीष, आलोक, चितरुपा, कमलू जीजी, कैलाश भाई जैसे नेतृत्वकारी साथियों के अलावा इस लड़ाई की असली ताक़त वे हज़ारों लोग हैं, जो अपनी-अपनी समझ और क्षमता के अनुसार उस लड़ाई का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. मध्यप्रदेश के झाबुआ के जलसिंधी गाँव के निवासी बाबा महारिया ऐसे ही लड़ाकों में से हैं. सालों पहले निरक्षर बाबा महारिया ने अपने साथियों को बोलकर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के नाम एक चिट्ठी लिखवाई थी. गांव, विकास और असल में पूरे जीवन को देखने का जो तरीका होता है, यह पुरानी चिट्ठी उन्हीं से जुड़े सवालों से मुठभेड़ करती है.

नर्मदा के लड़ाके


 

आदरणीय श्री दिग्विजय सिंह,

हम झाबुआ जिले की अलीराजपुर तहसील के जंलसिंधी गांव के ग्रामीण आज आपको मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री होने के नाते यह प्रत्र लिख रहे हैं.

हम नदी किनारे के वाशिन्दे हैं. विशाल नर्मदा के तट पर रहते हैं हम. इस साल सरदार सरोवर बांध से मध्य प्रदेश का डूबने वाला पहला गांव है हमारा जलसिंधी. साथ में कई और गांव सकरजा, काकड़सीला, आकडिया, आदि भी डूबने वाले हैं. इसके चलते हमारे जंगल कट रहे हैं, रोड बन रही है. वैसे तो हम बरसात में डूबते, लेकिन गुजरात सरकार बांध के दरवाजे (जलद्वार) अभी से बंद कर रही है- इसलिए हम सब गर्मी में ही डूब जाएंगे. इतने दिन से आप सुन रहे हैं कि महाराष्ट्र के मणीबेली और गुजरात के बडगांव के लोग डूबने के लिए तैयार हैं. ऐसे ही इस साल मध्यप्रदेश में सरदार सरोवर की पहली डूब में हम भी अपनी जिन्दगी समर्पित करने वाले हैं, लेकिन अपने गांव से हटेंगे नहीं. हमारे गांव में पानी आएगा, घर और खेत डूबेंगे तो इनके साथ हम भी डूब जाएंगे, ये हमारा पक्का इरादा है.

हम ये चिट्ठी आपको सूचित करने के लिए लिख रहे हैं कि सरदार सरोवर की डूब में आने वाले आदिवासी व किसान जलसिंधी में डूबने की तैयारी क्यों कर रहे हैं ?

सरकारी और तमाम शहरी लोग यह मानते हैं कि हम जंगल में रहने वाले, गरीब-गुरबा पिछड़े और बन्दरों की तरह बसर करने वाले लोग हैं. आप लोग हमें समझाते रहते हैं कि तुम लोग गुजरात की मैदानी जमीन पर जाओ, वहां तुम्हारा भला हो जाएगा, तुम्हारा विकास हो जाएगा. पर हम आठ साल से लड़ रहे हैं, लाठी–गोली झेल रहे हैं, कई बार जेल जा चुके हैं. आंजनवाड़ा गांव में पुलिस ने पिछले साल गोलीबारी भी कर दी थी, हमारे घर–बार तोड़ दिए थे. लेकिन हम लोग– ‘मर जाएंगे पर हटेंगे नहीं’ का नारा लगाते हुए आज भी उसी जगह पर बैठे हुए हैं. क्यों? सरकार हमें उजाड़ने के लिए पैसा भी लगा रही है और डन्डे भी मार रही है. ‘फिर भी हम हम नहीं हटेंगे’ कह कर इतनी ताकत क्यों लगा रहे हैं ? अगर गुजरात में हमारा भला होने की बात सच होती तो अभी भी इतने सारे लोग गुजरात जाने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं?

आप सरकारी और शहरी लोगों को हमारा इलाका सिर्फ पहाड़ी ही दिखाई देता है, लेकिन नर्मदा माता के तट पर जंगल व जमीनों के साथ हम लोग इसी पहाड़ी इलाके में सुख से जी रहे हैं. इसी इलाके में हमारी पीढि़यां भी जीती रही हैं. बरसों पहले हमारे पूर्वजों ने जंगलों को साफ करके, देवी–देवताओं का आव्हान करके, जमीनों को सुधारकर और जंगली जानवरों का खतरा मोल लेते हुए गांव को बसाया था. इन्हीं जमीनों पर आज हम लोग खेती कर रहे हैं.

आप सोचते हैं कि हम गरीब हैं. हम गरीब नहीं हैं. मिल-जुलकर अपने घरों को बांध कर हम यहां बसे हुए हैं. हम किसान हैं. हमारे यहां अच्छी फसलें पकती हैं. धरती माता पर हल चलाकर हम फसल पकाते हैं. बरसात में मेघ पानी देते हैं, उससे हम कमाई करके जीते हैं. कन्हीर (जुवार) माता पकती है. हमारी कुछ जमीन पट्टे की है और बाकी नेवाड़ (विवादित जंगल जमीन) है. इन जमीनों में हम बाजरा, जुआर, मक्का, भादी, भट्टी, सांवी, कुद्री, चना, मोठ, उड़द, तुवर, तिल, मुंगफली, आदि सभी पकाते हैं. हमारे यहां तरह-तरह की फसलें हैं. इन्हें हम बदल–बदलकर खाते हैं. इससे भोजन स्वादिष्ट भी लगता है और इसके दूसरे फायदे भी हैं. बरसात आते-जाते हमारा अन्न खतम हो जाता है. खाने की बहुत कठिनाई होती है. तब भादी-भट्टी सरीखी फसलें हम दो महीने में ही पका लेते हैं. इससे हमें खाने को मिल जाता है. बाकी फसलें तीन-चार महीनों में पके तो भी हमारी गुजर हो जाती है.

गुजरात में क्या पकता है? गेहूं और दादरा जुआर (जाड़े की जुआर), तुअर और थोड़ा-बहुत कपास. ये फसलें खाने की कम, बेचने की ज्यादा होती हैं. हम तो खाने के लिए ही उगाते हैं. यदि उससे अधिक मिलता है तो हम इसे कपड़े–लत्ते खरीदने के लिए बेचते हैं. बाजार में कीमतें कम हों या ज्यादा, हमें तो खाने को मिल ही जाता है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sanjeev Kumar Tiwari [sanjeev.tiwari.2010@hotmail.com] Rohtak, Haryana

 
  सरकार की नजर में आदिवासी केवल एक जीव है, मनुष्य नहीं. देश के सभी राज्यों में आदिवासियों के साथ यही किया जा रहा है. पूंजीपतियों के पैसे पर बनने और पलने वाली सरकारों का सारा ध्यान केवल बड़े और पैसे वाले लोगों पर है. ये सरकारें उनके प्रति ही जवाबदेह भी हैं. 
   
 

अभिषेक कश्यप [] , नई दिल्ली

 
  इस चिट्ठी ने हमारी पूरी व्यवस्था और विका के प्रति हमारी समझ की पोल खोल कर रख दी है. प्रशांत जी ने इस चिट्ठी को सामने ला कर बड़ा काम किया है. 
   
 

Himanshu, [patrakar.himanshu@gmail.com] नोयडा

 
  सरकार ने कब आदिवासियों की परवाह की? और हमारे नागर समाज ने भी कब उनके बारे में सोचा? विकास हमेशा आदिवासियों के विस्थापन के साथ ही क्यों संभव हो पाता है? दिल्ली पटना लखनउ शहर के लोगों को कभी विस्थापित क्यों नहीं किया जाता?
इसलिये क्योंकि हमने आदिवासियों को जानवर-बंदरों की तरह मान लिया है.
 
   
 

Aadivasi [] Ujjain

 
  सरकार हमसे डरती है-पुलिस को आगे करती है. अभी तो ये अंगडाई है-आगे और लड़ाई है. जंगल जमीन कुनीं छे-हमरीन छे हमरीन छे. और भी न जाने कितने उद्घोष नर्मदा घटी में गूंजे और अभी तक शांत नहीं हुए क्योकि सरकार हम लोगों के साथ न्याय नहीं कर पायी या शायद सरकार न्याय करना नहीं चाहती. 28 साल से सभी संघर्षरत हैं और रहेंगे जब तक न्याय नहीं मिलता. ये लडाई जारी रहेगी. आशीष भाई अमर रहें. 
   
 

Prashant [prashantd1977@gmail.com] Bhopal

 
  अभिषेक भाई, माफ़ करें !! बड़ा काम तो बाबा ने किया है ये पत्र लिखकर और एक बड़ा काम आपने किया है इसे पढ़कर और समझकर टिप्पणी देने का | हम तो बस निमित्त हैं, हमारे जाले साफ़ करने वाले इस पत्र को लिखने के लिए बाबा का साधुवाद | बाबा के पास तो खजाना है समझ का | आप आइये घाटी मैं चलते हैं और बाबा से मिलेंगे | 
   
 

laxmi narayan awadhiya [awadhiyaln@gmail.com] dindori (mp)

 
  बाबा महरिया का दर्द उन किसानो और आदिवासियों का दर्द है जिन्हें अपनी जन्म भूमि से जुदा किया जा रहा है. हमेशा ऐसा क्यों होता है कि विस्थापन के समय इन लोगों की उन मुश्किलों की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता जिससे यहाँ के वासिंदे लम्बे समय से जूझ रहे हैं. उन्होंने अपनी भुजाओं की ताकत से जमीन को फसल देने लायक बनाया. थोड़ी सी उपज से ही संतुष्ट रहे. सरकारों ने कभी उनकी हालत सुधारने का प्रयास नहीं किया. जब वो मेहनत कर सुख से जी रहे हैं तो उन्हें क्यों उजड़ा जा रहा है. क्या सरकार को पहले सुध नहीं थी कि पथरीली जमीन पर भी जीवन किस तरह पल रहा है. मातृभूमि के आँचल से बिछड़ने का दर्द बाबा महरिया की चिट्ठी में झलकता है. रविवार को धन्यवाद कि इस दर्द को सामने लाये. साथ ही प्रशांत जी को भी. 
   
 

राम मुरारी [ram_murari@yahoo.co.in]

 
  बाबा महरिया की ये चिट्ठी रुलाती है... बेबसी में... कुछ कर ना पाने की बेबसी में... क्या कहें... कुछ समझ में नहीं आता.  
   
 

manmohan [manmohan.gupta940@gmail.com] lucknow

 
  मैं सभी पाठको की तरफ से बाबा महरिया को नमस्कार करता हूं. बड़ा दर्द है आप सभी की कहानी में. यह कहानी जलसिंधी तो एक बानगी भर है, इसे तरह न जाने कितने दर्द है लोगो के दिल में. मैंने एक छोटी से शुरुआत की. ऐसे लोगों की मदद के लिए मैं बाबा से जाकर मिलूंगा और जो इनकी लड़ाई में मदद कर सकता हुं जरुर करुंगा. ऐसे जितनी समस्या हो मैं सभी से अनुरोध करता हूं कि मेरी मेल पर लिखे, धन्यवाद. 
   
 

Pramel Gupta [pramel.gupta@gmail.com] Bhopal

 
  बाबा महरिया के समय का कृषि तरीका गुजरात के एकल फसल को ठेंगा दिखाता है. सही में वही असली कृषि का मजा था. वातावरण और जैव विविधता पूरी तरह से सुरक्षित थी. 
   
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