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उच्च न्यायाधीशों के नाम खुला पत्र
बात पते की
उच्च न्यायाधीशों के नाम खुला पत्र
कनक तिवारी
मान्यवर,
आपको ‘माई लार्ड्स‘ की अंगरेजी जूठन से संबोधित करना अच्छा नहीं लग रहा है, इसलिए
यह विनयशील तथा सांस्कृतिक भारतीय संबोधन उचित है. हाल में सुप्रीम कोर्ट के माननीय
न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू तथा ज्ञानसुधा मिश्रा की खंडपीठ ने विश्व के अप्रतिम
लेखक विलियम शेक्सपीयर के अमर नाटक ‘हैमलेट‘ से उद्धरण देते हुए कुछ माननीय
न्यायाधीशों के आचरण के संदर्भ में देश के सबसे पुराने हाई कोर्ट में भी सड़ांध का
अनुभव किया है. विधायिका और कार्यपालिका की तरह न्यायपालिका संविधान के त्रिभुज का
महत्वपूर्ण अंग है. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर बौद्धिक, अकादमिक और नैतिक
उत्तरदायित्व हैं जिनके पालन के जरिए संविधान के मकसदों को फलीभूत किया जा सकता है.
संविधान की प्रारूप समिति के भविष्य दृष्टि के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर ने
न्यायपालिका की भूमिका को ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत दी थी. उनका सद्भावनापूर्ण
विश्वास था कि भविष्य में ऊंची अदालतों के न्यायाधीश अपेक्षित आदर्श आचरण करेंगे.
यही वजह है कि संविधान में केन्द्र सरकार या संसद का कोई मुख्यालय निर्धारित नहीं
किया गया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली में ही स्थापित करने का उल्लेख है. ऊंची
अदालतों के न्यायाधीशों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और बर्खास्तगी आदि को लेकर
संविधान में इतनी उदार अद्वितीय व्यवस्थाएं हैं कि उनका दुरुपयोग हो रहा है. बहुत
से न्यायाधीश संविधान निर्माताओं की उम्मीदों पर पानी फेर रहे हैं. फिलहाल कुछ
प्रमुख बिन्दुओं पर विमर्श करने की इच्छा हैः-
1. उच्च न्यायालयों में नियुक्ति जिन अधिवक्ताओं को प्रोन्नत कर होती है, उनकी
काबिलियत को तौलने का कोई परोक्ष आधार कहां है? सभी न्यायाधीशगण मिलकर संस्तुति
करते हैं. कुछ अच्छे अधिवक्ताओं पर तो विचारण होता है, लेकिन कई बार जिन्हें उच्चतम
न्यायालय अंगरेज़ी में ‘काली भेड़ें‘ कहता है, भी नियुक्त हो जाती हैं. संविधान इस
संबंध में संशोधन मांगता है. चतुर्थ वर्ग के कर्मचारी तक की नियुक्ति के लिए
प्रतियोगी परीक्षाएं होती हैं. संविधान न्यायालयों के लिए विवेकाधिकार पर आधारित
नियुक्तियां क्यों की जाएं? अखिल भारतीय उच्चतर न्यायिक सेवा के लिए सुप्रीम कोर्ट
को ही प्रत्यक्ष निर्णय क्यों नहीं लेना चाहिए?
2. सुना है उच्च न्यायालयों में सेवानिवृत्ति की उम्र 3 वर्ष बढ़कर 65 वर्ष हो
जाएगी. इस विचार के पीछे कौन से कारण हो सकते हैं. ज़िला न्यायालय से तरक्की पाने
वाले न्यायाधीश देर से उच्च न्यायालय पहुंचने के कारण सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुंच
पाते. शायद उन्हें इससे कोई लाभ मिले. देश में हर नौकरी में बेकारी का प्रतिशत बढ़
रहा है. 62 वर्ष की उम्र में तो लगभग सभी रिटायर हो जाते हैं. ऐसे में यह
विशेषाधिकार क्यों?
3. भाई भतीजावाद की जिस खुले आम फैलती बीमारी का ज़िक्र सुप्रीम कोर्ट के कटाक्ष में
है, उससे देश का कौन सा हाई कोर्ट बरी है? न्यायाधीशों की पत्नियां, बच्चे,
रिश्तेदार सभी अपने परिवार के किसी व्यक्ति के ‘माइ लार्ड‘ बन जाने पर अचानक फलने
फूलने लगते हैं. सरकारें और सरकारी उद्यमों के अतिरिक्त कारपोरेट घराने भी
न्यायाधीशों के संबंधियों को अपना स्थायी वकील बना लेते हैं. कभी-कभी तो एक ही
न्यायाधीश परिवार से जुड़े वकील अलग-अलग पक्षकारों के लिए खड़े हो जाते हैं. लगता है
कोई पारिवारिक सम्मेलन हो रहा हो. संविधान की शपथ लेने वाले न्यायाधीश खुद होकर
क्यों नहीं लिखते कि उन्हें अपने वकील रिश्तेदारों की प्रैक्टिस की वजह से दूसरे
हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया जाए? जस्टिस मार्कंडेय काटजू जैसे पारदर्शी
न्यायाधीश को तब हाई कोर्ट में सड़ांध नहीं सूंघनी पड़ेगी.
4. विवेक, विनय और विचार न्यायाधीश का आभूषण हैं और शक्ति भी. अनुभव कहता है कि कुछ
उच्च न्यायाधीश अपने व्यवहार और विचार में कई बार अभद्र भी हो जाते हैं. उनके लिए
यह संवैधानिक पद केवल व्यावसायिक उत्कर्ष और उत्कृष्टता का हो जाता है. एक ही तरह
के मुकदमे में वे एक वकील पर मुस्कराहट और दूसरे पर अपनी नफरत न्यौछावर कर देते
हैं. आंकड़ों से साफ पता चलेगा कि कुछ वकीलों की वकालत उन दिनों वसंत ऋतु में थी जब
उनका रिश्ता न्यायाधीश से ‘सैंया भये कोतवाल‘ के मुहावरे जैसा था. ‘माइ लॉर्ड‘ चले
गए, तो प्रैक्टिस में भी पतझड़ आ गया.
5. सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश अमूमन मुकदमे की पूरी मिसल पढ़कर आते हैं. मिनटों
में ही सुनवाई होती है. उच्च न्यायालयों के कुछ न्यायाधीश ‘होमवर्क‘ नहीं करते. वे
पूरा मुकदमा वकीलों से सुनते न्यायालय का समय बर्बाद करते हैं. कुछ न्यायाधीश लेकिन
अपनी प्रतिभा के कारण वकीलों को चमत्कृत करते हैं. ये ही न्यायाधीश जब वकील होते थे
तो न्यायाधीशों को चमत्कृत करते थे. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट तरक्की पर जाने के लिए
न्यायाधीशों को वरिष्ठता नहीं योग्यता के आधार पर संस्तुत क्यों नहीं किया जाना
चाहिए?
6. कुछ न्यायाधीश वकालत के दिनों के मोह से मुक्त नहीं होते हैं. अपने ही जूनियर
वकीलों को प्रोत्साहित करना, पूर्व प्रतिद्वन्दी वकीलों पर कटाक्ष करना और अपनी
लोकप्रियता को बढ़ाते रहने के लिए वकील संघों में फूट डालना, पार्टियां देना,
धार्मिक, सामाजिक समारोहों में शामिल होना, रोटरी या लायंस क्लब वगैरह में सक्रिय
रहना, व्याख्यान देने को उत्सुक रहना, वकीलों के साथ क्रिकेट खेलना जैसे बहुत से
ठनगन हैं जिनसे लोकप्रियता का ग्राफ नीचे गिरता नहीं है. शाम को अपने बंगले पर
चुनिंदा वकीलों के साथ चाय कॉफी की चुस्की लेना कुछ न्यायाधीशों का दशकों पुराना
शगल रहा है, जिसमें कुछ वकीलों को कभी नहीं बुलाया जाता.
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7. हिन्दी प्रदेशों में न्यायिक राजकाज की भाषा अभी भी अंगरेज़ी है. फर्राटेदार
अंगरेज़ी बोलने वाले बुद्धिजीवी बेहतर विचारक हों-ऐसा ज़रूरी नहीं है. उच्च न्यायालय
में ऐसे मनोरंजक दृश्य भी होते हैं जब अंगरेज़ी से घबराते न्यायाधीश महोदय मौन या
सुप्तावस्था में होते हैं. एक न्यायाधीश खराब अंगरेज़ी में वकीलों को डांट रहे थे कि
उन्होंने अंगरेज़ी भाषा की ताकत के बारे में अमुक निर्णय में लिखा है-उसे वकीलों ने
क्यों नहीं पढ़ा. कुछ एक फैसलों में क्रियापद, विशेषण और अन्य व्याकरण विधाओं को
लेकर जो लिखा जाता है, उसका ठीक उल्टा अर्थ सही होता है. हिन्दी के प्रति ललक
हिन्दी भाषी प्रदेषों में यदि हो तो पक्षकार भी समझे, उसके मुकदमे का क्या हो रहा
है.
8. अंगरेज़ी विधान बुद्धि में निज विवेक को बहुत महत्व दिया गया है. ज़मानत और स्थगन
दो प्राथमिक अनुतोष हैं जिनके मिल जाने से पक्षकार को संयत होकर अपना पक्ष समर्थन
करने की स्थिति बन जाती है. भारतीय उच्च न्यायालय भी पुलिस की डायरी पढ़कर मुलजिम के
अधिवक्ता से पूछते हैं कि जो कुछ लिखा है उसके आधार पर ज़मानत कैसे दी जाए जबकि ऐसा
करना कतई ज़रूरी नहीं होता. आज़ादी एक संवैधानिक अधिकार है. उसे पुलिसिया आरोप के
आधार पर खंडित नहीं किया जा सकता. स्थगन देने के मामले में भी कुछ न्यायाधीश वह नीर
क्षीर विवेक नहीं दिखाते बल्कि कई बार सरकारी और कारपोरेट घरानों के सलीके से तैयार
किए गए कागज़ातों पर निर्भर हो जाते हैं. न्याय पाने के लिए कमज़ोर या जनता के अकिंचन
वर्ग वहां जाते हैं लेकिन अधिकतर मामलों में क्या होता है?
9. सेवानिवृत्ति के बाद कुछ महत्वपूर्ण सार्वजनिक पदों को केवल न्यायाधीशों के लिए
आरक्षित कर दिया गया है. लोकायुक्त, माध्यस्थम अधिकरण, मानव अधिकार आयोग, प्रेस
काउंसिल, टेलीकॉम अथॉरिटी, विद्युत नियामक आयोग, जांच आयोग, उपभोक्ता फोरम वगैरह
बीसियों पद हैं जिनमें ऊंची अदालतों के न्यायाधीश अगले पांच वर्षों के लिए नियुक्त
हो सकते हैं. ऐसी छूट विश्वविद्यालय के अध्यापकों, संपादकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों,
वकीलों वगैरह को नहीं है. उदाहरणार्थ तकनीकी इंजीनियरिंग प्रकृति के ठेकों को भी
न्यायाधीश कैसे जांच पाते हैं, यदि वे कला संकाय के विद्यार्थी रहे हों?
10. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एक महत्वपूर्ण न्यायिक आयोजन में यह कह
चुके हैं कि देश में कम से कम बीस प्रतिशत ऊंची अदालतों के न्यायाधीश सिद्ध भ्रष्ट
हैं. पिछले दस पंद्रह वर्षों में क्या इसमें इज़ाफा नहीं हुआ होगा? न्यायमूर्ति
काटजू ठीक कहते हैं कि अवमानना कानून के डर से लोग हाई कोर्ट के न्यायाधीशों पर
आरोप नहीं लगा पाते हैं. ऐसे न्यायाधीश ही मूंछों पर ताव ज़्यादा देते हैं.
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय भी इसका अपवाद नहीं रहा है, जहां आरोपित न्यायाधीश काम कर
चुके हैं.
11. अंगरेज़ी लिबास भारतीय न्याय व्यवस्था का परचम क्यों बना हुआ है? इंग्लैंड और
भारत के मौसम में तो ज़मीन आसमान का फ़र्क है. कई बार न्यायाधीशों और वकीलों की
संस्थाओं ने विचार भी किया है. यदि पूरा पोषाकनामा नहीं भी बदले तो फिलहाल गाउन से
तो मुक्ति मिल ही जानी चाहिए. भरी गर्मी में काला कोट और सफेद पट्टिका बांधे ऊंची
अदालतों के इजलास में एयरकण्डीशनर की वजह से तकलीफ नहीं होती लेकिन निचली अदालतों
के न्यायाधीशों और वकीलों सहित पक्षकारों की गर्मी के मौसम में दुर्दशा देखने लायक
होती है. क्या इस सिलसिले में ऊंची अदालतों को विचारण नहीं करना चाहिए?
12. अंगरेज़ गर्मी में अदालतें बंद करता था क्योंकि ‘साहब बहादुर‘ को इंग्लैंड के
मुकाबले बहुत गर्मी लगती थी. तब से गर्मी की छुट्टियां अदालतों का मौलिक अधिकार बन
गई हैं. वक्त बदला है और आधुनिक हुआ है. अब तो अदालतें, मोटर कारें, बंगले सभी कुछ
एयरकण्डीशण्ड हैं जिनमें गर्मी नहीं ठंड लगती है. विद्यार्थियों को छोड़कर बाकी
सरकारी कर्मचारियों को इतनी छुट्टियां नहीं मिलतीं. देश में लाखों करोड़ों मुकदमों
का अंबार है. ऐसे में लंबी लंबी छुट्टियों का क्या औचित्य है?
13. न्यायमूर्तिगण कृष्ण अय्यर, पी. एन. भगवती, के. के. मैथ्यू, कुलदीप सिंह, सगीर
अहमद आदि ने जनहित याचिकाओं का नया आसमान बुना. पोस्टकार्ड पर लिख देने से एक
अकिंचन व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट की न्याय नज़ीरों में अमर याचिकाकार होने का मर्तबा
मिल जाता था. अब बहुत से न्यायाधीशों को यह लगने लगा है कि जनहित याचिकाओं का
दुरुपयोग हो रहा है. उन्होंने कठोर मुद्राएं अपना ली हैं. उसका खमियाजा प्रामाणिक
और ज़रूरतमंद जनहित याचिकाओं को भुगतना पड़ रहा है. ऊंची अदालतों को यह भी तो देखना
होगा कि कहीं झूठे प्रकरण वे लोग तो नहीं चलवा रहे हैं जो जनहित याचिकाओं जैसी
आविष्कृत संस्था के विरोधी हैं.
14. ऊंची अदालतों में मुकदमों की सुनवाई की कई बार प्रक्रिया अलग अलग तरह से
निर्धारित होती जाती है. कुछ मुकदमे अचानक सुन लिए जाते हैं. कुछ सालों साल ठंडे
बस्ते में पड़े होते हैं. कुछ में मिनटों की सुनवाई को भी टाल दिया जाता है. कुछ में
घंटों बहस होती है. उन मुकदमों में अमूमन कम सुनवाई होती है जिनमें ऊंची अदालतों के
न्यायिक प्रशासन को चुनौती दी जाती है. दिल्ली से चार्टर्ड हवाई जहाज में उड़कर मोटी
फीस वाले वकील आते हैं, तब अदालत में सुनवाई कभी नहीं टलती. कुछ बहुत बड़े लोगों के
मामले लगातार सुनवाई कर निपटा दिए जाते हैं. ऐसे में जिनका कोई नहीं है उनका क्या
केवल खुदा ही होगा, न्यायाधीश नहीं?
फिलहाल इन थोड़े से बिन्दुओं पर यदि कोई विमर्श आगे बढ़ सका तो भारतीय जनता और
पक्षकारों के साथ न्याय हुआ, ऐसा लगने की दिशा में एक कदम तो आगे बढ़ेगा. महंगा,
विलम्बित, अन्यायी और खरीद कर लाया गया न्याय और कभी-कभी न्याय के गर्भगृह में
पोषित होता अन्याय वह चारित्रिक लक्षण है, जिससे भारतीय जनजीवन और ईमानदार न्यायिक
परंपराओं को बचाया जाना चाहिए.
आपका शुभचिंतक
कनक तिवारी
14.12.2010, 16.02 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | दीपक [deepakrajim@gmail.com] आबूधाबी | | | |
सीधा-सीधी फ़टकार है ...शायद यह ललकार बने और कुछ हो वैसे बालाकृषणन तो कटघरे मे आ ही गये है ! | | | | | | | | devendra gautam [devendra_gautam23@rediffmail.com] Ranchi, jharkhand | | | |
पूरे कुएं में भ्रष्टाचार की भांग पड़ी हो तो न्यायपालिका को उससे बाहर क्यों रखा जाये. उसके भ्रस्टाचार पर टिका-टिप्पणी क्यों नहीं होनी चाहिए. आपने पहल की. आपको बधाई. | | | | | | | | Himanshu Koushal [dsk_himanshu@yahoo.co.in] seoni (M.P.) | | | |
In democracy public is liable for all whether its right or wrong. JUDGES, IAS, IPS, IFS are all from our society & when we are not honest so why we expect honesty from the people who sit in chair. Ultimately they are also the part of our society. I think the root cause of corruption is that the future of Indians are not secure, Everyone is worried how to live & in develop country there is no problem of employment. | | | | | | | | Deepak Pandey [deepakpssou@gmail.com] Bilaspur (Chhattisgarh) | | | |
मै आपके विचार से सहमत हु. इन पदों के लिए भी वही मापदंड होनी चाहिए जो अन्य के लिए है, चाहए मामला नियुक्ति, रिटायर्मेंट या संपत्ति का ब्यौरा इन्टरनेट पर देने कि क्यों न हो. आखिर सभी मंत्री नौकरशाहों को जब संपत्ति कि ब्यौरा देना आवश्यक है तो न्यायधीश आखिर इससे बच क्यों रहे है. | | | | | | | | deepak [] ghaziabad | | | |
The corruption in judiciary starts from the entrance where stamp paper is available at a premium,and then you enter the mazes inside. | | | | | | | | m5user [m5@medialab.co.in] bhilai | | | |
कुछ न्यायाधीश वकालत के दिनों के मोह से मुक्त नहीं होते हैं. | | | | | | | | Sanjay Kuamr Tomar [sanjaykumar.2010@gmail.com] Bhopal | | | |
बहुत मारक आलेख है. संकट ये है कि इस लेख पर आपके खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला भी चल सकता है. | | | | | | | | AMAAN [abooamaan@yahoo.com] AZAMGARH | | | |
PLS SOMTHING WRITE ABOUT NREGA CURRUPTION. | | | | | | | | pragya [pandepragya30@yahoo.co.in] luchknow | | | |
भ्रष्टाचार से कुछ तो बच पाता. | | | | | | | | Beena [beenapandey927@gmail.com] Lucknow | | | |
न्यायपालिका की अविकसित प्रणाली पर करार तमाचा..! आमतौर पर न्यायपालिका पर लिखने में संकोच किया जाता है लेकिन आपकी हिम्मत को दाद देनी होगी.
एकदम शानदार लेखन! | | | | | | |
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