पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

माफ़ी की वह माँग तो भाव-विभोर करने वाली थी

संघर्ष को रचनात्मकता देने वाले अनूठे जॉर्

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > मुद्दा > उत्तराखंडPrint | Send to Friend 

दास्तां-ए-मानुष : विनोद जमलोकी

दास्तां-ए-मानुष तीन

वार्तालेख


पीयूष दईया

 

सन् 1999 में उत्तराखंड के रांउलेक गांव, ज़िला: रूद्रप्रयाग में आए भू-स्खलन से प्रभावित कमला देवी, शेरीलाल, नर्मदा देवी और चैता देवी के विवरण पिछले दिनों प्रकाशित हुए थे. कुछ और प्रभावितों के विवरण यहां उन्हीं की जुबानी में हैं.

 

 

विनोद जमलोकी

! अनजान

 

विनोद जी की दर्दनाक कहानी की अपनी त्रासदी और विडम्बनाएं है. एक समय था जब वे पेशे से एक सफल डॉक्टर थे और एक हंसमुख शख्स के रूप में अपने स्वजन-परिजन के बीच सम्माननीय. लेकिन भूस्खलन के दौरान किसी और की जान बचाने की मानवीय कोशिश में स्वयं जीवनभर के लिए अपाहिज हो गए. आज उनकी रीड की हड्डी क्षत-विक्षत है और तमाम तरह के चिकित्सकीय इलाज के बावजूद वे जरा देर तक भी चल-फिर नहीं सकते और अब अपने भरण-पोषण के लिए पूरी तरह से अपने पिता व अपने भाई पर निर्भर है. जिस शख्स की जान इन्होंने बचाई थी उन्होंने पलट कर वापिस कभी इनकी ओर देखा तक नहीं. कभी उनसे आकर नहीं मिले और न किसी और से यह जानना चाहा कि वे कैसे है.
विनोदजी अपने जीवन से इतने थक चुके हैं कि सरकार सहित सबसे वे यह प्रार्थना करते है कि उन्हें इच्छा-मृत्यु की अनुमति दे दी जाय और उन्होंने जो कभी पहले अपने जीवन का बीमा करवाया था उसकी राशि उनके परिवार को दे दी जाय. जब वे बोलते हैं तो उनका शरीर ही नहीं स्वर भी कांपता लगता है. ऐसा धोखा होता है मानो पूरे घर में फैले श्मशानी सन्नाटे ने उन सहित उनके पिता, मां व भाई के भीतर को चांप लिया हो.

अपने मां-पिता छोटे भाई के साथ विनोद जमलोकी. आपका भाई अब यहां-फाटा-में आपके साथ नहीं रह पाता. उन्हें आज भी यहां रहने पर भय जकड़ लेता है. वे अपने परिवार के साथ दूसरे गांव में रहते हैं.

दास्तां-ए-मानुष का पहला भाग पढ़ें

दास्तां-ए-मानुष का दूसरा भाग पढ़ें

 

विनोद जी की पत्नी एक सुशिक्षित व साहसी महिला है जिन्होंने ससुराल व मायके के अपने नातों पर मोहताज़ रहने के बजाय यह कठिन निर्णय लिया कि वे स्वयं को व अपने बच्चों (बेटी बारह साल की है और बेटा नौ साल का) को एक स्वावलम्बी जीवन व परिवेश देने की कोशिश करेंगी. पिछले कुछ सालों से वे अपने मायके में रहते हुए नौकरी कर रही है और पति से अलग रह रही है. यह सिर्फ़ एक स्त्री का सजग व विद्रोही तेवर नहीं है बल्कि हमारे रूढ़िगत संस्कारों वाले क्रूर समाज में एक मानवीय चेहरे का अप्रतिम साक्ष्य है. एक ऐसा चेहरा जिसकी अपनी आत्मा व जीवन के अपने ज़ख्म व अकेलापन है लेकिन बावजूद इसके उनकी आस्था स्वयं की जीजिविषा को ज्यादा सामर्थ्यवान व परिष्कृत करने की ओर उन्मुख है और अपने मासूम बच्चों को एक बेहतर भविष्य देने का अजेय निश्चय उनके पांवों को कर्मभूमि में सक्रिय रखे हैं.


यहां प्रस्तुत पाठ विनोद जी का एक काव्यात्मक दस्तावेज है जो मुझे उनसे तब मिला जब मैं उनसे मिलने व वार्ता करने उनके गांव-फाटा-गया. इस पाठ से कई क़िस्म के विमर्श व व्याख्याएं जन्म लेती है लेकिन इस पाठ को किन्हीं खास सांचों में रखने के बजाय मुझे यही उचित जान पड़ा कि मैं इसे सभी के सम्मुख उसी रूप में खुला रख दूं जिस रूप में दरअसल यह है. मैंने सिर्फ ऌस पाठ की भाषा में किंचित् सुधार किया है अन्यथा यह पाठ जस-का-तस है : सत्रह जुलाई सन् दो हज़ार छ: को आपने एक लम्बा खत लिखा. यह खत ईश्वर के नाम भी हो सकता है और इनकी अपनी धर्मपत्नी के नाम भी जो कि अब इनके साथ नहीं रहती. या अपनी आत्मा या इस संसार के नाम.

 

मेरे अनजाने,

 

नहीं जानता कि तुम्हें क्या कह कर सम्बोधित करूं या कैसे पुकारूं. क्या तुम मेरे दोस्त हो या दुश्मन ? क्या तुम प्रेम हो या घृणा ? क्या तुम मेरी स्मृति में अमर हो या कुछ ऐसा जिसे भुला दिया जाना चाहिए ? क्या तुम मेरे हितैषी हो या मेरे अनिष्ट ?


जब भी कुछ जानने की कोशिश करता हूं तुम मेरे चारों ओर अदृश्य हो मुझमें व्याप जाती हो. आखिर कौन हो तुम जो मुझे शून्य बना देती हो ? कौन-सा अनजान है यह जो छाया की तरह न जाने कितने चेहरे बदल बदल कर मेरे पास रहती है जबकि जानता हूं कि छाया का कोई चेहरा नहीं होता.


कल तुम मुझे अपनी उदास लेकिन प्यासी आंखों से जब एकटक निहार रही थी तो यूं लगा जैसे तुम्हारे पास एक ऐसा हृदय है जिसमें मेरे लिए असीम ममत्व व स्नेहिल छुअन है. लेकिन तब ऐसा क्योंकर हो जाता है कि ज्यों ही मेरे इस नश्वर जीवन में स्वाति की बूंदों की तरह सुख आने आने को होता है कि तुम उसे छितरा मुझे उस चातक-सा बना देती हो जो उस बूंद की आस में अपने प्राणों में छटपटाता रहता है मानो वही मेरी नियति हो : निराशा.


बरसों बरस बीतते चले जा रहे हैं पर अभी तक यह नहीं जान सका हूं कि तुम कौन हो. कितने लोग मेरे जीवन में आए जिन्होंने मुझे प्यार व स्नेह देना चाहा लेकिन ऐसा क्योंकर हो जाता है तुमसे कि तुम उनका दिल यूं बदल देती हो कि वे मेरे प्रति अविश्वास व घृणा से भर कर मुझे प्रताड़ित करने लगते हैं ?


क्यों. आखिर ऐसा क्यों.


आज अगर सब कुछ होते हुए भी मेरे पास कुछ नहीं है तो इसका कारण तुम हो. तुम. जिन लोगों से भी मुझे प्यार रहा उन्हें तुमने या तो इस सुंदर दुनिया से विदा कर मुझे उनके विरह से शोकाकुल कर दिया या उनके दिलों में मेरे प्रति ऐसे भावों को जन्मा दिया कि ना तो वे अब मेरे हो पा रहे हैं न मैं उनका. तुमने मुझे अपने जीवन के आनन्द व सुख से वंचित कर दिया पर बिना यह बताए कि आखिर मेरा कसूर क्या है. क्या ऐसा कुछ है कि मैंने कभी किसी जन्म में तुम्हारा बिगाड़ किया हो ?


ओ! अनजान, क्या यह सच नहीं कि मुझे तो तुम्हारा अता-पता तक नहीं मालूम कि मैं तो तुम्हें जानता तक नहीं. इस जन्म में अभी तक तो तुमसे मुलाकात नहीं हो सकी है. पहले-पहल दूसरों की नज़रों में अदृश्य बन कर तुम मेरे सामने नमूदार हुईं और मेरे जीवन को होम कर दिया.


बचपन जो मां-पिता के साये में बीतना चाहिए था उसे तुमने अपनी खातिर मुझे उस साये से वंचित कर दिया और ऐसे अपनों का संग दिया जिनसे मैं हर लिहाज़ से प्रताड़ित होता रहा--कभी शारीरिक तो कभी मानसिक तो कभी आध्यात्मिक.


क्या मेरे जीवन में ऐसी कोई आस अब भी बची है कि कोई कल यूं भी आएगा कि वह मेरा होगा. शायद.


कोई पहाड़ या कोई नदी या कोई झरना या कोई फूल या कोई स्त्री या कोई कंधा.


कि अपना सिर जिस पर टिका सकूं, रो सकूं.


और दिल शान्त हो जाय.

अब सबको यह लगने लगा है कि मैं एक बुरा इंसान हूं. मेरे पास तो यह हक़ भी नहीं कि अपनी व्यथा-कथा किसी को सुना सकूं, व्यक्त कर सकूं. आज मैं तुम्हें यह जाहिर कर देना चाहता हूं कि मुझे भी इस दुनिया से प्रेम है और मुझे भी वह सबकुछ चाहिए जिसकी आकांक्षा हर मनुष्य करता है. हां, मैं हंसना चाहता हूं.


ओ ! अनजान.


क्या यह सच नहीं कि तुमने मुझे जड़ बना दिया है ? परिवार-व्यवहार-शान्ति-शरीर-आत्मा : सबकुछ तो तुमने छीन लिया. तुम लुटेरी हो.


अब मेरे पास कुछ भी नहीं है और जैसा तुमने चाहा वैसा ही हुआ फिर क्या वजह है कि तुम पुनरपि मेरे जीवन में फैल रही हो ?


नहीं जानता कि कैसे जानता हूं पर जानता हूं कि तुम्हें पता है कि मैं पिछले दो महीने से सो नहीं सका हूं--मेरी नींद तुम्हारे शिकंजे में है. ऐसा कौन सा आघात है जो तुमने मुझे न दिया हो ? ऊपर से स्वांग यह कि तुम मुझे अनन्त तरह से प्रेम करती हो ? अरे ! यह कैसा अबूझ प्रेम है, विचित्र भी. तुम्हारे पास न देह है न आवाज़; फकत आंखें हैं जो मुझ पर से कभी हटती नहीं. बिना पलकों की आंख में वह प्रेम कैसे हो सकता है जो पवित्र है, निश्छल व निर्मल है ? वह आत्मा जो प्रेम करती है कभी यह कामना नहीं करती कि कुछ ले सके, वह तो न्यौछावर करती है. अपनी आह तक से भी कभी अपने प्रेमी पर यह जाहिर तक नहीं होने देती कि वह प्रेम करती है.


हां, यह विधाता है जो सबकुछ देकर सबकुछ छीन लेता है और यह दावा करता है कि सबकुछ तेरा है.


यह स्वपन है जिसमें मैं अपने इष्ट से तुम्हारे बारे में पूछता हूं और वे हंसते-हंसते रो पड़ते है.


मुझ प्रवासी के प्रति तुम स्वार्थी ही नहीं निर्लज्ज भी हो. एक निर्दयी जिसने मुझे इस लायक भी नहीं छोड़ा कि बिलख सकूं. रात में जब संसार सो जाता है तब अंधेरे में मेरा साया जगता रहता है और उससे छिप कर मैं फफक-फफक रोता हूं. बिना आंसुओं के.


सारी दुनिया के काग़ज़ कम पड़ गये हैं पर मैं लिख रहा हूं, यह जानते हुए भी कि मेरी हर लिखत के बाद तुम मुझे ऐसा कष्ट दोगी जो भयंकर होगा.

भीषण भूकम्प.


और हर किसी ने यह मान लिया है कि मैं कुछ नहीं हूं.

आगे पढ़ें

Pages:

[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in