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भ्रष्ट अनंत, भ्रष्टाचार कथा अनंता

मुद्दा

 

भ्रष्ट अनंत, भ्रष्टाचार कथा अनंता

रघु ठाकुर


भ्रष्टाचार का फैलाव भारत में लगभग वैसा ही व्यापक व सर्वशक्तिमान है, जिस प्रकार की कल्पना सर्वशक्तिमान भगवान के बारे में है कि भगवान सर्वत्र व्याप्त है.कभी कभी राजनैतिक कारणों से या फिर कारपोरेट या उद्योग जगत के अंर्तद्वंदों से कुछ बड़े मामले उजागर होते हैं. कुछ दिन अखबार की सुर्खियों में भी आते हैं फिर थोड़े दिनों में या तो पुराने पड़ जाते हैं या फिर दबा दिये जाते हैं. जनस्मृति इतनी अस्थायी होती है कि कुछ ही दिनों में मीडिया के पन्नों से ओझल होते ही जनता भी इन्हें भूल जाती है.

घोटाला


पिछले दो दशक में कितने ही भ्रष्टाचार के कांड या घोटाले सामने आये, जिन्होने तात्कालिक रूप से राजनैतिक सत्ता परिवर्तन में भी आंशिक भूमिका निभाई परन्तु कुछ दिनो में समुद्र की तूफानी लहरों के समान सबकुछ शांत हो गया. दूसरा ये भी कि बड़े मगरमच्छ कभी भी जाल में नही फॅंसते. वे या तो जाल तोड़कर भाग जाते हैं या फिर समूचे जाल को ही लेकर चले जाते हैं.

बोफोर्स कांड ने राजनैतिक सत्ता तो बदली परन्तु दंड किसी को भी नही मिला. यहां तक कि क्वात्रोची के मामले भी अंततः राजनैतिक दबाव में सीबीआई ने हाथ खड़े कर दिये. टाईगर जोगिन्दर सिंह के नाम से प्रसिद्ध सीबीआई के पूर्व निदेशक विदेश यात्रा करके जब भारत लोटे तो अखबार के पहले पन्ने पर उनकी तस्वीरें मय उन पेटियों के छपी थी, जिनमें हजारों पन्नों के दस्तावेज वे लेकर आये थे. परन्तु अंततः उसी सीबीआई ने कह दिया कि मामला आगे ले जाना संभव नही है. न क्वात्रोची का प्रत्यर्पण या गिरफ्तारी संभव है न एंडरसन की. आखिर हम इतने शक्तिशाली कहे जा रहे हैं परन्तु हमारी शक्ति का प्रयोग कहां हो रहा है. क्या केवल विदेशी आर्थिक शक्तियों के पिछलग्गू बनाने में ही हमारा विकास व शक्ति है?

मध्यप्रदेश के आईएएस अरविंद जोशी व श्रीमती टीनू जोशी जैसे नौकरशाहों के यहां से करोड़ो रूपया जप्त होता है परन्तु वे सरेआम घूम रहे हैं. हर्षद मेहता जो बाद में अपराधी बने, पहले स्व. नरसिंहराव के प्रधानमंत्रित्वकाल में वित्त मंत्रालय को विकास का पाठ पढ़ाने के लिये आमंत्रित किये जाते थे. रायपुर के प्रशासनिक अधिकारी ने तो करोड़ों रूपया ग्रामीण गरीबों के नाम झूठा जमा कर दिया परन्तु सरकार पहले तो एक माह तक उन्हें निलंबित भी नहीं कर पाई तथा बाद में अज्ञात शक्तियों के दबाव में, पता नहीं वे राजनैतिक ज्यादा थी या आर्थिक; उन्हें पुनः बहाल कर दिया गया.

अब पिछला एक माह तो ’भ्रष्टाचार चर्चा’ का ही माह हो गया है. पूर्व संचार मंत्री राजा ने 2-जी स्पेक्ट्रम की खुली नीलामी के बजाय उसका लायसेंस ऐसी कंपनियों को दे दिया, जो किन्हीं न किन्हीं आरोपों में आरोपी रही हैं तथा जिसकी नीलामी से भारत सरकार को 1 लाख 36 हजार करोड़ या इससे भी अधिक की आय हो सकती थी, उसे मात्र 10 हजार करोड़ रुपये में आबंटित कर दिया. याने लगभग 1.25 करोड़ का सीधा भ्रष्टाचार. प्रधानमंत्री ने राजा को रोकने का प्रयास किया परन्तु संचार मंत्री सही राजा सिद्ध हुए और प्रधानमंत्री कमजोर रियाया.

इसका एक प्रमुख कारण यह भी था कि राजा डीएमके के करूणानिधि के कोटे के मंत्री थे तथा करूणानिधि ने खुले आम ही राजा का पक्ष लेते हुए छिपे शब्दों में समर्थन वापसी की धमकी दी थी. कांग्रेस पार्टी के शक्तिशाली लोग ही राजा-डीएमके करूणानिधि के पीछे थे तथा कुछ समाचार पत्रों मंप तो यह भी छपा कि पंजाब कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष अमरेन्द्र सिंह के माध्यम से श्री बरनाला को संदेश दिया गया तथा श्री बरनाला ने राजा के इस्तीफे के लिये करूणानिधि को तैयार किया. यह राजा का इस्तीफा कोई भ्रष्टाचार को रोकने या कार्यवाही के लिये नहीं हुआ है बल्कि संसद ठप्प होने के दबाब में कराया गया था कि शायद इससे मामला शांत हो जायेगा.

देश के विपक्षी दलों ने जेपीसी की मांग को उठाकर पिछले कई दिनों से संसद का बहिष्कार किया तथा संसद में कोई चर्चा नहीं हो पाई. या तो संसद बंद होती रही या केवल सत्तपक्ष अपनी फौरी जरूरतों के हिसाब से विधेयक पारित कराता रहा. कुल मिलाकर संसद जिंदा रहते हुए भी मृत प्राय हो गई है. संयुक्त संसदीय समिति के गठन से कांग्रेस पार्टी को क्या भय है, यह समझ से परे है. इसके संभावित कारण निम्न हो सकते हैं-
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