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यह महेंद्र अपनी टीम का कप्तान है

मिसाल-बेमिसाल

 

यह महेंद्र अपनी टीम का कप्तान है

शिरीष खरे


नहीं, यह महेंद्र सिंह धोनी नहीं है लेकिन है अपनी टीम का कप्तान. अधिकारों के ऐसे चौके-छक्के इस महेंद्र ने चलाये हैं कि लोग देखते रह जाते हैं.

महेंद्र


बाल मजदूरी करने वाले लगभग 16 साल के महेन्द्र अब बच्चों के अधिकारों से जुड़ी कई लड़ाईयों के नायक हैं. महेन्द्र के कामों से जाहिर होता है कि छोटी सी उम्र में मिला एक छोटा सा मौका भी किसी बच्चे की जिंदगी को किस हद तक बदल सकता है.

महेन्द्र रजक, इलाहाबाद जिले के गीन्ज गांव से हैं, जहां की भंयकर गरीबी अक्सर ऐसे बच्चों को पत्थरों की खदानों की तरफ धकेलती है. महेन्द्र रजक भी अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही बड़े हो चुके थे. इतना कि 6 साल की दहलीज पार करके उन्होंने खदानों में जाने का मतलब जाना था. इतना कि 6 दूनी 12, 12 दूनी 24, 24 दूनी 48 जानने के बजाय उन्होंने हमउम्र बच्चों के साथ पत्थर तोड़ने का पहाड़ा जाना था.

‘‘तब कुछ बच्चों को स्कूल जाते देखते तो लगता कि वो हमारे जैसे नहीं हैं. वो हमसे अच्छे हैं.’’- अपने बचपने को इस तरह याद करने वाले महेन्द्र अब 16 की उम्र छूने को हैं.

वे बताते हैं ‘‘मेरे लिए पत्थर तोड़ना तो बहुत मेहनत का काम था. सुबह 7 से शाम के 5 तक, तोड़ते रहो, खाने के लिए घंटे भर की छुट्टी भी नहीं मिलती थी. ठेकेदार आराम नहीं करने देता था. बार-बार पैसे काटने की धमकी अलग देता था.’’ इस तरह महेन्द्र को घर, मैदान और स्कूल से दूर यही कोई 9 घंटे के काम के बदले 70 रूपए रोज मिलते थे.

'संचेतना', जो कि' क्राई' के सहयोग से चलने वाली एक गैर-सरकारी संस्था है, ने जब महेन्द्र के गांव में अनौपचारिक शिक्षण केन्द्र खोला तो जैसे-तैसे करके महेन्द्र के पिता उसे पढ़ाने-लिखाने को राजी हुए. वैसे तो यहां एक प्राइवेट नर्सरी स्कूल भी था, जो बहुत मंहगा होने के चलते महेन्द्र के पिता जैसे ज्यादातर अभिभावकों की पहुंच से दूर था.

क्राई के पंकज मेहता बीते दिनों को ताजा करते हुये बताते हैं ‘‘हमारे सामने पत्थर तोड़ने वाले बहुत सारे बच्चे थे. उनके बचपन को बचाने के लिए हमने बस्तियों के पास सरकारी स्कूल खोले जाने का अभियान चलाया. इसके लिए राज्य की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई बड़े अधिकारियों से मिले-जुले, उनके साथ बैठे-उठे और उनके सामने बार-बार अपनी जरूरतें दोहराते रहे. आखिरकार 2002 को गीन्ज गांव में भी एक प्राथमिक स्कूल खोला जा सका.’’

संचेतना के सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि स्कूल भवन तो खड़ा कर दिया था लेकिन इसी से तो सब कुछ सुलझने वाला नहीं था. असली चुनौती ऐसे बच्चों को स्कूल तक लाने और उनमें शिक्षा की समझ जगाने की थी. असल में यहां बच्चों को कमाने वाले सदस्य के तौर पर देखने का चलन था. गरीब मां-बाप की जुबान पर यही सवाल होता था कि- चलिए आप कहते हैं तो हम अपने बच्चों को आज काम पर नहीं भेजते हैं. अब आप बताइए कल से गृहस्थी की गाड़ी कैसे चलेगी ?

इस बुनियादी सवाल से जूझना आसान न था. इसलिए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी पूरी ताकत महेन्द्र जैसे बच्चों के परिवार वालों के बीच आपसी समझ बनाने में लगाई थी. उन्होंने स्कूल के रास्ते पर बच्चों को रोकने वाले कारणों को भी समझा और यह भी समझाया कि बच्चों के भविष्य के लिए इतना तो खर्च किया ही जा सकता है. क्योंकि महेन्द्र का बड़ा भाई भी काम पर जाता था इसलिए उसके पिता अपने इस छोटे बेटे को काम के बजाय स्कूल भेजने के लिए तैयार हो गए.

इस तरह 9 साल की उम्र से महेन्द्र के स्कूल वाले दिन शुरू हुए.

स्कूल की शुरुवात हुई तो फिर कई चीजें शुरु हुईं. अब जैसे बाल पंचायत को ही लें.

बाल पंचायत बनने का किस्सा बड़ा दिलचस्प है. बाल दिवस पर बहुत सारे बच्चों ने गांव में खेल के मैदान का मुद्दा उठाया था. इसके लिए उन्होंने बाल दिवस के दिन ही इलाहाबाद जाने का मन बनाया.

यह बच्चे उस रोज इलाहाबाद की मुख्य सड़कों पर पहुंचे और जमकर खेले. ‘‘यह देख वहां के बहुत सारे लोग आ गए और गुस्से से बोले कि यहां के रास्ते क्यों रोक रहे हो ?’’ तब महेन्द्र ने कहा- ‘‘यह तो पण्डित नेहरू का शहर है और आज तो बाल दिवस भी है तो आज तो हमें यहां खेलने दो. बाकी 364 दिन तो हमें मैदान ही नहीं मिलता है.’’
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