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विकास के विनाश का टापू

मुद्दा

 

विकास के विनाश का टापू

प्रशांत कुमार दुबे/रोली शिवहरे जबलपुर से लौटकर
 

बरगी













साहब ! इंदिरा गांधी के कहने पर बसे थे जहां पर. अब आप ही बताओ कि देश का प्रधानमंत्री आपसे कहे कि ऊंची जगह पर बस जाओ, तो बताओ कि आप मानते कि नहीं ! हमने हां में जवाब दिया. जो उन्होंने कहा कि हमने भी तो यही किया. उनकी बात मान ली तो आज यहां पड़े हैं. इंदिरा जी बरगीनगर आईं थीं और उन्होंने खुद आमसभा में कहा था. श्रीमती गांधी ने यह भी कहा था कि सभी परिवारों को पांच-पांच एकड़ जमीन और एक-एक जन को नौकरी भी देंगें. अब वे तो गईं ऊपरे और उनकी फोटो लटकी है, अब समझ में नहीं आये कि कौन से सवाल करें? का उनसे, का उनकी फोटो से, का जा सरकार से ? सरकार भी सरकार है, वोट लेवे की दान (बारी) तो भैया, दादा करती है और बाद में सब भूल जाते हैं. फिर थोड़ा रुक-कर कहते हैं पंजा और फूल, सबई तो गये भूल.

यह व्यथा है जबलपुर जिले की मगरधा पंचायत के बढ़ैयाखेड़ा गांव के दशरु, मिठ्ठू आदिवासी की.

बढ़ैयाखेड़ा को नाव वाला गांव कहना शायद ठीक होगा. किसी ज़माने में यह गांव भी देश के दूसरे गांवों की तरह था लेकिन देखते ही देखते यह गांव दूसरे गांवों से अलग हो गया. आज की तारीख में यह गांव तीन ओर से बरगी बांध के पानी से घिरा है और बचा हुआ एक मात्र रास्ता जंगल की ओर जाता है. मतलब ये कि अगर इस गांव से किसी को कहीं जाना है तो उसे पानी वाले रास्ते से ही नाव में बैठकर जाना होता है और वह भी कम से कम 10 किलोमीटर तक.

अगर किसी को दिल को दौरा भी पड़ जाये और यदि उसे जीना है तो उसे अपने दिल को कम से कम तीन घंटे तो धड़काना ही होगा, तब कहीं जाकर उसे बरगीनगर में न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधा नसीब हो पायेंगी. और वो भी तत्काल किश्ती मिल जाये तभी यह संभव है. सुसाईटी यानी राशन दुकान से राशन लाना है तो भी किश्ती और हाट-बाजार करना है तो भी किश्ती. यानी किश्ती के सहारे चल रहा है जीवन इनका. कहीं भी जाओ, एक तरफ का 10 रुपया.

दशरु कहते हैं- “पहले अपनी खेती थी तो ठाठ से रहते थे. क्या नहीं था हमारे पास. मेरी 10 एकड़ जमीन थी, मकान था, महुए के 15 पेड़, आम के 2 पेड़, सागौन के 5 पेड़, 18 मवेषी थे. दो फसल लेते थे. जुवार, बाजरा, मक्का, तिली, कोदो, कुटकी, धान, समा, उड़द, मूंग, राहर, अलसी, गेहूं, चना, सरसों, बटरा और सब्जी भाजी जैसी कई चीजें. नमक ओर गुड़ के अलावा कभी कुछ नहीं लिया बाजार से हमने. तेल तक अपना पिरवा लेते थे हम. अब इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि शिवरात्रि पर भोले को चढ़ने वाली गेहूं की बाली भी दूसरे गांव से लाते हैं. पहले चना महुआ का तो भोजन था साहब. पर आज तो सुसाईटी से 20 किलो लात हैं और आधो-दूधो (आधे पेट) खात हैं. उसमें भी आने-जाने के किश्ती से 20 रुपये लगते हैं और कहीं उस दिन दुकान नहीं खुली तो राम-राम.”

ज्ञात हो कि रानी अवंतीबाई परियोजना अंतर्गत नर्मदा नदी पर बने सबसे पहले विशाल बांध बरगी से मंडला, सिवनी एवं जबलपुर जिले के 162 गांव प्रभावित हुये हैं और जिनमें से 82 गांव पूर्णतः डूबे हुये हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 7000 विस्थापित परिवार हैं, इनमें से 43 प्रतिशत आदिवासी, 12 प्रतिशत दलित, 38 प्रतिशत पिछड़ी जाति एवं 7 प्रतिशत अन्य हैं. जबकि बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ की मानें तो इस बांध से इलाके के 10 से 12 हजार परिवार विस्थापित हैं.

इस बांध के कारण इलाके की जो 20,000 एकड़ जमीन और घने जंगल पूरे या आधे डूबे उनमें दशरु का बढैयाखेड़ा गांव भी एक है. जबलपुर जिले के इस पूर्ण डूब वाले गांव में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25 परिवार रहते हैं. लेकिन सरकारी झूठ की हकीकत ये है कि यहां आज भी 42 परिवार रहते हैं.

माहू ढ़ीमर, जो अपने आपको गांव का कोटवार मानते हैं, बताते हैं “हमारे गांव का खेती की जमीन का रकबा 1600 एकड़ का था और अब तो चारों तरफ मैया ही मैया है यानी पानी ही पानी है. हमारे जंगल कहां गये ?”

माहू पानी की ओर ईशारा करते हुये कहते हैं “यहीं नीचे ही हैं. हम तो वो दवाई भी भूल ही गये, जो जंगल से मिलती थी. अपना ईलाज खुद करना जानते हैं. पहले नीचे पांचवीं तक का स्कूल था. हम 1986 में यहां आये और उसके बाद 10 साल यहां कोई स्कूल नहीं था. 1997 से यहां पर स्कूल बना, लेकिन इस 10 साल में तो हमारी एक पीढ़ी का भविष्य दांव पर लग गया.”
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