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सूचना आयुक्त ही दबा रहे हैं जानकारी

मुद्दा

 

सूचना आयुक्त ही दबा रहे हैं जानकारी

सचिन जैन और रोली शिवहरे भोपाल से


हमने तंत्र और उसे चलाए रखने वाले लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये सूचना के अधिकार कानून की पैरवी की थी, परन्तु जब सरकार इसे लागू करने के लिये जिम्मेदार आयोगों में नौकरशाहों को नियुक्त करने लगती है तब हमें चौकन्ना हो जाना चाहिये.

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अपने सेवाकाल के करीब तीस सालों या 12775 दिनों में तंत्र के हिस्से के रूप में काम करते हुये जिन लोगों ने उसे गैर जवाबदेह बनाया, अधिकारों के उल्लंघन किये, निजी और राजनैतिक हितों के लिये बार-बार नियम कानूनों का समायोजन करते हुये राज्य के हर काम को न्यायोचित साबित करने के लिए दिन-रात एक किया हो, उन्हें उसी तंत्र पर निगरानी के लिए का जिम्मेदार कैसे बनाया जा सकता है? जो व्यक्ति पारदर्शिता के सिद्धान्त पर सामान्यत; अविश्वास करता हो उसे सूचना आयोग में आयुक्त बनाकर तंत्र में पारदर्शिता लाने की संवैधानिक जिम्मेदारी सौंपना राज्य का षडयंत्रकारी कदम माना जाना चाहिये.

सूचना आयोग में आयुक्तों की नियुक्ति और उस पर नौकरशाहों को बिठाने को लेकर कानून बनने के समय से ही बहस चल रही है. सामाजिक कार्यकर्ता श्री अन्ना हजारे का कहना है कि ‘‘ऐसे सरकारी नौकरों को सूचना आयुक्त बना दिया गया है जो जिंदगी भर सर-सर बोलते रहे हैं. आखिर ऐसे अधिकारी अपने वरिष्ठों और साथियों के विरूद्ध कैसे फैसले दे सकते हैं.”

सूचना के अधिकार कानून लागू होने के पांच सालों बाद अगर इसका मूल्यांकन किया जाये तो इसमें सबसे बड़ी बाधा नौकरशाही ने ही खड़ी की है. सोचने और गौर करने वाली बात यह है कि हमारे जैसे लोग सूचना आयोग में कब और क्यों जाते हैं या वहां जाने की जरूरत कब पड़ती है. विकासखंड, जिला या राज्य स्तर पर लोक सूचना अधिकारी प्रशासनिक अधिकारी हैं, शिक्षा अधिकारी हैं, इंजीनियर हैं, पुलिस अधिकारी हैं, सचिव या संचालक हैं. इनके पास जानकारी और उसे छिपाने के साधन भी, लेकिन जब भी वे हमें सूचना पाने से वंचित करते हैं तब एक संवैधानिक अधिकार होने के नाते हम सूचना आयोग के पास जाते हैं.

हमें उम्मीद रहती है कि सूचना आयोग सूचना छिपाने वाले अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करेगा और जवाबदेही तय करेगा, लेकिन हम पाते हैं कि न्याय की लड़ाई में सूचना के हक की बात करने वाले 2-1 से पीछे हैं.

इस कानून के क्रियान्वयन के तीन केन्द्र है- पहला सूचना मांगने वाला, दूसरा सूचना देने के लिए जवाबदेह अधिकारी, जो सरकार का नुमाइंदा है और तीसरा 12775 दिनों तक सरकार का हिस्सा रहा नौकरशाह जो, सेवानिवृत्ति के बाद सूचना आयुक्त बना दिया गया है.

जब सूचना के हक की लड़ाई आयोग में चलती है तब स्वाभाविक रूप से आयुक्त की सहानुभूति सरकार के लोक सूचना अधिकारी के प्रति होती है. ऐसे में हमारे जैसा सूचना मांगने वाला अल्पमत में आ जाता है.

सूचना के अधिकार कानून के बाहर निकलकर देखा जाये तो हमारे देश में कई ऐसे कानून बने हैं जिनका ठीक से अमल हो तो बहुत से लोगों का जीना सुविधाजनक हो जायेगा. मानवाधिकार आयोग/महिला आयोग आदि तमाम अहम् संस्थाएं हैं जो कहने को स्वायत्त हैं परन्तु इनका रिमोट कंट्रोल सरकार के पास ही रहता है. कोई भी संस्थान कितना भी अच्छा क्यों न हो, सरकार उसमें एक अयोग्य व्यक्ति को बिठाकर उसका भट्ठा बिठा देती है.

हमने देखा है कि केन्द्र और राज्यों में सरकारों ने बहुत से आयोगों को इसी तरह लगभग सफेद हाथी बना दिया है. सेवानिवृत्त नौकरशाहों की नियुक्तियां इसलिए इन पदों पर की जाती हैं ताकि मानवअधिकारों को सीमित किया जा सके. एक गैर सरकारी संगठन के विश्लेषण के मुताबिक देश के 28 राज्यों में कुल 103 आयुक्त नियुक्त हैं, उनमें से 65 पर सरकारी अफसर राज कर रहे हैं. साफ है कि सरकारी अफसरों को नियुक्त इसलिये किया जा रहा है जिससे कि सूचना के अधिकार को सीमित किया जा सके और पारदर्शिता, जवाबदेही को तंत्र में प्रवेश होने से रोका जा सके.

वर्ष 2010 के बडे घोटालों- 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ, आदर्श हाउसिंग के उजागर होने के पीछे सूचनाएं ही थीं. नीरा राडिया ने केवल सरकार से सूचना निकलकर कारपोरेट घरानों तक पहुंचाई और उन्हीं सूचनाओं के बल पर कुछ खास औद्योगिक घरानों, ने सार्वजनिक सम्पत्ति के अरबों रूपये अपने निजी खातों में स्थानांतरित कर लिये.

आदर्श हाउसिंग घोटाले में राजनेता, नौकरशाह और यहां तक कि सेना के वरिष्ठतम अधिकारी भी हितग्राही बन गए क्योंकि उनकी पहुंच सूचनाओं तक थी. उसी घालमेल में महाराष्ट के सूचना आयुक्त और मानवाधिकार आयोग के सदस्य भी शामिल हो गये. उन्हें भी गलत लाभ पहुंचाया गया क्योंकि सरकार और आयोगों के शक्ति सम्पन्न अधिकारी (आयुक्त या सदस्य) एक दूसरे को अपने-अपने हितों को साधने में मदद करते हैं.
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