पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

संघर्ष को रचनात्मकता देने वाले अनूठे जॉर्

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >बहस >छत्तीसगढ़ Print | Share This  

राष्ट्रद्रोह, राजद्रोह और जनविद्रोह

बहस

 

राष्ट्रद्रोह, राजद्रोह और जनविद्रोह

कनक तिवारी


विनायक सेन के मामले में चुप रहना उचित नहीं होगा. मैं ज़मानत आवेदन के सिलसिले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में उनका वकील रह चुका हूं. इसलिए मुझे अच्छी तरह मालूम है कि उस स्थिति में विनायक सेन के विरुद्ध पुलिस की केस डायरी में ऐसा कुछ नहीं था कि प्रथम दृष्टि में मामला भी बनता. यह अलग बात है कि हाईकोर्ट ने उनकी ज़मानत मंजूर नहीं की जो बाद में लगभग उन्हीं तथ्यों पर बल्कि पुलिस द्वारा और कुछ साक्ष्य एकत्रित कर लिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में मंजूर हो गई.

विनायक सेन


दरअसल हो यह रहा है कि राज्यों में आईएएस के नौकरशाह, पुलिस अधिकारी और कुछ सामंती तत्व साहित्य, संस्कृति और विचार के प्रभारी बन बैठे हैं. इंदिरा गांधी के ज़माने तक उनके हाथों में राजकाज की नकेल होती थी, जिन्हें हिन्दी में तर्जुमा करने पर ‘राजनीतिक प्राणी‘ कहा जाता है. विनायक सेन के मामले में मंत्रिपरिषद के सोच का कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है.

मुख्यमंत्री तथा एक दो मंत्रियों को छोड़कर छत्तीसगढ़ में व्याप्त नक्सल समस्या की जानकारी मंत्रिपरिषद और विपक्षी विधायकों तक को ठीक से नहीं है. उन्हें खबरों, घटनाओं, विवरणों और सांख्यिकी वगैरह के बारे में सूचित किया जाता है. विचार विमर्श, अध्ययन, आंतरिक मतभेद, असहमति वगैरह लोकतंत्र के पाए हैं. ये सभी मंत्रिपरिषदों में गायब हैं. ऐसे में पुलिसिया दिमाग को तरजीह मिलती जाती है. उसकी खाकी भाषा में सफेद और काले तक का फर्क नहीं होता है. राजनेताओं के सफेद वस्त्र दैनिक आधार पर मैले हो गए हैं. खाकी वर्दी महीने में एक दो बार धुलती होगी. जो काले कोट पहनकर न्यायतंत्र चला रहे हैं वहां उनका धुलना साल छह महीने में होता होगा. यदि कोई आदिवासी या दलित मंत्री नौकरशाही के पर कतरना भी चाहता है तो उसे घेर-घारकर पस्त हिम्मत कर दिया जाता है.

अंगरेज़ों के ज़माने से लोकअभियोजक को खेल के अंपायर की तरह समझा गया है. प्रिवी कांउसिल की कई नज़ीरों में कहा गया है कि लोक अभियोजक अभियुक्त और थानेदार के बीच निर्णायक होता है. उसे थानेदार का बगलगीर होकर कचहरी की अधगंदी कैंटीन में समोसे खाते हुए पुलिसिया चालान को अभिप्रमाणित नहीं करना चाहिए.

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि विनायक सेन वगैरह के मामले में लोक अभियोजक ने ऐसा अन्वेषण नहीं किया होगा जिससे वह पुलिसिया चालान में खामियां ढूंढ़कर उसे चुस्त दुरुस्त करने की सलाह दे. यदि ऐसा होता तो मामले की इतनी बदरंग शक्ल नहीं होती. यह लतीफा है या कटाक्ष कि मामले में हाईकोर्ट में अपील तो की जा सकती है. हाईकोर्ट कितने दिनों में फैसला करेगा? व्यवस्था की इस बुराई का खमियाजा देश में लाखों न्यायाधीन कैदी भुगत चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में बार-बार सरकारों को लताड़ लगाई है लेकिन वही ढाक के तीन पात. हाईकोर्ट भी निचली अदालत की मिसल की सकरी गली से गुजरकर न्याय के पाथेय तक पहुंचना चाहेगा.

भारत में अपील न्यायालयों का काम दायें बायें देखना नहीं है. मानो कोल्हू के बैलों की दोनों आंखों पर पट्टी बांध दी जाए और चलने को कहा जाए. यह दुष्ट प्रावधान अंगरेज़ों ने दिया है. हाईकोर्ट इस नियम का अपवाद होना चाहिए. अपील न्यायालय में नई गवाही लेने के प्रावधान भी हैं.

पहली ज़मानत की अर्ज़ी के दरम्यान यह मनोरंजक बात मेरे सामने आई थी कि नारायण सान्याल को जब कत्ल के मामले में आंध्रप्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार कर छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया था तब उसके कुछ अरसा बाद ही छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम लागू किया गया. इस तरह नारायण सान्याल को ही नक्सलवादी घोषित करना तकनीकी तौर पर संभव नहीं था. सान्याल द्वारा दी चिट्ठियां जेल के अंदर यदि किसी व्यक्ति को दी गईं तो जेल के संबंधित अधिकारी अपनी वैधानिक ज़िम्मेदारी से कैसे बरी कर दिए गए? जेल नियम इस संबंध में मुलाकातियों के लिए तो काफी सख्त हैं.

यह पढ़ने में अच्छा लगता है कि राम जेठमलानी के कद के वकील ने विनायक सेन की पैरवी करने का ऑफर दिया है. वे इंदिरा गांधी के हत्यारों के भी चुनिंदा वकील थे. अमित जोगी के ज़मानत आवेदन पत्र पर उन्होंने जो बहस की थी उसमें तैयारी का अभाव दिखलाई पड़ता था बनिस्बत सी.बी.आई. के वकील के.


टेलीविजन पर शीर्ष वकील हरीश साल्वे विक्टोरियन ककहरा ही उच्चारित कर रहे थे कि सब कुछ अपील न्यायालय में ही किया जाना चाहिए. बाहर उसकी आलोचना नहीं होनी चाहिए. देश में सैकड़ों ऐसे मामले हुए हैं जब उन पर चैतरफा टिप्पणियां की गई हैं. इस सिलसिले में किताबें और लेख लिखे जाते हैं जिसके सैकड़ों उदाहरण हैं.

साल्वे वही वकील हैं जिनकी शिकायत पर प्रशांत भूषण पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चल रहा है. प्रशांत भूषण ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के आधे मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट रहे हैं. विनायक सेन के मामले में उनके ही खैरख्वाह कमज़ोर पैरवी किए जाने की बात भी कहते हैं. उचित तो यही होगा कि जनमत को तथाकथित न्यायाधीन रहने की थीसिस का हौव्वा दिखाकर मुंहबंद नहीं किया जाए. साथ-साथ कानूनी लड़ाई तो लड़नी ही होगी.

ऐसा नहीं है कि पुलिसिया चालान दंतकथाओं या अफवाहों पर ही आधारित होते हैं. न्यायाधीश की प्रथम दृष्टि के लिए पुलिस किसी न किसी तरह मामला बना ही लेती है. लेकिन अधिकतर मामलों में निचली अदालत के न्यायाधीश की प्रथम दृष्टि में दोष होता है. सभी न्यायाधीश दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 के अंतर्गत अपने कर्तव्यों का पालन कहां करते हैं? वे अधिकतर पुलिस की डायरी को अभियुक्त का चरित्र प्रमाणपत्र मान लेते हैं. फिर मामला आगे बढ़ाते चलते हैं, भले ही वह भरभरा कर गिर क्यों नहीं जाए.
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

vijay kumar LL.M. [vjbholu933@gmail.com] bhu varanasi

 
  अगर विनायक सेन के समर्थकों में से किसी की भी इस लोकतंत्र में आस्था है तो उन्हें दूसरे न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिये. अगर नहीं है तो विनायक को मान लेना चाहिये कि वे नक्सली हैं  
   
 

m3user [m3user@gmail.com] bhilai

 
  बढ़िया... बिनायक सेन के बहाने सरकारी और नक्सली हिंसा को समझने का अच्छा प्रयास... सिर्फ पढ़नेवाला नहीं, बहुत कुछ गुननेवाला आलेख. 
   
 

m5user [m5@gmail.com] bhilai

 
  अगर विनायक सेन के समर्थकों में से किसी की भी इस लोकतंत्र में आस्था है तो उन्हें दूसरे न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिये. अगर नहीं है तो विनायक को मान लेना चाहिये कि वे नक्सली हैं और उनकी इस संविधान में आस्था नहीं है. मैं इस बात को समझ नहीं पा रहा हूं कि कनक जी आप अपने मुवक्किल को यह सलाह क्यों नहीं देते कि वे मुकदमा लड़ने की तरफ ध्यान दें न कि सड़क पर पुरस्कार पाने के लिये प्रदर्शन में अपना समय गंवायें. 
   
 

राहुल बैनर्जी [aarohini@yahoo.com] इंदौर

 
  लेख सराहनीय है परंतु इसमें एक गलती है। ट्रायल कोर्ट द्वारा अभियुक्‍त के विरुद्ध मामला प्रथम दृष्‍टया साबित नहीं होने पर दण्‍ड प्रक्रिया संहिता के धारा 227 के अंतर्गत खारिज किया जा सकता है धारा 167 के अंतर्गत नहीं, जैसे कि कनकजी ने लिखा है। धारा 172 के तहत जांच अधिकारी द्वारा जो केस डायरी लिखी जाती है यह अभियुक्‍त या उसके वकील देख नहीं सकते है। परंतु अगर इस धारा में संशोधन कर धारा 227 के अंतर्गत सुनवाई के पहले अभियुक्‍त को यह अधिकार दिया जाए एवं साथ ही थाने के रोज नामचा या दैनिक विवरणी के साथ इसका मिलान करने दिया जाए तो अनिवार्य रूप से पुलिस जांच के अनेक विरोधाभास सामने आ जाएंगें जो साबित कर देगा कि पुलिस ने झूठा प्रकरण दर्ज किया है। यह इसलिए कि डायरी में लिखा गया जांच अधिकारी के गतिविधियों के विवरण से रोज नामचा में लिखा गया उसके विवरण का मेल होनी चाहिए। जब प्रकरण के कागजात थाने में बैठकर ही तैयार किए जाते है तब यह होना असंभव है। 
   
 

pushpendra dube [] indore

 
  लोकतंत्र का आधार ही हिंसा है. जिस लोकतंत्र की आलोचना गाँधी ने 1909 में हिंद स्वराज में की थी, आज लगता है कि उनकी क्रांतदर्शी दृष्टी कितनी सही थी. पूरे आलेख में कही पर भी हल नहीं सुझाया गया है. इसी को कहते हैं, चित भी मेरी पट भी मेरी. जिस भूदान, ग्रामदान और ग्राम स्वराज्य का आह्वान संत विनोबा ने किया था, उसकी तरफ किसी आदिवासी हितैषी, किसान समर्थक नेता को आंख उठाकर देखने की फुर्सत नहीं है. सारी जमीन ग्रामसभा को समर्पित कर दी जाये, वन की रक्षा का अधिकार ग्रामीण और आदिवासी अपने हाथ में ले ले और राजनीति को अपने गाँव में घुसने न दें तो क्या मजाल है किसी की जो उनका शोषण कर सके. लफ्फाजी से कुछ नहीं होगा, मल्कियत विसर्जन किये बिना शांति स्थापना असंभव है, चाहे कितने ही विदेशी पैसे से सरकार के खिलाफ कितने ही आन्दोलन कर लिए जाये. 
   
 

Trishant kumar Ghosh [] jagdalpur, Bastar, INDIA

 
  अगर विनायक सेन के समर्थकों में से किसी की भी इस लोकतंत्र में आस्था है तो उन्हें दूसरे न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिये. अगर नहीं है तो विनायक को मान लेना चाहिये कि वे नक्सली हैं और उनकी इस संविधान में आस्था नहीं है. मैं इस बात को समझ नहीं पा रहा हूं कि कनक जी आप अपने मुवक्किल को यह सलाह क्यों नहीं देते कि वे मुकदमा लड़ने की तरफ ध्यान दें न कि सड़क पर पुरस्कार पाने के लिये प्रदर्शन में अपना समय गंवायें. 
   
 

Rajni SIngh [iilloovveeuu1975@gmail.com] New Delhi

 
  आपने प्याज के कतरे की तरह सारे मुद्दे को सामने रख दिया है. आज विनायक सेन के मुद्दे पर दो ही वर्ग है- या तो आप विनायक के साथ हैं या विनायक के खिलाफ. आपने तटस्थ हो कर विचार किया है. बिना लाग-लपेट के अपनी बात रखी है. आज ऐसे ही विचारों की जरुरत है. 
   
 

राम मुरारी [ram_murari@yahoo.co.in]

 
  बढ़िया... बिनायक सेन के बहाने सरकारी और नक्सली हिंसा को समझने का अच्छा प्रयास... सिर्फ पढ़नेवाला नहीं, बहुत कुछ गुननेवाला आलेख. 
   
 

Sangita Singh Baghel [sangita2003@gmail.com] Korba, CG

 
  विनायक सेन का विरोध कर के छत्तीसगढ़ की सरकार औऱ मीडिया उन्हें नोबल पुरस्कार दिला कर ही छोड़ेगी. विनायक सेन और उनके सहयोगी यही तो चाहते हैं.
कनक जी, आपने कम से कम निरपेक्ष तरीके से सवाल उठाये हैं.
 
   
 

Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Noida

 
  जो लोग कोर्ट का हवाला दे रहे हैं, ये वही लोग हैं जो साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी से अब तक पूरे देश में प्रलाप कर रहे हैं.
एक लोकतांत्रिक देश में लोगों को कोर्ट के अंदर तो बात करनी ही चाहिये, उन्हें कोर्ट के बाहर भी बात करने का अधिकार है. विनायक सेन कोई हीरो नहीं हैं लेकिन हर आम आधमी को यह अधिकार है. भाजपा और उनके पैसे पर पल रहा मीडिया का एक वर्ग चाहता है कि उसे तो मंदोदरी विलाप करने दिया जाये लेकिन कोई दूसरा अपना बात नहीं रखे.
 
   
 

Ajay Kumar verma [] Raipur Chhattisgarh

 
  आपने बहुत अच्छा लिखा है कनक जी. बहुत तार्किक और सटीक. यह उन दोनों तरह के लोगों को जवाब है, जो विनायक को नायक या खलनायक बताने पर तुले हुये हैं. सैनिकों के 2400 करोड़ रुपये खा जाने वाले कोयला माफिया का एक दलाल जगह-जगह लोकतांत्रिक तरीके से सवाल उठाने वालों को जयचंद की पदवी बांटता फिर रहा है. ऐसे दलालों से पूछा जाना चाहिये कि रातों-रात सैनिकों का पैसा खा कर महंगी गाड़ी में घूमने वाले दलाल कब से राष्ट्रभक्त हो गये ? ऐसे दलाल पहले अपनी तरफ देखें कि पांच साल पहले ये कहां थे और आज छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का खून पी कर ये कितने मोटे-ताजे हो गये.
साल्वे का सवाल आपने बहुत महत्वपूर्ण तरीके से उठाया है. जो लोग हाईकोर्ट का हवाला देते हैं, उन्हें हाईकोर्ट के उन सूचनाओं का भी पता होना चाहिये कि वहां इतने मामले दर्ज हैं कि उनको निपटाने में सैकड़ों साल लग जायेंगे.ऐसे लोगों को दो-चार दिन जेल भेज कर छोड़ देना चाहिये, जो कोर्ट का हवाला दे रहे हैं.
 
   
 

saroj kumar vats [saroj.vats@gmail.com] Toranto, CANADA

 
  आपने बहुत अच्छे तरीके से विश्लेषित किया है. दिलचस्प ये है कि आपने विनायक सेन के सही-गलत होने को लेकर कोई बात नहीं की है. उनके वकील रहने के बावजूद. यह तथ्य रेखांकित करने योग्य है. काश कि हमारे दूसरे लेखक भी इसी तरह बिना आग्रह के सोचते, विचारते औऱ लिखते. 
   
 

अशोक []

 
  एक शानदार और तर्कपरक आलेख. 
   
 

bhagatsingh [] Raipur

 
  ये सही है कि सरकारें इतिहास से सबक नहीं लेतीं. मंडेला को जिस तरह नस्लवादियो ने 25 साल जेल में रखा और आंग सांग सू की को तानाशाहों ने सजा देकर उन्हें और उनकी आवाज़ को दबा नहीं सके.कार्पोरेट और अमेरिका के चरणों में पड़ी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सरकार ने बिनायक को उम्रकैद दी हैं. हाशिए पे धकेल दी गई लोगो के पक्ष में बोलने वालो को नक्सली नेटवर्क का हौव्वा बतलाकर ऐसे लोगों का मनोबल कमज़ोर करने की साजिश के तहत उन पैर नज़र रखने का हल्ला मचाया जा रहा है.
शायद उन्हें मालूम हो कि ऐसी गीदड भभकी से यदि कोई डरता तो आज दुनिया में बिनायक अकेले होते. निर्णय को मैने गंभीरता से पढ़ा हैं उसमे सिर्फ पोलिस के बयां को ही सबूत मन गया हैं.यह सब जानते हैं कि उपरी अदालतों में ये कही टिकेगा नहीं,लेकिन इसके बहाने तथाकथित देशभक्तों की जमात ने जो माहौल बनाया है उसका प्रभाव तो आम लोगो पर पड़ेगा ही.
आपके इस बेहतरीन लेख के लिए बहुत बहुत बधाई.
 
   
 

zulaikha jabeen [] Raipur

 
  अद्भुत-शानदार... चरण/भाटों की चारागाह छत्तीसगढ़ से सुनाई देती दहाड़ इस बात का सुबूत है कि यहाँ अभी शेर जिंदा बच गये हैं.बधाई कनक जी.
यूं तो अब यहाँ के कई अखबारों ने विनायक सेन के हक में एम.जे. अकबर, रामचंद्र गुहा, विनोद वर्मा के लेख छाप कर अपने कालिख पुते चेहरा पोंछने की नाकाम कोशिश शुरू कर दी है-लेकिन फिर भी आपके विचारों का इंतज़ार था. जो ख़तम हुआ. आपके हौसलों को सलाम. यूं भी बर्तोल्त ब्रेख्त अपने एक गीत में कह गये हैं...
क्‍या ज़ुल्‍मतों के दौर में भी गीत गाये जायेंगे ?
हां, ज़ुल्‍मतों के दौर के ही गीत गाये जायेंगे!
 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in