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राष्ट्रद्रोह, राजद्रोह और जनविद्रोह

बहस

 

राष्ट्रद्रोह, राजद्रोह और जनविद्रोह

कनक तिवारी


विनायक सेन के मामले में चुप रहना उचित नहीं होगा. मैं ज़मानत आवेदन के सिलसिले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में उनका वकील रह चुका हूं. इसलिए मुझे अच्छी तरह मालूम है कि उस स्थिति में विनायक सेन के विरुद्ध पुलिस की केस डायरी में ऐसा कुछ नहीं था कि प्रथम दृष्टि में मामला भी बनता. यह अलग बात है कि हाईकोर्ट ने उनकी ज़मानत मंजूर नहीं की जो बाद में लगभग उन्हीं तथ्यों पर बल्कि पुलिस द्वारा और कुछ साक्ष्य एकत्रित कर लिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में मंजूर हो गई.

विनायक सेन


दरअसल हो यह रहा है कि राज्यों में आईएएस के नौकरशाह, पुलिस अधिकारी और कुछ सामंती तत्व साहित्य, संस्कृति और विचार के प्रभारी बन बैठे हैं. इंदिरा गांधी के ज़माने तक उनके हाथों में राजकाज की नकेल होती थी, जिन्हें हिन्दी में तर्जुमा करने पर ‘राजनीतिक प्राणी‘ कहा जाता है. विनायक सेन के मामले में मंत्रिपरिषद के सोच का कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है.

मुख्यमंत्री तथा एक दो मंत्रियों को छोड़कर छत्तीसगढ़ में व्याप्त नक्सल समस्या की जानकारी मंत्रिपरिषद और विपक्षी विधायकों तक को ठीक से नहीं है. उन्हें खबरों, घटनाओं, विवरणों और सांख्यिकी वगैरह के बारे में सूचित किया जाता है. विचार विमर्श, अध्ययन, आंतरिक मतभेद, असहमति वगैरह लोकतंत्र के पाए हैं. ये सभी मंत्रिपरिषदों में गायब हैं. ऐसे में पुलिसिया दिमाग को तरजीह मिलती जाती है. उसकी खाकी भाषा में सफेद और काले तक का फर्क नहीं होता है. राजनेताओं के सफेद वस्त्र दैनिक आधार पर मैले हो गए हैं. खाकी वर्दी महीने में एक दो बार धुलती होगी. जो काले कोट पहनकर न्यायतंत्र चला रहे हैं वहां उनका धुलना साल छह महीने में होता होगा. यदि कोई आदिवासी या दलित मंत्री नौकरशाही के पर कतरना भी चाहता है तो उसे घेर-घारकर पस्त हिम्मत कर दिया जाता है.

अंगरेज़ों के ज़माने से लोकअभियोजक को खेल के अंपायर की तरह समझा गया है. प्रिवी कांउसिल की कई नज़ीरों में कहा गया है कि लोक अभियोजक अभियुक्त और थानेदार के बीच निर्णायक होता है. उसे थानेदार का बगलगीर होकर कचहरी की अधगंदी कैंटीन में समोसे खाते हुए पुलिसिया चालान को अभिप्रमाणित नहीं करना चाहिए.

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि विनायक सेन वगैरह के मामले में लोक अभियोजक ने ऐसा अन्वेषण नहीं किया होगा जिससे वह पुलिसिया चालान में खामियां ढूंढ़कर उसे चुस्त दुरुस्त करने की सलाह दे. यदि ऐसा होता तो मामले की इतनी बदरंग शक्ल नहीं होती. यह लतीफा है या कटाक्ष कि मामले में हाईकोर्ट में अपील तो की जा सकती है. हाईकोर्ट कितने दिनों में फैसला करेगा? व्यवस्था की इस बुराई का खमियाजा देश में लाखों न्यायाधीन कैदी भुगत चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में बार-बार सरकारों को लताड़ लगाई है लेकिन वही ढाक के तीन पात. हाईकोर्ट भी निचली अदालत की मिसल की सकरी गली से गुजरकर न्याय के पाथेय तक पहुंचना चाहेगा.

भारत में अपील न्यायालयों का काम दायें बायें देखना नहीं है. मानो कोल्हू के बैलों की दोनों आंखों पर पट्टी बांध दी जाए और चलने को कहा जाए. यह दुष्ट प्रावधान अंगरेज़ों ने दिया है. हाईकोर्ट इस नियम का अपवाद होना चाहिए. अपील न्यायालय में नई गवाही लेने के प्रावधान भी हैं.

पहली ज़मानत की अर्ज़ी के दरम्यान यह मनोरंजक बात मेरे सामने आई थी कि नारायण सान्याल को जब कत्ल के मामले में आंध्रप्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार कर छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया था तब उसके कुछ अरसा बाद ही छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम लागू किया गया. इस तरह नारायण सान्याल को ही नक्सलवादी घोषित करना तकनीकी तौर पर संभव नहीं था. सान्याल द्वारा दी चिट्ठियां जेल के अंदर यदि किसी व्यक्ति को दी गईं तो जेल के संबंधित अधिकारी अपनी वैधानिक ज़िम्मेदारी से कैसे बरी कर दिए गए? जेल नियम इस संबंध में मुलाकातियों के लिए तो काफी सख्त हैं.

यह पढ़ने में अच्छा लगता है कि राम जेठमलानी के कद के वकील ने विनायक सेन की पैरवी करने का ऑफर दिया है. वे इंदिरा गांधी के हत्यारों के भी चुनिंदा वकील थे. अमित जोगी के ज़मानत आवेदन पत्र पर उन्होंने जो बहस की थी उसमें तैयारी का अभाव दिखलाई पड़ता था बनिस्बत सी.बी.आई. के वकील के.

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टेलीविजन पर शीर्ष वकील हरीश साल्वे विक्टोरियन ककहरा ही उच्चारित कर रहे थे कि सब कुछ अपील न्यायालय में ही किया जाना चाहिए. बाहर उसकी आलोचना नहीं होनी चाहिए. देश में सैकड़ों ऐसे मामले हुए हैं जब उन पर चैतरफा टिप्पणियां की गई हैं. इस सिलसिले में किताबें और लेख लिखे जाते हैं जिसके सैकड़ों उदाहरण हैं.

साल्वे वही वकील हैं जिनकी शिकायत पर प्रशांत भूषण पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चल रहा है. प्रशांत भूषण ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के आधे मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट रहे हैं. विनायक सेन के मामले में उनके ही खैरख्वाह कमज़ोर पैरवी किए जाने की बात भी कहते हैं. उचित तो यही होगा कि जनमत को तथाकथित न्यायाधीन रहने की थीसिस का हौव्वा दिखाकर मुंहबंद नहीं किया जाए. साथ-साथ कानूनी लड़ाई तो लड़नी ही होगी.

ऐसा नहीं है कि पुलिसिया चालान दंतकथाओं या अफवाहों पर ही आधारित होते हैं. न्यायाधीश की प्रथम दृष्टि के लिए पुलिस किसी न किसी तरह मामला बना ही लेती है. लेकिन अधिकतर मामलों में निचली अदालत के न्यायाधीश की प्रथम दृष्टि में दोष होता है. सभी न्यायाधीश दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 के अंतर्गत अपने कर्तव्यों का पालन कहां करते हैं? वे अधिकतर पुलिस की डायरी को अभियुक्त का चरित्र प्रमाणपत्र मान लेते हैं. फिर मामला आगे बढ़ाते चलते हैं, भले ही वह भरभरा कर गिर क्यों नहीं जाए.
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